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कहानी- कहां से कहां तक - नीला प्रसाद

कहां से कहां तक

सुमिता के सामने बैठी मेधा को लगा कि रिश्ते साल -दर -साल शक्लें बदलते रहते हैं− जैसे पैदाइश के बाद बड़े होते बच्चे के नाक -नक्श! कुछ रिश्ते साल -दर -साल ज्यादा खूबसूरत होते जाते हमें बांधते चले जाते हैं तो कुछ अन्य बदशक्ल होते जाते भी हमें खुद से निकलने नहीं देते! मेधा ने तय करने की कोशिश की, कि उसका और सुमिता का रिश्ता कहां ठहरता है, किस खांचे में आता है यह? दिनों -दिन परिभाषित होता जाता, तीखे नाक -नक्श वाला या परिभाषित हो चुकने के बाद बदशक्ल -सा लगता? फिर यह क्यों हुआ कि पहले इस शहर में इतनी बार आने पर भी अंदर से कभी इच्छा नहीं हुई कि सुमिता से मिला ही जाए पर आज एकबारगी लगा कि उससे मिलना तो बहुत जरूरी है! जरूरी है जानना कि सुमिता का क्या हुआ! उड़ती -उड़ती खबरें जो आती रहीं, सच थीं क्या? वह लिव-इन में है या शादीशुदा.. सिर्फ पत्नी है या मां भी बन चुकी! वह बातूनी सुमिता जो सामने वाले को बोलने ही नहीं देती थी, अब तक वैसी ही है या चुप्पी -सी हो चुकी? अतीत में तो सुमिता को जितना जाना, वह मन में वैसे ही दर्ज था जैसे अलगनी पर टंगा कोई पुराना हैंगर, जो हवा से जब-तब हिल जाता, शोर करके अपनी उपस्थिति दर्ज करा लेता है।

सुमिता उसे देख खुश हुई। बीच के वर्षों को पाटने की कोशिश में बातों, घटनाओं, विचारों से अपने खास अंदाज में, पत्थर फोड़कर निकले किसी हहराते पहाड़ी झरने की तरह मेधा को भिगोने लगी।

‘ओह मेधा, यह तो सोचो कि प्यार आखिर होता क्या है - त्याग, समर्पण के सिवा?’ वह बोली। ‘तो मैंने तो वही किया, जो पीढ़ियों -पीढ़ियों से भारतीय महिलाएं करती आ रही हैं। किसी के लिए खुद को होम कर दो और अपनी ज़िंदगी ऐसे जीती रहो, मानो वह तुम्हारी है ही नहीं। दूसरे के लिए ही रखो अपना खयाल कि तुम उसे अच्छी लगती रहो.. खाओ, ताकि तुम उसके लिए जिंदा और स्वस्थ बची रहो। सजो, ताकि तुम्हें देखकर उसे प्रसन्नता हो.. घर को साफ सजा-धजा कर रखो, ताकि वह अच्छे वातावरण में, साफ - सुथरे घर में खुश रहता, आंतरिक प्रसन्नता पा सके। नौकरी करो, ताकि उसे पैसे की कमी महसूस न हो.. लव इज़ सैक्रिफाइस। खुद को पूरी तरह दे दो और भूलकर भी कभी खुद को ‘मैं’ नहीं महसूसो। किसी में समा जाओ और फिर भी उसमें निरंतर समाते रहने की इच्छा छोड़ो नहीं... इसीलिए मैं किसी के साथ लिव -इन में रही, उसकी केप्ट बनकर रही कि पत्नी बनकर - उससे क्या फर्क पड़ता है? शादी से पहले प्रेग्नेंट हुई या बाद में - उससे भी क्या फर्क पड़ता है? उसकी इच्छा से एक बच्चा पैदा किया या तीन.. कोई फर्क पड़ता है?? यह तो उसे सोचना है न, कि वह कितने बच्चे पाल सकता है! अगर बेटियां ही बेटियां होती गईं तो उन्हें दहेज देकर ब्याह सकता है? बेटियों को करियर या पति चुनने की छूट किस हद तक दे सकता है? सोचो कि भले ही वह मुझसे नीचे पद पर है, मैं आखिर उसकी पत्नी के रूप में ही जानी जाती हूं न!..चारों ओर नजर डालो और बताओ कि जिस - जिस ने यह नहीं माना, वे कहां पहुंची ज़िंदगी में?’ उसने चुनौती देते हुए पूछा, ‘मुझे तो तुम्हारी ज़िंदगी का सब पता है मेधा, बोलो तुम कहां पहुंची? पति से सिर्फ और सिर्फ टकराव.. क्योंकि तुम अपनी तरह, अपनी शर्तों पर जीना चाहती हो; और वह बिना कहे चाहता यही है कि तुम उसकी तरह, उसकी शर्तों पर जिओ। उसकी सोच को बिना बहस अपना लो और कहो कि यह तुम्हारी अपनी सोच है, जीने का तुम्हारा अपना तरीका है यह! वैसे भी वह तुम्हें जीने दे ही नहीं सकता अपनी तरह से क्योंकि आधुनिकता के बाहरी खोल के अंदर है तो वह भी वही पारंपरिक पुरुष न, जो पुरुष होने मात्र से खुद को ऊंचा समझता, दंभ से भरा होता है; ठेठ भारतीय पुरुष, जो चाहता है कि पत्नी उसकी सोच के अधीन रहे, मन - वचन - कर्म से पति की छाया बनी जिए..’

प्रहार झेलती मेधा कुछ बोलने को उत्सुक हुई, सुमि ने बदस्तूर बोलने नहीं दिया।

‘मेधा, मैं तुमसे बहुत - बहुत ज्यादा जानती हूं इन पुरुषों की असलियत! मेरी मां तो आज से पचास साल पहले मेरे पापा के साथ लिव - इन में रही थीं। वे स्कूल में प्रिंसिपल थीं और पापा, एक कॉन्ट्रैक्टर। स्कूल की बिल्डिंग में फेरबदल के सिलसिले में दोनों मिले और वे मेरी दबंग मां से इतने प्रभावित हुए कि अपनी पहली पत्नी को दूसरे शहर में छोड़, मां के साथ रहने लगे। तो लिव - इन ही हुआ न! मां को घर पर किसी ने कुछ नहीं कहा - क्योंकि उनके पापा यानी मेरे नाना, मेरी नानी के मरने के बाद दूसरी शादी कर चुके थे और पहली पत्नी की संतान उनके लिए बोझ -सी थी, तो मां को एक फेमस बोर्डिंग स्कूल में डालकर निश्चिंत हो गए थे। मां क्या करती हैं, क्या नहीं; किससे मिलती हैं, किसके साथ रहती हैं, उन्हें ज्यादा परवाह नहीं थी। मां को घुड़सवारी आती है। तैरना, बंदूक चलाना भी आता है। वे पढ़ने में तो अच्छी थीं ही, दबंग प्रशासक बनने के गुणों से भरपूर भी थीं, इसीलिए पढ़ाई पूरी करके प्रिंसिपल बन गईं। इस तरह रहने को क्वार्टर मिल गया और नाना के पास वापस लौटना नहीं पड़ा।
फिर पापा उन्हें मिले तो अपनी बोल्डनेस और नाना के प्रति अपना विद्रोह जताने को वे बिना शादी पापा के साथ रहने लगीं। नहीं, वे नहीं चाहती थीं कि पापा पहली पत्नी को तलाक दे दें। किसी निरीह, अबला -सी औरत को बेघर क्यों करना! वे तो पापा को अपनी पहल से, हर थोड़े दिन बाद पहली पत्नी यानी मेरी बड़ी मां के पास भेज देती थीं। जब बड़े भइया - दीदी का जन्म हो चुका और स्कूल में नाम लिखाने की बारी आई तब उन्होंने पापा से शादी कर ही ली। पापा को पहली शादी से सिर्फ बेटियां थीं इसीलिए भइया पैदा हुए तो वे बहुत खुश हुए। भइया के जन्म के बाद उनके पास पैसों की बाढ़ -सी आ गई तो वे उन्हें सौभाग्यशाली भी मानने लगे। फिर धीरे -धीरे वे ज्यादा -से - ज्यादा समय मां के साथ ही बिताने लगे, ज़बर्दस्ती किए जाने पर ही गाहे-बगाहे बड़ी मां के पास जाते। हम सात भाई - बहनों का जन्म हुआ। बड़ी मां से भी उन्हें पांच बच्चे हुए। भइया के जन्म के काफी बाद वहां भी बेटा हुआ।
मां लिव - इन में रहती थीं तब कितनी बातें होती थीं चारों तरफ! केप्ट हैं पापा की, सब यही कहते थे, पर मां ने कोई परवाह नहीं की। जो भी कुछ कहे, उसे पलटकर यही जवाब दें कि ठीक है, नहीं रहती किसी की केप्ट.. तुम कोई अच्छा -सा मर्द ढूंढ लाओ न मेरे लिए, शादी कर लूंगी। सब चुप हो जाते। मां तो खुलेआम मानती हैं कि भारत में लिव - इन में भी मर्द और औरत का रिश्ता वैसा ही होता है, जैसा शादी में। मतलब कि बराबरी के बाहरी खोल के अंदर घर का असली स्वामी पुरुष रहेगा, सारे निर्णय उसके चलेंगे। औरत वैसे ही मर्द के अधीन रहेगी, जैसे पत्नी को रहना चाहिए - अपने मर्द पर इमोशनली निर्भर और उसके वैल्यू सिस्टम की छाया। हर बात में हां -में -हां मिलाने वाली, अपने मर्द में कभी दोष न ढूंढने वाली.. जो भी है, जैसा भी है, उसका भगवान है, यही समझने वाली!! ऐसा न हो तो कोई लिव-इन भारत में नहीं चलता... टकराहटें शुरू हो जाती हैं और जल्दी -ही लिव -इन खत्म!! टूटे दिल से दोनों अपने -अपने रास्ते!!’
मेधा विस्फारित, चकित नेत्रों से सुमिता को देखती रही। अंदर बहुत कुछ खौल रहा था, बहुत सारे मुद्दों पर असहमति जताना, कुछ बोलना चाहती थी पर जानती थी कि सुमिता को बीच में टोकना बेकार है। यह अंदर की सारी बातें बोलकर खाली हो जाए, तभी इसे कुछ कहा जा सकता है। लगातार बोलती सुमिता को वह चुपचाप सुनती रही।

‘और इसमें गलत भी क्या है मेधा? यही तो है प्यार! खुद को किसी में समाहित करके खुद को भूलकर जीना। तुम्हारी तरह पति के व्यवहार को हर वक्त ऐनलाइज करते, दुखी होते जीने की बजाए, बस प्यार करना.. और सोचो न, कि करते तो अल्टिमेटली हम सब वही हैं - कमियों को इग्नोर करते हुए पति का सिर्फ अच्छा पक्ष देखना, उसे प्यार करना बंद नहीं करना.. आखिर जो दुर्गुण हमारे अपनों में होते हैं और हम उन्हें इग्नोर करते उन्हें प्यार करते होते हैं, वही दुर्गुण दूसरों में हमें चुभने लगते है कि नहीं? अपना पति झूठा हो, रिश्तों में बेईमान हो, तब भी यही सोचें कि कुछ भी हो, कैसा भी हो, पति है मेरा। बुरा कैसे मानूं, साथ कैसे छोड़ूं? पर दूसरे किसी का पति ऐसा हो, तो बार-बार इसकी चर्चा करते रहें कि देखो, कैसा झूठा-प्रपंची, रिश्तों और रुपयों में बेईमान, कुसंस्कारी है − अपने पांवों खड़ी पत्नी इसे छोड़ क्यों नहीं देती?? अपना बच्चा पढ़ाई में कमज़ोर हो, बात नहीं मानता हो, बेवकूफ हो - तब भी प्यारा, और हमारी यही इच्छा कि वह बुलंदियों तक पहुंचे; दूसरों का पढ़ाई में कमजोर होने के कारण कहीं न पहुंचे तो कहें कि है ही बेवकूफ - कहां पहुंचेगा आखिर!’

मेधा मुस्कराहट रोक नहीं पाई।

‘पर खैर’, सुमिता बोली ‘मैं तो लिव - इन की बात कर रही थी। मेरी या मेरी मां की बात रहने दो, हम दोनों ही यह जान और मान चुके हैं कि भारत में पुरुष अभी लिव - इन तक में महिला को बराबरी का दर्जा देने को तैयार नहीं। उसका मानसिक विकास अभी उतना हुआ ही नहीं है कि वह बिना हर्ट हुए बराबरी की बात सोचे और निबाहे। भले ही साथ रहती महिला की कोई जिम्मेदारी नहीं निभानी हो, वह पति से ऊंचे पद पर हो, ज्यादा कमाती हो, पुरुष इस सोच को ही पोसता रहता है कि महिला अधीन रहने को बनी है। तो अपनी शादी को लेकर मैं “कोई भी चलेगा जो मारे - पीटे नहीं, और सताए भी तो ज्यादा नहीं”, वाली मानसिकता में थी। मुझे पता था कि भले ही पढ़ी - लिखी, मोटा कमाने वाली ऑफिसर हूं, सुंदर तो नहीं हूं न! तो किसी को भाऊंगी तो अपनी सैलरी के कारण, लुक्स के कारण नहीं। और अंदर की सुंदरता कौन देख पाता है, कौन उसे महत्व देता है भला!? फिर शादी से पहले कोई देख पाए भी तो कैसे? यहां तक कि लम्बी डेटिंग करो, तब भी किसी का असली चेहरा उजागर नहीं हो पाता। उस दौरान तो सब मीठे बने रहते हैं और अपना अच्छा पक्ष ही सामने लाते हैं.. इसीलिए शादी तो हर हाल में एक डील ही होगी, चाहे जिससे हो.. बिना दहेज हो जाए, तो और भी अच्छा। आखिर पापा को जितना भी पैसा हो, दोनों तरफ मिलाकर कुल आठ बेटियां ब्याहनी थीं।

... तो कहानी ऐसे शुरू हुई कि राजेन जब मेरे पी.ए. होकर आए, तो दुखी-दुखी दिखते थे। डिक्टेशन लेते वक्त भी चेहरा लटका, सर झुका। मैं पिघल गई और एक दिन मैंने अपनी पहल से बातें शुरू कीं। पता चला कि शादीशुदा हैं, पत्नी गांव की ठेठ गंवई हैं। पत्नी को कुछ समस्या है कि बच्चा नहीं होता। इस कारण दुखी रहते हैं और ज़िंदगी में कोई रुचि नहीं जगती।

फिर मेरे ही कहने पर राजेन पत्नी को गांव से ले आए। सारी जांच हुई, इलाज शुरू हुआ। मैंने उनकी पत्नी से इतना अच्छा बर्ताव किया कि वह मुझसे पूरी तरह खुल गई। बोली कि उसे लगता है कि बच्चा तो होगा नहीं और सास जीना मुहाल कर देगी। सही है− इतने खेत हैं, कौन संभालेगा? जेठ को भी एक बेटी ही है। तो वारिस कहां से लाएं? वह बोली कि मैं तो इतना डरी हुई हूं कि जाने कब मेरी सास मुझे घर से निकाल दें और मायके वाले कहें कि हमने तो ब्याह दिया, हमारे पास वापस आने के बदले वहीं जान क्यों न दे दी; तब क्या कहूंगी? हमारे राजपूतों में तो शादी के बाद छोड़ दी गई लड़की की दूसरी शादी गांव में आज भी मुश्किल है। इतनी भोली थी वह कि बोली मुझसे कि मैं एक साल यहीं रह जाती हूं। आप एक बच्चा पैदा करके मुझे दे दो - मैं सास से कह दूंगी कि इलाज करवाने से मुझे यह बच्चा हुआ है। फिर मेरे जीने का सहारा हो जाएगा और आप बच्चा पैदा करने के बाद जिससे मर्जी हो, शादी कर लीजिएगा। देखने में अच्छी हैं, पढ़ी - लिखी हैं, कमाती हैं, आपको लड़कों की क्या कमी! मैं कोई आपकी तरह पढ़ी - लिखी तो हूं नहीं कि कहीं नौकरी मिल जाएगी। मुझे तो मरते दम तक पति के घर ही रहने की मजबूरी है और यही सीख भी मिली है कि डोली आई, अब अर्थी ही निकलेगी... और ये जो मेरे पति हैं न, बहुत गुस्से वाले हैं। हाथ भी चलाते हैं। थर -थर कांपती रहती हूं इनसे”

मुझे उस पर बहुत दया आई। देखने में अति साधारण, बिन पढ़ी, गंवार -सी दिखने वाली नितांत घरेलू महिला, जो मेरा सहारा चाहती थी। मेरे कहने पर पति इलाज के लिए यहां ले आए हैं, यह जानकर मुझे बहुत ताकतवर समझ रही थी। वह रोज कहती, ‘’देखिएगा, बच्चा तो होगा नहीं और ये घर ले जाकर मुझसे और ज्यादा मारपीट करेंगे। कहेंगे कि जाकर कहीं जान क्यों नहीं दे देती कि तुमसे पिंड छूटे।’’ रोज वह यही सब कहती, रोज मेरे मन में उसके लिए दया में इजाफा हो जाता।

तो मुझे एक तरकीब सूझी। सोचा कि राजेन तो मेरे अंडर हैं, मुझसे दबते हैं। देखूं जरा कि इनपर कितनी चलती है मेरी! जरा टेम कर दूं तो पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार करेंगे। तब तक राजेन मुझसे बहुत खुल गए थे और एक दोस्ती -सी हो गई थी। घंटों बातें करना, मुस्कराना, पत्नी की बातें बताना और खीझ जाना कि जाने कैसी उजड्ड पत्नी गले पड़ गई है, पर देवता मानती है, सेवा करती है, तो छोड़ें कैसे? और फिर शादी के फेरे लिए हैं, साथ निभाने की कसमें खाई हैं, तो निभाना तो पड़ेगा ही… वह होता यह है कि गांव में शादी करते समय लड़की देखने का रिवाज नहीं होता। अमुक की लड़की है, जिसके पास इतने बीघे खेत हैं.. इतना दहेज देंगे और लड़की सुघड़ है, देखने में ठीक-ठाक बताई जाती है, तो शादी हो जाती है। इसी तरह राजेन की भी शादी हो गई और रानी गले पड़ गईं। फिर वह व्रत-उपवास करके, पसंद का खाना पकाकर, पांव दबाकर और पति के लिए सिलाई-बुनाई करके, उन्हें खुश रखने की कोशिशों में लग गईं। पहले तो इंतजार चला, फिर जब साल बीत गया और प्रेग्नेंट नहीं हुईं तो चिंता शुरू हुई। गांव के डॉक्टर को दिखाया गया। डॉक्टर ने कहा कि इंतजार करो। अब सोचने की बात यह है कि जब सेक्स और वंश चलाने के लिए ही शादी की है तो पत्नी का निःसंतान रहना बर्दाश्त कैसे किया जाए! मैंने राजेन को खूब डांटा कि दुनिया कहां से कहां चली गई और ये अटके पड़े हैं वहीं के वहीं! पुरुषसत्तात्मक सोच, मेल शॉविनिज़म के मारे।

‘दुनिया बदल गई है?’ राजेन ने चुटकी लेते हुए पूछा।
‘हां’, मैं जोर देकर बोली।
‘आप भी बदल गई हैं?’
‘हां, क्यों नहीं। मैं सोच में आधुनिक हूं, अपने फैसले खुद लेती हूं’

‘तो फिर मेरी बेचारी पत्नी की खातिर एक बेटा क्यों पैदा नहीं कर देतीं? चलिए बेटा नहीं, बेटी ही सही.. कोई तो हो जाए, कि मेरी मां उसे बांझ कहकर नहीं सताए! उसकी ज़िंदगी में भी मुस्कान आ जाए’

‘तुम भरोसा नहीं करोगी मेधा, पर तब मुझे बार -बार सोचकर भी यही ठीक लगा कि चैलेंज स्वीकारते हुए, राजेन के साथ रहना शुरू करके.. माने सोना शुरू करके, एक बच्चा पैदा करके उसकी पत्नी की गोद में डाल, समझूं कि कितना बड़ा पुण्य किया, समाज सेवा की। तब तो जिद थी कि समाज के सभी नियमों को धता बताते, किसी के लिए कुछ कर दिखाऊंगी। जाने क्या-क्या जिद थी.. क्या -क्या चलता था मन में। पापा ने पहली पत्नी को तलाक दिए बिना ही मां से शादी की थी और दोनों को निभाते रहे। जाने पिता की अवैध संतान होने की कुंठा थी या कुछ और, कि मैं विद्रोह कर बैठी।

राजेन की पत्नी रानी, गांव चली गई और राजेन मेरे फ्लैट में आ गए। नहीं, सबों के सामने नहीं, सिर्फ रात - रात को.. छुप - छुपकर। तब मैंने यह सोचा कि प्रेग्नेंसी के कुछ महीने तो यूं ही निकल जाएंगे, बाकी लंबी छुट्टी लेकर निकाल लूंगी। फिर दूर के किसी शहर में बच्चे का जन्म होते ही, उसे राजेन को सौंपकर वापस काम पर लौट आऊंगी। तब इस सब में मुझे कोई पेच नजर ही नहीं आया। इधर मैं प्रेग्नेंट होऊंगी, उधर रानी गांव से आ जाएगी और यहीं रहने लगेगी। फिर बच्चा लेकर चली जाएगी। वह प्रेग्नेंट है, यह बताकर सारी तैयारी होती रहेगी। पेट दिखना शुरू होते ही मैं ऑफिस से गायब हो जाऊंगी.. वगैरह। फिल्मी कहानी की तरह की सोच। कोख दूंगी पर भाड़ा नहीं लूंगी।

पर होनी तो कुछ और थी।

पहले-पहल तो सब ठीक-सा ही लगा। महीने–दर-महीने बीतते गए। लिव-इन था भी और नहीं भी, क्योंकि राजेन का खुला साथ नहीं था। रात को छुप-छुपकर आना, पति की तरह छेड़छाड़ और सेक्स करना, फिर दिन भर मेरे पी.ए. की तरह विनम्र बर्ताव करते हुए, बताए गए सभी काम करना। रात को ये आते तो कई बार बाहर से मेन गेट पर ताला लगा देते और अंदर पिछले दरवाजे से घुस जाते। ग्राउंड फ्लोर पर रहती थी तो चल जाता था यह सब। फिर पिछले दरवाजे से ही सुबह निकल जाते और अपने घर से नहा-धोकर ऑफिस पहुंच जाते। छुपाने की कोशिश पूरी की थी पर बात फैलने लगी कि हमारे बीच कुछ चल रहा है.. कि मैं केप्ट हूं उनकी। कुछ माह बाद मैं प्रेग्नेंट हो गई।
कहां तो सोचा था कि किसी को भनक तक नहीं लगने दूंगी, कहां तबियत इतनी खराब हो गई कि शुरुआत में ही सारा भांडा फूट गया। मां को बताया तो वे अड़ गईं कि अभी, इसी वक्त अबॉर्ट करवाओ तथा किसी और से, किसी से भी, तुरंत शादी कर लो। ‘क्यों आप भी तो लिव - इन में रही थीं, शादी से पहले प्रेग्नेंट हुई थीं’,मैंने कहा तो पूरी लड़ाई हो गई। ‘हिस्ट्री रिपीट्स इटसेल्फ’। सबसे बड़ी बहन ने, जो मां की शादी से पहले पैदा हुई संतान थी, हिकारत से कहा। राजेन किसी को पसंद नहीं थे क्योंकि उनकी पोस्ट, उनका परिवार, उनका मुझसे कम क्वॉलिफिकेशन किसी को पसंद नहीं था।। वे पहले से शादीशुदा थे और उनकी करनी किसी को पच नहीं रही थी कि पत्नी रखे - रखे, किसी और से सिर्फ बच्चा पैदा करके देने को संबंध बनाएंगे। मैं टेंशन में आ गई। राजेन से शादी की कोई बात तो मेरे मन में भी नहीं थी पर मां ने जिस तरह से मुझे नकार दिया और राजेन को भला - बुरा कहने लगीं, मुझे घेरकर किसी और से तुरंत शादी कराने की सोचने लगीं, वह मुझे विकर्षित कर रहा था। अब मैंने मां को सबक सिखाने की सोची। आखिर जो काम खुद उन्होंने किया, वह बेटी के लिए गलत कैसे हो सकता था? और फिर मेरे मन में पहले तो राजेन को अपनाने जैसी कोई बात थी ही नहीं। मेरी देह मेरी है, उस पर मेरा हक है और मैं जैसे चाहूं, वैसे इसका उपयोग कर सकती हूं - यह सोच थी। दो लोग आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाएं और बच्चा पैदा करें, इसमें शादी कहां से आ गई, समाज कहां से आ गया? मां ने मेरे तर्कों के जवाब में मुझे थप्पड़ मारे और कहा, ‘अकल घास चरने चली गई है। घर से निकल जाओ।’ मैं घर से चली आई।

फिर तबियत कुछ संभली, तो सोचा। बहुत - बहुत सोचा। शायद मां ने जो किया, उसका उन्हें अफसोस था, तभी चाहती नहीं थीं कि बेटी भी वही करे.. उन्हें शायद अहसास था कि समाज की नजरों में उनकी सभी संतानें अवैध हैं। चाहे जितनी भी तरक्की कर लें, कहलायेंगी अवैध ही। किसी अच्छे, संस्कारी परिवार से रिश्ता नहीं आएगा। तभी तो स्कूल में पढ़ा रही बड़ी दीदी को अपने से छोटे, कम कमाने वाले, नीची जाति के लड़के से शादी करनी पड़ी। बेरोजगार मंझली दीदी कुंवारी ही रहीं और मुझसे छोटी बहन, साथ काम करने वाले से प्यार की पींगें बढ़ाती हुई भी शादी नहीं कर पा रही थी, क्योंकि लड़के के घरवाले राजी नहीं थे। मां चाहती थीं कि कम -से -कम मेरी शादी तो अच्छे परिवार में हो जाए। मैं ऑफिसर थी और उनके पास दहेज देने को पैसे भी थे। पर मैंने यह कांड कर लिया।

अब? पहली बार शक हुआ कि कुछ गलत तो नहीं हो गया? आपसी सहमति से शारीरिक संबंध तक तो ठीक था पर बच्चा पैदा करना तो सीधे-सीधे शादी के नियमों से जुड़ा मुद्दा था। यह भी शक हुआ कि क्या पैदा करने के बाद मैं अपने बच्चे को छोड़ पाऊंगी? छोड़ दिया तो खुद को क्या मुंह दिखाऊंगी? राजेन ने कहा कि वे मुझे अपनाने को तैयार हैं। हमने मंदिर में शादी कर ली। तब तक राजेन का पहली पत्नी से कागज़ी तलाक हुआ नहीं था। मैंने शादी के कागजात ऑफिस में दे दिए ताकि मामला शांत हो जाए, मैटरनिटी लीव भी मिल जाए। पर इस्टैब्लिशमेंट वालों ने मुंह पर कह दिया − यह शादी अवैध है, राजेन तो हमारे रिकॉर्ड के अनुसार पहले से शादीशुदा हैं। अब राजेन को रानी से तुरंत तलाक दिलवाए बिना जीना अचानक मुश्किल लगने लगा। कुछ कानूनी दांव -पेंच चले। रानी को मनाकर कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिये गये कि वह अपनी इच्छा से सालों से अलग रह रही है और आपसी सहमति से तलाक देने को राजी है। साथ ही मौखिक रूप से यह वादा भी दे दिया गया कि वह घर से कभी बेदखल नहीं की जाएगी−जीते जी कभी नहीं। इस तरह मैं जो रानी की हमदर्द बनी, समाज -सेवा की खातिर, उसके लिए बच्चा पैदा करने जा रही थी, एकदम से विरोधी खेमे में आकर उसकी सौतन, उसकी दुश्मन बन गई। सब कुछ गलत होता जा रहा था पर क्या करती? कुछ माह बाद बेटी हुई तो कहना पड़ा कि सतमासा है जबकि वह पूरी स्वस्थ, फुली ग्रोन चाइल्ड थी। इतनी खूबसूरत - स्वस्थ बेटी को देखकर भी राजेन का चेहरा लटक गया। बोले कि जल्दी-से-जल्दी फिर प्रेग्नेंट हो जाओ। लोग कहने लगे कि राजेन ने यह जांचा कि मैं बच्चा पैदा कर सकती हूं या नहीं, फिर मुझे फांस लिया कि शादी करनी ही पड़े। एक पढ़ी-लिखी, तगड़ा कमाने वाली लड़की बैठे- बिठाए दूसरी पत्नी के रूप में मिल गई और पहली वाली से संबंध भी बने रह गए। संबंध बने रह गए तो दहेज में मिले खेत भी रह गए, गांव में मां की सेवा के लिए बहू भी रह गई। शहर में तो परिस्थितियों की मारी, मायके द्वारा त्यागी हुई मॉडर्न पत्नी पूरी तरह चंगुल में थी ही। डेढ़ महीने बाद फिर से प्रेग्नेंट होकर मैं ग्यारह महीनों के अंतराल पर दुबारा मां बनी। दूसरी संतान भी बेटी ही हुई और खीझ में, पढ़ी-लिखी, खुद से ज्यादा कमाने वाली, खुद से ऊंचे पद पर काम कर रही पत्नी पर, राजेन का हाथ जब-तब उठना शुरू हो गया।

इस बीच मां ने नियति को स्वीकारते हुए, मेरे घर आना-जाना शुरू कर दिया था। उन्हें भी समझ नहीं आ रहा था कि मेरी ज़िंदगी का क्या करें.. तो सिखाने लगीं कि जब शादी कर ही ली है तो किसी तरह राजेन को इतना खुश रखूं कि वह मारपीट नहीं करे। उसे समझाऊं कि संपत्ति की वारिस लड़कियां भी हो सकती हैं और यह पुरानी सोच है कि वंश लड़के ही चलाते हैं। मां एक बार गांव में राजेन के घर भी हो आईं और मेरी सास को समझा आईं कि अब और बच्चे पैदा करने के लिए मुझ पर दबाव नहीं डाला जाए, क्योंकि पहले ही मैं बहुत दुबली-पतली हूं, दो साल में दो बार मां बन चुकी हूं और मेरी तबियत अच्छी नहीं रहती। अगर बच्चे पैदा करती -करती मैं मर गई तो उनके बेटे का क्या होगा? क्या वे चाहती हैं कि मैं मर जाऊं? ‘न, न दुलहिन तो बहुत अच्छी हैं’ सास ने तुरंत कहा। ‘पढ़ी - लिखी दुलहिन घर आती हैं तो मेरे पांव छूती हैं, यही कम है क्या? खाना बनाकर खिलाती भी हैं.. मीठा बोलती हैं।’ उन्होंने मेरी तारीफों की झड़ी लगा दी।

पर राजेन के मन की गांठ नहीं गई। जब - तब मुझे उकसाते रहे कि मैं एक बार और प्रेग्नेंट हो जाऊं.. कि क्या पता, अबकी बेटा हो ही जाए.. और फिर पैसों की क्या कमी है घर में! दोनों मिलकर इतना कमाते हैं, इतनी संपत्ति है घर में, खेत -खलिहान हैं, बच्चे पालने में मदद करने को सास और रानी हैं.. सुनते–सुनते कान पक गए। खीझकर एक दिन चिल्ला पड़ी मैं−‘तो जाओ न, रानी से कर लो बच्चे! वह तो तुम्हारे साथ सोने को तैयार बैठी है।’ राजेन ने गुस्से में मुझे एक जोरदार थप्पड़ रसीद किया और गालियां बकते हुए सामान बांधने लगे। अगली बस से वे सचमुच गांव चले गए। बाद में सुना कि रानी ने पांव पकड़ लिए थे कि उसका अच्छी तरह इलाज करवाया जाए, वह वाकई चाहती है कि मां बने। रानी को बगल के बड़े शहर ले जाकर डॉक्टर से दिखलवा, उसका इलाज शुरू करवा राजेन उस वक्त तो वापस आ गए, पर उनका जल्दी - जल्दी गांव आना - जाना शुरू हो गया। ऐसे सालों चला और मैं मान बैठी कि भले ही रानी से उनके संबंध फिर से हो गए हैं, रानी कभी मां नहीं बन सकेगी और मेरी बेटियां ही संपत्ति की वारिस होंगी। पर नियति ने मुझे फिर से दिन में तारे दिखा दिए। रानी प्रेग्नेंट थी और राजेन उसे मेरे पास लाना चाहते थे ताकि वह सभी मेडिकल सुविधाओं के बीच मां बन सके। लड़ाई तो खूब हुई पर मैं अंततः मना नहीं कर पाई। मना कर भी कैसे सकती थी?
रानी आ गई। शादी के बाद से मैं जब भी गांव जाती, उससे नजरें चुराती फिरती थी, पर अब तो बातचीत और सेवा जरूरी थी। उसके साथ मेरी सास भी आई थीं। रानी का पूरा खयाल रखा जाने लगा। उसके लिए व्यंजन बनाने से लेकर, उसका मन बहलाने तक की सारी व्यवस्था की गई। मेरी प्रेग्नेंसी के दौरान मेरे लिए कुछ नहीं हुआ था। सास का मानना था कि मैं पढ़ी-लिखी हूं, अपनी देखभाल खुद कर सकती हूं और मेरे पास पैसे भी बहुत हैं.. तो किसी मदद की क्या आवश्यकता? बेटियों के जन्म के दो-एक हफ्ते पहले मेरी एक खास दोस्त आ जाती और दो हफ्ते बाद चली जाती। डेढ़-दो महीने बाद, बेटियों को मेड के सहारे छोड़कर मैं ऑफिस जाने लगती। पर अबकी का हाल देखकर कसक हुई। सारी तैयारियां पहले से ही ऐसी थीं, मानो घर में कोई राजकुमार आ रहा हो, और किस्मत की बात, कि आया भी। सास तो रानी की सेवा में ऐसे लग गईं मानो उसने मां बनकर उनपर कोई अहसान कर दिया हो। राजेन मेरे सामने रानी के साथ सोते नहीं थे पर बेटे को गोद में उठाते इतराते, मुझे ऐसी हिकारत भरी नजरों से देखते कि मैं जल जाती। अपना बैंक बैलेंस निल करके रानी की सेवा में पैसे बहा रही थी। वह भी अच्छा खा -पीकर, सेवा पाकर, या फिर खुशी के मारे, सुंदर-सी दिखने लगी थी। मेरा अहसान मानती थी कि मैंने उसे अपने यहां आने दिया और उसपर इतना खर्चा किया। स्थिति विचित्र हो गई। मेरी बेटियां, जिनके हकों की रक्षा के लिए मैं राजेन से लड़ती रही और फिर से मां बनने से इनकार कर दिया, अब परोक्ष रुप से दादी की दुत्कार का शिकार हो रही थीं। दादी चाहती थीं कि दोनों बहनें मिलकर भाई की सेवा करें, उसे टहलाने ले जाएं और भाई की खातिर खुद मन मारकर रहें, अपने लिए कुछ न मांगें। मैं परेशान हो गई। कभी बेटियों को लेकर बाजार निकल जाती और छोटी -मोटी चीजें भी दिलवा देती तो सास घर आते ही पूछतीं - ‘भाई के लिए कुछ नहीं लाई? बड़ा होकर यही तुम्हारी देखभाल करेगा, व्रत त्यौहार ससुराल से बुलाएगा, नेग देगा। इससे अच्छा बर्ताव करो, इसे खूब प्यार करो−खुद से भी ज्यादा।’ जब रानी और उसके बेटे के लिए चीजें खरीदती, पैसे खर्च करती मैं आजिज आ गई तो एक दिन मैंने राजेन से कह दिया कि बहुत हुआ, अब वे सबों को गांव वापस छोड़ आएं। यह सुनना था कि उन्होंने बेटियों के सामने ही मारपीट शुरू कर दी। शोर सुनकर रानी आई और मुझे वहां से ले गई। बोली −‘मुझे अब और कुछ नहीं चाहिए। मुझे एक बेटा मिल गया, इज्जत मिल गई, घर में जगह मिल गई.. और क्या चाहिए? मैं तो खुद ही गांव वापस जाना चाहती हूं, वहां सबों को अपना बेटा दिखाना चाहती हूं। उसकी सेवा कर - करके उसे बड़ा करना चाहती हूं। हां, पढ़ने का समय आए तो उसे भी बहनों की तरह शहर के स्कूल में पढ़ने और उनके साथ रहने का मौका मिलना चाहिए.. बाकी तो उसकी किस्मत है’ वह कह रही थी कि वह तो मेरे पांव धोकर पीने लायक भी खुद को नहीं मानती। वह सोच ही कैसे सकती है कि मेरे साथ मेरे घर में रहेगी और मेरी बराबरी करेगी। उस दिन रानी, जिसकी राजेन के सामने डर के मारे बोली नहीं निकलती थी, ऊंचे स्वर में बोली कि वह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि मेरा अपमान हो। वह खुद भी वापस गांव चली जाना चाहती है और राजेन उसे जल्दी -से -जल्दी गांव वापस छोड़ आएं। राजेन उसे ऊंचे स्वर में बोलते सुन, अवाक रह गए।

वे सब चले गए। मेरी ज़िंदगी धीरे -धीरे वापस पटरी पर आने लगी। राजेन को उम्मीद थी कि वे डिपार्टमेंटल एग्ज़ाम पास करके ऑफिसर बन जाएंगे पर वे पास नहीं हो पाए। मेरी इज़्ज़त नहीं करते थे तो खुलेआम कुछ कहते भी नहीं थे। गांव तो अब जल्दी-जल्दी जाना लाजिमी था ही, इतने सारे जश्न जो हुए! कभी मुंहजुठाई हो रही है, कभी जन्मदिन है, तो कभी मुंडन। मुंडन में तो मुझे भी जाना पड़ा। वहां मेरी छोटी बेटी को देखकर एक महिला बोली - “यही है भागवाली। इसी की पीठ पर भाई आया है” मेरे लाए महंगे-महंगे उपहार सबों को दिखाती सास बहुत खुशी से बोलीं - “मेरी अफसर बहू बहुत अच्छी हैं।”

तीन साल का होते ही शुभ - रानी का बेटा - मेरे पास आ गया। वह लाड़-प्यार में बिगड़ा गंवारू बच्चा था और मेरी बेटियां डिसिप्लिन में पली, पढ़ने - लिखने में अच्छी, सलीकेदार बच्चियां। पर रानी भी साथ आई थी और उसे गवारा नहीं था कि उसके बेटे को कभी डांटा जाए, अनुशासन सिखाया जाए या ज़बर्दस्ती पढ़ने को बिठाया जाए। मैं चाहती नहीं थी कि रानी साथ ही रहे। ऑफिस और कॉलोनी में दस तरह की बातें शुरू हो जाती थीं। फिर उसके रहते शुभ को कुछ भी सिखाना -पढ़ाना और उसे स्कूल के इंटरव्यू में पास करवाने लायक बना सकना नामुमकिन था। तो एक दिन जब राजेन घर पर नहीं थे, मैंने उसे समझाया कि वह शुभ को यहीं छोड़ कर गांव वापस चली जाए। वह मान गई। उसे भरोसा था कि शुभ की देखभाल मैं, तनु और अनु की तरह ही करूंगी। वह राजेन से जिद करके चली गई - हालांकि जाते समय बहुत रोई। शुभ भी उसे छोड़ना नहीं चाहता था। धीरे -धीरे शुभ बहनों के साथ हिलमिल गया। मैं उसे ट्रेन करने लगी। जन्म प्रमाणपत्र में पहले से ही राजेन ने मां की जगह मेरा नाम लिखा रखा था, जिसका मुझे पता तक नहीं था। जब मैं उसे स्कूल के लिए एडमिशन दिलाने ले गई और शहर के सबसे अच्छे और महंगे स्कूल में उसका दाखिला हो गया, राजेन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। शुभ साथ ही रहने लगा और मुझे मां कहने, मुझ पर अपना हक जताने में कोई परहेज नहीं करने लगा। उसकी उपस्थिति में उससे छह और सात साल बड़ी दोनों बहनों को भी अच्छा लगने लगा। एक बार फिर नियति ने मेरा प्लान उलट दिया। कहां तो मैं रानी को बच्चा पैदा करके देने वाली थी कि वह पाले, कहां उसका पैदा किया बच्चा मैं पाल रही हूं। अब तो मन में बस यही लगता है कि किसी तरह राजेन को रानी से दूर रखूं। वे मुझे और मेरी बेटियों को छोड़ें नहीं, भले ही मैं बदले में उनका बेटा पालती रहूं। वैसे भी शुभ का क्या कसूर.. बच्चे से कैसी दुश्मनी? अब मैं अपने लिए नहीं जीती। बस राजेन और बच्चों के लिए जीती हूं। अपने लिए बहुत जरूरी न हो तो कुछ नहीं खरीदती, बस बच्चों के लिए खरीदती हूं - खासकर शुभ के लिए! भले ही तनु, अनु को मन मारना पड़े, रानी का भरोसा टूटना नहीं चाहिए…तनु, अनु को पिता की छाया से वंचित नहीं होना चाहिए।’

सुमिता चुप हो गई। एक झटके से सन्नाटा छा गया।
सुमिता की आंखें नम थीं, उनमें आंसू भरे थे। मेधा की आंखें नम थीं पर उनमें गुस्सा भी था।
सुमिता सोच रही थी अपनी कहानी सुनाकर उसने तार्किक मेधा को चुप कर दिया है। ज़िंदगी तर्कों से नहीं अजस्टमेंट से चलती है। हर कोई वैसी ज़िंदगी नहीं पा सकता, जैसा सपना था.. और फिर मैंने तो शादी को लेकर कोई सपना देखा ही नहीं, सिवाय इसके कि पति मारे-पीटे नहीं.. तो देखो, मेरी कहानी सुनकर मेधा, वह मेधा, जो रिश्ते में किसी अन्याय की बात सोच-सुन ही नहीं सकती, आखिरकार चुप, ठोढ़ी पर हाथ दिए बैठी है न!
और मेधा? वह तो सोच नहीं पा रही थी कि अपनी बात शुरू कैसे करे। इस उलझी हुई, बेवकूफ लड़की− नहीं महिला− का क्या करे। सही है कि हर एक को वह सब मिलता नहीं, जिसके ख्वाब देखता वह बड़ा होता है, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि वह अपनी ज़िंदगी ऐसे उलझा ले। जो जैसा सामने है उसी को बिना सवाल अपनाता चला जाए..वह गुस्सा बर्दाश्त न कर पाने के कारण उठ खड़ी हुई। सुमिता सकपका गई। उसने मेधा का गुस्से से तना बेचैन मुंह और दर्द भरी आंखें देख, हड़बड़ाहट में पूछा−
‘क्या हुआ मेधा?’

‘खुद से पूछ न सुमि, मुझसे क्यों?’ मेधा ने तड़पकर कहा।
एक लंबी चुप्पी छा गई।

फिर सुमिता का वह कवच, जो ज़िंदगी में उसे घेरकर बांधे रखता था, मेधा की उपस्थिति में धीरे -धीरे टूटने लगा। सिर्फ अंदर से नहीं, बाहर से भी। उसकी नम आंखों से आंसू ऐसे बह निकले, जैसे कोई बांध टूटा हो। वह हिचक -हिचककर रोती हुई मेधा के कंधे से जा लगी। ‘अब क्या करूं मेधा, तू ही बता? क्या करूं अपना और बेटियों का? खुद मर जाऊं कि मार दूं उनको? शुभ का हर तरह से, अपनी बेटियों की कीमत पर ध्यान न रखूं तो राजेन मुझे जीने देंगे? क्या रोज पिटूं, तीनों बच्चों की बराबरी की बात करके?.. और राजेन को छोड़ दूं तो मुझे मेरी बेटियों समेत कौन अपनाएगा? अपनाएगा कोई?? क्या वे बिन बाप की नहीं हो जाएंगी??’

मेधा का मन हुआ कि सुमि को उसके खुद के रचे नरक में छोड़कर, अभी इसी क्षण भाग खड़ी हो। ये विद्रोह करने चली थीं घर से और बिन ब्याही मां बनना इनकी समाज सेवा थी.. अब कहां गया विद्रोह? अब क्यों नहीं कर पा रही बेटियों के हकों की रक्षा? अपनी बेटियों की कीमत पर सौतन का बेटा पालती है, पति से पिटती है, कोई विद्रोह नहीं कर पाती? पर मेधा के अंदर उठी क्रोध की लहर अनजाने ही बिखरने लगी। वह एक असुविधाजनक बेचैनी और असहायता की गिरफ्त में आ गई। रोती हुई अपने कंधे से टिकी खड़ी हिचक -हिचककर रोती सुमिता को उसने बाँहों से घेर, कसकर सीने से लगा लिया। सालों - साल अंतरंग रही वे दोनों, अंदर की किसी तरलता में पिघलती, फिर से किसी अपनेपन से घिर आईं।

मेधा, सुमिता को पुचकारने लगी।

‘चुप हो जा सुमि, चुप हो जा। ऐसे हार मत। अपना उपजाया दुख अपनी बेटियों पर ऐसे डाल मत। तनु, अनु के सुख की कीमत पर शुभ को सुखी मत कर। रानी -राजेन को खुश रखने के लिए खुद को, बेटियों को दुखी मत कर। कुछ सोच, कुछ तो सोच.. ऐसे मर मत।’
‘अपना मरना मैं महसूस नहीं करती। बस बेटियों के मन का मरना देख तड़पती हूं, उनके मरने से डरती हूं।‘सुमि आंखें पोंछती, धीरे से बोली− ‘और वैसे भी मेरे मरने का क्या! परंपरा को तोड़ने की कोशिश में ज्यादातर लड़कियां तो आखिर मारी ही जाती हैं− देह से, चाहे दिल से।’
अबकी वही दर्द मेधा ने महसूसा। ‘हां, सही तो है, देह से नहीं तो दिल से मरती हैं ज्यादातर। कम से कम मेरी और तेरी किस्मत में तो यही था। पर एक फर्क है सुमि! तुमने सरेंडर कर दिया, मैं आज भी डटी हुई हूं। भले अपनी सोच के अनुसार जीना चाहती रहकर दुखी रही, पति को कभी अपनी ज़िंदगी की स्क्रिप्ट लिखने नहीं दी। कइयों को ठुकराकर जिसे अपनाया, ठगी जाकर भी उसे कभी चैन से जीने नहीं देती। वह मुझसे प्यार नहीं करता है तो मैं उसे दुर्व्यवहार करने भी नहीं देती.. सोच की आजादी मैं छोड़ती नहीं, भले ही कर्मों की आजादी हासिल नहीं कर पाती। सही है कि धारा के विरुद्ध बहने वाले अपनी सारी ताकत खुद को साबुत बचा पाने में ही लगा देते हैं, सुख क्या भोगेंगे?’, कहती हुई मेधा कहीं खो गई पर कुछ क्षण बाद उसने खुद को कहते सुना। ‘हार मत सुमि, हार मत। भले ही दरवाजा बंद हो, खुलता न हो, उसे खटखटाना छोड़ मत। तनु, अनु और खुद की कीमत पर मत कर शुभ को, राजेन को प्यार।’

सुमिता का रोना पूरी तरह थमा नहीं था। आखिरकार उसांसें छोड़ती, कहीं खोई-सी सुमिता को छोड़, मेधा कुर्सी से उठ खड़ी हुई। अब वहां और बैठना नामुमकिन था। उसके अंदर कोई कह रहा था कि सुमिता का शिकार हो चुका है और वह शिकारी के चंगुल से आसानी से मुक्त नहीं हो पाएगी। क्या उसके अंदर कभी मुक्ति की कामना जगेगी भी? मेधा ने खुद से बार -बार पूछा, पर जवाब नहीं मिला। फिर उसने डरते -सहमते खुद से पूछा - ‘और मेरा क्या होगा? क्या मैं कभी बराबरी का जीवन जी पाऊंगी?’ और फिर से कोई जवाब नहीं मिला।

** (वागर्थः अक्टूबर 2012)
नीला प्रसाद
एफ-103, साकेत धाम
प्लॉट ई-10, सेक्टर -61
नोएडा-201307
ई मेल p.neela1@gmail.com
मोः 9899098633



परिचय

जन्म 10 दिसम्बर 1961 को रांची में हुआ। भौतिकी प्रतिष्ठा के साथ बी.एससी (ऑनर्स) करने के बाद ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान, रांची से कार्मिक प्रबंधन तथा औद्योगिक संबंध में पोस्ट ग्रैजुएशन किया।
छोटी अवधि के लिए जमशेदपुर में प्रबंधन की प्राध्यापिका रही। उसके बाद कोल इण्डिया लिमिटेड जॉइन करके उसकी विभिन्न अनुषंगी इकाइयों में रांची, दिल्ली तथा धनबाद पदस्थापित रही।
संप्रति दिल्ली में चीफ मैनेजर-एच.आर.

लेखन पिता की विरासत है।
दो कहानी संग्रहः ‘सातवीं औरत का घर’ तथा ‘चालीस साल की कुंवारी लड़की’ प्रकाशित। तीसरा कहानी संग्रह 'ईश्वर चुप है' शीघ्र प्रकाश्य।

लिखना बारह की उम्र से शुरु किया। पहली रचना सोलह की उम्र में ‘युवा कवि’ दिल्ली से प्रकाशित। कहानियां, कविताएं, नाटक और लेख लिखती रही पर यह सिलसिला बीच में सालों-साल के लिए टूट गया।
लेखन की दूसरी पारी की शुरुआत सन 2000 के आसपास। तब से अब तक राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में तीसेक कहानियां प्रकाशित।

दो वैचारिक लेख अं.हिं.वि.वि., वर्धा के स्त्री विषयक पाठ्यक्रम में।

पहले कहानी संग्रह ‘सातवीं औरत का घर’ पर आगरा वि.वि. में डिसर्टेशन थीसिस।
कहानियों का मराठी और तेलगु में अनुवाद।
कई कहानियां विषय विशेष से संबंधित संकलनों में चयनित-प्रकाशित तथा शोध में सम्मिलित।

1993 में प्रबंधन संबंधी लेख के लिए एन.आई.पी.एम. का यंग मैनेजर्स अवॉर्ड तथा कहानी संग्रह ‘सातवीं औरत का घर’ पर 2011 का विजय वर्मा कथा सम्मान। इसके अतिरिक्त स्कूल, कॉलेज, कंपनी स्तर पर कई दर्जन पुरस्कार।

संपर्कः
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p.neela1@gmail.com.
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