लघुकथा - दहशत - बिनय कुमार शुक्ल

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दहशत

आज पूरा शहर दहशत में है | हर तरफ आशंकाओं का माहौल | सभी डरे हुए अपने घरों में दुबके हुए हैं | कोई किसी से बात करने के लिए तैयार नहीं | अफवाहों का माहौल गरम है | हर मिनट नई नई खबर आ रही है | कभी यह खबर आती कि बाहर से हजारों की संख्या में जेहादी आक्रमण के लिए चल पड़े हैं , तो कभी खबर आती कि आज शाम को फिर से हमला होने वाला है | जितने मुंह उतनी बातें चल रही है |

जबसे सर जी ने स्ट्राइक करवाया है तब से मोहल्ले की चैन गायब है | एक तरफ सीमा पर के प्रशंसक तो दूसरी तरफ देशभक्ति में सारोबार लोग | कल तक जो आपस में भाई भाई से लगते थे, एक साथ रहते थे , आज सरहदों के बवाल के चक्कर में अपने ही घर में बवाल मचा बैठे हैं | दोनों दलों के छुटभैये कद्दवार नेता अपनी अपनी हांकने में लगे हुए हैं | कोई किसी से उन्नीस नहीं रहना चाहता | खुद को बीस बनाने के चक्कर में , अपनी अपनी कौम के रहनुमा बने युद्ध स्तर पर हिंसा अभियान को जारी रखे हुए हैं | अगर देखा जाए तो कुछ विशेष बात थी ही नहीं | विद्यालय में परीक्षा चल रही थी | एक छात्र नक़ल करते हुए पकड़ा गया और कक्षा से बाहर निकाल दिया गया | परीक्षा की समाप्ति के बाद विद्यालय के गेट के बाहर उस छात्र ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर नक़ल रोकने वाले शिक्षक पर हमला कर दिया| शिक्षक के बचाव में कुछ लोग आगे आये , पर यह क्या!! उस छात्र को जैसे ही चपत पड़ी, उसने इसे साम्प्रदायिक रंग दे डाला | भागते हुए उसने ऐलान किया कि दूसरी कौम के लोग हमें मारना चाहते हैं | भागो …..|

उसके आवाज देते ही तलवारें खिंच गयीं, हथगोले और गोलियों की बौछार होने लगी | मास्टर जी किसी प्रकार से अपनी जान बचाकर भागे | आज इस घटना की बीते लगभग पंद्रह दिन हो गए पर तनाव में कोई परिवर्तन नहीं आया | सब परेशान हैं पर किसी से कुछ कह भी नहीं सकते |

सड़क के एक कोने पर भोंदू चाय वाला एक छोटे से खोमचे में अपनी दूकान चलता हैं | उसके हाथों की चाय पीने के लिए हर कौम के लोग लालायित होकर आते थे, वहीँ बैठकर घंटों देश- दुनिया के हाल पर रायशुमारी करते थे | आज तो तब हद हो गयी जब कुछ लोग उसे पटक कर मारने लगे और उसका गला रेंतने का प्रयास करने लगे | कुछ लोगों ने इस कृत्य का विरोध किया तो उन्हें भी गालियां पड़ीं | किसी प्रकार से भोंदू को तो बचा लिया गया पर उसकी दूकान तबतक आग से जलकर ख़ाक हो गयी | चौराहे पर बैठा उसे जलते हुए देखता रहा | | उसके परिवार के जीविका के साधन को लुटते देखता रहा |कुछ कर भी तो नहीं सकता था …........

बूढ़े काका की एकमात्र सब्जी की दूकान थी मोहल्ले में, उसे भी लोगों ने जला दिया | काका भी भोंदू जैसा ही एक गरीब आदमी था जिसके आजीविका के सीमित साधन थे जिसे भीड़ ने नष्ट कर दिया |

पुलिस की रेपिड एक्शन टीम आ चुकी थी | उन्होंने पास के तीन किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया |ना कोई अंदर आ सकता था ना ही किसी को बाहर जाने की इजाजत थी | सारी दुकाने बंद हैं | बंद भला क्यों न हों |कौन है जिसे अपनी संपत्ति और अपनी जान प्रिय न हो | कर्फ्यू के आज पंद्रहवां दिन है |दूध के लिए बच्चे तड़प रहे हैं | खाने पीने का समान सब कुछ ख़त्म हो चुका है | दहशत के मारे और कर्फ्यू में कोई भी दूकान खोलने के लिए राजी नहीं है | ना मंदिर से आजान की आवाज आ रही है ना ही मंदिर से पूजा की घंटियों का | लगता है जैसे भगवान और खुदा दोनों ही इस झंझट से मर्माहत हो चुके इसलिए इनके बन्दे भी चुप हैं |

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2 टिप्पणियाँ "लघुकथा - दहशत - बिनय कुमार शुक्ल "

  1. हृदयविदारक चित्रण.

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  2. अति संवेदनशील मर्मान्तक । धन्यवाद।

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