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बॉब डिलन - लोकतंत्र का लोकगायक - लोकमित्र

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सम-सामयिक/साहित्य के नोबेल पुरस्कार-2016 पर विशेष
बॉब डिलन
लोकतंत्र का लोकगायक
लोकमित्र

हालांकि चर्चा तो इसके पहले भी कई बार हुई कि बॉब डिलन को नोबेल पुरस्कार दिये जाने के बारे में सोचा जा रहा है, लेकिन 13 अक्टूबर 2016 के पहले तक किसी को यकीन नहीं था कि एक दिन सचमुच साहित्य का नोबेल पुरस्कार एक गीतकार और लोकगायक को भी दिया जा सकता है। इसकी वजहें थीं, दरअसल पिछले 115 सालों में साहित्य का नोबेल पुरस्कार जिन दिग्गज और विशुद्ध क्लासिक साहित्यकारों को दिया गया था, उनकी किसी भी कतार में, किसी भी तरह अमरीका का यह मानवाधिकारी लोकगायक फिट नहीं बैठता था। इसलिए माना जा रहा था कि बातें और अफवाहें अपनी जगह है पर साहित्य के नोबेल पुरस्कार पाने वालों में डिलन कभी शामिल नहीं किये जायेंगे।


मगर आखिरकार दुनिया बदल गई। जो बात कभी सिर्फ अफवाह थी, वह 13 अक्टूबर 2016 की दोपहर सच्चाई बन गयी। साहित्य के लिए साल 2016 का नोबेल पुरस्कार बॉब डिलन नामक अमरीका के इस रॉक स्टार गायक को मिला। सवाल है आखिर इसका क्या मतलब निकालें? मतलब निकालने की यह जरूरत इसलिए, क्योंकि पूरी दुनिया में इस फैसले की अलग-अलग अर्थों में व्याख्या हो रही है। विशुद्ध साहित्यकार जो पूरी दुनिया में गायकों, लोकगायकों या बहुसंख्यक लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकारों को साहित्यकार मानना तो दूर, उनकी इस संभावना पर भी नाक भौं सिकोड़ते हैं। उनको लगता है, बॉब डिलन को दिया गया साहित्य का नोबेल पुरस्कार दरअसल यह साहित्य के खाते में डाली गई एक विशुद्ध डकैती है। विशुद्ध साहित्यकारों को लगता है बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल पुरस्कार देकर नोबेल कमेटी ने इस महान पुरस्कार का पतन किया है।


राजनीतिक विश्लेषक और हर फैसले पर अमरीका के वर्चस्व को सूंघने वालों की नजर में भी यह न सिर्फ एक राजनीतिक फैसला है बल्कि बहुत तात्कालिक फैसला भी है। इन विश्लेषकों के मुताबिक अमरीका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और स्वभाव से दक्षिणपंथी डोनाल्ड ट्रंप के मुकाबले हिलेरी क्लिंटन कमजोर पड़ रही हैं। इसलिए ऐन मौके पर बॉब डिलन को नोबेले पुरस्कार दिलवाकर व्हाइट हाउस ने प्रेसीडेंट के चुनावों के लिए बचे महज एक महीने के पहले अमरीकी फिजा को मानवाधिकारों की खुश्बू से तरबतर करने का मन बना लिया है। इसीलिए अमरीकी सत्ता केंद्र ने हस्तक्षेप करके बॉब को यह पुरस्कार दिलवाया है। ऐसा कहने वाले अपनी बात को वजनदार बनाने और बताने के लिए याद दिला रहे हैं कि आमतौर पर विज्ञान के पुरस्कार के साथ ही घोषित होने वाला साहित्य का नोबेल पुरस्कार इस बार एक सप्ताह से भी ज्यादा दिनों तक बिलंबित क्यों हुआ?


दरअसल इनके मुताबिक ज्यूरी की उलझन थी, जिसके कुछ सदस्य अमरीका के इस दबाव को मानने के लिए तैयार नहीं थे। मगर इनके मुताबिक अंततः वहीं हुआ जो अमरीका ने चाहा। ये अलग-अलग व्याख्याएं हैं लेकिन अगर समग्रता में सोचा जाये और हर निर्णय के पीछे किसी षडयंत्र को न सूंघा जाये तो बड़ी सहजता से नोबेल कमेटी के इस तर्क से संतुष्ट हुआ जा सकता है कि बॉब डिलन पिछली आधी सदी से भी ज्यादा समय से, न सिर्फ महान अमरीकी गीत परंपरा को समृद्ध करते रहे हैं बल्कि उसे नया काव्यभाव और दर्शन भी दिया है। एकेडमी ने यह भी माना है कि यह महान रॉक गायक अपने आपमें किवदंती बन चुका है, इसके बाद हालांकि कमेटी ने आगे शब्द छोड़ दिये हैं लेकिन इसका विस्तार यही है कि बॉब डिलन को पुरस्कार देकर नोबेल कमेटी ने खुद, नोबेल पुरस्कार का भी सम्मान किया है।


अलग-अलग व्याख्याएं कुछ भी कहें लेकिन इस महान गायक, गीतकार, संगीत अन्वेषक और शिल्प के मामले में बेहद प्रयोगधर्मी कलाकार ने दुनिया को न सिर्फ नयी किस्म की भावनाएं बल्कि नये ढंग से अनुप्रेरित करने वाली प्रेरणाएं भी दी हैं। कमेटी ने सही कहा है कि पिछली आधी सदी से भी ज्यादा का समय इस महान गायक का बार-बार खुद की खोज का समय रहा है। कोई भी महान रचयिता दुनिया से कुछ नहीं लेता, बार-बार खुद को ही दुनिया के लिए नयी-नयी तरह से खोजता है, उसकी यह अपनी खोज ही दुनिया की थाती बन जाती है।
दुनिया के हर उस जीनियस ने जिसने दुनिया को बदला है, बार-बार खुद को ही खोजा है। चाहे वो बुद्ध हों और चाहे महात्मा गांधी। 75 साल के रॉक लीजेंड बॉब डिलन इसी परंपरा के एक मिथकीय उदाहरण हैं। उन्होंने अपना कॅरिअर साल 1959 में अमरीका के मिनीसोटा के एक कॉफी हाउस से शुरु किया। उस समय उनकी उम्र महज 19 साल थी। जाहिर है तब किसी ने उन्हें नोटिस नहीं लिया था, लेकिन बॉब डिलन इससे हताश होने वाले नहीं थे। क्योंकि वह दुनिया के लिए नहीं खुद के लिए गा रहे थे, खुद को स्पंदित कर रहे थे। खुद की प्रेरणा के लिए फिजाओं का रूख बदल रहे थे। अपने 54 साल के सक्रिय कॅरिअर में बॉब डिलन ने 70 एलबम निकाले, 6 किताबें लिखीं, एक दर्जन से ज्यादा फिल्मों, लघुफिल्मों और वृतचित्रों में अभिनय किया। 653 गाने लिखे। सबकी धुनें खुद बनायीं और प्रस्तुति में एक दो दर्जन नहीं बल्कि हजारों प्रयोग किये।


यहां तक कि कई बार उनकी इस प्रयोगधर्मिता को हूट भी होना पड़ा, मगर इस लीजेंड ने फिर भी साबित किया, महान कलाकार सिर्फ खुद से प्रेरित होता है। सिर्फ खुद से संचालित होता है। सो, डिलन न हताश हुए, न परेशान हुए और आर्केस्ट्रा गिटार को फेंककर खूब मस्ती में इलेक्ट्रिक गिटार बजाकर साबित किया कि कला दिल में होती है, उपकरणों में नहीं। सवाल है बॉब डिलन को क्या वाकई एक लोकगायक मना जाये? क्या वाकई उन्हें महज एक संगीतकार माना जाये? क्या उन्हें सिर्फ गीतकार तक सीमित रखा जाये? या जैसे कि पश्चिमी पत्रकारों ने बार-बार कहा है, वह अपनी पीढ़ी के प्रवक्ता थे, वो माना जाये? आखिर उन्हें किस एक खांचे में फिट किया जाये? सच्चाई यही है कि हम चाहे जो करें, जितनी भी कोशिश कर लें बॉब किसी भी एक विधा में, क्षेत्र में, धारा में या अभिव्यक्ति में नहीं समाते। उन्हें सीमित नहीं किया जा सकता। बॉब विस्फोटक हैं। बॉब विरोधाभासी हैं। बॉब विचारक हैं। बॉब को सिर्फ लोकगायक कहना एक किस्म से उनका अपमान है। क्योंकि बॉब डिलन ने लोकगायिकी और लोकगीतों का मैयार बदल दिया है। वह एक किस्म से आइडियोलॉजिकल प्रीचर हैं। लेकिन जब हम जिद करके उन्हें यही मानने लगते हैं तो वो हमारे हाथों से छिटक जाते हैं; क्योंकि उनकी स्थाई आइडियोलॉजी नहीं है।


एक दौर में वो हिटलर से प्रभावित होते हैं, दूसरे दौर में वो इजरायल के लिए गीत गाते हैं और एक दौर वह भी आता है जब वह अमरीकी वर्चस्व, बर्बरता और आतंक के सामने दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं और उनके गीत वियतनाम की आवाज बन जाते हैं। उनके गीत मानवाधिकारों की आत्मा बन जाते हैं। इसलिए बॉब डिलन को निरानिर एक लोकगायक कहकर उनके कद को थोड़ा कम करना है। सच बात तो यह है कि उन्होंने साहित्य के नोबेल पुरस्कार पर डकैती नहीं डाली बल्कि नोबेल कमेटी को अपने जरिये एक सम्पूर्ण जीनियस को चुने जाने का सौभाग्य दिया है, जो शायद एक विधा में अटता ही नहीं है। बॉब डिलन होने का असली चुबंक, उनका मायावी जादू, उनके शब्दों में, उनकी प्रस्तुति में रहा है। उनके गीत अकसर कंट्रोवर्सी में जाते रहे हैं।


लेकिन बॉब डिलन की कंट्रोवर्सी कभी भी जुगुप्सा की चोटी में नहीं पहुंचती रही। वह कंट्रोवर्सी इंसान का मान बढ़ाती रही है। वह कंट्रोवर्सी अभिव्यक्ति को नये पैमाने देती रही है। हर लिविंग लीजेंड की तरह उनमें भी कुछ शोमैनशिप रही है। उनमें भी कुछ स्टारडम की अकड़ रही है, लेकिन इससे उन्होंने कभी अपनी अभिव्यक्ति का स्तर नहीं गिराया। 1966 में उनका एक्सिडेंट हुआ और लंबे समय तक यानी लगभग 8 सालों तक वह सार्वजनिक प्रस्तुतियों से दूर रहे, क्योंकि उन्हें हमेशा लगता रहा अभी वो इस लायक नहीं हैं कि स्टेज पर आकर स्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर सकें। उन्होंने कोई समझौता नहीं किया। जब पूरी तरह से सही हो गये जब उनमें वही कॉन्फिडेंस लौट आया जो आसमान के चमकते सितारे का होता है। वह फिर स्टेज पर लौट आये और इतिहास बताता है, शोहरत, प्रसिद्धि, जुनून, दीवानगी सबकुछ ताउम्र उनके पीछे चलती रही है, आगे उनके कुछ भी नहीं चला।
इसलिए नहीं माना जाना चाहिए कि उनको नोबेल पुरस्कार देकर नोबेल कमेटी ने साहित्य का हिस्सा मार दिया है। सच तो यह है कि नोबेल कमेटी ने अपनी खोज को ज्यादा मानवीय बना लिया है, अपने कद को ज्यादा ऊंचा कर लिया है। अगर वो भविष्य में भी कुछ ऐसा कर सकी तो माना जायेगा कि लोकगायन की तरह महान पुरस्कारों की परंपरा में भी बॉब डिलन ने एक नया आयाम जोड़ दिया है।


(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)

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