विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

ये कैसा मजाक - कहानी - विनोद कुमार दवे

image

ये कैसा मजाक

मुझे अच्छी तरह याद है, दो साल पहले 31 मार्च की शाम मुझे एक कॉल आया,” हेलो अमित! मैं....... दीपशिखा बोल रही हूँ.......।“

मैं एकदम चिंतित हो गया। वह रो रही थी। मैं कुछ बोलता उस से पहले ही वह बोल उठी,”तुम जल्दी से 12 नंबर की बस पकड़ कर वृन्दावन गार्डन पहुँच जाओ.....जरूर आना...शायद हमारी अंतिम मुलाकात हो”।

मैंने आव देखा न ताव। सीधे घर से भागा। मेरा भाग्य मेरे साथ था। बस तुरंत मिल गई। लगभग एक घंटे के सफ़र के बाद मैं वृन्दावन गार्डन में था। मैं यह सोच कर परेशान था कि दीपशिखा का क्या हाल होगा? मैंने उसे गार्डन में ढूंढा। लेकिन वह नहीं मिली। अचानक मेरा मोबाइल बज उठा। मैं हेलो ही बोल सका था कि उसने कहा,”हेलो अमित! मैं बड़ी मुसीबत में हूँ। तुम अभी होटल ग्रीनसिटी के बाहर मुझे मिलो। कॉल फिर कट गया। शायद संकट की घड़ी थी। मैं फिर से बस पकड़ कर होटल ग्रीनसिटी पहुँच गया। वहां कोई नहीं था। इस बार मोबाइल की घंटी बजते ही मैं बोल उठा,” दीपशिखा! आखिर तुम हो कहाँ?”

चुप रहो।“

ये आवाज़ किसी आदमी की थी। मेरे हाथ पाँव तक फूल गए। वह बोला,”अगर पुलिस को खबर दी तो बहुत बुरा होगा। तुम्हारी प्रेमिका हमारे कब्जे में है। अब जल्दी से होटल चंद्रविहार पहुँच जाओ।“

मैं पसीने से तरबतर था। रोंगटे तक खड़े हो गए थे। रात के 8 बज रहे थे। मैंने हिम्मत की और आधे घंटे बाद होटल चन्द्रविहार के बाहर खड़ा था। गार्ड ने मुझसे पूछा,”आपका नाम अमित है?”

मैंने हां में सर हिलाया।

आपको मैडम अंदर बुला रही है।“

अंदर जाकर देखा तो मेरा दिमाग चकरा गया। मेरे चार दोस्त और दीपशिखा जोर जोर से चिल्ला रहे थे,”अप्रैल फूल!”

मेरी आँखें गुस्से से लाल हो गई। मैंने दीपशिखा को बहुत बुरी तरह डांटा और पैर पटकते हुए वहां से लौट आया। मैंने चार दिनों तक उस से बात नहीं की। पाँचवें दिन वह घर आ धमकी। उसने रोते हुए मुझसे माफ़ी मांगी। सच कहूँ, वो रोते हुए भी बहुत खूबसूरत लग रही थी। मैं बस उसके चेहरे को देखता रह गया।

पिछला एक अप्रैल आने से पहले मैं सारी तैयारी कर चुका था। उसे अप्रैल फूल बनाने के विचार मात्र से मैं रोमांचित था। मैंने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर उसे अप्रैल फूल बनाने की पूरी तैयारी कर ली। मैंने 29 मार्च को ही कॉल करके कह दिया था कि मैं शहर से बाहर जा रहा हूँ। दो दिन बाद वापिस आऊँगा। योजनानुसार मैंने दोस्तों को कह दिया कि एक अप्रैल को उसे कह देना कि अमित दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया है।

एक अप्रैल की दोपहर को मेरे दोस्त का कॉल आया। उसने बताया कि दीपशिखा को वो सब कुछ बता दिया गया है जिसकी स्क्रिप्ट मैं दो दिन पहले ही लिख चुका था। मैं खुश था और ये जानने को उत्सुक था कि उसकी प्रतिक्रिया क्या रही। मेरे दोस्त के अनुसार दीपशिखा मुझे मिलने अस्पताल की ओर रवाना हो चुकी थी। पिछली साल उसने मेरी जो हालत की थी, उसका बदला लेकर मैं अत्यंत प्रसन्न था। लगभग दो घंटे बाद मेरे दोस्त का वापिस कॉल आया। बोला,”अमित! मजाक महंगा पड़ा। दीपशिखा अस्पताल में है। तुम्हें देखने जब अस्पताल जा रही थी, रास्ते में दुर्घटना हो गई। गंभीर रूप से घायल है वो। “

मैं हंस पड़ा और बोला,” देखो! तुम मुझे समझते क्या हो? मैं तुम्हारी बातों में आने वाला नहीं हूँ। इस ग्रुप को छोड़कर उसमें कैसे शामिल हो गए?” ये कहते ही मैंने कॉल काट दिया। मैं सोच रहा था कि मेरा दोस्त दीपशिखा की बातों में आ गया होगा। इसलिए मुझे दीपशिखा के घायल होने की खबर झूठी लग रही थी(वास्तव में मैं यहीं दुआ कर रहा था कि यह एक अफवाह साबित हो)। पर मैं ख़ुद को नहीं रोक सका। मैं सीधे अस्पताल पहुँच गया।

ख़ुदा शायद मेरी दुआ सुनने को तैयार नहीं था। मेरा प्यार मजाक के अंधड़ में उड़ गया। डॉक्टर हाथ झटक चुके थे। दीपशिखा के माँ बाप का रो-रो कर बुरा हाल था। दीप की शिखा बुझ चुकी थी। मैं इस का गुनहगार था। मजाक इतना महंगा पड़ेगा मैं सोच भी नहीं सकता था। आंसू आँखों में ही रह गए, जुबां अटक गई और मैं बेहोश हो गया। जब तक होश आया, दीपशिखा अग्नि में विलीन हो चुकी थी। मेरा प्यार एक हलके मजाक में खो गया। आज भी अप्रैल के पहले दिन मैं 12 नंबर की बस पकड़ता हूँ। वृन्दावन गार्डन पहुंचता हूँ फिर होटल ग्रीनसिटी। मुझे पता है वह इन दोनों जगहों पर नहीं मिलेगी। वह होटल चंद्रविहार में मेरा इंतजार कर रही होगी। मैं चंद्रविहार होटल जाता हूँ और आंसुओं से भरी आँखों से मैं गार्ड की तरफ देखता हूँ, शायद वह आकर मुझसे कहेगा,”आपका नाम अमित है? मैडम आपको अंदर बुला रही है।“

पर नहीं....यह संभव नहीं है और मैं पागलों की तरह वहां रोने लगता हूँ। अभी तक उसी होटल के सामने खड़ा हूँ, शायद मेरा प्यार मुझे बुला दे.....शायद......

--

image

परिचय -

साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं यथा, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, अहा! जिंदगी, कादम्बिनी , बाल भास्कर आदि में रचनाएं प्रकाशित।

अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत।

पता :

विनोद कुमार दवे

206

बड़ी ब्रह्मपुरी

मुकाम पोस्ट=भाटून्द

तहसील =बाली

जिला= पाली

राजस्थान

306707

मोबाइल=9166280718

ईमेल = davevinod14@gmail.com

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget