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प्राची - सितम्बर 2016 / हास्य-व्यंग्य / धारावाहिक उपन्यास / एक गधे की वापसी / कृश्न चन्दर

हास्य-व्यंग्य

धारावाहिक उपन्यास

एक गधे की वापसी

कृश्न चन्दर

छठीं किस्तः

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जाना गधे का दि ग्रेट नेशनल स्टार बैंक ऑफ इण्डिया में, और जमा कराना तीस लाख रुपये का, और मुलाकात करना बैंक के जनरल मैनेजर से...

बैंक के मैनेजर से एक असिस्टैण्ट ने कहा, ‘‘आपसे मिलने के लिए एक गधा आया है.’’

‘‘गधा? गधे का बैंक में क्या काम!’’ बैंक के मैनेजर ने चौंककर पूछा.

बैंक के अंदर आते ही मुझे देख सब लोगों में खलबली मच गई थी. क्लर्क लोग अपनी कुर्सियों से उठ खड़े हुए और एड़ियां उचका-उचकाकर मुझे देखने लगे. पैसा निकलवाने और पैसा जमा कराने वाले सब मुझे आश्चर्य और परेशानी से देख रहे थे.

इससे पहले कि लोग अपने होश-हवास ठीक करके मेरे प्रवेश का विरोध कर करते, सेठ भूरीमल मुझे लेकर मैनेजर के कमरे में प्रविष्ट हो गया.

‘‘यह क्या बदतमीजी है!’’ बैंक-मैनेजर चिल्लाया. फिर वह सेठ भूरीमल की ओर मुड़कर बोला, ‘‘श्रीमान्जी, यह बैंक है, अस्तबल नहीं!’’

सेठ भूरीमल कुछ कहना चाहता था, किन्तु मैंने उसे बात नहीं करने दी. मैंने धीरे से मुस्कराकर कहा, ‘‘इस दुनिया में सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि जिन लोगों को बैंक में होना चाहिए वे अस्तबल में बंद कर दिए जाते हैं, और जिन लोगों को वास्तव में अस्तबल में होना चाहिए वे बैंक में पाए जाते हैं!’’

बैंक-मैनेजर मुझे बोलता देखकर आश्चर्यचकित हो गया. उसका निचला जबड़ा लटके का लटका रह गया. वह हकलाकर बोला, ‘‘आ...आ...आपकी तारीफ?’’

‘‘एक गधे की तारीफ क्या हो सकती है! वह भला इस योग्य कहां, किंतु मैं आपका समय नष्ट नहीं करूंगा. मुझे गधा कहते हैं. मैं आपके यहां अपना एकाउंट खोलने आया हूं.’’

‘‘हमारे यहां किसी गधे का एकाउंट नहीं खुल सकता.’’

‘‘क्यों नहीं खुल सकता? मैं नकद रुपया लाया हूं. आपका बैंक-चार्ज देने को तैयार हूं.’’

‘‘आप इंसान नहीं, हैवान हैं!’’

‘‘इस बात की क्या गारंटी है कि आपके यहां जो लोग आते हैं सबके सब इंसान हैं? मैंने बहुत इंसानों को हैवानों से बुरा जीवन व्यतीत करते देखा है. मैं बैंक एकाउंट रखने वाले बहुत-से ऐसे इंसानों को जातना हूं जिन्हें देखकर हैवानों से प्रेम हो जाता है.’’

‘‘मैं विवश हूं साहब,’’ बैंक-मैनेजर मेरी बातों से परेशान होकर बोला, ‘‘यह हमारे बैंक का नियम है कि हम किसी जानवर या हैवान का एकाउंट नहीं खोल सकते.’’

‘‘इंसान की एक विशेषता यह भी है कि बोलने वाला गधा है. इस सीमा तक आप मुझे भी इंसान समझ सकते हैं.’’

‘‘बहस मत कीजिए. चले जाइए. मैं यहां किसी गधे का एकाउंट नहीं खोल सकता!’’ बैंक-मैनेजर ने बड़ी कठोरता से कहा.

मैंने कहा, ‘‘बस दो-एक बातें बता दीजिए. फिर मैं चला जाऊंगा.’’

‘‘फर्माइए.’’

‘‘ये जो हजारों आदमी आपके बैंक में रुपया जमा कराते हैं इनको आप क्या देते हैं?’’

‘‘देने का क्या मतलब! हम तो लेते हैं, बैंक का ब्याज.’’

‘‘यानी एक तो आप हमारा रुपया अपने पास रखें, और फिर ब्याज भी हमसे लें!’’

‘‘नहीं, यदि आप जनरल एकाउंट के बजाय सेविंग एकाउंट या फिक्स्ड डिपाजिट में रुपया रखवा दें तो हम आपको ब्याज देंगे.’’

‘‘आखिर आप मुझे क्यों मदद देंगे! जब मेरा रुपया आपके पास सदा जमा रहता है तो फिर मुझको कैसे ब्याज दे सकते हैं? क्या मेरा रुपया आपके पास पड़ा-पड़ा अंडे देता है?’’

मैनेजर हंसा. बोला, ‘‘श्रीमान्जी, बात यह नहीं है. वह बात यह है कि आप हजारों लोग जो अपना थोड़ा-थोड़ा करके सैकड़ों की पूंजी हमारे बैंक में जमा करते हैं, उन्हीं की पूंजी को जमा करो तो लाखों की रकम हो जाती है. फिर हमारे बैंक के डायरेक्टर लोग आपकी पूंजी को बड़े-बड़े उद्योगों में लगाते हैं, सुरक्षित सम्पत्तियां खरीदते हैं और लाखों का लाभ कमाते हैं.’’

‘‘यानी निर्धन आदमी अपनी छोटी-सी पूंजी सुरक्षा के विचार से तुम्हारे जनरल एकाउंट में रखता है, उसके लिए चार्ज देता है, और तुम हम सबकी पूंजी जमा करके लाखों का धन्धा कर लेते हो!’’

‘‘जी हां, बात तो कुछ ऐसी ही है.’’

‘‘और फिर तुम कहते हो इस बैंक में किसी गधे का एकाउंट नहीं खुल सकता!’’

बैंक-मैनेजर मेरी बात समझकर हंस दिया. बोला, ‘‘आप अत्यंत चतुर सिद्ध हैं.’’

‘‘निर्धन आदमी कभी-कभी अपनी मुसीबत को चतुरता से न टाले तो जीना कठिन हो जाए. अच्छा मैनेजर साहब, हम जाते हैं.’’

यह कहकर मैं बैंक-मैनेजर के कमरे से बाहर निकल आया. मेरे जाने के बाद भूरीमल ने बैंक-मैनेजर से कहा, ‘‘तुमने बड़ी भारी गलती की, दयालुराम! यह गधा तीस लाख रुपये जमा कराने आया था.’’

‘‘तीस लाख!’’ बैंक-मैनेजर जोर से चिल्लाया.

‘‘हां, तीस लाख!’’ सेठ भूरीमल ने सिर हिलाकर कहा.

‘‘तीस लाख!’’ बैंक-मैनेजर कुर्सी से उछलकर बाहर दरवाजे की ओर दौड़ा.

‘‘अरे, वह गधा कहां है?’’

बैंक में खलबली मच गई. सब लोग मैनेजर को बैंक से भागकर बाहर निकलते हुए मेरे पीछे-पीछे भागते हुए देख रहे थे.

बैंक-मैनेजर चीख रहा था, ‘‘अबे ओ गधे, यानी कि अजी जनाब गधे साहब! जरा सुनिए तो सरकार मेरी!’’

मैंने पीछे मुड़कर पूछा, ‘‘क्या है?’’

बैंक-मैनेजर ने मेरी रस्सी पकड़ी और बड़ी दयनीयता से बोला, ‘‘मुझसे बड़ी गलती हुई. वास्तव में मुझे आपको पहचानने में बड़ी गलती हुई. अब आप अंदर चलिए और अपना रुपया जमा कर दीजिए.’’

‘‘पर मैं तो एक गधा हूं.’’

‘‘अजी, आप गधे क्या उल्लू भी हों तो भी कोई बात नहीं!’’

‘‘मैं एक हैवान हूं.’’

‘‘अजी आप हैवान क्या शैतान हों, तब भी आपको न जाने दें! चलिए, अंदर चलिए!’’

बैंक का मैनेजर फर्शी सलाम करते हुए मुझे अपने कमरे में अंदर ले गया.

लोग आश्चर्य से हक्का-बक्का रह गए. अंदर जाते ही बैंक के मैनेजर ने जोर से घंटी बजाई.

‘‘एकाउंट का फार्म लाओ. हस्ताक्षर का फार्म लाओ. पासबुक लाओ, चेकबुक लाओ...जल्दी लाओ!’’

फिर मेरी तरफ मुड़कर बोला, ‘‘आप तीस लाख रुपये जमा कराएंगे?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘हुम्!’’ बैंक-मैनेजर ने प्रसन्नता से अपनी एड़ियां रगड़ीं. फिर बोला, ‘‘मेरे ख्याल से आप बीस लाख तो फिक्स्ड डिपाजिट में रख दीजिए, पांच लाख सेविंग एकाउंट में और पांच लाख जनरल एकाउंट में.’’

‘‘जी नहीं,’’ मैंने कहा, ‘‘मैं इक्कीस लाख रुपये फिक्स्ड डिपाजिट में रखूंगा, चार लाख सेविंग में और पांच लाख जनरल एकाउंट में.’’

‘‘बीस की बजाय इक्कीस लाख क्यों?’’ सेठ भूरीमल ने पूछा.

‘‘इक्कीस लाख रुपये मठ के लिए सुरक्षित रखना चाहता हूं!’’ मैंने सेठ भूरीमल को बताया. ‘‘वह भूल गए कि गुरुजी ने जो मुझे हिमालय पर मठ खोलने के लिए कहा था?’’

सेठ भूरीमल को याद आ गया और विश्वास हो गया.

मैनेजर ने एक फार्म मेरे सामने रखते हुए कहा, ‘‘इस पर हस्ताक्षर कर दीजिए.’’

‘‘मैंने कहा, ‘‘मैं हस्ताक्षर नहीं कर सकता. मैं तो गधा हूं.’’

‘‘कोई बात नहीं,’’ मैनेजर बोला, ‘‘आप अंगूठा लगा दीजिए.’’

‘‘गधे का अंगूठा भी नहीं होता, सुम होता है.’’

‘‘सुम भी चलेगा. तीस लाख रुपये की रकम के लिए सुम तो क्या गधे की दुम का निशान भी चलेगा!’’ मैनेजर मुस्कराकर बोला और उसने फार्म मेरे सामने रख दिया.

‘‘सुम लगाइए.’’

सेठ भूरीमल ने कहा, ‘‘पढ़ जाओ.’’

‘‘क्यों?’’ मैंने पूछा.

सेठ भूरीमल ने मैनेजर से पूछा- ‘‘इस रकम पर आपको ओवर-ड्राफ्ट क्या मिलेगा?’’

‘‘ओवर-ड्राफ्ट क्या होता है?’’ मैंने पूछा.

सेठ भूरीमल ने स्पष्ट करते हुए कहा, ‘‘बैंक में जितना एकाउंट हो आप उससे अधिक निकलवा सकते हैं. उसकी एक रकम निश्चित हो जाती है.’’

मैनेजर बोला, ‘‘इस रकम पर मैं आपको एक लाख रुपये ओवर-ड्राफ्ट दूंगा.’’

‘‘एक लाख नहीं दो लाख.’’ सेठ भूरीमल ने कहा.

‘‘चलिए दो लाख सही. आप सुम लगाइए.’’

जब मैं फार्मों पर सुम लगा रहा था, उसी समय एक दुबला-पतला परेशानहाल आदमी अंदर आया और बैंक-मैनेजर से कहने लगा, ‘‘मेरी पत्नी बहुत बीमार है. जाने बचे कि नहीं बचेगी. मुझे उसकी दवा-दारू के लिए डेढ़ सौ रुपये चाहिए. और मेरे एकाउंट में केवल पचास रुपये जमा हैं इस समय. मैनेजर साहब, मुझे एक सौ का ओवर-ड्राफ्ट दे दीजिए. दो दिन के बाद पहली तारीख को जब मुझे वेतन मिलेगा, मैं एक सौ रुपये बैंक में जमा कर दूंगा.’’

‘‘क्या आपका ओवर-ड्राफ्ट बैंक से स्वीकृत है?’’ मैनेजर से पूछा.

‘‘जी नहीं. पर मेरी पत्नी बहुत बीमार है. वह मर जाएगी अगर...’’

मैनेजर ने बात काटकर कहा, ‘‘सॉरी, मैं इस मामले में कुछ नहीं कर सकता.’’

वह आदमी रोता हुआ बाहर चला गया.

मैंने मैनेजर से कहा, ‘‘तीस लाख जमा करने वाले गधे के लिए दो लाख का ओवर-ड्राफ्ट! और किसी की पत्नी मृत्यु-शैया पर पड़ी हो, उसे सौ रुपये भी न मिलें. मैनेजर साहब, आप अपेन बैंक को इंसानों का बैंक कहते हैं?’’

बैंक का मैनेजर कुछ कहना चाहता था. किंतु इतने में द्वार फिर खुला और एक लंबे बालों वाला गोरे रंग का आदमी- जिसने बादामी रंग की कमीज पहन रखी थी और एक सफेद पतलून और पेशावरी चप्पल पहने था- जल्दी से एक चेक लेकर अंदर आया और बोला, ‘‘कटाकट फिल्मी कम्पनी वालों ने मुझे डेढ़ सौ का यह चेक दिया था. पर क्लर्क बोलता है, कटाकट फिल्म कम्पनी के हिसाब में केवल एक सौ चालीस रुपये जमा हैं.’’

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ मैनेजर ने तुनककर पूछा.

‘‘आप ऐसा कीजिए कि कटाकट फिल्म कम्पनी के हिसाब में मैं दस रुपये अपने पास से जमा कराए देता हूं, और आप फटाफट मेरा डेढ़ सौ का चेक पास कर दीजिए. साला...अपना दस रुपये का ही तो मादा रहेगा. एक सौ चालीस रुपये तो अपने घर में आएगा.’’

‘‘ओ.के.’’ मैनेजर ने कहा और वह लंबे बालों वाला आदमी तत्काल बाहर चला गया.

‘‘यह कौन था?’’ मैंने उस आदमी की चालाकी से प्रभावित होकर बैंक-मैनेजर से पूछा.

‘‘यह दादा धमाल है. कटाकट कम्पनी में फिल्म डायरेक्टर है.’’

फिर वह मुझे पासबुक और चेकबुक देते हुए बोला, ‘‘लीजिए साहब आपका काम हो गया. मेरे लिए और कोई सेवा?’’

मैंने चेकबुक देखकर कहा, ‘‘क्या मैं अब इस एकाउंट से रुपया निकाल सकता हूं?’’

‘‘जितना जी चाहे निकाल सकते हो.’’ मैनेजर बोला.

‘‘अब चेकबुक पर हस्ताक्षर के बजाय अपना सुम लगा सकता हूं?’’

‘‘निस्संदेह! आपके सुम का निशान ही आपका हस्ताक्षर समझा जाएगा.’’

‘‘बहुत खूब!’’ मैंने सेठ भूरीमल से कहा, ‘‘अब आप इस चेक पर एक लाख की रकम लिख दें. मैं अपना सुग लगाए देता हूं.’’

एक लाख रुपये लेकर हम बाहर आ गए.

बाहर आकर सेठ ने मुझसे पूछा, ‘‘गुरु, इस रकम की क्या जरूरत थी?’’

मैंने कहा, ‘‘अधिक बकवास मत करो. यहां से सीधे नुक्कड़ की ‘जनरल स्टोर्स’ की दुकान पर चले जाओ और इस रकम के लिए एक झोला खरीद लाओ और उसे मेरी गर्दन में लटकाकर उसमें ये एक लाख रुपये रख दो.’’

सेठ बड़बड़ाता हुए और यह कहता हुआ चला गया, ‘‘अभी से इस गधे के दिमाग में गर्मी आ गई है.’’

उसका ख्याल था कि मैंने नहीं सुना होगा. किंतु मैंने सुन लिया था...खैर, तुझे भी ठीक कर दूंगा.

जब सेठ नुक्कड़ पर गायब हो गया तो मेरे कानों में यह आवाज आई-

‘‘सेठ!’’

मैंने इधर-उधर देखा तो सेठ नहीं दिखाई दिया. फिर कानों में आवाज आई-

‘‘सेठ! मैं तुमको बोलता हूं.’’

अब जो मैंने देखा तो दादा धमाल था. कह रहा था, ‘‘सेठ, आइसक्रिम खाएगा?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘जलेबी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘बढ़िया मघई पान खाएगा-फर्स्ट क्लास!’’

‘‘नहीं.’’

मैंने अस्वीकृति से सिर हिलाकर कहा, ‘‘क्यों? बात क्या है? क्यों खुशामद कर रहे हो?’’

‘‘खुशामद तो हम अपने बाप की भी नहीं करेगा. पर तुमको काम की बात बताएगा. पर जरा इधर कोने में आ जाओ.’’

मैं उसके निकट चला गया. वह दस मिनट तक मेरे कान में खुसर-पुसर करता रहा और इधर-उधर देखता रहा. जब उसने दूर से सेठ भूरीमल केा आते देखा तो फौरन ‘फिर मिलूंगा’ कहकर लुप्त हो गया.

सेठ भूरीमल ने न उसे मुझसे बातें करते देखा, न गायब होते देखा. मेरे समीप आकर सेठ भूरीमल ने झोला मेरे गले में बांधा. उसमें एक लाख के नोट गिनकर डाले. मेरे पांव छुए और दोनों हाथ जोड़कर बोला, ‘‘गुरु महाराज! अब आप हिमालय कब जाएंगे?’’

एक लाख के नोट झोले में पड़ते ही मेरे सारे शरीर में एक विचित्र सनसनी-सी दौड़ गई. रगों में खून का दौरा तेज हो गया. सिर से पांव तक एक अंगड़ाई-सी आई. फिर मैंने जोर की एक हांक लगाई और कहा-

‘‘अहमक! अब हम हिमालय नहीं जाएंगे, यहीं बम्बई में रहेंगे.’’

‘‘अब वह गधों का मठ?’’ सेठ ने पूछा.

‘‘वह गधों का मठ अब बम्बई में ही खुलेगा.’’

‘‘यानी?’’ सेठ ने मेरी ओर आश्चर्य से देखकर पूछा.

‘‘यानी एक फिल्म कम्पनी.’’

‘‘फिल्मी कम्पनी?’’ सेठ भूरीमल जोर से चीखा, ‘‘गुरुजी, आप तबाह हो जाएंगे, बर्बाद हो जाएंगे!’’

‘‘हम न तबाह होंगे, न बर्बाद होंगे. हमें दादा धमाल ने बता दिया है. केवल अड़तालीस रुपये में फिल्म कम्पनी खुल सकती है.’’

‘‘केवल अड़तालीस रुपये में? महाराज, आपकी बुद्धि को क्या हुआ है?’’

‘‘हम कोई गधे नहीं हैं, सेठ! हम सब समझते हैं. दादा धमाल ने हमें सब समझा दिया है. वह कहता था- मुझे अड़तालीस रुपये दे दो. तुम्हें फिल्म कंपनी खड़ी करके दिखा दूंगा. मैंने उसे सौ रुपये दे दिये हैं, अब वह कल तक फिल्म कंपनी खड़ी करके मेरे पास आएगा.’’

‘‘फिल्म कंपनी न हुई, बांस का डंडा हो गया! उठाया और खड़ा कर दिया!’’ सेठ भूरीमल ने और भी उकताहट से कहा.

‘‘तुम नहीं समझते हो. हम सब समझते हैं. दादा धमाल ने हमें सब समझा दिया है, और फिर हमारे पास से जाएगा क्या?...केवल अड़तालीस रुपये. अड़तालीस रुपये में यदि अड़तालीस लाख का लाभ हो तो क्या तुम उसको बुरा धंधा कहोगे?’’

‘‘पर आएगा कहां से?’’

‘‘हम सब जानते हैं. हम सब समझते हैं. तुमको भी समझा देंगे. तुमको भी बता देंगे. कल दादा धमाल हमारे पास आएगा. उससे मिलकर अपनी तसल्ली कर लेना.’’

क्रमशः....

अगले अंक में.....

खोलना गधे का फिल्म कंपनी, और बन जाना प्रोड्यूसर और प्रेम करना बंबई की प्रसिद्ध हीरोइन प्रेमबाला से और बयान डायरेक्टर धमाल और दूसरे अभिनेताओं का...

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