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कहानी - प्रतिशोध - सर्वेश तिवारी श्रीमुख

"प्रतिशोध"

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नालंदा को लूटने और विश्वविद्यालय को पूरी तरह जला कर राख कर देने के बाद जब बख्तियार ख़िलजी आगे बढ़ा तो नालन्दा युद्ध में अकेले साढ़े चार सौ काफिर बौद्धों की हत्या करने वाले सेनापति जमालुद्दीन को पुरस्कार स्वरुप नालंदा की जागीर मिली, अब वह नालंदा का राजा था। बुद्ध के अहिंसक प्रवचनों के अध्ययन में रत विधार्थियों पर उसकी तलवार खूब बरसी थी, और एक भी विद्यार्थी छोड़ा नही गया था। अगल बगल के गांवों के सभी युवक युवती या तो मार दिए गए थे, या गुलाम बना लिए गए थे।बख्तियार ख़िलजी की कृपा से इन गुलामों में से एक बड़ी संख्या जमालुद्दीन को भी मिली जो अब उसके नौकर थे। जमालिद्दीन के इन्ही गुलामों में था वह, नाम था सिद्धार्थ। उसके पिता नालंदा महाविहार के द्वारपाल थे। बुद्ध की समस्त शिक्षाओं को कंठस्त कर चूका द्वारपाल जमालुद्दीन की तलवार के सामने एक क्षण भी नहीं टिक पाया था। महाविहार को आग के हवाले करने के बाद जब सेना गांव में घुसी तब उसका परिवार गुलाम बना लिया गया था।

डेढ़ साल से गुलाम सिद्धार्थ अपने हृदय में बदले की ज्वाला ले कर जल रहा था। वह दिन रात जमालुद्दीन के कलेजे में कटार उतारने के स्वप्न देखा करता, पर जमालुद्दीन तक पहुच पाना उसके लिए असंभव था। किन्तु डेढ़ वर्ष बाद शायद विधि उसके अनुकूल हुई थी, और महीने भर पहले उसे घोड़ों के काम से हटा कर महल में पानी पहुचाने के काम में लगा दिया गया था।

अब सिद्धार्थ रोज इसी ताक में रहता कि जमालुद्दीन के कुल के किसी भी व्यक्ति की छाती में कटार उतार कर वह अपने ह्रदय की ज्वाला को शांत करे। महल में पानी के बड़े बड़े मटके ले कर आने जाने के क्रम में उसने जमालुद्दीन की बेटी के कमरे का पता लगा लिया था, और अब वह रोज मौके की तलास में रहता था। उसके हृदय की आग रोज तेज होती जाती थी।

रात का समय था, सिद्धार्थ पहरेदारों से छुपते छुपाते शहजादी के कमरे में घुस चूका था। उसने देखा शहजादी दूसरी और मुह किये सो रही थी। उसकी कटार उसके हाथों में चमक उठी। वह दबे पांव शहजादी के पलंग के पास पंहुचा, उसकी कटार सो रही शहजादी के कलेजे में उतरना ही चाहती थी कि जाने कैसे शहजादी ने करवट बदली और उसकी आँख खुल गयी। सिद्धार्थ ने देखा, अद्भुत सौंदर्य! उसकी कटार उसके हाथ से गिर पड़ी।

भयभीत जैनब ने पूछा- कौन हो तुम?
- सिद्धार्थ।
- मुझे क्यों मारना चाहते हो?
-तुम्हारे पिता ने मेरे पिता की हत्या की थी। मुझे उसका प्रतिशोध लेना है।
- फिर मारते क्यों नहीं?
-मैं तुमको नही मार सकता।
- क्यों?
-तुम बहुत सुन्दर हो।
सिद्धार्थ धीरे धीरे कमरे से बाहर निकल गया। उसकी कटार जैनब के क़दमों में पड़ी थी। जाने क्यों वह मुस्कुरा उठी।

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सिद्धार्थ रोज महल में पानी ले कर आता, और रोज जैनब उसे मुस्कुराती दिख जाती। कुछ दिनों तक वह जैनब को नजरअंदाज करता रहा पर अब जैनब की मुस्कुराहटों पर सिद्धार्थ भी मुस्कुरा उठता था। शायद उसके हृदय की आग मंद पड़ रही थी। अब उसकी आँखे महल में जैनब को ढूंढती रहती थीं। जैनब अब रोज पहले से ज्यादा सुन्दर लगती थी।

एक दिन पानी लाते समय एकांत देख कर जैनब ने कहा- सिद्धार्थ!
सिद्धार्थ ने सर उठा कर देखा तो बोली- तुम भी बहुत सुन्दर हो।
सिद्धार्थ की मुस्कुराहट उड़ गयी, वह बोल पड़ा- तुम्हारा बाप मेरे पिता का हत्यारा है।
- तो इसमें मेरा क्या दोष?
- पता नहीं....
वह तेज तेज क़दमों से चलता निकल गया।
ऐसा कई बार हुआ। जैनब की मुस्कुराहट सिद्धार्थ का हमेशा राह रोकती, सिद्धार्थ मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुरा कर देता और चला जाता। धीरे धीरे उसके हृदय की आग ठंढी हो रही थी और उसमे कोई पौधा उग रहा था।
उस दिन नालंदा में मेला लगा था। जमालुद्दीन अपने राज्यारोहण की वर्षगांठ पर हर साल मेला लगवाता था। उस दिन नौकरों को भी छुट्टी मिल जाती थी। सभी गुलाम मेले में गए थे पर सिद्धार्थ के मन में कोई उत्सुकता नही थी। वह यूँ ही चमेली की क्यारियों में अकेला बैठा था। अचानक किसी की दो हथेलियों ने उसकी आँखे बन्द कर दी। वह मुस्कुराता हुआ बोला- जैनब!

जैनब ने आँख खोल दिया, बोली- कैसे पहचान गए सिद्धार्थ?
-इस कैदखाने में और किसके शरीर में हृदय है जैनब, जो एक गुलाम को प्यार करे!
- प्यार? वह खिलखिला उठी।
- यह प्यार है या कुछ और यह तो नही जानता जैनब, पर जब भी तुम याद आती हो तो मुस्कुरा उठता हूँ। चाह कर भी तुम्हारा अहित नही सोच पाता। शायद यह प्यार ही है जैनब।

जैनब की आँखे चमकने लगीं।वह सिद्धार्थ के करीब आ गयी। सिद्धार्थ ने आसमान की तरफ देख कर कहा- माफ़ कीजियेगा पिताजी, आपके हत्यारे की बेटी से प्यार कर बैठा हूँ।

जैनब उसके और निकट आ गयी और जाने कैसे उनके अधर एक दूसरे को छूने लगे। अचानक जैनब ने खींच कर सिद्धार्थ को अपने पीछे कर लिया, सिद्धार्थ ने देखा- राज्य का सेनापति नंगी तलवार लिए उनके सामने खड़ा था। वह कांपने लगा। पर इसके पहले कि वह कुछ समझ पाता बिजली की फुर्ती से जैनब सेनापति की छाती में कटार उतार चुकी थी।

उसने एक नजर चारो ओर दौड़ाई, कहीं कोई नही था। उसने मुस्कुराते हुए देखा सिद्धार्थ की ओर पर सिद्धार्थ का चेहरा बर्फ की तरह सफेद हो चूका था। वह कांपते हुए बोला- यह क्या किया जैनब?

जैनब बोली- प्रेम।
- अरे प्रेम छोडो, अब हमारा क्या होगा? मैं तो मार दिया जाऊंगा।
जैनब का मुह जैसे कुम्हला गया, बोली- कुछ नही होगा सिद्धार्थ। तुम हट जाओ यहां से, कोई नही जानेगा कि यह किसने किया।

- कैसे कोई नही जानेगा जैनब, तुम तो राजा की बेटी हो, पर मैं तो मार दिया जाऊंगा। तुम्हारा प्रेम मेरी भी जान ले गया।
जैनब ने कुछ देर तक सिद्धार्थ के मुह की ओर देखा, फिर बोली- तुम भाग जाओ सिद्धार्थ। मैं यहां सब संभाल लुंगी। अभी सब लोग मेले में हैं, कल जब तक सब जानेंगे तब तक तुम दूसरे राज्य में रहोगे। भाग जाओ सिद्धार्थ।
झाड़ियो से निकल कर भागते सिद्धार्थ की तरफ चुपचाप देखती रही जैनब, उसकी आँखे भीग गयी थीं। उसके मुह से निकला- काश! तुमने उस रात मार ही दिया होता सिद्धार्थ।

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इस घटना के चालीस वर्ष बीत गए।
नालंदा के भीड़ भरे चौराहे पर एक फटेहाल  भिखारी भूखा पड़ा हुआ था। किसी राहगीर ने कहा- अरे यहां क्यों जान दे रहे हो, जैनब बेगम के महल में जाओ, भोजन और वस्त्र सब मिल जायेगा।

भिखारी कांपता हुआ बोला- कौन जैनब बेगम?
- अरे बादशाह जमालुद्दीन की बेटी जैनब बेगम। नालन्दा में नए आये हो शायद। पिछले चालीस सालों से वही तो इस देश के गरीबों की माँ हैं। खुद ब्याह नही किया पर देश के सभी गरीबों को बेटे की तरह पालती आईं हैं।
भिखारी लड़खड़ाता हुआ जैनब बेगम के महल की ओर चला, उसकी आँखे बह चली थीं।

जैनब अपने महल के आगे गरीबों को भोजन बंटवा रही थी। भिखारी जा कर उसके सामने खड़ा हो गया। ब्यस्त जैनब ने उसके चेहरे की ओर देख कर कहा- क्या चाहिए? खाना खाये.. .............................

अचानक उसकी आँखे फ़ैल गयीं, वह बुदबुदाई- सिद्धार्थ??
भिखारी कांपते कांपते जैनब के कदमों के पास गिर चूका था। जैनब ने नौकर को जल्दी से पानी लाने के लिये कहा और सिद्धार्थ को उठाना चाहा, पर शायद उसके पास समय नही था। वह इस बार भी भाग गया था।
दुपट्टे से आँख पोछती जैनब के मुह से निकला- चालीस साल बाद आये भी तो दुःख दे कर ही गए। खूब प्रतिशोध लिया सिद्धार्थ।

मुह से निकलती रुलाई के बेग को दुपट्टे से रोकने का असफल प्रयास करती जैनब घर के अंदर भाग चली।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।
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