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 बालकथा - आदर्श गांव - शशांक मिश्र भारती

 बालकथा:-

आदर्श गांव
            -------  शशांक मिश्र भारती
      
      चैनाला सरयू नदी के ऊपर बसे एक गांव का नाम था। सीढ़ियोंदार बने खेत दूर से देखने पर किसी बैल की आंत की भांति दिखलाई पड़ते थे।गांव से ऊपर टेढ़ा-मेढ़ा र्सिर्पला रास्ता था।मानों बड़ा सा अजगर लाकर किसी ने एक छोर से दूसरे छोर तक पेट के बल सुला दिया हो।दिन भर मोटर गाड़ियों की गड़गड़हट, बजने वाले सायरनों की आवाज सुनायी पड़ती रहती थी।रात में सन्नाटा होने पर सायं- सायं को जंगली जानवर यदा-कदा तोड़ देते।सियारों की हुआ- हुआ तो रोज ही रात को सुनायी पड़ जाती।  

        दूर से देखने पर चारों ओर का वातावरण हरा-भरा दिखता था। जैसा कि कोई हरी साड़ी में सजी-संवरी दुल्हन खड़ी हो, लेकिन अन्दर से हाल बड़ा खराब  था खराब भी यंू कहिये; कि बरसात के मौसम को छोड़कर पूरे वर्ष पानी के दर्षन न होते ।एक ओर भयंकर गरमी दूसरी ओर पानी का संकट।नाले-स्रोत भी सूख जाते या उनमें से पानी पेड़ों से ओस की बूंदों सा टपकता।बरसात का पानी भी रुकने का उचित प्रबन्ध न होने से व्यर्थ ही बह जाता। इसलिये बरसात अधिक हो या कम। गरमियों का हाल एक जैसा ही रहता। पीने, कपड़ा धोने, नहाने, जानवरों को पानी पिलाने आदि के लिए सब नदी की ओर दौड़ते। कई बार नदी का दूषित जल पीने से गांव में बीमारियां फैल जातीं।गरमियां एक- दो जानवरों की जान ही ले जाती थी। पक्षी भी पानी के अभाव में तड़पकर दम तोड़ देते।  

       आस-पास के अन्य गांवों की भांति ही यह गांव भी अनेक बुराईयों से ग्रस्त था। पुरुष दिन भर घुंआ उड़ाते, शराब और दम पीते। जुआं खेलते और स्त्रियां सुबह से देर रात तक काम में लगी रहती। कई बार चारे और लकड़ी के लिए दूर जंगल भी जाना पड़ता। अक्सर रात को नशे में आकर पुरुष मार- पीट भी करते। छोटी- छोटी बातों पर लड़ाई झगड़ा तो आम बात थी।बच्चे यह सब देखने को विवश थे।कुछ विरोध न कर पा रहे,थे।  

       एक दिन की बात है, कि बच्चे पत्थरों को लगा- लगाकर घर बनाने का खेल रहे थे।एक बनाता दूसरा तोड़ देता।कोई- कोई ऊपर से पानी डाल देता।यही सब चल रहा था।कोई कहता ऐसे बनाओ। यह ठीक नहीं है और अपने आप एक-दो पत्थर रख देता।तब तक कोई आकर तोड़ देता।यही सब कुछ चल रहा था। उछलकूद तोड़ फोड़ के मध्य बच्चों ने देखा- कि एक स्थान पर पानी रुका हुआ है। कहीं से भी एक बूंद नहीं निकल रहा है।

       सब बच्चे इकटठे हो गये इस कौतूहल को देखने के लिए। किसी को कुछ समझ न आ रहा था। सब एक दूसरे की ओर प्रश्न भरी दृष्टि से देख रहे थे।सबके मन मे एक ही बात आ रही थी, कि आखिर ऐसा कैसे हो गया। पानी क्यों रुक गया ?

       तभी शिखर ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा- मित्रों ध्यान से देखो कैसे पत्थरों ने मिट्टी की सहायता से पानी रोक दिया है।पत्थर इस प्रकार लग गये कि पूरा का पूरा पानी रुक गया है।

       हां भाईयों ,कितना अच्छा तालाब बन गया खेल-खेल में। इन्द्र ने अनुमान लगाया,

       मित्रों यदि ऐसे अनेक तालाब बना दिये जाये ंतो कितना अच्छा रहेगा। पानी बेकार में बहेगा भी नहीं और रुक भी जायेगा। चेतना ने बतलाया।

       चेतना तुम बातें तो बड़ी समझदारी की करती हो।पर यह सब कैसे संभव है ?
       जिस समस्या का समाधान बड़े- बड़े लोग नहीं कर पाये । वर्षों से परेशान है। इन बच्चों ने खेल- खेल मे कर डाला चुटकी बजाते ही। अब हमारे गांव में पानी की समस्या नहीं रहेगी और न ही कोई पशु-पक्षी प्यासा मरेगा। प्रेरणा बोली,

        इतना सब कुछ कैसे होगा। यह बड़ी-बड़ी बातें करना तो आसान है। पर होगा कैसे सब ? नेहा ने प्रश्न पूछते हुए कहा,

        सुनो मित्रों भले ही हमारे गांव वालों को शराब और जुआं खेलने से समय न हो। लड़ाई- झगड़े में उलझे हो। रोज रात को घर वालियों को पीटने में अपनी शान समझते हों ; किन्तु हम सब सच्चे मन से यदि कुछ करना चाहेगे तो पूरा होगा और सभी को सहयोग भी करना होगा

       हम सब मिल कर इसी तरह के या इससे कुछ बड़े तालाब गांव के चारों ओर बना सकते हैं हमारे गांव में पत्थरों की कोई कमी नहीं है। जहां- जहां से पानी बहकर नदी में जाता है या बरबाद हो जाता है।वहां-वहां पर तालाब बनाकर पानी रोकना है।

       यह सब तो ठीक है पर इतना सब कैसे सम्भव है।किस तरह से इतने बड़े गांव के चारों ओर तालाब बनेंगे। कौन समझायेगा। रोहित ने कहा,


      देखो रोहित, संख्या से अधिक महत्व परिश्रम व लगन का होता है।हम सब बच्चे किसी से कम थोड़े ही हैं।गांव के सौ बच्चे छांटकर दस- दस की दस टोलियां बनायेंगे। दो टोली उत्तर में, दो दक्षिण में, दो पूरब में और दो पश्चिम काम करेंगी।जो दो टोलियां बचेंगी।उनमें से एक टोली गांव के अन्दर रहकर साफ सफाई पर ध्यान देगी। गांव वालों का सहयोग लेकर गांव में छोटे-छोटे गड्ढे बनाकर उनमे पत्थर लगाकर पानी की टंकियां बनायेगी।ताकि घर - जरुरत का पानी इनमें मिल सके।

       अब बची एक टोली यह आस -पास के गांवों में जाकर वहां के लोगों को योजना व योजना से होने वाले लाभों से परिचित करायेगी।साथ  ही बेकार में बहकर जाने वाले पानी को रोक कर उपयोग करने के लिए कहेगी।

       वाह! आनन्द आ गया, कैसे सुन्दर व उपयोगी योजना बनाई है।तूने शिखर, तुझे तो देश का जल बचाओ मन्त्री होना चाहिये।विशाल प्रसन्नता से उछलता हुआ बोला,

       इसके बाद गौरव, चेतना, प्रेरणा, नेहा, सुमित, प्रखर, नेहा, विशाल, आकाश और सूरज के नेतृत्व में टोलियां बना दी गईं।  

       सभी टोलियां अपने कार्य में जी जान से जुट गईं। कुछ बच्चे पत्थर इकटठे कर रहे थे तो कुछ उनको मिट्टी मे अच्छी प्रकार लगा रहे थे।  शिखर किसी टोली में न था वह घूम- घूम कर सभी का मार्गदर्शन कर रहा था।

          गांव के लोगों ने एक दो दिन तक तो  यह सब बच्चों की बचकानी हरकत माना। उनकों डांटा- फटकारा भी। पर बच्चों की लगन व परिश्रम ने उनका हृदय जीत लिया और वह सब भी तालाब बनवाने में जुट गये।

           लगभग छः माह के कठोर परिश्रम के बाद चैनाला गांव पूरी तरह से छोटे- छोटे तालाबों से घिर गया।यहीं नहीं गांव की गन्दगी भी साफ हो गयी। परिश्रम का फल भी गरमी के मौसम में दिखलायी पड़ा,

            इस बार गांव में पानी की कोई समस्या न थी।सभी तालाब पानी से भरे थे।जानवर प्यास बुझा रहे थे।पक्षी चहचहाकर गाना सुना रहे थे।

            वास्तव में बच्चों की दूरदर्शिता ने वर्षों से फैली पानी की विकराल समस्या का समाधान कर दिया था। खेल -खेल में ही चैनाला एक आदर्श गांव बन गया था।



शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी:-09410985048/09634624150
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