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मंगल ठाकुर उर्फ़ "ठाकुर मंगल बाबा" के कारनामे (कहानी )

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उत्तरी बिहार का एक शहर है मुजफ्फरपुर। मुझफ्फरपुर यूँ तो एक से बढ़कर एक युगपुरुषों जैसे - राष्ट्रकवि दिनकर,डा. सर्वपल्लीराधाकृष्णन, डा. राजेन्द्र प्रसाद आदि महापुरुषों की कर्मभूमि रही है लेकिन इन्हीं महापुरुषों के बीच एक और युगपुरुष हुए "राज मंगल ठाकुर" उर्फ़ "ठाकुर मंगल बाबा"। बाकी महापुरुषों अपने - अपने कर्मों के लिए जाने जाते हैं लेकिन ठाकुर मंगल बाबा अपने कारनामों के लिए जाने जाते हैं।

आप बिहार यूनिवर्सिटी के मुजफ्फरपुर अवस्थित "रामवृक्ष बेनीपुरी महिला महाविद्यालय" चले जाइये और वहां के किसी भी कर्मचारी से पूछिये - क्या आप राज मंगल ठाकुर को जानते हैं ? वह शख्स हाथ जोड़कर अपनी आँखों में श्रद्धा और उत्पीड़न का सम्मिलित भाव लाते हुए कहेगा - जी , मंगल ठाकुर को कौन नहीं जनता है ?कहिए क्या सेवा करूँ? दरअसल उस यूनिवर्सिटी और उनके इलाके का शायद ही कोई शख्स होगा जो उनके कारनामों से पीड़ित और वाकिफ न होगा। मंगल ठाकुर की लोगों में तूती बोलती है। अब आपलोगों के जेहन में सवाल कौंध रहा होगा की आखिर मंगल बाबा कौन हैं और इनकी क्या खासियत है की लोग इनसे ख़ौफ़ खाते हैं? अगर आपलोग सोच रहे हैं की ये कोई दबंग मर्डर या क्रिमनल बैकग्राउंड के आदमी हैं तो आप सरासर गलत हैं।

मंगल ठाकुर बिहारयूनिवर्सिटी के मुजफ्फरपुर अवस्थित रामवृक्ष बेनीपुरी महिला महाविद्यालय में चपरासी हैं और अपने गाँव के विशाल मंदिर के महंथ भी हैं। दिखने में दुबले - पतले , हाइट साढ़े पांच फिट ,बढ़ी हुई दाढ़ी। अपने जेब में हर समय चिलम और गांजा लेकर चला करते हैं। इलाके के लोग कहते हैं कि इस कलयुग के एकमात्र ऐसे जीव हैं जिन्होंने अपने कूटनीतिक चालों से जो चाहा वो पाया। जिस चीज पर इनका दिल आ जाता वो चीज इनकी हो जाती। बिना अस्त्र-शस्त्र उठाये ही इन्होंने ने करोड़ों के जमीन जायदाद पर कब्ज़ा किया सिर्फ अपने हुनर के बदौलतl

इनके गाँव में एक मंदिर था। उस मंदिर के महन्थ थे चतुर्भुज ठाकुर। मंदिर का एक बड़ा परिसर था उसमें आम,अमरुद,लीची,कटहल,गांजा आदि के अनेकों पेड़ लगे हुए थे। मंदिर का तीन चार एकड़ जमीन भी था। इनसब चीजों से सालभर में लगभग दो लाख रूपये की आमदनी हो जाती थी। चतुर्भुज ठाकुर और मंगल ठाकुर में गाढ़ी मित्रता थी। इस मित्रता का मुख्य वजह यह था की दोनों एक नम्बर के गंजेड़ी थे। हालाकिं चतुर्भुज ठाकुर मंगल ठाकुर से उम्र में पन्द्रह साल बड़े थे।

एक रोज गांजे के नशे में चतुर्भज ठाकुर ने ठाकुर मंगल बाबा को भला बुरा कह दिया। मंगल बाबा बोले - चतुर्भुज ठाकुर हम कोई अठान - पठान नहीं हैं कि तुम हमको कुछ भी बोल दो। हम परशुराम के वंशज हैं देख लेना तुम्हारी महंथई एक दिन हिला के रोड पर नहीं ले आये तो तो हमारा नाम भी "मंगल ठाकुर" नहीं। इतना कहकर वे वहां से अर्ध रात्रि में ही कूच कर गए अपने दलान को। दलान पहुँच कर खटिया पर लेट गए। सोने की लाख कोशिस करते लेकिन नींद भला कहाँ आती! जेहन में तो चतुर्भुज ठाकुर का अपमान और मंदिर को हथियाने की तरकीब चल रही थी। उस रात ठाकुर मंगल बाबा को नींद नहीं आई। वो रात भर दांव -पेंच सोचते रहे। सहसा एक उपाय सूझा। वो मन ही मन आनन्दित हुए।

सुबह उठाकर ठाकुर मंगल बाबा मंदिर गए और चतुर्भुज ठाकुर को प्रणाम करते हुए बोले - देखो, चतुर्भुज ठाकुर हम दोनों बचपन के लंगोटिया यार हैं कल रात हमारे-तुम्हारे बिच में जो तू - तू मैं - मैं हुई उसको भूल जाओ। आज के चार दिन बाद होली है और हम उस होली को यादगार बनाना चाहते हैं। उस दिन हम एक भव्य आयोजन करने की सोच रहे हैं इस मंदिर परिसर में। गान - बजान होगा और खान - पान भी होगा। अब तुम इस मंदिर के महन्थ हो इसलिए तुम्हारा परमिशन जरुरी है। साथ दोगे न ? चतुर्भुज ठाकुर भावुक होकर ठाकुर मंगल बाबा को बाहों में भरते हुए बोले - अरे, मंगल तू पगला है क्या ? तुम कंजूस जिंदगी में एक कौड़ी कभी खर्च नहीं किये। आज आयोजन की बात कर रहे हो और हम साथ न दें ऐसा भी हो सकता है क्या ? ठाकुर मंगल बाबा बोले ठीक तो फिर पक्का रहा आयोजन ।
चार दिन बाद होली आई। पुरे गाँव के नशेड़ियों में चहल - पहल थी। चहल - पहल हो भी क्यों न मंगल बाबा जो कभी भिखारी को एक अट्ठन्नी तक नहीं दिए थे वो आज भव्य आयोजन करनेवाले थे। सुबह से ही मंदिर परिसर में भांग पिसा जा रहा था। काजू - किशमिस,बादाम आदि भी अलग सिलौट पर पिसा जा रहा था। बारह बजने को था सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी। उधर बाल्टी में भांग का घोल तैयार था। लोग एक दूसरे को अबीर- गुलाल लगाकर भांग का शर्बत गटक कर नाच - गा रहे थे। चतुर्भुज ठाकुर चार गिलास लेने के बाद सुध - बुध खो रहे थे। सारे लोग नशे में चूर होकर मंगल ठाकुर जिंदाबाद का जयकारा लगाए जा रहे थे ।

इन सब के बीच ठाकुर मंगल बाबा बिल्कुल होश में थे। देखे की यही समय है सही शॉट खेलने का मिडविकेट के ऊपर से। वे अपने जेब से एक कागज़ निकाले और बोले - भाई, अब जिंदगी का क्या भरोसा कल होकर हम रहें या न रहें? इसलिए इस आयोजन को यादगार बनाये रखने के लिए इस कागज पर सबलोग अपना दसख़त कर दीजिये।
महन्थ चतुर्भुज ठाकुर बोले - वाह! मंगल ठाकुर क्या बात है लाओ। सबसे पहले महन्थ और उम्र में बड़े होने के नाते हम हस्ताक्षर करते हैं। इतना कहकर उस सादे कागज पर हस्ताक्षर कर दिए फिर उसके बाद सभी लोग उनके निचे हस्ताक्षर कर दिए। कुछ अंगूठा छाप लोग भी थे वो भी अपना अंगूठा लगा दिए।

(मंगल ठाकुर उस हस्ताक्षर वाले कागज़ के साथ एक चिट्ठी अटैच करके कोर्ट पहुँच गए)

पांच दिन बाद अचानक पुलिस की गाड़ी मंदिर परिसर में आकर रुकी। मंगल बाबा कोर्ट का आर्डर चतुर्भुज ठाकुर को दिखाए ।

मैं चतुर्भुज ठाकुर, काफी दिनों से अस्वस्थ चल रहा हूँ। मेरा मानसिक संतुलन भी ठीक नहीं रहता। सुबह की आरती शाम को पढ़ देता हूँ और शाम वाली सुबह को। मंदिर में पूजा करने आनेवाले शख्स से भी कभी-कभी अनबन हो जाती है। इन सब परिस्थितियों के बीच मेरा इस महन्थ पद पर रहना उचित नहीं। अतः मैं पुरे होशो - हवाश में शेरुकाहीं राम मंदिर मुझफ्फरपुर की महंथई मंगल ठाकुर को सौंपता हूँ।
आज्ञा से,
महन्थ चतुर्भुज ठाकुर

महन्थ चतुर्भुज ठाकुर चौंक गए lवे कुछ बोलते ही इससे पहले पुलिस ने उन्हें डाँटते हुए कहा - चलिए, ज्यादा नौटंकी मत कीजिये और जल्दी से सारे ताले का चाभी मंगल ठाकुर को देकर मंदिर खाली कीजिये। चतुर्भुज ठाकुर अपने जनेऊ से चाभियों का गुच्छा मंगल ठाकुर को देते हुए बोले - लो कर लो महंथई लेकिन याद रखना तुम हमको धोखा दिए हो और हम छोड़ेंगे नहीं पटना हाई कोर्ट में जायेंगे। मंगल ठाकुर बोले - जरूर जाइयेगा भूतपूर्व महंथ जी लेकिन फ़िलहाल अभी मंदिर से तो जाइये।

अब मंगल ठाकुर मंदिर के नये महंथ हो चुके थे और चतुर्भुज ठाकुर सड़क पर आ चुके थे। जो चतुर्भुज ठाकुर कल तक करोड़ों के मालिक थे आज प्रोपर्टी के नाम पर उनके पास सिर्फ एक मरियल घोड़ा था। उस मरियल घोड़ा का नाम "बदल" था जिसपर बैठकर वे अपने पुराने जजमान के यहाँ जाते और अपना दुखड़ा सुनाते। जजमान से केस लड़ने के लिए चन्दा इकठ्ठा करते। लेकिन चन्दे के पैसे से करोड़ों के मालिक मंगल ठाकुर का मुकाबला करना आसान नहीं था। अतः मजबूरन उनको अपना घोड़ा "बादल" बेचना पड़ा । और हैरत की बात यह है कि उस बादल को खरीदने वाला कोई और नहीं बल्कि मंगल ठाकुर ही थे।

इस घटना के दस वर्ष पहले की बात है। मंगल ठाकुर रामवृक्ष बेनीपुरी महिला महाविद्यालय में डेली बेसिस पर चपरासी थे। उन्होंने ने कई बार सरकार को चिट्ठी लिखा की उन्हें परमानेंट कर दिया जाय लेकिन रजिस्टार से डीन तक कोई उनका सहयोग नहीं किया। अंत में एक दिन वो महाविद्यालय के सामने अपने ऊपर किरोसिन का भरा कनस्तर उझिल लिए और "डीन" से बोले अगर आपलोग हमारे परमानेंट होनेवाले चिट्ठी पर हस्ताक्षर नहीं किये तो हम यहीं जलकर मर जायेंगे फिर आपलोग पर मेरे आत्महत्या का केस चलेगा। सभी लोग हाथ जोड़ते हुए बोले - देखो, मंगल ऐसा मत करो। हम अभी तुम्हारी चिट्ठी फॉरवर्ड कर देते हैं।
उस घटना के एक महीने के भीतर ही बाबा मंगल ठाकुर उस महाविद्यालय के परमानेंट चपरासी नियुक्त कर दिए गए। लोग कहते हैं ज्यादा पढ़े - लिखे नहीं हैं वरना वे उस महाविद्यालय के सर्वोच्च पद "डीन" से निचे समझौता नहीं करने वाले थे।

मंगल ठाकुर आज भी जीवित हैं और अभी रिटायर नहीं हुए हैं। पिछले साल ही अपने बेटे का शादी किये हैं तिलक में ह्यूज अमाउंट लेकर।
ऐसे लोग हमारे समाज के लिए आइकॉन हैं। ऐसे होनहार चालबाज वीरवान यदा-कदा ही पैदा होते हैं। 

लेखक - गणेश सिंह 

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