विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

यशवन्त कोठारी की 2 ताज़ा लघुकथाएँ

लघु कथाएं

अमंगल में भी मंगल

यशवन्त केाठारी

एक राजा और उसके मंत्री में बहुत दोस्ती थी । राजा हर काम करने से पहले मंत्री से पूछता था और मंत्री का एक ही जवाब होता था, 'महाराज, अमंगल में भी मंगल छिपा है ।'

राजा अकसर यह सोचकर परेशान होता था कि यह अमंगल में मंगल कैसे छिपा होता है ?

एक बार राजा की उँगली में भयंकर फोड़ा हुआ और उसकी उँगली काटनी पड़ी। राजा ने मंत्री से पूछा तो उसका फिर वही जवाब था, 'अमंगल में भी मंगल छिपा है ।' राजा को बहुत गुस्सा आया-एक तो उसकी उँगली कट गई और मंत्री इसे ठीक बता रहा है । उसने मंत्री से पूछा, ''कैसे ?''

मंत्री ने जवाब दिया, '''महाराज, समय आने पर सब पता चल जाएगा ।'' कुछ समय बाद राजा और मंत्री शिकार करने घने जंगल में गए । राजा मंत्री के इस व्यवहार से बड़ा परेशान था । अचानक राजा ने सोचा, अगर मैं इसे कुएँ में धक्का दे दूँ, तब यह क्या कहेगा ? यह सोचकर राजा ने पास के कुएँ में मंत्री को धक्का दे दिया और कुएं में गिरे मंत्री से पूछा, ''कहो भाई, अब क्या कहते हो ?''

''महाराज, अमंगल में भी मंगल छिपा है ।''

अंधेरा हो गया, राजा रास्ता भटक गया । उसी समय बलि की तलाश में निकले देवी के भक्त आए और बलि देने के लिए राजा को पकड़कर ले गए । राजा भयभीत और परेशान था ।

राजा को ध्यान से देखने के बाद पुरोहित ने कहा, ''अरे छोड़ो इसे ! इसकी तो एक उँगली कटी हुई है, बलि केवल पूरे बत्तीस लक्षणों से युक्त पुरुष की होती है ।''

राजा अपनी कटी उँगली की बदौलत बच गया । वह कुएँ के पास आया ओर किसी तरह मंत्री को बाहर निकाला । फिर पूछा, ''कहो भाई, कैसे हो ?''

''ठीक हूँ महाराज ।''

''देखो, मैं अपनी कटी उँगली की वजह से बच गया ।''

''महाराज, मैंने कहा था न-अमंगल में भी मंगल है ।''

''वह तो ठीक है । मगर तुम्हारे कुएँ में गिरने में कौन सा मंगल था ?''

''महाराज, मेरा पूरा शरीर साबुत है, कोई अंग-भंग नहीं है । यदि आप मुझे कुएँ में नहीं धकेलते, तो मैं आपके साथ होता । मेरा शरीर साबुत होने के कारण वे लोग मेरी बलि दे देते । इसलिए मैं कहता हूँ कि अमंगल में हमेशा मंगल छिपा रहता है ।''

0 0 0

यशवन्त कोठारी

86,लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002 फोन ०९४१४४६१२०७

 

दीपदान

यशवन्त कोठारी

प्रोफेसर शर्मा अपने क्वार्टर में उदास बैठे डूबते सूर्य को निहार रहे थे । संध्या कभी कितनी खूबसूरत हुआ करती थी, जब उनकी बिटिया संध्या उनके आँगन में धमा-चौकड़ी मचाया करती थी, लेकिन आज.....। उनकी आँखों में आँसू आ गए ।

एक महीना भी तो नहीं बीता-वह स्कूल से लौट रही थी; सामने सिटी बस से उतरकर कॉलोनी की तरफ आ रही थी कि एक ट्रक ने धड़धड़ाते हुए उसके शरीर को कई टुकड़ों में बिखेर दिया । पूरी कॉलोनी में सन्नाटा छा गया था । हर कोई मिसेज शर्मा और प्रोफेसर शर्मा को दिलासा दे रहा था ।

अस्पताल में डॉक्टर नरेश ने उनकी बेटी की आँखें माँग ली थीं । प्रोफेसर मना नहीं कर सके और अपनी बेटी की आँखें नेत्र बैंक हेतु दे आए थे ।

पिछली दीपावली कितनी खूबसूरत, चमचमाती और रंगीन थी । और आज.... । उनकी समस्त इच्छाएँ ही मर गई थीं ।

मिसेज शर्मा अलग-थलग उदास पड़ी रहती थीं ।

प्रोफेसर शर्मा कॉलेज जाते, उदास चेहरे से पढ़ाते और वापस आकर अपने क्वार्टर की कोठरी में बंद हो जाते । न कहीं आना, और न कहीं जाना । दीपावली जैसा त्योहार भी उन्हें बेकार लग रहा था क्योंकि उनकी इकलौती लड़की संध्या जो नहीं रही ।

आप दीपावली का दिन है । सब घरों में खुशियाँ मनाई जा रही है । मिठाइयाँ बन रही हैं, लेकिन प्रोफेसर शर्मा के चेहरे और घर में अजीब उदासी है ।

अचानक कॉलबेल बजी । दरवाजा खोलने पर आठ-दस वर्ष की एक लड़की ने चहकते हुए उनके कमरे में कदम रखा ।

''पापाजी ! आप नहीं जानते, मैं संध्या हूँ, आपकी संध्या, देखिए मेरी आँखें !'' प्रोफेसर शर्मा ने देखा, वाकई वे ही खूबसूरत आँखें, जैसे संध्या की हों । उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई, वे भी दौड़ी आईं । इस बच्ची ने उन्हें भी प्रणाम किया, फिर कहा-''मम्मी-डैडी, आप शायद मुझे नहीं जानते, लेकिन डॉक्टर अंकल ने मुझे सबकुछ बता दिया है । मैं जन्म से अंधी थी । डॉक्टर नरेश अंकल ने मुझे आपकी संध्या की आँखें आपकी ही हैं डैडी; देखिए, वही रंग, वैसी ही लंगी । मैं संध्या हूँ ।''

''हाँ बेटी, तुम संध्या ही हो । ''

''मम्मी, मेरे डेडी बाहर खड़े हैं । उन्हें भी बुला लाऊँ ।''

''हाँ, बेटी जरूर ।''

''नमस्ते, प्रोफेसर साहब ! मैं मेजर बलवंत हूँ। मेरी बेटी जन्म से अंधी थी । आपकी कृपा से मेरी बेटी को आँखें मिल गईं और अब यह भी देख सकती है । देखिए, प्रोफेसर साहब मेरे भी एक ही बेटी है । आज से यह आपकी भी बेटी हुई आइए, दीपावली के पावन पर्व पर हम सब खुश हो जाएँ ।''

अश्रुपूरित नेत्रों से प्रोफेसर शर्मा, श्रीमती शर्मा ने अपनी नई बेटी का स्वागत किया और कहा-''मेजर साहब, मुझे अपनी बेटी वापस मिल गई ।''

0 0 0

यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर302002 फोन ०९४१४४६१२०७

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget