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डॉ. सुधा गुप्ता 'अमृता' की कविताएं

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मच गया शोर


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गुनगुनाये पंछी उठी घटा घनघोर
गड़ गड़ बादलोँ का मच गया शोर

ताल तलैया हँसे भर भर भर
ठण्डी हवाएँ चलें सर सर सर
नदियों का दिखता ओर ना छोर

अंगना में नाचें बूँदें छम छम छम
बदरा ढोल बजाये ढम ढम ढम
कागज़ की कश्ती चले हिलोर

सूरज का नहीं अता पता
छुआ - छुअल्ली खेले लता पता
गूँजत मादल नाचत मोर

मोर पपीहा करत किलोल
गड़ गड़ बादलोँ का मच गया शोर l


गजल                                                                                                                     

आदमी अब कुछ कहो       

जाग उठो चुप ना बैठो आदमी अब कुछ कहो
जिद करो दुनिया बदल दो आदमी अब कुछ कहो                                                               

गर्दिशों में ही छुपा है इक सितारा भाग्य का
आएगी उजली सुबह भी , आदमी अब कुछ कहो

तुम चलोगे काफिले , खुद साथ बढ़ते जाएंगे
फायदा क्या बैठने का , आदमी अब कुछ कहो

सिसकियों और हिचकियों से , बांध टूटा सब्र का
दर्द लहरों में बहेगा , आदमी अब कुछ कहो

उठ चलो तोड़ें दीवारें , जो बनी हैं बंदिशें
गीत गाओ फिर नया , आदमी अब कुछ कहो

खुल गए हैं रास्ते , दिन अच्छे आएंगे तभी
चीर दो पत्थर का सीना , आदमी अब कुछ कहो l


अपलम चपलम


अपलम चपलम बड़े हैं तिकड़म
खाते शलजम गाते सरगम
इनको गाना आता है
गाते रहते अगड़म बगड़म

अपलम की एक बहिन है शबनम
चपलम की एक बहिन है मरियम
दोनों मिलकर गायें गाना
तर्ररम् तर्ररम् तर्ररम् तर्ररम्

अपलम चपलम आये कटनी
खाई उनने आम की चटनी
चटनी लग गई खट्टम् खट्टम्
एक दूजे को देते धक्कम 

अपलम चपलम गये स्कूल
भारी बस्ता खुद स्थूल
गिनतारे के किये उपक्रम
पढ़े पहाड़े धूम धडक्कम

अपलम चपलम
बड़े हैं तिकड़म l

गीत                                                                                                                                                        

   जाने क्यों अनमन है


आँख उनींदी खोया है मन कैसी उलझन है
था वैरागी स्वप्न अभी जाने क्यों अनमन है

एकाकी मन झूल रहा था
स्मृतियों के झूले में
संग यादों की महक रहे तो
क्या रक्खा है फूलों में

दुःख कुरेदने का इस जग में कैसा प्रचलन है
था वैरागी स्वप्न अभी जाने क्यों अनमन है

मन के थर्मामीटर में है
विरह व्यथा का ताप चढ़ा
पलक बंद कर स्वच्छ फलक पर
तेरा ही तो रूप गढ़ा

तुझे व्यक्त ना कर पाने का कैसा बंधन है
था वैरागी स्वप्न अभी जाने क्यों अनमन है

आँखों में संवाद मुखर हैं
होठों पर ख़ामोशी है
पावन प्रीत की रेखा है
फिर , जग कहता क्यों दोषी है

बँधा कटीले तारों में रिश्तों का मधुवन है
था वैरागी स्वप्न अभी जाने क्यों अनमन है l 

कविता

धरती पेड़ और हवा


 

धरती का
हवा से
माँ - बेटी का
रिश्ता है
और पेड़
धरती पर
मर्द बना
खड़ा है

     ० ० ०
हवा भी कभी
होती है बेचैन
पेड़ को नहीं मालूम !
उसे तो अपनी हरियाली की
चिंता है
इसीलिए
धरती की छाती पर
जड़ें धँसाये
खड़ा  है

       ० ० ०

हवा जानती है
कि  पेड़
उसके बिना
जीवित नहीं रह सकता
इसीलिए / वह पेड़ को
सहलाती है
अपनी बेचैनियाँ
धरती से बतलाती है
पेड़ अनभिज्ञ  रहना चाहता है
कि , उसका व्यवहार 
हवा के ह्रदय में
शूल सा अड़ा  है

     ० ० ०

धरती जब सुनती है
हवा का दर्द
तो ऐसे में
फटने लगती है
उसकी छाती
वह चाहती है , हवा को
छिपा ले सदा के लिए
पर ऐसा कर नहीं पाती
पेड़ की जड़ें तरेरती हैं
और हवा
बाहर निकल आती है
पेड़ का अस्तित्व बचाने 
कुछ गुनगुनाती है
हवा के ह्रदय में
अनुराग भरा है

    ० ० ०

धरती अब
नए सृजन से
कतराती है 
जब भी आना चाहती है
उसकी कोख में
हवा सी कोई रोशनी
वह उसे अँधेरी कब्र में
फेंक आती है
ऐसा करवाने में
धरती से पूछो कि
उसके अंतस का निर्झर
किस तरह झरा है 

    ० ० ०

पेड़ का वर्चस्व
उसकी अतल  तक
फैली जड़ें
एक मजबूत
व्यवस्था को
दर्शाती हैं
और धरती से
बार - बार गुमनाम
हत्या करवाती है
धरती पर प्रलयंकारी
प्रहार पड़ा है

     ० ० ०

पर , अब हवा में
धीरे - धीरे तेजी
आने लगी है
धरती हवा से
कुछ कानों में
बतियाने लगी है
पेड़ कुछ
घबराने लगा है
हवा से
   दोस्ताना हाथ
बढ़ाने  लगा है
पेड़ अब
अपनी शाख पर
हवा को बिठाने
लगा है
क्योंकि ,
पतझर / द्वार पर
खड़ा है

कविता

पृथ्वी है अम्माँ



 
सपना
सपने में अम्माँ
अम्माँ का कमरा
कमरे में पलका
पलका में खोली
अम्माँ की आँखें
जैसे हों रोली
बिछाती है पलका
लगाती मसहरी
लेटती है अम्माँ
हाथ लिए बिजना
डोलता है बिजना
डोलता है बिजना ?
या डोलती है अम्माँ
पल भर ना बैठती
डोलती है अम्माँ

    ० ० ० 

बोलती हैं चिड़ियाँ
उठती है अम्माँ
देती है दाना
बुहारती है अंगना
सोती हैं बहुएँ
मुस्काती है अम्माँ
उठाती  है बिस्तर
टिकाती है पलका
अम्माँ के हाथों में
दिन सारा अटका

        ० ० ०

सपना


सपने में अम्माँ
अम्माँ का कमरा
कमरे में चकिया
सुनती है अम्माँ
चकिया की  बतियाँ
घर घर घर घर
घूम घूम घूम घूम
एक पाँव मोड़ के
बैठी है अम्माँ
पीसती है नाज
गाती  है अम्माँ
गीत सुख -सुख के
दुःख भूल -भूल के
पकडे है मुठिया
घूमती है चकिया
घूमती है चकिया
या घूमती है अम्माँ
घूमती है अम्माँ

     ० ० ०
 
घूमती ना अम्माँ
तो घूमती ना धरती
दिन रहते रोते
रात काली होती
सोने के दिन और
चाँदी की रातें
देती है अम्माँ
सुख की सौगातें
घूमती है पृथ्वी
घूमती है पृथ्वी ?
या घूमती है अम्माँ
घूमती है अम्माँ

पृथ्वी है अम्माँ -------पृथ्वी है अम्माँ

OOOOO

 

 

 

आना हो गौरैया


आना हो गौरैया आना , आना मोरे आँगना
भोर के वो उत्सव रोज के मनाना

ओ री गौरैया मैं , जानूँ तोरा रूठना
अब तो मनाऊँ आ जा , आ जा मोरी सगुना
आ जा चहक सुना , लाल को जगाना
भोर के वो उत्सव-------------------

हमने जुलुम किये , बगिया कटाय के
अपने महल बना , बिरछा कटाय के
अब तो लगाऊँ , तोरे लिये मीठे जामुना
भोर के वो उत्सव-------------------

डालूं मुट्ठी भर दाने , पानी भी पिवाऊँगी
आटा की गोली धरूँ , चांउर जीवाऊंगी
झुंड झुंड चूं चूं , रागिनी सुनाना
भोर के वो उत्सव-------------------

तेरे नन्हें लाडलों को , दूर से ही देखूंगी
चोंच में दाना खिला , नाहीं तोहे टोकूंगी
चोंच से चोंच मिला , प्रेम सरसाना
भोर के वो उत्सव-------------------

 

 

बिना नेल पालिश वाली उँगलियाँ


कामकाजी कठोर उँगलियों में
कभी नहीं लगता नेल पालिश
फिर भी ये उँगलियाँ
भली लगती हैं

बिना नेल पालिश वाली उँगलियाँ
सहलाती हैं
दुःख से भरे माथे को
रोपती हैं
संघर्ष की छाती पर
सुख का बीज
तब ही आँखों में
अंकुरित होता है
सुख का सपना

बिना नेल  पालिश वाली उँगलियाँ
कठोर जरूर रहती हैं
पर स्नेह की परिभाषा
यही उँगलियाँ लिखती हैं
नाजुक नेल पालिश वाली उँगलियों ने
कभी नहीं छुआ
जीवन का कडुआ सच

बिना नेल पालिश वाली उँगलियाँ
कभी नहीं चाहतीं
नेल पालिश लगाना
क्योंकि वे जानती हैं
जब जीवन के रंग उधड़ जाते हैं
तो नेल पालिश कहाँ ठहर पाता है
कामकाजी कठोर उँगलियों से ही
जीवन संवर जाता है

गजल

इजहार के दीये हैं स्वीकार के दीये
मंदिर हैं दिल के जल रहे ये प्यार के दीये

अहसान आपने किया हम भूल न सके
दिल में सजा रखे हें ये आभार के दीये

हम इंतजार में तो  सदा जागते रहे
बुझने नहीं दिए कभी ये द्वार के दीये

जिनकी शहादतों से हमें जिंदगी मिली
यादों में उनके अब जले  उपकार के दीये

जन्म हो या मृत्यु हो त्यौहार हो कोई
खामोश जल रहे हैं ये  व्यवहार के दीये

हिन्दू मुसलमान  हो या सिक्ख ईसाई
आपस में मिलाते  हैं ये त्यौहार के दीये

बिटिया ने रोटी हाथ की चिड़िया को डाल  दी
आँखों में उसकी जल उठे संसार के दीये

बेटी को विदा कर दिया डोली चली गई
जला रखे हैं माँ ने इंतजार के दीये

ये आफतों का दौर है जीना मुहाल है
ऐसे में बुझ ही जायेंगे सरकार  के दीये

गीत

तृप्त होकर क्या करेंगे

स्वीकार है बंधन मुझे
उन्मुक्त होकर क्या करेंगे
आनंद है जब प्यास में
फिर तृप्त होकर क्या करेंगे

मन ही पर्वत मन ही नदिया
मन ही निर्झर सा झरे
पा लिया जब आपको मन
कामना फिर क्या करे
भक्त मन तेरा हुआ
विभक्त होकर क्या करेंगे

जागरण ही जागरण है
काम सपनों का नहीं 
प्रेम का पथ है अगर
फिर आवरण लगता नहीं
चेतना अब छा  गई
सुप्त होकर क्या करेंगे

मन सरोवर में तेरे ही
नाम के खिलते कमल
नाम की इक बूँद से
प्यासे अधर लिखते अनल
प्रीत गाढ़ी हो गई
विरक्त होकर क्या करेंगे


डॉ. सुधा गुप्ता (अमृता )
दुबे कालोनी।, कटनी 483 -501 ( म. प्र. )

नाम - डॉ. सुधा गुप्ता (अमृता)
पिता - डॉ. गुलाबदास गुप्ता , स्वतंत्रता सेनानी
पति - श्री जगदीश गुप्त , कवि / साहित्यकार 
जन्म - 04 जुलाई 1954 कटनी ( म. प्र.)
शिक्षा - एम. ए., पी - एच. डी.( हिंदी ), बी. एड., संगीत प्रभाकर , ड्राइंग डिप्लोमा
लेखन विधा - कविता, कहानी, गीत, नवगीत , बालगीत, बालकहानी, लघु कथा, लेख ,
प्रकाशित पुस्तकें - किरदार बोलते हैं (कहानी संग्रह) , बिना नेल पालिश वाली उँगलियाँ (कविता संग्रह ), धूप के पंख (गीत संग्रह ), ताकि बची रहे हरियाली (बाल गीत संग्रह ), चुलबुली, पम्मी -शम्मी , )जंगल की एकता ( बाल कहानी संग्रह ), )राष्ट्रीय फलक पर स्वातंत्र्योत्तर बाल कविता का अनुशीलन - मध्यप्रदेश के विशेष सन्दर्भ में (शोध ग्रन्थ ), पर्व जयंतियाँ एवं दिवस )एवं अनेक संकलनों में लेख ,कविता ,गीत आदि प्रकाशित
सहभागिता - प्रेमचंद सृजन पीठ विक्रम वि. वि. उज्जैन के अखिल भारतीय कथा समारोह ग्वालियर में भागीदारी एवं जबलपुर कथा समारोह में सहभागिता
सम्मान / पुरस्कार - )ब्रजबिहारी टंडन सारस्वत सम्मान (बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र भोपाल तथा भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर ), ब्रह्मदत्त तिवारी स्मृति पुरस्कार (कहानी विधा )हिंदी लेखिका संघ भोपाल ),जानकी नेगी स्मृति बाल साहित्य सृजन सम्मान (उत्तराखंड बाल साहित्य संस्थान एवं बाल प्रहरी अल्मोड़ा, ) शब्द भूषण (शब्द प्रवाह साहित्य मंच उज्जैन ),श्  विद्यादेवी भदौरिया स्मृति बाल साहित्य सम्मान (बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र भोपाल, )साहित्य साधना सम्मान (ज्याइंट्स ग्रुप कटनी, )भक्त शिरोमणि मीरा राष्ट्रीय सम्मान )हल्दी घाटी ), राष्ट्रीय साहित्य साधना अलंकरण (निर्दलीय भोपाल ,श्विद्या वाचस्पति )भागलपुर 
सम्बद्धता - म. प्र. बाल कल्याण परिषद, म. प्र. लेखक संघ, म. प्र. हिंदी लेखिका संघ,भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर   
सम्प्रति - शिक्षिका , म. प्र. स्कूल शिक्षा विभाग , कटनी
विशेष - बाल साहित्य में शोध उपाधि , राज्य स्तरीय आचार्य सम्मान , जिला स्तरीय श्रेष्ठ शिक्षक  सम्मान , राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार महामहिम राष्ट्रपति द्वारा
संपर्क - दुबे कालोनी , कटनी 483 -501 म. प्र./ email : sudhaamrita-gupta@gmail-com

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