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रामायण (हाइकु रूप में)



विनोद कुमार दवे, ५१ हाइकु से सम्पूर्ण रामायण को हाइकु रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। बताएं कि उनका यह प्रयास आपको कैसा लगा।


रामायण (हाइकु रूप में)


राम चरण
हाइकु रूप लिखूँ
श्री रामायण

गौरीनंदन
श्रीगणेश आज्ञा दो
हे गजानन

करूँ वंदन
शिव विष्णु ब्रह्मा को
मेरा नमन

सरयू तट
अयोध्या के राजन
थे दशरथ

राम जन्में जो
दशरथ के घर
वे पीताम्बर





राम लक्ष्मण
भरत व शत्रुघ्न
देवता तुल्य


प्रिय अपार
तीनों रानियों को थे
चारों कुमार

राम लक्ष्मण
विश्वामित्र के संग
चले आश्रम

आतंक मिटा
सुबाहु ताड़का का
संत्रास हटा

अहल्या को छू
श्री राम ने दी मुक्ति
बनी स्त्री शक्ति

मिथिला आए
शिव धनुष तोड़
सीता को लाए

अयोध्या सजी
राजतिलक हेतु
मंथरा हंसी

मोह में फंस
कैसे कैकयी गई
कुल को डस

चौदह साल
वनवास में राम
वो चली चाल

प्रण उमंग
चले सीता लक्ष्मण
राम के संग

पुत्र वियोग
दशरथ के प्राण
ले गया रोग

भरत मिले
चित्रकूट के घाट
राम के गले



मुकुट त्याग
राम पग पादुका
शासन सौंपा

शूर्पणखा के
प्रेम निवेदन से
लक्ष्मण रुसे

नाक कटाया
शूर्पणखा गई जो
मारीच आया

लालच वश
सीता ने मृग देखा
राम विवश

तमस घिरा
स्वर्ण हिरण देख
संयम गिरा

सीता हरण
रावण के हाथों से
स्वयं का अंत


बीच राह में
जटायु उड़ आए
बचा न पाए

सीता की याद
वन वन भटके
लक्ष्मण राम

सीता को रखा
अशोक वाटिका में
राम को भजा

राम ने खाए
सबरी फल मीठे
भले थे झूठे

कपीश मिले
ऋष्यमूक पर्वत
सुमन खिले

सुग्रीव डरे
राजा बली के प्राण
राम ने हरे




किष्किन्धा राज
मिला सुग्रीव भूले
राम का काज

लक्ष्मण भागे
अस्त्र उठा किष्किन्धा
सुग्रीव जागे

मारुति चले
समुद्र सीना लांघ
तो लंका जले

राम विधाता
रावण दर्प में था
जान न पाता

सागर पार
कैसे लंका में जाए
सेना अपार

अथाह जल
समुद्र ने राह दी
स्वयं निकल




सब्र के फल
संधि हेतु प्रयास
हुए निष्फल

भीषण युद्ध
सत्य असत्य बीच
रावण क्रुद्ध

युद्ध को आए
रावण के संग जो
मृत्यु को पाए

भेद की बात
विभीषण ने जानी
हुआ आघात

रावण नाभि
तीर चला श्री राम
किया कल्याण

रावण वध
विभीषण को सौंपा
राज शासन




अग्नि परीक्षा
सतीत्व नाम पर
सीता से धोखा

राम लक्ष्मण
अयोध्या जब आए
दीप जलाए

अफवाहों से
माँ सीता भी न बची
ज्यों मीन फंसी

क्या राम राज
सीता निर्वासन है
रावण राज

हैं लव कुश
श्री राम ने जाना जो
मेरे तनुज

भूमि से आई
माँ भूमिजा वैदेही
भू में समाई




सरयू तले
लेने जलसमाधि
श्री राम चले

आँखें भिगोई
मृत्यु को राम मिले
सरयू रोयी

जग में पाए
जन्म जो भी प्राणी हो
निश्चित जाए

कथा का सार
न स्वर्ण लंका रही
न अहंकार

परिचय -
साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं यथा, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, अहा! जिंदगी, कादम्बिनी , बाल भास्कर आदि में रचनाएं प्रकाशित।
अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत।

पता :
विनोद कुमार दवे
206
बड़ी ब्रह्मपुरी
मुकाम पोस्ट=भाटून्द
तहसील =बाली
जिला= पाली
राजस्थान
306707

ईमेल = davevinod14@gmail.com
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