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फिल्म निर्माण की प्रक्रिया - डॉ. विजय शिंदे

लेखक के द्वारा लिखी कहानी से परदे पर उतरनेवाली फिल्म तक की प्रक्रिया बहुत लंबी है। यह प्रक्रिया विविध चरणों, आयामों और संस्कारों से अपने मकाम तक पहुंचती है। एक लाईन में बनी फिल्म की कहानी या यूं कहे कि दो-तीन पन्नों में लेखक द्वारा लिखी कहानी को फिल्म में रूपांतरित करना एक प्रकार की खूबसूरत कला है। इस रूपांतर से न केवल लेखक चौकता है बल्कि फिल्म के साथ जुड़ा हर शख्स चौकता है। टूकड़ों-टूकड़ों में बनी फिल्म जब एक साथ जुड़ती है तो एक कहानी का रूप धारण करती है। फिल्मों का इस तरह जुड़ना दर्शकों के दिलों-दिमाग पर राज करता है। लेखक से लिखी कहानी केवल शब्दों के माध्यम से बयान होती है परंतु फिल्म आधुनिक तकनीक के सहारे से ताकतवर और प्रभावी बनती है। "सिनेमा ने परंपरागत कला रूपों के कई पक्षों और उपलब्धियों को आत्मसात कर लिया है – मसलन आधुनिक उपन्यास की तरह यह मनुष्य की भौतिक क्रियाओं को उसके अंतर्मन से जोड़ता है, पेटिंग की तरह संयोजन करता है और छाया तथा प्रकाश की अंतर्क्रियाओं को आंकता है। रंगमंच, साहित्य, चित्रकला, संगीत की सभी सौंदर्यमूलक विशेषताओं और उनकी मौलिकता से सिनेमा आगे निकल गया है। इसका सीधा कारण यह है कि सिनेमा में साहित्य (पटकथा, गीत), चित्रकला (एनीमेटेज कार्टून, बैकड्रॉप्स), चाक्षुष कलाएं और रंगमंच का अनुभव, (अभिनेता, अभिनेत्रियां) और ध्वनिशास्त्र (संवाद, संगीत) आदि शामिल हैं। आधुनिक तकनीक की उपलब्धियों का सीधा लाभ सिनेमा लेता है।" (संदर्भ विकिपिड़िया) यहां हमारा उद्देश्य सिनेमा निर्मिति का संक्षिप्त परिचय करवाना है और इस परिचय के दौरान फिल्म निर्माण के चरण और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहां हमारा उद्देश्य फिल्म निर्माण की प्रक्रिया किस प्रकार घटित होती है और उसकी प्रमुख सीढ़ियां कौनसी है, इस पर प्रकाश डालना है। इसकी कई छोटी-बड़ी सीढ़ियां है परंतु यहां उसमें से प्रमुख सत्रह सीढ़ियों का संक्षेप में एक क्रम के तहत विवरण है।

1. एक वाक्य की कहानी (One line story)

फिल्म निर्माताओं के सामने कोई व्यक्ति इसी रूप में कहानी को लेकर जाता है। लेखक की कहानी पांच पन्ने की दस पन्ने की या इससे भी बड़ी हो सकती है। कोई उपन्यास या नाटक भी हो सकता है। विषय की विविधता के हिसाब से उसकी लंबाई हो सकती है। परंतु किसी निर्माता को मौखिक तौर पर बताते वक्त उसे कुछ वाक्यों में बयान करना पड़ता है इसे एक वाक्य की कहानी या One line story कहा जाता है। दूसरे शब्दों में इसे आयड़िया या चमकता विचारसूत्र भी कहा जाता है।

2. पूर्ण कहानी बनाने की प्रक्रिया

विचार-सूत्र या एक वाक्य की कहानी को विकसित कर एक पूरी कहानी बनाई जाती है। निर्माता इस कहानी का चयन और आवश्यक परिवर्तन करता है और सबकी स्वीकृति के लिए रखा जाता है। इसे फिल्‍म की कथा कह सकते हैं।

3. पात्रों का चुनाव

कहानी स्वीकृत हो जाने पर उसके अनुकूल मुख्य पात्रों (Hero & Heroines) के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होती है। निर्माता-निर्देशक जिन पात्रों पर मुहर लगाते हैं उनके अनुमति की भी जरूरत होती है, अतः पात्रों के पास कहानी पढ़ने और स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। कभी-कभार सबको इकठ्ठा बुलाकर कहानी का मौखिक वाचन होता है। अर्थात् पात्रों के चुनाव के बाद उनकी स्वीकृति प्राप्त होना भी अत्यंत आवश्यक होता है।

4. पटकथा निर्माण

फिल्‍म की कथा को पटकथा में ढाले बिना फिल्‍म निर्माण बड़ा जटिल होता है। पटकथा लेखक या निर्देशक द्वारा कहानी की पटकथा सिनेमा के फिल्‍मांकन के अनुरूप तैयार की जाती है। पटकथा एक नहीं अनेक होती हैं जिसमें कॅमरा परसन और अभिनेताओं समेत सभी जरूरी लोगों के लिए आवश्‍यकता के अनुरूप पटकथाएं तैयार की जाती हैं। पटकथा लिखने के बजाय या फिर उस पर हू-बहू चलने के बजाय वह लगातार बदलती रहती है।

5. संवाद लेखन

पटकथा की तैयारी के साथ-साथ संवाद लेखक का आगमन होता है तथा निर्देशक की सलाह से दृश्‍यों का ध्‍वनिकरण (Spoken Expression) करना तथा इससे जरूरी काट-छांट संभव हो जाती है और इससे पटकथा का नाटकीय विधान तन जाता है, उसमें कसाव पैदा होता है। पटकथा में स्‍पेसीफिक्स यानी समय, जगह और इनड़ोर तथा आउटड़ोर जैसी सूचनाएं होती है।

6. बजट बनाना

निर्माता द्वारा बजट (Budgeting) पर बातचीत तथा बजट के अनुरूप पटकथा का समायोजन एवं बदलाव जरूरी होता है। वास्‍तव में देखें तो बजट पटकथा पर दबाव बनाता है जिसके चलते पटकथा से कई दृश्‍य काट-छांट दिए जाते हैं।

7. फाइनेंसर और वितरक

फाइनेंसर और वितरक इसी दौरान स्‍टोरी सुनने आ जाते हैं। साथ ही वे तय करते हैं कि फिल्‍म में कितने गीत-नृत्‍य होंगे। इन दोनों की भूमिका कई बार निर्देशक की परिकल्‍पना को भी प्रभावित करने लगती है। अभिनेताओं के चयन में हेर-फेर भी इनके चलते कई बार करना पड़ता है।

8. संगीत और गीत

इसी दौरान संगीत निर्देशक के साथ पूरी तकनीकी यूनिट से संपर्क किया जाता है और संगीत और गीत रिकार्डिंग के काम के लिए समझौता (Contract) साइन कर लिया जाता है। कोरियोग्राफी की भूमिका भी जबर्दस्‍त होती है। गीत-नृत्‍य की शूटिंग अलग से की जाती है।

9. शूटिंग, लोकेशन्स और स्टूड़ियो

अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की सुविधा के अनुसार शूटिंग की तारीखों और लोकेशन्‍स या स्‍टूड़ियों का निश्‍चय किया जाता है। स्‍टूड़ियो की शूटिंग एक समय सबसे महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी लेकिन समानांतर फिल्‍मकारों ने इससे बाहर निकलकर वास्तविक लोकेशन्‍स पर ही फिल्‍मांकन को तवज्‍जोह दी। इसमें रुपयों के लागत (Flow of Money) का भी ध्‍यान रखना पड़ता है। फिल्‍म कैसे और कहां और कितने समय तक शूट की जाएगी यह बहुत कुछ धन की उपलब्‍धता पर भी निर्भर करता है।

10. दृश्य संपादन

शूट की गई फिल्‍म के गैर तराशे अंशों को रशेस कहते हैं। इससे कहानी की क्रमिकता की पहचान की जा सकती है। संपादक तैयार Rushes को देखते हैं और अन्‍य फिल्‍मी हिस्‍सों से मिलान कर उनका संपादन कर लेते हैं। संपादक फिल्‍मों के रफ कट तैयार कर शूटिंग के दौरान निर्देशक को दिखाते चलते हैं और जरूरी बदलावों को उसी समय नोट कर लिया जाता है। फाइनेंसर और डिस्ट्रीब्‍यूटर को ये Rushes दिखाए जाते हैं जिसके आधार पर उनसे आगे पैसा लिया जा सके।

11. लिप-सिंक

अधिकांश एक्‍टर सेट पर ही अपनी रिहर्सल करते हैं और संवादों को वहीं दुहराते हैं। संवादों को बाद में अलग से डब किया जाता है, जिससे शूटिंग के दौरान सिर्फ लिप-सिंक की जरूरत होती है।

12. पार्श्व संगीत और पार्श्व ध्वनियों का रिकॉर्डिंग

संगीत कंपोजर को पूरी फिल्‍म दिखाकर उसका संगीत रिकॉर्ड करवा लिया जाता है। साथ ही, वह पार्श्‍व ध्‍वनियों का भी अभिलेखन (रिकॉर्ड) कर लेता है।

13. डबिंग

संपादक सारी पार्श्‍व ध्‍‍वनियों, संवादों और विशेष ध्‍वनि प्रभावों को फिल्‍म के साथ जोड़ देता है। यह प्रकिया डबिंग कहलाती है। संवादों को डब करने के लिए हीरो और हीरोइन समेत सह अभिनेताओं को कई बार स्‍टूड़ियो आना पड़ता है। डबिंग पूरी होने पर इसे दृश्‍य फिल्‍म के साथ तकनीकी दक्षता से जोड़ दिया जाता है।

14. सेंशर बोर्ड

फिल्‍म सेंशर बोर्ड के पास प्रमाणपत्र लेने हेतु भेजी जाती है और सेंशर द्वारा सुझाए बदलावों को संपादक, निर्देशक की अनुमति से समाहित कर लेता है।

15. रि-रिकॉर्डिंग

पूरी फिल्‍म का पुनर्अभिलेखन (रि-रिकॉर्डिंग) होता है। इस बीच गीतों और टी.वी. शो तथा ट्रेलर आदि के जरिए फिल्‍म दर्शकों में जिज्ञासा जगा चुकी होती है।

16. प्रिंट रिलिज

कर्इ रिलिज प्रिंट तैयार किया जाते हैं। वितरकों को समझौते के अनुसार ये प्रिंट उपलब्‍ध कराए जाते हैं।

17. प्रदर्शन

प्रेस के लिए प्रदर्शन आयोजित किए जाते हैं। इससे प्रिंट मीड़िया में भी फिल्‍म की समीक्षाएं आनी प्रारंभ हो जाती हैं और फिल्‍म दर्शकों को खीचनें में कामयाब होती है। अन्‍य अनेक स्‍तरों मसलन पोस्‍टर आदि द्वारा भी व्‍यापक प्रचार-प्रसार अभियान चलाया जाता है और सिनेमा थिएटरों में फिल्‍म प्रदर्शित कर दी जाती है। (-संदर्भ, डॉ. रामप्रकाश द्विवेदी, फिल्म निर्माण की प्रक्रिया )

सारांश

सिनेमा निर्माण और संघर्ष हमेशा जारी रहता है। यह संघर्ष सिनेमा से जुड़े हर शख्स की जिंदगी का हिस्सा होता है। सिनेमा निर्माताओं के हाथों में सिनेमा निर्माण करना, उसका प्रचार-प्रसार एवं प्रमोशन करना होता है, लेकिन उस सिनेमा की सफलता-असफलता दर्शकों पर निर्भर होती है। अतः फिल्म निर्माण क्षेत्र में केवल निर्मिति करना निर्माण करनेवाले का कार्य है। अगर निर्मिति में त्रूटियां रहेगी, कहानी, पटकथा, संवाद, गीत और संगीत में कमजोरियां रहेगी तो इसका असर फिल्म की कमाई पर होता ही है, साथ ही फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति के भविष्य पर भी इसका असर पड़ता है। जिस तरह कोई लेखक किसी उपन्यास या कहानी का निर्माण करता है वैसे ही फिल्म का निर्माण भी होता है। कहानी पहले से लिखी होती है परंतु उस कहानी को फिल्म के भीतर बाजार और दर्शक के हिसाब से ढालना लंबी प्रक्रिया है। इस प्रक्रियां में कई लोग कई कलाओं के साथ जुड़ जाते हैं। इनका समायोजन और मिलाप करना फिल्म निर्मिति क्षेत्र का कौशल माना जाता है।

मूलतः फिल्म निर्मिति का क्षेत्र जितना आसान लगता है उतना आसान नहीं है। सफल फिल्म निर्माण के लिए अच्छे प्लॅनिंग की जरूरत होती है। अपने फिल्म के लिए कौनसे दर्शक आ सकते हैं, उनकी मनोरंजन को लेकर मांगे कौनसी हैं? उनके सपनें और अपेक्षाएं क्या हैं? फिल्म निर्माण से सृजनात्मक मांग कितनी की जा रही है? निर्देशक और निर्माता का तालमेल कितना है? फिल्म का बजट कितना है? जिस फिल्म को बना रहे हैं वह बाजार में टिकेगी या नहीं? उसकी मार्केटिंग पॉलिसी क्या होगी? आदि बातों का ध्यान निर्माताओं को रखना पड़ता है। दुघर्टना का बीमा होता है परंतु फिल्मों के असफल होने का बीमा नहीं होता है, अतः इस बात को ध्यान में रखें तो फिल्म निर्माण बड़ी जोखिम का कार्य होता है। घरों-घरों में आसानी से उपलब्ध टी. वी. मनोरंजन भी फिल्म निर्माण के लिए चुनौती दे रहा है। किसी भी फिल्म के रिलिज होते ही आधुनिक तकनीकों के चलते उसकी पायरसी भी आम बात बन चुकी है जो निर्माण क्षेत्र का नुकसान कर रही है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

  2. विकिपिड़िया ई-स्रोत

  3. सिनेमा के चार अध्याय – डॉ. टी. शशिधरन्, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014.

  4. हिंदी सिनेमा का सच – (सं.) मृत्युंजय, समकालीन सृजन, कलकत्ता, अंक 17, 1997.

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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