ललिता भाटिया की लघुकथाएँ - ममता की डोर

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ममता की डोर 

माँ बिस्तर  पर अंतिम साँसे  ले रही थी आँखे बेटे की इंतज़ार में खुली थी । तभी उन के देवर मोबाईल पर फोन आया । उस के चेहरे के बदलते रंग देख माँ सब समझ गई एक जोर की हिचकी ली ममता की डोर टूट गई  । तभी देवर बोला : भाभी रूपं नहीं आ रहा उसे किसी काम से डलास    पर ये सब सुनने के लिए माँ वहां नहीं थी । 

 

जो बोले कुण्डी खोले 

रात का समय था खाने के बाद सारा परिवार अपने २ काम में व्यस्त था । पतिदेव अपने व्यापार का लेखा जोखा देख रहे थे बेटा  दोस्तों के साथ चैट  कर रहा था बेटी फेसबूक पर बिज़ी थी और पत्नी सास बहु वाला सीरयल देख रही थी और दूसरे कमरे में बूढ़ी सास खांस २ कर बेदम हो रही थी । खुद उठ कर दवाई ले नहीं प् रही थी । बुडिया कि जोरदार खांसी से सब अंदर ही अंदर चिड़  रहे थे पर बोला कोई नहीं । जो बोले कुण्डी खोले । उसे ही बुडिया को दवाई देने जाना पड़ेगा । और इस समय अपना काम छोड़ने का मूड किसी का भी नहीं था । बुढ़िया कि खांसी लगातार बढ़ती जा रही थी । 

Lalta Bhatia 

Rohtak

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