रविवार, 16 अक्तूबर 2016

लघुकथा - छवि - कामिनी कामायनी

॥ छवि ॥

‘ ए दाई मैडम जी कहाँ हैं ?’ उस एकदम संकीर्ण ,दबड़े नुमा ,छोटे से कोठरी वाले घर, जो हॉस्टल के एक कमरे को ही घेर कर दो कमरे का ,बना दिया गया था , के आगे रसोई घर के सामने आँगन में बैठ कर बर्तन धोती मटमैली सफ़ेद सी साड़ी पहने ,अत्यंत वृद्ध स्त्री ने इसका कोई जवाब भले ही मुंह से नहीं दिया ,मगर अपने चेहरे पर व्याप्त असंख्य गहरी झुर्रियों और निस्तेज आँखों को बर्तन पर ही टिकाए गर्दन को बेहद हल्का सा झटका देकर बता दिया, संकेत से ,कि अपने कमरे में ही है ।

अंदर मैडम जी, दो चौकी जोड़ कर बनाया गया डबल बेड पर शान से बैठी थी । उनके सामने तीन छात्राएँ थी ,बड़ी मुश्किल से दो और भी आ गई थी । सामने के दीवार पर काला गाउन ,माथे पर कैप ,हाथ में लंबा सा कागज मोड कर पकड़े उनका शानदार फोटो था । बीए की डिग्री जो मिली थी । उस फोटो के नीचे एक रैक था ,जिसपर कुछ किताबें ,कुछ अन्य समान ,आईना ,कंघी ,नीचे जूते चप्पल रखे थे ।बिस्तर के दोनों तरफ खिड़कियाँ थी ,वो भी सामानो से लदी -फदी। खिड़की का पल्ला दो भागों में बटा था ,नीचे का बंद ऊपर का खुला ।

मैडम जी तो थी साँवली ,बल्कि ,गहरी साँवली कहें तो ज्यादा सही होगा ,मगर उनके नाक नक्श अच्छे थे ,कद अच्छी थी ,और बाल कमर के नीचे ,काले काले घने घने ,जिस दिन वह अपना सिर धोतीं ,हास्टल की लड़कियों के बीच ईर्ष्या की विषय बन जाती । जुड़ा बनाए तब ,चोटी बनाए तब ,हर अदा में बड़ी मोहक लगतीं । साड़ी भी बड़े करीने से बांधती । छात्रावासिनिओ के अभिभावक जब यदा कदा उनसे मिलते ,उनकी दृष्टि वहीं,उन्हीं पर , अटक जाती ।स्कूल के एन सी सी की इंचार्ज थी ।जब सैनिकों वाला ड्रेस पहनती ,उसमें भी खूब फबती थीं ।गाती भी बहुत अच्छा थी ,सुरीली तान से हारमोनियम पर रागनियाँ सुनाती॰ तो समा बंध जाता था । अधिकांश लड़कियां उनका ,अक्सर गुणगान करती रहती ।

उस बार एन सी सी कैंप में ,जो किसी दूसरे शहर में लगना था ,दुर्गा पूजा की छुट्टी में लगाई गई ।तीनों छात्रावास एकदम खाली ,केवल वही कैडेट्स जो कैंप में जाने वाली थी ,बच गई । उस भीषण सन्नाटे से बचने के लिए सब को एक ही जगह शिफ्ट कर दिया गया था ।

मैडम के पति आए थे ,गोरे चिट्टे ,कहीं किसी कोयले वाले अंचल में इंजीनियर थे। जब वे आए सरिता ,गीता वहीं थी । पुरुष ने वृदधा स्त्री के पाँव छूए ,तो उनकी बूढ़ी निगाहों में चमक आ गई ,चेहरे पर एक उदास सी हंसी ,“ आ गया बब्बू’।बब्बू बिना कुछ बोले कमरे की ओर बढ़ गया था ।

बूढ़ी नौकरानी का रहस्य जब छुट्टी के बाद चहकती ,फुदकती छात्रावास में उजागर हुआ , स्वप्नदर्शी किशोरी छात्राओं का कोमल मन काँप उठा था “छिः ,मैडम जी अपनी इतनी बूढ़ी सास को दासी बना कर रखी हुई हैं”। ऐसा भी घमंड करने लायक उनमें क्या है ? यह सर्वथा अनुचित है । उनके मन की दर्पण पर बनी ,मैडम की सुनहरी छवि भरभरा कर चूर चूर हो गई थी ।
उस दिन से वह किसी के लिए आदर्श नहीं रही थी ।

कामिनी कामायनी ।

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