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कहानी - अपने पराए / शालिनी मुखरैया

अपने – पराये

(प्रधान कार्यालय पंजाब नैशनल बैंक ,राज भाषा विभाग द्वारा हिन्दी दिवस पर तृतीय पुरस्कार से पुरस्कृत )

“ आ जाओ अन्दर ,कब तक युँ ही इंतज़ार करते रहोगे” शांति ने श्यामलाल के कन्धे पर हाथ रखा .

अपनी पत्नी के स्पर्श से श्याम लाल की तन्द्रा भंग हुई . हर शाम उनकी बूढी आंखेँ वृद्धाश्रम के गेट को

इस आशा के साथ निहारा करतीँ कि कभी तो उनका पुत्र ,नाती –पोते उन्हेँ ले जाने आएंगे , जहाँ वे कभी उन्हेँ छोड कर गये थे . अपने नाती – पोतोँ के इंतज़ार मेँ श्याम लाल की आंखेँ पथरा जाती मगर उन्हे न तो आना था और न वो लोग कभी आये .

उनकी पत्नी शांति ने तो अपने मन को समझा लिया था और अपने आप को बदली हुई परिस्थितियोँ के अनुसार ढाल लिया था . उस वृद्धाश्रम मेँ उनके जैसी अनेकोँ स्त्रियाँ भी थीँ , सब की कहानी लगभग एक सी ही थी. सभी किसी न किसी कारण से अपनोँ द्वारा ठुकरा दिये गये थे और अपने जीवन की सान्ध्य बेला मेँ , जब अपनोँ के साथ की , उनके अपनेपन की विशेष जरूरत होती है , उस समय को वृद्धाश्रम की तन्हाईयोँ मेँ बिताने को मजबूर थे. मगर शांती ने मन ही मन फैसला कर लिया था कि वे निराश हो कर अपना जीवन नहीँ बितायेँगी और खुश रह कर अपना समय व्यतीत करेँगी . आश्रम मेँ सुबह सवेरे ध्यान और योग की क्क्षायेँ लगती जिसमेँ वह नियमित् रूप से शामिल होतीँ .आपस मेँ हँस बोल कर सब स्त्रीयाँ अपना समय यापन करतीँ .

मगर श्यामलाल बद्ली हुई परिस्थितियोँ मेँ अपने आप को ढाल नहीँ पा रहे थे . वह आज भी इस बात को स्वीकार करने मेँ असमर्थ थे कि उनका इकलौता बेटा , जिसे उन्होने इतने लाड प्यार से पाला था , इतना स्वार्थी निकलेगा और उन्हे आज इस प्रकार का जीवन जीने पर मजबूर कर देगा .मगर सार दोष बहू को भी देना उचित नहीँ होगा , आज अगर अपना ही सिक्का खोटा निकल गया तो दूसरे को दोष देने से कोई लाभ नहीँ .कहीँ न कहीँ उनसे बडी चूक हुई थी अपने ही अंश को पहचानने मेँ वरना अपनी तरफ से उन्होने सदा ही अच्छे संस्कार दिये थे. शिक्षण क्षेत्र से जुडे होने के कारण विद्यार्थी उन्हेँ सदा मान सम्मान देते थे. न जाने कितने गरीब बच्चोँ की उन्होनेँ पढ्ने मेँ मदद की थी . उनके पढाये हुये बच्चे विदेशोँ मेँ भी उनका नाम रौशन कर रहे थे , इस बात से उनका हृदय गर्व मह्सूस करता था .मगर घर को आग लग गयी घर के चिराग से ,यह कहावत उन पर सत्य साबित हुयी .सुबोध उनका इक्लौता बेटा था , मगर अपने औलाद के मन को ही वे कभी न पढ पाये , उसके मन मेँ क्या षड्यंत्र पल रहा है यह उनको जरा भी भनक नहीँ लगी. बडी चालाकी से अपने वाग्जाल मेँ फंसा कर सुबोध ने सारी सम्पति अपने नाम करा ली .

 

“इक्लौता बेटा है, आगे –पीछे सब उसी का तो है” यह सोच कर श्यामलाल ने तनिक भी देर न लगाई .

मगर वक़्त बदलते देर नहीँ लगती . सम्पत्ति नाम होते ही अपने खून ने ऐसा व्यंग्य बाणोँ का छेदन शुरू किया कि उस परिस्थिति मेँ रह्ना मुश्किल हो गया . अपने माँ –बाप से छुट्कारा पाने के लिये

सुबोध ने उन्हेँ वृद्धाश्रम भेज दिया और अपने पितृऋण से मुक्ति पा ली .

कहीँ न कहीँ श्यामलाल के मन मेँ एक आस अवश्य थी कि एक दिन सुबोध को अपनी गल्ती का एह्सास होगा और वह अवश्य उन्हेँ घर वापिस ले जाने आएगा , इस लिये वह हर रोज़ वृद्धाश्रम के गेट को निहारा करते . इस प्रकार दो –तीन वर्ष गुज़र गये .

एक दिन वृद्धाश्रम के आफिस से एक चपरासी श्यामलाल और शांति को बुलाने आया . “ मिश्रा जी ने आप दोनोँ को याद किया है, आपसे कोई मिलने आया है,”

उम्मीद की एक किरण अभी भी श्याम लाल के मन मेँ बाकी थी .शांति भी यह जानने को उत्सुक थी कि आखिर 2-3 वर्षोँ बाद किसने उन्हे याद किया है .आफिस मेँ पहुंच कर एक अजनबी युवक को देख कर श्याम लाल की उम्मीद की किरण लुप्त हो गई . वह मन ही मन सुबोध के आने की आशा कर रहे थे .

श्याम लाल को देख कर उस अजनबी युवक ने उनके चरण छू लिये .श्याम लाल उसे पह्चानने मेँ असमर्थ थे , इसलिये इस अप्रत्याशित घट्नाक्रम से हड्बडा गये ,

” मास्साब ,आपने मुझे पहचाना नहीँ , मैँ आलोक हूँ . “

आलोक का नाम सुन कर श्याम लाल की बूढी आँखोँ मेँ चमक आ गई. जब वे स्कूल मे पढाते थे तो उनकी मुलाकात एक कूडा बीनने वाले बालक से हुई जो बडे ध्यान से स्कूल आने जाने वाले छात्रोँ को देख रहा था .

“ क्योँ ,क्या तुम पढ्ना चाहोगे”.

आलोक की आंखोँ मेँ बेबसी थी .उसकी परिस्थितियोँ को देख कर श्याम लाल ने अपने स्कूल मेँ मुफ्त शिक्षा का इंतज़ाम करवा दिया था .पढाई मेँ आलोक तेज़ निक्ला और फिर परिस्थितियाँ अनुकूल मिलने पर और निखर गया .अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण करके वह दूसरे शहर चला गया और आज वह उनके सामने था,

 

बातचीत के दौरान पता चला कि उसने सिविल सेर्विसेज़ की परीक्षा पास कर ली थी और अपने पुराने

शहर मेँ एस .डी . एम ( S,D.M) बन कर वह पुन: आया था . यहाँ पर आने के बाद आलोक ने अपने मार्गदर्शक की तलाश की और पता चलने पर इस वृद्धाश्रम मेँ आया था .

तीनोँ की आंखेँ अश्रुओँ से भीगी हुई थीँ .श्यामलाल और शांति की व्यथा जान कर आलोक बहुत द्रवित हुआ ,उसने मन ही मन एक फैसला ले लिया . उसने श्याम लाल जी से कहा ,

” आपने जो कुछ भी मेरे लिये किया ,मैँ गुरु दक्षिणा स्वरूप आपको जो भी दूंगा आपको उसे स्वीकार करना होगा “

“ मैँ आपका कोई भी इंकार नहीँ सुनूँगा “

”आपको और आँटी जी को मेरे साथ ही रह्ना होगा , मैँ आप दोनोँ को यहाँ नहीँ रहने दूँगा .”

अश्रुओँ की धारा सबके नेत्रोँ से बह रही थी. वृद्धाश्रम से विदा होते समय उनके अन्य साथी उंसे मिलने आये और आश्रम के गेट तक विदा किया . सब के मन मेँ एक आशा की किरण टिमटिमा रही थी कि किसी दिन उन का भी कोई अपना उन्हेँ इस प्रकार ले जाने आयेगा .मगर कौन अपना था और कौन पराया यह श्यामलाल और शाति अपने मन मेँ समझ्ने की कोशिश कर रहे थे ???????????

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शालिनी मुख्ररैया

पंजाब नैशनल बैंक

मेडीकल रोड

अलीगढ

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bahut sundar vivaranatmak aur bhavuk rachnaa

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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