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व्यंग्य - नो अपील, नो वकील' घोषणापत्र : कुबेर

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व्यंग्य

नो अपील, नो वकील' घोषणापत्र

 

कुबेर

चौथे मोर्चे की संभावना, संरचना व संरक्षण पर विचार-विमर्श करने के लिए राजधानी में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया है। इस कार्यशाला में देशभर के चुनिंदा चोर, तस्कर, ठग, जालसाज और धोखेबाज एकत्रित हुए हैं। कार्यशाला का आयोजन 'अदेतमस' नामक संगठन ने किया है। 'अदेतमस' न तो 'तमसो म ज्योतिर्गमय' का आधुनिक भाष्य है और न ही भीष्म साहनी के उपन्यास 'तमस' का नवीन संस्करण या उसका दूसरा भाग। यह एक एन. जी. ओ. है जिसका शब्द विस्तार है - 'अखिल देशीय तस्कर तथा माफिया संगठन'।

चौथा मोर्चा बनाने के पीछे इनके बनानेवालों के पास एकदम ठोस और वाजिब तर्क है। उनका मानना है कि तीसरा मोर्चा सदा से राहु और शनि की तिरछी नजरों का शिकार रही है। इसीलिए बनने से पहले यह टूटने लगती है।

यही कारण है कि देश में अब तक तीसरा मोर्चा बनाने और चलाने वाले पारंपरिक और अनुभवी राजनेताओं को इस कार्यशाला में आमंत्रित नहीं किया गया है। इस कार्यशाला में आये हुए तमाम चोरों, ठगों, तस्करों, जालसाजों और धोखेबाजों की दृष्टि में ये सारे लोग निकम्मे और भ्रष्ट हो चुके हैं। देश सेवा की भावना इनमें अब रही नहीं है। इन लोगों का मानना है कि अब आगे इन्हें पाले रखने की कोई जरूरत नहीं है। इनके गले में बंधी हुई तमाम तरह की पट्टियाँ अब निकाल लेनी चाहिए। देश की जनता अब जब हमें ही पूरी तरह से बर्दाश्त करने के लिए प्रशिक्षित और अभ्यस्त हो चुकी है तो इन निकम्मों पर निवेश करते रहने से क्या फायदा?

इस बात पर सभी डेलिगेट्स एकमत थे। सबने एक स्वर में कहा - ''हम चोरों, तस्करों, ठगों, जालसाजों और धोखेबाजों के बारे में लोग अच्छी तरह से जानते हैं। वे जानते हैं कि काम के प्रति निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी जैसे विलुप्त भाव केवल हमारी ही बिरादरी में पाई जाती है। राजनीति, प्रशासन और अन्य क्षेत्र में ये मात्र नारा बनकर रह गये हैं। राजनीति और प्रशासन के क्षेत्र में अब हमें इन विलुप्त भावों को पुनर्जागृत करना होगा। इस शुभ कार्य को सरकाने के लिए हमें कुछ नया तरीका अपनाना होगा। सबसे पहले हम अपने आप को राजनीतिज्ञ नहीं कहेंगे। इसके बदले हमसब राजसेवक शब्द को अपनायेंगे। आगे हमें राजसेवक कहकर ही संबोधित किया जाये।'' तालियों से मंडप गूँज उठी।

विचार-विमर्श का दौर तो शुरू हो ही चुका था अब गहन विचार मंथन का दौर शुरू हुआ।

''तीसरे मोर्चे की हालत हमने देख लिया है। देश में अब चौथे मोर्चे का गठन होना चाहिए। देशहित में यह बहुत जरूरी है।'' विचार-विमर्श करनेवाले राजसेवकों में से एक ने संकल्प प्रस्तुत किया।

''और यदि मोर्चा एकबार गंठ जाय तो कम से कम अगले आम चुनाव तक गठा रहे, इसका भी पुख्ता इंतिजाम होना चाहिए। देशहित में यह और भी बहुत-बहुत जरूरी है।'' दूसरे ने इस संकल्प को मजबूती प्रदान करते हुए कहा।

एक अन्य ने प्रस्ताव रखा - ''हमारा उद्देश्य देश की जनता का,े उनको होनेवाले विभिन्न नुकसानों और तकलीफों के लिए राहत और राहत सामग्री मुहैया कराना है; इसलिए इस चौथे मोर्चे का नाम होना चाहिए - 'राष्ट्रीय राहत पार्टी' अर्थात 'रारापा'।'' सबने इसका भी ध्वनिमत से समर्थन किया। ''रा.रा.पा.' चूँकि अदेतमस की ही एक इकाई होगी अतः इसका ध्येय वाक्य होगा - 'निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी'। एक अन्य राजसेवक ने सुझाव प्रस्तुत किया। इसे भी ध्वनिमत से स्वीकार कर लिया गया।

मोर्चे के अध्यक्ष पद व अन्य पद के लिए किसी तरह की बकझक नहीं हुई। सबसे बड़े माफिया डॉन को सर्वसम्मति से मोर्चे का अध्यक्ष स्वीकार कर लिया गया। संचालन कर रहे राजसेवक द्वारा अध्यक्ष महोदय से कार्यशाला समापन की अनुमति लिया ही जा रहा था कि एक राजसेवक ने जान की बख्शीश पाकर अध्यक्ष महोदय से निवेदन किया - ''भाई! वैसे तो आपकी इच्छा ही मोर्चे का संविधान माना जायेगा। पर लोगों को दिखाने के लिए इसे छपवाना भी जरूरी है, भाई।''

इस राजसेवक की सलाह से अध्यक्ष महोदय काफी खुश हुआ। उन्होंने उसे अपना सलाहकार बना लिया। कहा - ''अबे बांगड़ू! इतना अच्छा आइडिया तेरे दिमाग में आया कहाँ से? और कुछ छपवाना हो तो वह भी बता डाल। पर ध्यान से सुन। देश का प्रधान सेवक हमी को बनने का है। उस समय कोई सलाह दिया तो हम साला तेरे भेजे को ऊपर वाले के पास भेज देगा। समझा कि नहीं?''

''वो तो हमने पहले से समझ लिया है भाई। हमारा एक ही काम होगा - आपको देश का प्रधानसेवक बनाना। इसके लिए तैयारी फुल है भाई। वोटिंग के दिन देश की जनता को हम ऐसा दारू पिलायेगा, ऐसा दारू पिलायेगा कि सबको खाली आपिच का फोटू दिखाई देगा भाई। पर एक बात और भाई! हमको अपना घोषणापत्र भी तो छपवाना पड़ेगा न भाई।''

''हाँ, हाँ, वोइच् हम भी कह रहा था। घोषणापत्र। पर साला बांगड़ू, ये बात तेरे भेजे में आई कैसे? ठहर, हमारे भेजे में भी कोई बात आ रही है। बोले तो संविधान और घोषणापत्र, ये दो-दो चिट्ठियाँ अलग-अलग छपवाने से क्या फायदा। जनता का पैसा बर्बाद नहीं करने का साला। दोनों को एक में मिलाकर छापने का। समझे।''

''वाह भाई! क्या झक्कास आइडिया आया है आपके भेजे में भाई। अभी से जनता की इतनी फिक्र। आप पक्का प्रधानसेवक बनेला भाई। तब तो हमारी सरकार बाक्स आफिस पर जरूर हिट होगी भाई।''

''बाक्स आफिस पर? नाटक नहीं करने का साला, बांगड़ू! जो-जो हम बोलेगा, उसको जल्दी-जल्दी लिखने का। और आज ही छपवाने का। समझे।''

''समझा भाई! बोले तो, आज ही छापेगा। आगे बोलो भाई।''

''लिख, सबसे पहले लिख - 'निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी'। इन बातों का पालन नहीं करनेवालों का भेजा तुरंत ऊपरवाले की ओर पार्सल कर दिया जायेगा।''

''लिख लिया भाई।''

''अब लिख। वो क्या कहते है, अबे! बाबा साहब वाला, ...

''संविधान भाई?''

''हाँ, हाँ, वोइच्, संविधान। सबसे पहले उसिच को ठीक-ठाक करने का। अभी हम जो कुछ लिखवा रहा है, उसको उसके ऊपर में जोड़ने का और इसीसे काम चलाने का। इससे काम न चले तभीच् उसको खोलने का। समझे।''

''समझा भाई! आगे बोलो भाई।''

''दूसरा बड़ा लफड़ा मंत्री बनने का होता है। इसलिए मंत्री का पद, मंत्रालय और विभाग के बड़े बाबुओं को देने का।''

''बड़े बाबू बोले तो, सचिव न भाई।''

''हाँ, हाँ, साला वोइच्, बोलने का। समझा।''

''समझा भाई! आगे बोलो भाई।''

''हम खुद देश का प्रधानसेवक बनने का। और जीतनेवाले सभी राजसेवकों को उनके-अपने एरिया का प्रधानसेवक बनाने का। समझे क्या?''

''समझा ना भाई! क्या स्कीम लेकर आया भाई, सबके सब प्रधान सेवक। आगे बोलो भाई।''

''साला बांगड़ू, नाटक नहीं करने का। ठीक से सुनने का, और ठिकिच लिखने का। अगला लफड़ा साला लोगों को जल्दी और सही न्याय दिलाने का होता। इसको दुरुस्त करने का। इसके लिए 'नो अपील, नो वकील' स्कीम लागू करने का। देश भर के कोर्ट को खतम करने का। जज लोगों को हटाने का। जिला जज का काम एरिया के प्रधानसेवकों को करने का। देश के बड़े जज का काम हमको करने का। पांच साल से कम सजावाला केस पुलिस में ही निपटाने का। पांच से दस सालवाला केस एरिया के प्रधानसेवकों को निपटाने का। दस से बीस सालवाला केस देश के प्रधानसेवक को, बोले तो, हमको निपटाने का। फांसीवाला केस राष्ट्रपति को निपटाने का। जजों और वकीलों को इन लोगों का सलाहकार बनाने का। समझे।''

''समझा भाई! क्या झांसू स्कीम लेकर आया भाई, फटाफट केस निपटेगा। आप भी तो एकदम चकाक जस्टिस करते हैं भाई, एकदम ठांय, ठांय। अपने लिए कुछ नहीं रखने का भाई।''

''अबे बांगड़ू, यहाँ सबसे बड़े लफड़ेबाज कौन होते हैं? प्रधानसेवक। इन लोगों का लफड़ा निपटाने का दम यहाँ के जजों में होता क्या? इनका फैसला हमी को करने का।''

''समझा भाई, आगे बोलने का।''

''अगला लफड़ा देश की जनता को हर तरह की समस्या से राहत दिलाने का। बोले तो, घूसखोरी, बेईमानी, भ्रस्टाचार, मिलावट, मंहगाई, और बेरोजगारी से छुटटी दिलाने का। इसके लिए इन सब कामों को वैध बनाने का। अच्छा हेल्थ, और अच्छा एजुकेशन भी एक भारी लफड़ा होने का। खराब सड़कों की परेशानी से भी लोगों को राहत दिलाने का। आने-जाने में भीड़ और ट्रैफिक जाम से भी राहत दिलाने का। इसके लिए प्रत्येक मद का एक लाख के हिसाब से दस-दस लाख रूपयों की राहत सभी लोगों को सालाना देने का। इसके लिए देश के सभी लोगों को मल्टीपरपस स्मार्टकार्ड देने का। लेनेवाले और देनेवाले, दोनों का जिस्ट्रेशन करने का। इससे किसके स्मार्टकार्ड से किसने कितना लिया, इसका हिसाब सरकार के पास रहने का। समझे क्या?''

''समझा ना भाई! क्या धांसू स्कीम लेकर आया भाई, फटाफट प्राब्लम निपटने का। आगे बोलो भाई।''

''साला बांगड़ू! असली लफड़ा तो अभी जस का तस रहने का।''

''वो क्या भाई?''

''असली लफड़ा - रोड, पुल और बिल्डिंग का एबोरशन हो जाने का। बोले तो, इनका खाली कागजों में बनने का। बनते-बनते चक्कर खाकर गिरने का है। बनते ही खराब होने का है। समझा।''

''समझने का भाई।''

''हमने सोचा है, इससे निपटने के लिए इनके असली लागत मूल्य की पांच गुनी रकम सेंक्सन करने का। एक हिस्सा इंजिनियर के लिए, एक एरिया के प्रधानसेवक के लिए, एक हमारे लिए, एक ठेकेदार के लिए और अंतिमवाला बनवाने के लिए। समझा।''

''समझा भाई! क्या स्टीमेट बनाया भाई। अब एकदम मजबूतीवाली सड़कें, पुल और बिल्डिगें बनेगी भाई। आगे बोलो भाई।''

''सबकी खोपड़ी में बंदूक टिकाकर तेरे को रखने का। कहीं कोई गड़बड़ी हुई तो तेरे भेजे का पार्सल बनाकर ऊपरवाले के पास भेजने का। समझा।''

''समझा भाई। आगे बोलो भाई।''

''अब चुप भी हो जा, साला बांगड़ू। जादा भेजा नहीं चाटने का।''

''बोले तो आखरी बात भाई। ये जो आपकी स्कीम है, उसे 'नो अपील, नो वकील' नाम से छपवाने का भाई।''

''हहा .. । आजकल बड़ा समझदार हो गया बे। अब जादा भेजा नहीं खाने का। आज की मिटिंग डिसमिस करने का। समझे।''

''समझा भाई। आज की मिटिंग डिसमिस भाई।''

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