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मकड़ी का जाल / कहानी / ललिता भाटिया

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मकड़ी का जाल

आठ दिन तक भाई की शादी की चहल पहल रही। कल सुबह भैया-भाभी हनीमून पर रवाना हो गए, तो सौमिल ने भी पैकिंग करते हुए कहा — ‘अच्छा मांजी, हमें भी अब इजाजत दें ताकि हम भी अपनी घर-गृहस्थी संभाले’। माँ नेह में गीली आंखों और अपने सबसे प्यारे सतलड़े रानीहार के साथ विदा किया। अगले इतवार फिर आने का वादा करके हम लोग आ गए।

सुबह सौमिल को ऑफिस भेजा और मोनू को स्कूल। कामवाली के आने मैं अभी देर थी। शादी कि खुमारी अभी उतरी कहाँ थी। सो रेडियो ऑन करके मैं कुछ देर बेड पर लेट गई। पता नहीं कब आँख लगी और फ़ोन कि घंटी ने उठा दिया – हैलो, हाँ पापा। क्या हाल है ? लगता है भैया और मेरे बिना उदास हो गए। मैं चहकते हुए बोलती जा रही थी कि दूसरी तरफ से सिसकियों कि आवाज़ सुनाई दी।

क्या हुआ पापा आप रो क्यों रहे हैं ?

अनुष्का तुम यहाँ आ जाओ।

क्या हुआ आप कुछ बताइए तो ?

वो तुम्हारी माँ घर पर नहीं हैं।

कहीं पडोस में गई होगी।

नहीं बस तुम जल्दी से आ जाओ। मायका ओर ससुराल एक शहर में ही था सो मैंने सौमिल को फ़ोन पर बता दिया और मोनू को स्कूल से ले कर एक घंटे में पापा के पास पहुँच गई। मुझे देखते ही पापा जोर से रो पड़े। माँ का कमरा देखा। दो चार साड़ी इष्ट लड्डू गोपाल ओर गीता नहीं पड़ी थी। इसका अर्थ था माँ अपनी मर्जी से कही गई हे। पापा आप ये सब कब पता चला ?

“सवेरे जब में सेर से आया तो मेज पर नींबू पानी नहीं देखा। मैंने सोचा बाथरूम में होगी। जब काफी देर तक कुछ पता न चला तो मैंने घबरा कर तुम्हें फ़ोन किया।” शायद माँ के कमरे से कुछ पता चले इस आस में माँ के कमरे में गई। खोजने पर माँ की अलमारी से एक डायरी मिली। जिस के केवल कुछ पेज ही भरे थे। एक एक अक्षर मोती की तरह साफ था

प्रिय अनुष्का,

ईश्वर ने मेरी झोली में पहला उपहार आशीष के रूप में मेरी झोली में डाला फिर कई मन्नतों के बाद तुम्हें पाया। तुममें मैंने सदा अपना अपना बचपन जिया। तुम्हें अपनी परछाई माना। ३५ साल इस घर में बिताये। पहले घर में बड़ों का दबदबा देखा, उनके जाने के बाद शासन की डोर तुम्हारे पापा के हाथ में आ गई, जिनके फिक्स रूटीन को तोडना किसी के बस में नहीं था। पापा का इतना दबदबा था की तुम्हारे आने के पहले मैं तुम दोनों को खिला-पिलाकर सुला देती थी। उन्हें घर में किसी किस्म का शोर, ऊँची आवाज़ में बात करना पसंद नहीं था। घर से हंसी-मजाकिया हलकी-फुलकी बातचीत जैसे चीज़ गायब हो गई थी। न कहीं आना, न कहीं जाना। मायका इस उम्र में वैसे ही छूट जाता है। तुम लोगो से भी संवाद न के बराबर हो गया। तुम्हें भी माँ की जरूरत तभी पड़ती जब भूख लगती या माँ मेरी लाल वाली चुन्नी नहीं मिल रही या माँ इसके साथ का दूसरा सैंडिल नहीं मिल रहा। हर कोई अपना मतलब हल करके दूर हो जाता। किसी ने माँ के दिल की हालत नहीं पहचानी। बेटे और पति की सोच तो मर्दानी थी पर तुम तो लड़की हो। मेरी बेटी, मेरी परछाई तुमने भी कभी माँ के अन्दर झाँकने की कोशिश नहीं की। माँ के अंदर भी कुछ शौक हो सकते है , कुछ इच्छाएं हो सकती है , कुछ अरमान हो सकते है। पर ये सारे शौक सारे अरमान गृहस्थी के हवन कुंद में होम हो गए। शुरू से एक इच्छा थी चारों धाम की यात्रा की। तुम्हारे पापा के सामने कई बार ये इच्छा रखने की कोशिश की, पर हर बार डांट खा कर चुप हो गई। अब के शादी के खर्च से कुछ पैसे बचे थे और साथ में अब तुम्हारे पापा को सँभालने के लिए बहुरानी भी आ गई है, इसलिए मैं जा रही हूँ। शायद हमेशा के लिए। पता नहीं अब उम्र के इस मोड़ पर कब और कहाँ भगवान के घर से बुलावा आ जाए। सच, इंसान की गृहस्थी मकड़ी के जाले की तरह होती है , जिसे मकड़ी स्वयं बुनती है लेकिन फिर स्वयं निकल भागती है , स्वयं नहीं फंसती। पर इंसान फंस जाता है।

तुम्हारी माँ

कितना दर्द छुपा रखा था तुम्हारी माँ ने। मैंने कभी उसके दिल में झाँकने का प्रयत्न ही नहीं किया। बस अपने बिज़नस में ही मस्त रहा – कहते-कहते पापा का गला भर आया।

मैंने पापा को पानी पिला कर शांत किया – पापा अब क्या करे, माँ को कहाँ ढूंढे। दो दिन बाद भैया-भाभी भी आ जायेंगे। नयी बहु को हम क्या बताएँगे?

शाम को सौमिल भी आ गए। जहां-जहां हम माँ को ढून्ढ सकते थे, ढूँढा पर असफल रहे। अब इंतज़ार था, तो भैया-भाभी के आने का। मन मारकर दो दिन का इंतज़ार करना था। कल तक जहां हंसी-ख़ुशी थी, आज मानो मातम छाया हुआ था। सभी चुप-चुप संवादहीन। बस एक मोनू ही था जो अपनी बल सुलभ बातों से हमें मुस्कुराने पर मजबूर कर देता था। दो दिन बाद भैया-भाभी आ गए। भाभी को यही बताया कि माँ के मायके में कोई गुजर गया है वहां गई है, पर भैया से मिल कर में खूब रोई। सच ही कहा गया है मायका माँ से होता है। माँ के बिना घर का हर कोना सूना-सूना लगता है। माँ के हाथ का दाल-भात किसी छप्पन भोग से कम नहीं लगता। पर अब तो मानो पेट भरने के लिए ही खाना है। भैया ने भी माँ को ढूँढने कि काफी कोशिश कि पर नाकाम रहे। माँ के बिना दुनिया सूनी हो गई। इतने दिन से गुमसुम पापा ने आखिर चुप्पी तोड़ी और बोले – अनुष्का बेटी, तुम और सोमिल कल घर चले जाओ। मोनू के स्कूल कि काफी छुट्टियां हो गईं। घर में अब बहु आ गई है। मुझे अब तो मेरे हाल पढ़ छोड़ दो। सच है कि जब कोई चीज़ गुम हो जाती है तभी हमें उसकी कद्र पता चलती है।

न चाहते हुए भी मैंने सुबह जाने के लिए पैकिंग कर ली। अगले दिन सुबह मैं और पापा बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे कि एक ऑटो आ कर रुका। ऑटो से उतारते हुए माँ को देख कर मैं चीख पड़ी। पापा, भैया देखो माँ आ गई। मेरी आँखों से आंसू कि अविरल धरा बह निकली। माँ अपना सामान लेकर अपने कमरे में चली गईं। गुमसुम-सी बैग में से सामान निकालती गईं और अपनी जगह पर रखती गईं।

माँ तुम कहाँ चली गई थी ? मैंने तो तुम्हारे मिलने कि उम्मीद ही छोड़ दी थी। बेटा गई तू इस इरादे से थी कि अब आश्रम से कभी वापस नहीं आऊँगी। लेकिन बेटा तुम जानती हो मकड़ी की तरह इंसान अपने इर्द-गिर्द गृहस्थी काजा ल बुनता है। मकड़ी उसमें से साफ़ बच निकलती है पर इंसान उस जाल में फंसता चला जाता है क्योंकि इंसान इंसान है मकड़ी नहीं। तुम सब से दूर जाकर मुझे लगा मैं तुम सबसे दूर नहीं रह सकती। मेरी आत्मा तो तुम सबमें, इस घर में बसती है। कहते-कहते माँ ने अपने लड्डू गोपाल को अपनी जगह स्थापित कर दिया।

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ललिता भाटिया रोहतक

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