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कहानी - दर्द का रिश्ता / शालिनी मुखरैया

दर्द का रिश्ता

बैंक के काउंटर के आगे लाइन लगी थी .आज पेंशन का दिन था .इस कारण पेंशनरोँ की लम्बी कतार लगी हुई थी ,कई पेंशनर बैंक खुलने से पह्ले ही आ कर लाइन मे लग जाते थे, कुछ तो साथ मेँ अपना खाना पीना भी बाँध कर लाते थे .मानो पेंशन दिवस एक त्योहार हो.सब अपनी बारी का तसल्ली से इंतज़ार करते थे , आपस मेँ बतियाते हुए सब का समय व्यतीत होता था .एक महीने बाद मुलाकात होती थी तो सब के पास बताने को बहुत कुछ होता था .मेरी ड्यूटी पेमेँट काऊँटर पर थी , इस कारण गाहे बगाहे उन लोगोँ की बातेँ कानोँ मेँ पड्ती रह्ती थीँ . बुढापा अपने आप मेँ कोई बीमारी नहीँ है , मगर जब अपने साथ छोड देते हैं तो हिम्मत टूट जाती है.

अधिकतर बुजुर्गोँ की आँखोँ मेँ एक सूनापन झलकता था , किसी के बच्चे विदेश जा कर बस गये थे और् बूढे माँ बाप के लिये किसके पास वक़्त था . कुछ तो ऎसे थे जिनके बच्चे उन के साथ हो कर भी उन से बहुत दूर थे . वह उन लोगोँ के लिये और भी ज्यादा कष्ट्कारी था . हर सुबह शाम ज़हर का घूंट पी कर अपना समय काट्ना और भी ज्यादा बोझिल होता होगा . पता नहीँ कैसे औलाद इतनी स्वार्थी और मतलबी हो जाती है कि जिन माँ बाप ने उनको जन्म दिया है , उनको भी भुला देती है. न जाने क्योँ बच्चे यह भूल जाते हैँ कि एक दिन वो भी तो बूढे होंगे ,जवानी तो किसी का भी सदा साथ नहीँ देती है . आज जो बच्चे हैँ वो कल जवान होँगे और फिर भविष्य मेँ बूढे भी होँगे , समय का यही चक्र सदा चलता आया है .

मगर यह बात आज की पीढी की समझ मेँ नहीँ आती .

जीवन की सान्ध्यवेला मेँ अगर कोई साथी साथ छोड कर चला जाय तो अकेलापन और भी बढ जाता है.ऐसे मेँ मन का दर्द समझने वाला कोई हमदर्द मिल जाये तो दिल का बोझ हल्का हो जाता है.

सभी पेंश्नरोँ मेँ आपस मेँ एक दर्द का रिश्ता सा बन गया था , आपस मेँ एक दूसरे के दुख सुख की सुन कर एक दूसरे का बोझ ह्ल्का कर लिया करते थे . मेरा सदा प्रयास रह्ता कि किसी भी बुजुर्ग को बहुत ज्यादा देर लाइन मेँ न लगना पडे और उनका काम जल्दी हो जाय , मैँ उन्हेँ समझाती कि “ बाबा आप ATM कार्ड क्योँ नहीँ ले लेते .आप लोग भीड मेँ क्योँ परेशान होते हैँ

जारी ...........2-

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,ATM से आप लोगोँ को सुविधा भी रहेगी और यूँ लाइन मेँ लग कर परेशान भी नहीँ होना पडेगा .”

वे लोग मेरी नासमझी पर मुस्कुरा देते जैसे न जाने मैँने कौन सी बात कह दी हो.

”बिटिया तुम नहीँ समझोगी , जब ह्मारी उमर पर आओगी तब हमारी कसक को समझ पाओगी कि कितनी बेसब्री से हमेँ इस दिन का इंत्ज़ार रह्ता है.”

“अपने घर मेँ हम प्यार के दो बोल को भी तरस जाते हैँ , कम से कम इस दिन के इंतज़ार मेँ हम पूरा महीना इस उम्मीद मेँ तो बिता देते हैँ कि कोई तो है जिस से हम अपने मन की बातेँ बता सकेँ . इस उम्मीद के सहारे ही तो हम ज़िन्दा हैँ वर्ना तो कब के इस दुनिया को अलविदा कह चुके होते”.

मैँ मन ही मन उनकी भावनाओँ को समझने का प्रयास करती जिस सत्य की अनुभूति से मैँ अभी तक दूर थी . आखिर कोई न कोई रिश्ता तो हम सब के बीच था , शायद एक दर्द का रिश्ता .........................

 

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शालिनी मुख्ररैया

पंजाब नैशनल बैंक

मेडीकल रोड

अलीगढ

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