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प्राची - सितम्बर 2016 : आश्चर्य वृतांत / अंबिकादत्त व्यास

धरोहर कहानी

अंबिकादत्त व्यास

पं. अंबिकादत्त व्यास भारतेन्दु मंडल के प्रसिद्ध लेखक थे. वे कवित्त सवैया की तत्कालीन प्रचलित शैली में काव्य-रचना करते थे. इन्होंने बिहारी सतसई के दोहों के आधार पर कुछ कुंडलियां संकलित की हैं. इन्होंने नई धारा से प्रभावित होकर अनेक रचनाओं का प्रणयन भी किया. बंगला काव्य की तरह से भी लिखना चाहा. ये अपने समय के प्रकांड पंडित थे. कट्टर सनातनी, कुशल वक्ता और प्रचारक के रूप में आपकी ख्याति रही.

अंबिकादत्त व्यास ने यूं तो पद्य और गद्य पर सम्यक् रूप से विचार किया और लिखा भी, किन्तु इनकी भाषा शैली में व्याकरणिक दोष है, पंडिताऊपन है, विराम चिन्हों का गलत प्रयोग है. ये बातें तो हैं किंतु इनकी नाट्य कृतियां ललिता (1884) और गोसंकट (1887) और सन् (1893) में प्रकाशित आश्चर्य वृतान्त एक अद्भुत आख्यान है. व्यास जी ने यह रचना चार वर्ष में पूरी की. न तो हिन्दी गद्य साहित्य में और न कथा साहित्य के विवेचन में इसका कोई उल्लेख मिलता है. यह कहानी है या आख्यान या मनःकल्पना (फेंटेसी) अभी विद्वानों ने निर्णय नहीं दिया है. कल्पना की अबूझ उड़ान, भाषा और वर्णन में जिंदादली, रोचकता का निर्वाह और एक अनगढ़ व्यवस्था इस वृतान्त को कथा बनाते हैं. इसलिए यहां इस वृतांत का प्रारंभिक अंश मात्र दिया जा रहा है.

आश्चर्य वृतांत

अंबिकादत्त व्यास

संसारेपि सतीन्द्रजालमपरं यद्यस्ति तेनापि किम्।’

(-इस संसार के रहते यदि कोई दूसरा इंद्रजाल भी है, तो इससे क्या?

(कवि का अभिप्राय यह है कि संसार ही सबसे बड़ा इंद्रजाल है.)

चित्रकूट से कुछ दक्षिण को झुकते, पुष्करिणी तीर्थ के पास विराधकुंड नामक एक तीर्थ है. वहां की भूमि भूपहाड़ों के कारण अत्यंत कठिन और पाषाणमय है. वहां लगभग सोलह-सत्रह हाथ की चौड़ाई का गोल एक कुवां ऐसा गहरा है, कि उसके देखने से ही ऐसा आश्चर्य होता है कि इन चट्टानों को तोड़कर इस घोर जंगल में वह किस बली ने खुदवाया है. वहां यह बात प्रसिद्ध है कि श्री रामचंद्र जी ने विराध राक्षस के गाड़ने का गड़हा करने के लिए पृथ्वी में बाण मारा, तब पाताल तक छेद हो गया था, सो यही है. अब तक लोग उसमें बड़े-बड़े पत्थरों के ढोंके छोड़ते हैं, पर वह ऐसा गहरा है कि खड़का तक नहीं सुन पड़ता. वह कितना गहरा है औ कैसा है इसके निश्चय करने को अंगरेज लोग बहुत दिनों से पीछे पड़े हैं पर अभी तक कुछ पता नहीं लगा. 1 मार्च सन् 1884 को अमेरिका के प्रसिद्ध प्रोफेसर ‘लूफ लिरपा’ वहां पहुंचे, उसी के पास तंबू तान डेरा डाला और दूरबीन लगा नाप-जोखकर यह निश्चय किया कि किनारों की तरफ चारों ओर संधी से अनेक घास-फूस और पेड़ वगैरह आए हैं. यदि किसी किनारे के कुछ लटकाया जायेगा तो उन झाड़-झंखाड़ों में फंस जाएगा. इसलिए जैसे कूप में घरारी पर से बड़ा घड़ा लटकाया जाता है, वैसे ही एक बड़ी घरारी पर से कल के द्वारा एक भारी लंघर इसके बीचोंबीच लटकाया जाय. उसी से इसकी गहराई का पता लगेगा. बस 5 तारीख को कल औ लंघर मंगाने के लिए बंबई पत्र भेजा गया और 14 तारीख को सब सामान आ पहुंचा औ 31 मार्च तक खोद-खाद गाड़-गूड़ कर घरारी ठीक-ठीक जमा दी गई.

अब 1 एप्रिल को सबेरे सात बजे प्रोफेसर साहब के साथ और भी कई अंगरेज लोग चारों ओर दूरबीन ले-लेकर बैठे और घरारी पर से पैंतालीस मन का लंघर लटकाया गया. उस गड़हे में बड़ा ही घोर अंधकार था, इसलिए प्रोफेसर साहब ने इस लंघर में एक बड़ा लंप भी बांध दिया था कि ज्यों-ज्यों नीचे जाय त्यों-त्यों उजाला भी होता जाय और ऊपर से सब कुछ देख भी पड़ता जाय. बस धीरे-धीरे लंघर लटकने लगा और उस अंधेरे में के पेड़, झाड़-झंखाड़, मकड़ियों के जाले, सांपों की केंचुलियां, बिल और संधों में बैठे बिच्छू आदि जंतु देख पड़ने लगे. प्रोफेसर साहब उसे देख-देख अपनी बही में कुछ-कुछ लिखते जाते थे औ वह लटकता जाता था. यहां तक कि दूर होने के कारण अंत में वह लंघर केवल एक गुब्बारे या तारे ऐसा चमकने लगा और उसके चारों ओर केवल अंधेरा देख पड़ने लगा.

नौ बजने के समय साहब ने निश्चय किया तो वह लंघर दो माइल औ तीन सौ सैंतीस गज नीचे जा चुका था. जब पंद्रह मिनट और बीते तब वह लंघर एकाएकी लटकने से रुक गया. साहब ने हिसाब किया तो उतनी देर में चार सौ पचास गज और नीचे पहुंचा था. अर्थात् कुल दो माइल और सात सौ सत्तासी गज नीचे जा पहुंचा था.

जब उन लोगों ने यह निश्चय किया कि अब लंघर का नीचे की ओर लटकाना किसी प्रकार हो ही नहीं सकता तो हारकर ऊपर ही खींचने लगे. पर खींचने के समय उस लंघर का बोझा बढ़ जाना देख साहब को औ और-और लोगों को भी बड़ा आश्चर्य हुआ और चकचिहाकर देखने लगे कि देखें, लंघर के साथ उलझा-पुलझा क्या आता है.

फिर क्रम से पहले धीरे-धीरे उस लंघर की लालटेन चमकने लगी, फिर उसका भी कुछ-कुछ आकार देख पड़ने लगा, फिर जब तक लोग एकटक लगाकर देखते ही हैं तब तक तो उस गंभीर गड़हे से एक बड़ी गूंज के साथ ध्वनि भी आने लगी. तब तो सभों को और भी आश्चर्य हुआ और ध्यान देकर सुनने से जाना गया कि ‘धीरे-धीरे’ यह शब्द है. साहब को आदमी के शब्द का निश्चय होते ही लंघर धीरे-धीरे खींचा जाने लगा और थोड़ी देर में यह शब्द स्पष्ट सुन पड़ने लगा. फिर देखा कि जाले और सूखी लताओं के साथ एक आदमी उस लंघर में चिपट रहा है. देखते ही साहब ने औ और लोगों ने भी उसे धीरज धराया कि ‘घबराओ मत, लंघर को जोर से पकड़े रहो.’

ज्यों ही लंघर ऊपर आया त्यों ही कल बल से साहब ने उस आदमी को लंघर से उतारा और उसके जाले छुड़ा, धूल झाड़ी पर वह मारे घबराहट के एकाएकी बेचेत-सा होकर हांफता हुआ लेट गया.

उसके कपड़े-लत्ते से जान पड़ता था कि वह राजपुताने की ओर का रहने वाला, किसी भले घर का आदमी है. झट छाया में ले जाकर, लोगों ने उसे पानी के छींटे दे, हवा कर ठंडा किया, घंटे भर में वह अपने में आया. जल पीने के अनंतर उसने पूछा कि यह कौन स्थान है? समीप कौन पहाड़ी है? यहां से गयाजी कितनी दूर हैं? और आप लोग क्यों जुटे हैं?

ये प्रश्न सुन के लोग और भी चकित हुए, क्योंकि इस समय ये कई बातें आश्चर्य की उपस्थित हुईं कि पहले तो उस विराध कुंड ही की गहराई बहुत लंबी पाना और फिर उसमें से विचित्र रीति से एक आदमी का निकलना, तिस पर भी वह आदमी राजपुताने की ओर का, और फिर भी वह पूछने लगा कि यहां से गयाजी कितनी दूर हैं.

उस समय उन लोगों को गड़हे की गहराई का कौतुक छोड़ इसकी बातें सुनने का एक नया ही कौतुक आ उमगा और चारों ओर से भीड़ों के ठट्ट जमने लगे.

पहले उसे संक्षेप से यह कह सुनाया गया कि यह चित्रकूट के पास का जंगल है और झन्ना-पन्ना, पथर कछार वगैरह की राजधानी यहां से समीप है. वे पहाड़ भी उसी लगाव के हैं. यहां से गयाजी सैकड़ों कोस पर हैं तथा हम लोग आज इस गड़हे की गहराई नापने को इकट्ठे हुए थे और इसीलिए हम लोगों ने यह लंघर लटकाया था. पर इस लंघर के साथ आपको देख, अब हम लोगों को कैसा आश्चर्य और कौतुक हो रहा है सो कह नहीं सकते. आप कौन हैं? कहां के हैं? कैसे इस गड़हे में आए? और कब से इसमें हैं? वहां का क्या हाल है? हम लोगों को बड़ा ही आश्चर्य है कि आप इधर से गिर के भीतर जाते तो जीते कैसे? कोई सुरंग होती तो क्या इस अंगरेजी राज्य में भी छिपी रहती? भूगर्भ की किसी विचित्र सृष्टि के आदमी होते तो हम लोगों से झट पट बोलचाल कैसे मिलती?

यह सुन वह आदमी और भी आश्चर्य में भर उठा, इधर-उधर ताकने लगा और बोला कि ‘‘क्या! गयाजी सैकड़ों कोस पर है?’’

वे बोले, ‘‘हां-हां, सैकड़ों कोस पर है.’’ यह सुन वह चार-पांच मिनट तक चुप होकर मन ही में विचारने लगा कि ‘ओः! परमेश्वर की क्या माया है. मैं कहां का रहने वाला, कहां सैर करने गया! कहां जा पड़ा!! और कहां आ निकला!!!’ फिर कुछ ठठककर प्रगट बोला कि ‘‘अच्छा आप लोगों को मेरा इतिहास सुनने का कुतूहल हो तो सुनिए, मैं कहूंगा. मेरी कथा बड़ी लंबी-चौड़ी और आश्चर्यमयी है.’’ फिर जब चारों ओर से ‘हां-हां, कहिए, कहिए हमारा बड़ा जी लगा है’- यह ध्वनि हुई तो वह बोला कि ‘‘अच्छा तो मैं बड़ी देर से प्यासा हूं, थोड़ा जल पी लूं तो स्वस्थ होकर कहूं.’’

फिर उसने उठकर, पास ही वाले एक पहाड़ की चट्टान के बीच से झरते हुए झरने का टटका पानी पीया और हाथ मुंह धो, आंखें मल, रूमाल से मुंह पोंछता हुआ फिर उसी समाज में आ बैठा और चारों ओर से लोगों को एकटक अपनी ही ओर ताकता हुआ देख, अपनी कथा कहने लगा-

‘‘मैं राजपुताने का रहनेवाला एक वैश्य हूं, पर मैं बहुत दिन से कलकत्ते में कोठी का काम करता हूं और प्रयाग, काशी, पटने आदि स्थानों में बेर-बेर आता-जाता रहता हूं. नए-नए नाटकादि तथा संवादपत्रों को उलट-पुलट किया करता हूं, इसलिए, मेरी बोलचाल से आप लोग कुछ भी न पहचानिएगा कि यह पछांही है, पर हां, हम लोग अपना वेष नहीं बदलते हैं.

‘‘मैं कलकत्ते से अपने पिता का श्राद्ध करने गयाजी आया था. मैं अकेला न था. साथ दस-पंद्रह पुरुष और भी थे. हम लोगों ने तीर्थ में जा विधिपूर्वक श्राद्ध किया. तब इच्छा हुई कि अब गया के इधर-उधर घूमकर पहाड़ों की भी हवा खायं. पहले हम लोग बुद्धगया गए. यह गयाजी के दक्षिण लगभग तीन कोस की दूरी पर है. वहां एक बड़ा भारी बुद्ध का मंदिर है, जिसे बहुत पुराना और टूटा-फूटा समझकर पहले ब्रह्मा के बादशाह ने मरम्मत करवाई थी और अब सरकार अंगरेज बहादुर की ओर से भी बड़ी मरम्मत कराई जा चुकी है.

‘‘सचमुच ऐसा ऊंचा और विशाल मंदिर मैंने आज तक कहीं नहीं देखा था. वहां के स्थान-स्थान में बुद्ध के चित्र देखने से मुझे इस देश में किसी समय बौद्ध मत के पूरे फैल जाने का स्मरण होता था.

‘‘वहां एक संपन्न महंत की बड़ी गद्दी है. इनको वहां के छोटे राजा ही कहना चाहिए. इनके यहां साधुओं की जमात है और विदेशियों को नियम से सीधा मिलता है. ये लोग शंकर मतानुयायी हैं. इनके देखने से मुझे साथ ही यह भी स्मरण हुआ कि स्वामी शंकराचार्य कैसे प्रतापी और बौद्ध मत के विरुद्ध थे कि जहां बौद्ध का मंदिर वहां साथ ही उनकी गद्दी भी अब तक जम रही है.’’

‘‘फिर हम लोग ब्रह्मयोनि के ऊंचे पहाड़ पर गए. यह गया के बहुत समीप है. इस पर गया और साहबगंज के नगर भर की शोभा देख पड़ती थी. ऐसा जान पड़ता था कि किसी ने उस नगर का चित्र लिख, पैर के पास धर दिया है. जैसे काशी और कलकत्ते में मिंट और हाईकोर्ट, नगर भर की शोभा देखने को ऊंचे-ऊंचे स्थान हैं, उन्होंने टक्कर में मुझे गया में ब्रह्मयोनी का पहाड़ जान पड़ा.

‘‘मैं उसे भलीभांति देखभाल कर, फिर बस्ती में आया. वहां लोगों के मुंह के बराबर के पहाड़ की बड़ी प्रशंसा सुनी कि वह अभी तक सिद्धस्थान है और वहां बहुत तपस्वी-मुनि लोग भी रहते हैं. तब मैं बड़ा उत्कंठित होकर चार-पांच इष्ट मित्र और नौकरों के साथ उस पहाड़ की ओर चला.

‘‘यह पहाड़ गया से कुछ दूर पड़ता है और मैं सैलानी आदमी, इसलिए दूसरे दिन पहुंचा. राह में कई एक गांव पड़े. वहां की विचित्र भाषा और विचित्र पहनावा देख मेरे चित्त में और ही भाव होता था. एक निरे गया निवासी और दूसरे एक टटके मैथिल भी मेरे साथ पड़ गए थे. जब वे एक-दूसरे से बातें करते थे तो विचित्र ही ‘कहलथू सुनलथू’ और ‘कहैछी सुनैछी’ की झड़ी सुन पड़ी थी. और तो था ही, पर इनके बात-बात में ‘थू’ और उनके बात में ‘छी’ था.

‘‘बराबर नामक पहाड़ दूर ही से देख पड़ने लगा. जान पड़ता था कि वह भी सिर उठाकर हम लोगों को देख रहा है. इसके सबसे ऊंचे शिखर पर एक पेड़ भी बड़ा भारी देख पड़ता था, जैसे सिर पर तुर्रा हो. इसी के पास एक पहाड़ था. इसका नाम लोगों ने कौआडोल बताया. यह बात भी लोगों से जानी गई कि इस पर एक बड़ी भारी शिला है, वह केवल कौए के बैठने से भी हिल जाती है. मैंने भी मान लिया कि क्या आश्चर्य है. कोई शिला ऐसी ही तराजू ऐसी होगी जो कौए का बोझा भी किसी ओर न संम्हाल सके.

‘‘यों सांझ होते-होते उस बराबर के पहाड़ की जड़ में पहुंचे. उस समय तक तो सांझ होने के कारण अंधकार होता ही आता था फिर उस पहाड़ के पेड़ों ने तो गाझिन होने के कारण एकाएकी नील ही स्वरूप धारण किया. वह आकाश चूमता हुआ ऊंचा पहाड़- वह श्याम पेड़ों की घटा- वह ठंडी हवा का सर्राटा- वह बनैले जंतुओं का शब्द- वह बड़ी कंदराओं का गूंजना- और वह एक विलक्षण सन्नाटा, इस समय भी मुझको प्रत्यक्ष ही सा जान पड़ता है.

‘‘फिर हम लोगों का एक साथी, जो मार्ग जानता था, आगे-आगे चला, हम लोग पीछे-पीछे चले. उसी पेड़ों के झमाट में एक ऊंची सी भूमि पर चढ़ना आरंभ किया. पैर-पैर पर भालू का भय होने लगा. मेरे पास कोई शस्त्र न था, पर मैंने अपनी छड़ी ही कस के थामी. सावधान नेत्रों से चकपकाकर चारों ओर देखता हुआ चला. ऊपर चढ़ जाने से उस मंद अंधेरे में भी यह देख पड़ने लगा कि यह पहाड़ कंकणाकार चारों ओर घूम गया है और बीच में इसने थोड़ा अवकाश छोड़ दिया और उसी पहाड़ी के घेर में पूर्व की ओर यह चढ़ानवाली भूमि थी मानो घेर में जाने का यह द्वार था. उस समय मुझे प्लेब्न, नेपाल आदि दुर्गम स्थानों का स्मरण होने लगा. यह भी मेरे चित्त में आया कि ऐसे इन स्थानों में महाराष्ट्रों की फौज ले के शिवाजी क्रीड़ा करते थे.

‘‘तब फिर उतार की भूमि आई. एक ने कहा, ‘इस ठिकाने भूत पिशाच अधिक रहते हैं, कोई संग छोड़ के आगे-पीछे मत होना.’ दूसरे ने कहा, ‘हां, यहां ही बैठ के आस लगाए रहते हैं कि हमें कोई गया पिंद दे.’ मैं दोनों की बात सुनकर मनीमन हंसा और धीरे से कहा कि, ‘हां, पर यहां के भूत, भालू और बाघ हो के विचरते हैं.

‘‘इतने में रात हो गई, चंद्रमा ऊगे, दूध की-सी वर्षा होने लगी. झरनों का जल चमाचम चमकने लगा, हवा से पेड़ों का कांपना देर पड़ने लगा, और चारों ओर बिखरे हुए काले पत्थर भालुओं का भ्रम देने लगे.

‘‘मैं बहुत थक गया था, सो चुपचाप एक ऊंचे पत्थर पर बैठ गया. मेरे साथियों में से यह बात किसी ने न जानी और मैंने भी न कह समझा कि झट साथ हो ही जाता हूं, कहूं क्या.

‘‘उस उमड़े हुए समुद्र ऐसे पहाड़ में मेरी आंख जा लगी, लगभग दो मिनट को मैं उधर ही देखता रहा. फिर चित्त में कुछ भय हुआ कि लोग यहां भूत बतलाते थे, कहीं सचमुच ही कोई न आ जाय. इधर तो डर का अंकुर जमा और उधर देखा कि कोई साथ नहीं, सब क्या जाने किधर चले गए. मैं चकचिहाकर देखने लगा, इतने ही में तो ऐसा जान पड़ा कि किसी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ लगाया. साथ ही चिहुंककर मैं पीछे फिर और देखा कि एक लंबा और मोटा पुरुष खड़ा है, जिसकी पीली जटा पीठ पर छटक रही है, दाढ़ी इतनी लंबी है कि कमर के नीचे तक आ रही है, लाल नेत्र हैं, एक हाथ में खप्पर है और बगल में डंड है. मुझको बड़ा ही भय होता, पर मैंने देखा कि वह एक हाथ की तर्जनी अंगुली नाक पर रखके मुझे चिताता है कि ‘चुप! चुप!’

‘‘मैं चकचिहाकर लगभग एक मिनट तक यों ही पत्थर की मूर्ति की भांति ठठका रहा- फिर देखा कि वह एक ओर चला और मुझे अपने साथ चलने की सूचना की. पहले मेरे चित्त में कुछ भाव रुकने का-सा हुआ, पर फिर बिना सोचे-बिचारे मैं उसके पीछे हो लिया और कुछ दूर चलने पर मेरे चित्त में अनेक भाव उठने लगे.

‘‘पहले मैंने सोचा कि जैसा लोग कहते थे, यह कहीं कोई भूत ही तो नहीं है? पर साथ ही मैंने मन ही मन हनुमानजी का मंत्र जपा, जो मेरे पिता ने किसी समय बताया था. उसके जपने पर भी देखा कि उस जटिल की कोई हानि नहीं हुई. तब एक बेर अचानक चित्त में यह भान भी हुआ कि यह कहीं कोई रूस का जासूस तो नहीं है! पर उसकी चाल-ढाल औ जंगल में घूमने से यह संदेह भी मिटा, फिर, एकाएकी यह जी में आया कि यह कोई बाममार्गी अघोरी तो नहीं और मुझे भी कहीं ले जाकर मेरा बलिदान तो न कर डालेगा. यह सोचते ही मेरी छाती धड़क उठी, रोएं खड़े हो गए, पसीने आ गए, मुंह पीला पड़ गया, और हाथ-पांव थर्रा उठे. तब तक वह जटिल कुछ आगे निकल गया था और दूर पड़ गया था. मैंने सोचा कि जटिल देखता तो हई नहीं, मैं अपनी दूसरी राह लूं. इतने में तो जटिल ने लौटकर समीप आ, झट मेरा गट्टा पकड़ा. मैं साथ ही चमक उठा तब जटिल ने धीरे से मेरे कान में कहा कि मुझसे डर मत, मैं तेरा भला चाहता हूं बुरा नहीं, चल आ. मैं भी अनेक प्रकार विचार करता उसके पीछे-पीछे चला.

‘‘सामने ही एक बड़ा काले पत्थर का गजराज ऐसा ऊंचा स्थान था. धीरे-धीरे जटिल उस पर चढ़ा और उसके साथ मैं भी चढ़ा. वहां देखा कि एक छोटे से बड़ के पेड़ की छाया में जटिल बाबा का आसन है, पर उसके पास थोड़ी कुशा के सिवाय और कोई सामग्री नहीं है. वहां जटिल बाबाजी बैठे और मुझको भी बैठने की आज्ञा दी. पर मेरे बैठते ही जटिल ने कहा कि ‘मैं तुम्हारी सब कथा जानता हूं, तुम अपने साथियों से बहक गए हो सो चिंता मत करना, मैं झट मिला देता हूं, पर थोड़ी देर स्वस्थ होकर ठहरो औ मुझसे कुछ भय मत करो, मैं सबको सुख देना चाहता हूं. किसी को दुःख देना यह मूर्ख औ पापियों का काम है.’ यह मधुर, गंभीर औ धार्मिक वचन सुन मुझे जो आनंद हुआ, जो शांति हुई और जो संतोष हुआ सो मैं कुछ कह नहीं सकता. बाबाजी का वह वचन अब तक मेरे कान में गूंज रहा है औ उसके स्मरण से जान पड़ता है कि अभी तक बाबाजी की वह शांत रसमयी मूर्ति मेरे आगे ही है औ वे मुझसे कह रहे हैं कि ‘डरो मत, डरो मत.’

‘‘मैंने हाथ जोड़ के नम्रता से कहा कि ‘स्वामी! आपके चरण के शरण होने पर मृत्यु का भी कुछ भय नहीं है, साधारण भय क्या होगा.’ क्षण मात्र बाबाजी भी चुप रहे. तब मैंने कहा कि ‘महाराज! मुझको बड़ी प्यास लगी है, क्या कुछ जल मिल सकता है?’ बाबाजी ने कहा, ‘ठहरो, मैं अभी लाता हूं.’ इतने में बाबाजी कुछ आड़ में चले गए और एक तुंबा जल औ थोड़ा सा कंद झटपट ले आए और गंभीर स्वर से बोले कि ‘लो, कुछ खा के पानी पीओ.’ मैंने प्रणाम करके वह कंद लिया और ज्यों ही एक टुकड़ा मुंह में रखा त्यों ही मेवा-मिस्त्री को मात करने वाले उस अपूर्व स्वाद के आनंद में मग्न हो गया. जब मैं उसके स्वाद की प्रशंसा करने लगा तो बाबाजी ने कहा कि इसमें और भी यह गुण है कि इसके खाने पर पंद्रह दिन तक भूख नहीं लगती. यह सुन मैं और भी चकित हुआ. खाकर मैंने वह अमृत ऐसा जल पिया, स्थिर होने पर बाबाजी ने कहा कि- ‘‘बेटा! उस समय तुम्हारे ठीक पास, एक पेड़ की आड़ में एक बड़ा भयंकर बाघ था. तुम्हारी गंध पाकर वह तुम्हारी खोज में था, तुम कुछ भी आगे बढ़ते तो उससे भेंट हो जाती औ ऊंचे सुर में कुछ बोलते तो थे प्राण बचना कठिन था, इसलिए मैं तुम्हें चुपचाप यहां ले आया हूं. अब तुम्हारी इच्छा हो, कुछ पूछो, बातचीत करो और जब तुम कहोगे तभी मैं तुम्हें तुम्हारे साथियों से मिला दूंगा.’’

‘‘यह सुन मैंने प्रणाम करके अपने प्राणदाता बाबाजी से कहा कि महाराज! क्यों न हो, तुलसीदास जी ने सच कहा है कि ‘संत हृदय नवनीत समाना, कहा कबिन पै कहा न जाना. निज परितोष द्रवै नवनीता, परदुख द्रवैं सुसंत पुनीता.’ सो धन्य हैं, आप ही ऐसे महात्माओं के तपोबल से पृथ्वी स्थिर है. इतना कहने के अनंतर मेरे चित्त में समुद्र की सी तरंगें चल पड़ीं, एक बेर तो चित्त में यह आया कि कहीं अब भी तो मेरे पीछे से बाघ नहीं चल आता है. फिर साथ ही कुछ शोक का सा आविर्भाव हुआ कि देखो, यदि अभी बाबाजी न पहुंचते तो मुझे वह दुष्ट जंतु खा जाता. औ फिर मेरे संगी कहां खोजते गया में, मेरे डेरेवाले घर जा के क्या कहते? हाय! मेरी युवती रमणी क्या करती? पर जब तक ऐसा भाव उठे-उठे तभी वैराग्य ने हृदय में राज्य किया और अंतःकरण में प्रसन्नता के साथ इस आनंद के अमृत की वर्षा हुई कि शरीर अनित्य है- ‘अद्य वाब्दशातान्ते वा मृत्युवैं प्राणिनां धुवः’ (आज या सौ बरसों बाद, प्राणियों की मृत्यु तो निश्चित ही है.) तब एक दिन तो संसार छूट ही गा, आज ही मर जाता तो क्या बुरा था. आह! इस समय मैं विष्णुचरणदर्शन से पवित्र हो रहा हूं, शरीर प्रसन्न है, यदि दिन बीत गया हो तो ऐसे समय मृत्यु होना क्या अच्छी बात है. थिक्कार है. उन मरनेवालों को, बरसों खाट में पड़े रह के, रो-रो के, दांत निकाल के मरते हैं और मुझे अब भी बाघ उठा के ले जाय तो आहा! क्या कहा है, जैसे दिलीप अपना देह देने को सिंह के सामने मांसपिंड की भांति बैठ गए वैसे मैं भी उपस्थित हूं, भला यह मांस किसी के भी तो काम आवे! आहा- ‘मृत्युं वरं को न वृणीत आगतम्.’ (सुंदर आई हुई मृत्यु का वरण कौन न करेगा?)

‘‘हाय-हाय! मैं किस माया के बखेड़े में पड़ा हूं, अभी आज यह संसार सपना हो जाता. अच्छा, अब मैं भी यहीं धूनी जमाऊं और इस श्लोक को प्रतिक्षण स्मरण करूं कि-

‘अन्तकाले च पुरुषो हृागते गतसाध्वसः।

छिन्द्यादसशस्त्रेण स्पृहां देहेनुय च ताम।।’

(-पुरुष को उचित है कि अंतकाल में निर्भय होकर, असंग रूपी शस्त्र से देहादिक की स्पृहा को काट दे.)

‘‘इतना मैं विचारता ही था कि समीप ही एक पेड़ की आड़ में एक भालू भयंकर स्वर से बोल उठा. बस इतने ही में मेरा ज्ञान न जाने किधर चला गया और झट कमर से कटार निकाल मैं खड़ा हो गया औ ललकार उठा कि आ किधर है, अभी तुझको चीर डालता हूं और तेरे साथी बाघ-साघ के भी टुकड़े-टुकड़े कर डालता हूं. मेरी आंखें लाल हो गईं, होंठ कांप उठे और ऐसा चित्त हो गया कि सौ बाघ खड़े हों तो अकेला कूद पड़ूं और चीर डालूं. भालू तो कुछ बड़ी बात नहीं. हां, युद्ध ठने औ मुझे रूसी सेना पर सरकार छोड़ दें तो मैं सब बैरियों की छाती पर इसी कटार से अपना नाम लिखकर चला जाऊं.

‘‘मेरा यह डौल देख बाबाजी हंसे. तब तो मैं भी ऐसा लज्जित हुआ कि कुछ कहा नहीं जाता. चुपचाप कटार को म्यान में रखकर सिर झुकाकर बैठ गया और अपने ही बहुरूप हृदय पर आप ही पछताने लगा.

‘‘बाबाजी बोले, ‘बेटा, चिंता मत करो. तुम उस राजपुताने के सिंह बच्चे हो जहां महाराज मानसिंह, महाराज जयसिंह आदि महारथी औ ठाकुर दलेलसिंह जी ऐसे बीरबर हो गए हैं. तुम्हें कैसा ही वैराग्य क्यों न हो, पर समय पर वीरता ही प्रगट होगी. ऐसा ही क्षणिक वैराग्य अर्जुन को हुआ था, तब नारायण ने समझाया था.’

‘‘इसके अनंतर, थोड़ी देर तक उन महात्मा ने मुझे और भी कई उपदेश दिए और अंत में कहा कि अब तुम्हारे साथी लोग तुम्हारे लिए घबराते होंगे सो अब उनके पास जाओ. मैंने हाथ जोड़कर कहा कि ‘महाराज मेरा सामर्थ्य नहीं कि इस जंगल में मैं उन्हें खोज सकूं. हां, आप अनुग्रह करके पहुंचा दें तो पहुंच सकता हूं.’ तब बाबाजी ने कहा, ‘बहुत अच्छा, एक क्षण के लिए आंख तो बंद करो.’ मैंने स्वीकार कर आंखें मींचीं अैर पल भर के अनंतर ही एक मंद हल्ला-सा सुन पड़ा, सोचने से उसमें से ये बातें कुछ-कुछ समझ पड़ने लगीं, ‘क्या हुआ, अवश्य कोई भूत पीछे पड़ा.’ ‘नहीं साहब, भूत कहां! कोई बाघ-भालू होगा, वहां से उठा ले गया.’ ‘अजी क्या बकते हो? रास्ता भूल गया है, चलो खोजें.’ ‘अच्छा चलो, देखो तो यह ऊंचे टिल्ले पर ध्यान लगा कौन बैठा है.’ ‘कोई महात्मा होगा. चलो इससे तो पूछें.’-मैं इतनी बात सुन मन में गमता था कि कौन और क्या बोल रहे हैं, तब तक तो एकाएकी ऐसा जान पड़ा कि किसी ने मेरी बांह पकड़ी. मैंने हड़बड़ाकर ज्यों ही आंख खोली त्यों ही तो देखा क्या कि न वह टिल्ला है, न वहां वे बाबाजी हैं और न वे मेरे आसपास के घास वनस्पति हैं, पर उनके बदले मेरे साथी लोग मुझे घेरे खड़े हैं और हर्ष में ताने के साथ कह रहे हैं कि ‘वाह बाबाजी! भला ध्यान लगाया.’ मैं भी उनके गले लगा औ फिर उठकर उनके साथ उस छोटे टिल्ले से उतर चला तो देखा कि पास ही एक बड़े चट्टान के भीतर खोद बनाई हुई बड़ी कोठरी है. उसका नाम कर्ण चौपाड़ गुफा है. वहां एक वैरागी बाबाजी रहते हैं और प्रायः आए हुए यात्री लोग एक दिन उनी की कुटी में निवास करते हैं, तब दूसरे दिन पहाड़ पर चढ़ के कुछ देखते-सुनते हैं, क्योंकि बस्ती से वहां आते-आते तक एक दिन बीत जाता है. बस वहीं मेरे साथी लोग भी डेरा जमाए थे. मुझे भी वहीं एक चट्टान पर बैठाया और कौतुक से मेरे बिछट जाने का वृत्तांत पूछने लगे. मैं भी जैसे अब कह गया हूं वैसे ही उनके सामने कह गया औ फिर उनका भी वहां आने का औ मेरे लिए व्याकुल होने का चरित सुन गया. उस समय मेरा चरित सुन मेरे साथी लोग औ कर्ण-चौपाड़ के बाबाजी भी अत्यंत ही चकित हुए और आश्चर्य, हर्ष, व्यामोह आदि से पूरित हो अनेक भावना करने लगे. किसी निर्बुद्धि ने कहा कि बस, तुम्हारे प्राण बचे. वह सिद्ध नहीं था, कोई भूत था. दूसरे चालाक ने कहा, नहीं साहब, वह मनुष्य ही था, पर कर्णपिशाची अथवा कोई यक्षिणी सिद्ध थी. तीसरे नवशिक्षित थियोसोफिस्ट ने कहा कि नहीं, हमने सुना है कि रूस से बहुत से योगाभ्यासी लोग आए हैं औ हिंदुस्तान के स्थान-स्थान में व्याप्त हैं. उन्हीं में से कोई होगा. चौथे लालाजी ने कहा कि क्या अजब कि हजरत महम्मद के शागिर्दों में से कोई हो. पांचवें धूर्त ने कहा कि अरे! तुम्हें डर लगा होगा, कहां का जटिल और कहां का सिद्ध!! बस यों ही लोग भांति-भांति की उड़ंतबाजी करने लगे और मैं चुप, काठ की मूरत सा बैठ, सबके मुंह की ओर देखने लगा. यों ही बड़ी देर तक हम लोगों की गोष्ठी होती रही, फिर वहां के बाबाजी ने हम लोगों को कुछ फल और कंद-मूल आदि मंगा दिए. हम लोगों ने खाए और एक चौड़ी चट्टान पर कुछ कम्मल-सम्मल बिछाकर लेटे. फिर घंटों तक तो उसी बिछटने की चर्चा होती थी. अनंतर कहीं भालुओं का लड़ना, कहीं चीतों का बोलना, कहीं इनके शब्द से बहुत चिड़ियाओं का चहचहा उड़ना, कहीं आते हुए हुंडार के पैरों का चटचटाना और कहीं जंतुओं के पीने से जल का ढबढबाना सुनते हुए कुछ सगबगाते, कुछ डरते, कुछ करवट लेते, कुछ चमकते, कुछ बर्राते मेरे साथी तो सब सो गए, पर मुझे नींद न आई.

‘‘इतने में तो नील गंभीर तालाब पर पौरते हुए हंस की सी, पन्ने की थाली में धरे मक्खन की सी, सघन तमाल में लगे श्वेत फूल के गुच्छे की सी, श्याम मूर्ति पर लगे चंदन बिंदु की सी, यमुना में पौरते बलभद्र की सी, निलांबर में काढ़े जरी के बूटे की सी, हबशियों की फौज में घुसे अंगरेज की सी, काले कोट पर लटकते हुए चांदी के तकमे की सी और आकाश में उड़ जाती आर्यों के यश की पोटरी की सी शोभा देता हुआ चंद्रमा आकाश में देख पड़ा. मैं बड़ी देर तक टकटकाकर उसकी ओर देखता रहा. फिर उसकी चांदनी में पहाड़ की विलक्षण शोभा देखता और उस मंद वायु से धीरे-धीरे हिलते पत्तों की सन्नाहट सुनता मैं भी सो गया.

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