शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

बनास जन के दो विशेषांकों का लोकार्पण

बनास जन के दो विशेषांकों का लोकार्पण

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संवाद - प्रो. नवलकिशोर

फिर से मीरां - प्रो. माधव हाड़ा

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उदयपुर।  जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (मान्य) विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा 'आलोचक से मिलिए'  का आयोजन हुआ। यह कार्यक्रम नई दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी की लघु पत्रिका ‘बनास जन‘ द्वारा हिन्दी के सुप्रसिद्ध आलोचक  प्रो. नवलकिशोर एवं प्रो. माधव हाड़ा पर प्रकाशित अतिरिक्तांकों को केन्द्र में रखकर आयोजित किया गया। प्रो. नवल किशोर के आलोचना कर्म पर चर्चा करते हुए प्रो. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि प्रो. नवलकिशोर राजस्थान में हिन्दी साहित्य के शलाका-पुरूष हैं, इनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व में किसी प्रकार का अन्तर्विरोध नहीं है, डाॅ. नवलकिशोर वादमुक्त चिंतक हैं, इनकी आलोचना सृजनात्मक आलोचना है, उन्होंने कहा कि इनके कृतित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्होंने मानववाद को आधार बनाकर अपनी आलोचना पद्धति को स्थापित किया है अतः वैचारिक उदारता इनके आलोचना-कर्म की विशिष्टता बन गई, उन्होंने यह भी कहा कि माक्र्सवाद और आस्तित्ववाद का सामंजस्य कर नवल जी ने अभूतपूर्व कार्य किया है। प्रो. नवल किशोर से संवाद अंक पर चर्चा करते हुए आगे डाॅ. व्यास ने बताया कि डाॅ. रेणु व्यास ने नवलजी से बहुत प्रासंगिक विषयों पर बातचीत कर उनके आलोचना-कर्म को सप्रयास रेखांकित किया है। इस साक्षात्कार के माध्यम से हम नवलजी के आलोचना कर्म से बहुत करीब से परिचित हो पाते हैं। हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष डाॅ. मलय पानेरी ने प्रो. माधव हाड़ा की बहुचर्चित पुस्तक ‘पंचरंग‘ चोला पहर सखी री, पर आधारित ‘बनास जन‘ पत्रिका के अतिरिक्तांक ‘फिर से मीरा‘ पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रो. हाड़ा ने मीरा के समय और समाज की ऐतिहसिक दृष्टि से पड़ताल कह हैं, उन्होंने अपने निष्कर्ष पर्याप्त वस्तुनिष्ठता रखते हुए निकाले हैं। मलय पानेरी ने कहा कि डाॅ. हाड़ा के ये निष्कर्ष महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि मीरा का समय ठहरा हुआ समय था और मीरा किसी सत्तारूढ़ की बेटी नहीं थी उन्होंने मीरा की साधारण स्त्री की छवि को स्थापित कर इतिहास और साहित्य लोक में प्रचलित चल निकली छवि से उसे बाहर निकाला है। इस पुस्तक की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। ख्यात आलोचक प्रो. नवल किशोर ने अपनी आलोचना पद्धति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पद्धति वादकेन्द्रित न होकर समावेशीकरण पर आधारित है अतः अन्य पद्धतियों की तुलना में यह आधिक न्यायसंगत ढ़ंग से कार्य करती है। इसकी वैश्विक दृष्टि इसे अधिक विश्वसनीय बनाती है। प्रो. नवल किशोर ने कहा कि ‘बनास जन‘ हिन्दी की श्रेष्ठ लघु पत्रिकाओं में गिनी जाती है, इसका पूरा श्रेय युवा संपादक डाॅ. पल्लव को जाता है, जिन्होंने थोड़े ही समय में अपने संपादकीय कौशल का परिचय देकर राष्ट्रीय स्तर पर इस पत्रिका की पहचान बनाई है। प्रो. माधव हाड़ा ने बताया कि दिल्ली जैसे महानगर में कई साहित्यिक एवं शोध पत्रिकाएं निकलती हैं किंतु पल्लव संपादित ‘बनास जन‘ इतने कम समय में ही शीर्ष पत्रिकाओं में आज गण्य हो गई हैं। प्रो. हाड़ा ने आलोचना के उपकरणों की महत्ता को उजागर करते हुए कहा कि आयातित उपकरणों से हमारी अपनी कृतियों का मूल्यांकन करना अनुचित है हमारे अपने उपकरणों से ही किसी रचना की सम्यक समीक्षा संभव है।

मंचस्थ अतिथियों ने ‘बनास जन‘ के दोनों अंकों का विमोचन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्रमजीवी महाविद्यालय की अघिष्ठाता प्रो. सुमन पामेचा ने की, विशिष्ट अतिथि प्रो. सत्यनारायण व्यास थे। कार्यक्रम का संचालन डाॅ. ममता पानेरी ने किया। धन्यवाद डाॅ. राजेश शर्मा ने दिया।

रिपोर्ट -डॉ ममता पानेरी 

सहायक आचार्य हिंदी विभाग 

जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (मान्य) विश्वविद्यालय

उदयपुर 

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Delhi- 110088

Phone- 011-27498876

Mo - 08130072004

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