विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

लघुकथा - दहशत - बिनय कुमार शुक्ल


दहशत

आज पूरा शहर दहशत में है | हर तरफ आशंकाओं का माहौल | सभी डरे हुए अपने घरों में दुबके हुए हैं | कोई किसी से बात करने के लिए तैयार नहीं | अफवाहों का माहौल गरम है | हर मिनट नई नई खबर आ रही है | कभी यह खबर आती कि बाहर से हजारों की संख्या में जेहादी आक्रमण के लिए चल पड़े हैं , तो कभी खबर आती कि आज शाम को फिर से हमला होने वाला है | जितने मुंह उतनी बातें चल रही है |

जबसे सर जी ने स्ट्राइक करवाया है तब से मोहल्ले की चैन गायब है | एक तरफ सीमा पर के प्रशंसक तो दूसरी तरफ देशभक्ति में सारोबार लोग | कल तक जो आपस में भाई भाई से लगते थे, एक साथ रहते थे , आज सरहदों के बवाल के चक्कर में अपने ही घर में बवाल मचा बैठे हैं | दोनों दलों के छुटभैये कद्दवार नेता अपनी अपनी हांकने में लगे हुए हैं | कोई किसी से उन्नीस नहीं रहना चाहता | खुद को बीस बनाने के चक्कर में , अपनी अपनी कौम के रहनुमा बने युद्ध स्तर पर हिंसा अभियान को जारी रखे हुए हैं | अगर देखा जाए तो कुछ विशेष बात थी ही नहीं | विद्यालय में परीक्षा चल रही थी | एक छात्र नक़ल करते हुए पकड़ा गया और कक्षा से बाहर निकाल दिया गया | परीक्षा की समाप्ति के बाद विद्यालय के गेट के बाहर उस छात्र ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर नक़ल रोकने वाले शिक्षक पर हमला कर दिया| शिक्षक के बचाव में कुछ लोग आगे आये , पर यह क्या!! उस छात्र को जैसे ही चपत पड़ी, उसने इसे साम्प्रदायिक रंग दे डाला | भागते हुए उसने ऐलान किया कि दूसरी कौम के लोग हमें मारना चाहते हैं | भागो …..|

उसके आवाज देते ही तलवारें खिंच गयीं, हथगोले और गोलियों की बौछार होने लगी | मास्टर जी किसी प्रकार से अपनी जान बचाकर भागे | आज इस घटना की बीते लगभग पंद्रह दिन हो गए पर तनाव में कोई परिवर्तन नहीं आया | सब परेशान हैं पर किसी से कुछ कह भी नहीं सकते |

सड़क के एक कोने पर भोंदू चाय वाला एक छोटे से खोमचे में अपनी दूकान चलता हैं | उसके हाथों की चाय पीने के लिए हर कौम के लोग लालायित होकर आते थे, वहीँ बैठकर घंटों देश- दुनिया के हाल पर रायशुमारी करते थे | आज तो तब हद हो गयी जब कुछ लोग उसे पटक कर मारने लगे और उसका गला रेंतने का प्रयास करने लगे | कुछ लोगों ने इस कृत्य का विरोध किया तो उन्हें भी गालियां पड़ीं | किसी प्रकार से भोंदू को तो बचा लिया गया पर उसकी दूकान तबतक आग से जलकर ख़ाक हो गयी | चौराहे पर बैठा उसे जलते हुए देखता रहा | | उसके परिवार के जीविका के साधन को लुटते देखता रहा |कुछ कर भी तो नहीं सकता था …........

बूढ़े काका की एकमात्र सब्जी की दूकान थी मोहल्ले में, उसे भी लोगों ने जला दिया | काका भी भोंदू जैसा ही एक गरीब आदमी था जिसके आजीविका के सीमित साधन थे जिसे भीड़ ने नष्ट कर दिया |

पुलिस की रेपिड एक्शन टीम आ चुकी थी | उन्होंने पास के तीन किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया |ना कोई अंदर आ सकता था ना ही किसी को बाहर जाने की इजाजत थी | सारी दुकाने बंद हैं | बंद भला क्यों न हों |कौन है जिसे अपनी संपत्ति और अपनी जान प्रिय न हो | कर्फ्यू के आज पंद्रहवां दिन है |दूध के लिए बच्चे तड़प रहे हैं | खाने पीने का समान सब कुछ ख़त्म हो चुका है | दहशत के मारे और कर्फ्यू में कोई भी दूकान खोलने के लिए राजी नहीं है | ना मंदिर से आजान की आवाज आ रही है ना ही मंदिर से पूजा की घंटियों का | लगता है जैसे भगवान और खुदा दोनों ही इस झंझट से मर्माहत हो चुके इसलिए इनके बन्दे भी चुप हैं |
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

हृदयविदारक चित्रण.

अति संवेदनशील मर्मान्तक । धन्यवाद।

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget