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स्मरण शक्ति बढ़ाने के अनुभूत उपाय - वैद्य राजेश कपूर

स्मरण शक्ति बढ़ाने के अनुभूत उपाय

जिवन में सफ़लता प्राप्त करने के लिये अच्छी स्मरणशक्ति होना जरूरी होता है। कहा जा सकता है कि बुद्धि, स्मृति जितनी अधिक हो जीवन में सफ़लता की संभावना उतनी अधिक बढ़ जाती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार हम सबके पास लगभग १०० करोड़ स्नायुकोष होते हैं। किन्तु हम काम केवल चार-पाँच करोड़ कोषों से लेते हैं। शेष सब प्रसुप्त अवस्था में होते हैं। जिनके १० करोड़ स्मृतिकोष काम करने लगते हैं वे आईन्स्टीन या न्यूटन बन जाते हैं। इन कोषों के जागने या क्रियाशील हो जाने पर बुद्ध, नानक, महावीर, तुलसी, कबीर बन सकता है। व्यास, नारद, पतंजली य श्री राम बन सकते हैं। सारे स्मृतिकोषों के जागृत हो जाने पर तो शायद सोलह कला सम्पूर्ण श्री कृष्ण बना जा सकता है।

हर व्यक्ति का जन्म इस सम्भावना के साथ होता है कि वह इसी जन्म में अपने सारे स्नायुकोषों को जगाकर स्वयं ईश्वर हो जाय, ईश्वर के समकक्ष हो जाय या उनके साथ साथ एकाकार हो जाय। शायद यही मुक्ति है, मोक्ष है, निर्वाण है, मानव जीवन की सार्थकता है, जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

आधुनिक विज्ञान तो यह कमाल अभी तक नहीं कर पाया पर हमारे पूर्वजों ने ऐसे उपाय खोजे थे जिनसे स्मरणशक्ति को असाधारण रूप से बढाया जा सकता है। योग, प्राणायाम, साधना, औषधियों, मंत्रों या ध्वनी तरंगों, यंत्रों तथा शक्तिपात अर्थात सिद्ध पुरुषों की कृपा से स्मरणशक्ति बढ़ाई जा सकती है ; सुप्त स्नायुकोषों को जगाया जा सकता है। अतिमानवीय क्षमताओं को जागृत किया जा सकता है।

कम आयु में, विद्यार्थी जीवन में सफ़लता बहुत अधिक मिलसकती है पर आयु बढ़ने के साथ यह क्षमता घटती चली जाती है। वास्तव में हमारी प्रजनन शक्ति की उर्जा से ही यह चमत्कार सम्भव है। इसलिये शुक्र की रक्षा करना, संयम पूर्ण जीवन, चरित्र रक्षा करना जरूरी है। तभी तो हमारे पूर्वजों ने २५ वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य का नियम बनाया होगा। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी संयम पूर्ण जिवन जीने के अनगिनत आदर्श भारतीय समाज में हैं।

पश्चिमी समाज के प्रभाव से हमारे समाज में भोगपूर्ण जीवनशैली को जितना अधिक बढ़ावा मिला है उतना अधिक हमारी युवा पीढ़ी, हमारे विद्यार्थियों का मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य खराब हुअा है।

अतः संयम व ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए निम्न उपायों को करने से स्मरणशक्ति बढ़ाने में बहुत सफ़लता मिलेगी।

# ॐ का उच्चारण पाँच मिनट या इससे अधिक समय तक प्रतिदिन करने से पाँच- सात दिन में ही स्मरण शक्ति बढ़ने लगती है। सभी रोगों में लाभ होगा। ॐ का उच्चारण करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिये।

कमर सीधी रखें। प्रातः या दिन में पूर्व दिशा की ओर तथा सायं काल या रात को उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठना अच्छा है। किसी कारण यह सम्भव न हो तो भी लाभ होगा।

ॐ का उच्चारण तीन भागों में होता है। अ, ऊ और म् । तीनों का उच्चारण मिलाकर क्रमशः करें। ॐ के प्रारम्भ में अ बोलते समय ध्यान नाभि व उसके नीचे रखें। ॐ के मध्य में ऊ का उच्चारण करते समय ध्यान छाती के मध्य में रखें। अंत में म् का उच्चारण करते समय ध्यान भृकुटी के मध्य में रहे तो परिणाम और अच्छे होंगे।

सुविधा हो तो शुद्ध ऊनी आसन या कुशा के आसन पर बैठें। सूती दरी या कपड़ा चल सकता है। आसन के बिना भी काम चल सकता है पर फ़ोम, नायलोन, कैशमीलोन, डैफ़ोडिल, सन्थैटिक कपड़े के आसन का प्रयोग न करें। फ़ोम की गद्दी पर मोटा सूती या ऊनी वस्त्र बिछा कर काम चलाया जा सकता है।

भोजन करने के कुछ बाद ॐ तो बोल सकते हैं पर भोजन के बाद डेढ़ - दो घण्टे तक ध्यन लगाने से बचें। वैसे ॐ का उच्चारण किसी समय भी, लम्बा या छोटा कैसा भी कर सकते हैं। प्रातः व रात को सोने से पहले मध्यम आवाज में नियमित रूप से करना उत्तम होगा। कुछ देर गहरी आवाज के साथ और फ़िर मानसिक जाप करें।

अमेरीका के चिकित्सा विज्ञानी प्रो. जे. मोर्गन ने साढ़े चार हज़ार असाध्य रोगियों का इलाज ॐ से करने पर प्रयोग किया था। उन्हें आश्चर्यजनक सफ़लता मिली थी। तबसे वे ॐ से रोगियों का इलाज कर रहे हैं। एम्स़ की डा. मंजरी त्रिपाठी व उनके एक और वरिष्ठ चिकित्सक के अनुसार ॐ के उच्चारण से हृदय रोग, उच्च रक्तचाप आदि अनेक रोगों में लाभ मिलता है।

नासा की खोज के अनुसार सूर्य से अनेक प्रकार की तरंगों, ऊर्जा, गैसों के अतिरिक्त विशेष प्रकार की ध्वनि भी प्रसारित होती है। वह विशेष ध्वनि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ है।

ॐ तथा गायत्री मंत्र के जाप से स्मरणशक्ति बढ़ने के अतिरिक्त बुरी आदतों से छुटकारा पाने व चरित्र निर्माण में भी भारी सहायता मिलती है।

# आहार का भी ध्यान रखना जरूरी है। तामसिक, बासी, अपवित्र, चरित्रहीन का बनाया व स्पर्श किया भोजन करने से बुरे विचार ही आते रहेंगे। तभी भारत में भोजन बनाने व खाने में पवित्रता व सफ़ाई को बहुत महत्व दिया जाता था। भोजन को जाति व छूआछूत से जोड़कर देखने की विकृति कब और कैसे आ गयी, यह तो पता नहीं चलता पर वास्तव में आहार की पवित्रता का प्रभाव हमारे मन व तन पर गहरा होता है, इसे हमारे पूर्वज अच्छी तरह से जानते व समझते थे। तभी तो संसार का एकमात्र देश भारत है जहाँ भोजन को बनाने व खाने के लिये शुद्धता व पवित्रता के विशेष नियम प्रचलित हुए। कच्ची- पक्की रसोई की परम्परा उसी का एकरूप है।

# एक विशेष बात यह भी ध्यान देने की है कि एल्यूमीनियम के पात्रों, फ़ाईल आदि के प्रयोग से स्नायुकोष और लाल रक्तकण नष्ट होने लगते हैं। अतः इनके प्रयोग से बचें। मैलामाईन, नानब्रेकेबल, प्लास्टिक के बने बर्तन भी हमारे लीवर, किडनी, स्मरणशक्ति व पाचनतंत्र को खराब करते हैं। थर्मोकोल , प्लास्टिक व पेपर कपों से कैंसर होने की चेतावनी अनेक चिकित्सा वैज्ञानिक दे चुके हैं। इसलिये इनसे बचने का प्रयास करें।

# स्वदेशी गाय का शुद्ध घी लाकर रखें। प्रातः और रात को सोने से पहले पाँव के तलुऔं में इस घी से ५-५ मिनेट मालिश करें, नाभी, गुदाचक्र, नाक व आँखों में लगाएं। आँखों से कुछ देर पानी बहेगा व कुछ देर तक कुछ धुंधला दिखाई देगा।

स्मरण शक्ति बढ़ेगी और पुराना सर दर्द व माईग्रेन तक अनेकों का इससे ठीक होता हमने देखा है। अबतक हजारों रोगियों पर इसका सफ़ल प्रयोग हम कर चुके हैं।

घी नकली हुआ तो नुकसान होगा।

ऐच ऐफ़ या जर्सी आदि विदेशी गोवंश का घी भी हानिकारक है, अनेकों शोधपत्रों से यह सिद्ध हो चुका है। अतः घी स्वदेशी गोवंश का हो जो दही जमाकर विधिवत बना हो।

घी की पहचान के लिये एक चम्मच घी बिना गर्म किये खायें। यदि सुखद लगे, पेट, मुंह या गले में कष्ट न हो तो घी ठीक होगा अन्यथा खराब होगा या नकली होगा।

मरोड़, दस्त, ज्वर, मासिकधर्म होने पर नाभी में घी न लगायें।

घी के स्थान पर शुद्ध बादामरोगन, सरसों के तेल, कड़वी खुमानी के तेल का प्रयोग कर सकते हैं। पर रिफ़ाईंड या नकली या हैक्ज़ेन से निकाले गये तेल का प्रयोग हनिकारक है। कड़वी खुमानी के तेल का प्रयोग गर्मियों में न करें।

इस प्रयोग से स्मरणशक्ति बढ़ने व सर दर्द ठीक होने के इलावा आँखें सुन्दर बनेंगी, सूखी खाँसी ठीक हो सकती है। पेट में गैस कम बनेगी व पाचन सुधरेगा, शरीर के अनेक रोगों में लाभ मिलेगा।

# हमारी सभी शक्तियों का मूल स्रोत हमारा शुक्र या रज है। इसी शक्ति से संतान का निर्माण होता है और इसी से हमारी गुप्त व सुप्त शक्तियों को जगाना संम्भव है। पुरुषों की इस प्रजनन शक्ति या ऊर्जा स्रोत को शुक्र या वीर्य कहा जाता है तथा स्त्रियों में यह रज के रूप में स्थित है।

आधुनिक चिकित्सकों को पता नहीं कैसे यह भ्रम हो गया है कि इस शक्ति को नष्ट करने से कोई हानि नहीं होती, लाभ होता है। जबकि विश्व के सुप्रसिद्ध आधुनिक चिकित्सा विज्ञानियों की खोज के अनुसार लेसीथीनम नामक इस पदार्थ से ही हमारे मस्तिष्क, पेशियों, अस्थियों व मज्जा का निर्माण हुआ है। इसके नष्ट होने पर बुद्धी, बल, सुन्दरता, स्वास्थ्य, प्रसन्नता सब नष्ट हो जाते हैं। अतः चरित्र की रक्षा के बिना किसी भी उपाय से स्मरणशक्ति की न तो रक्षा की जा सकती है और न ही स्मरणशक्ति बढ़ाई जा सकती है।

इस विषय कि सविस्तार जानकारी पाने के लिये इंटरनैट पर निम्न ई-पत्रिका पर निम्न लेख पढ़िये………

गूगल सर्च मे देखें pravakta.com इसमें लेखक सूचि में डा.राजेश कपूर के ऊपर क्लिक करेंगे तो लेखों की तीन पृष्ठ की सूचि सामने आयेगी। उन लेखों में चुनें “ब्रह्मचर्य की अद्भुत ऊर्जा” या दूसरा लेख देखें “कामवासना की अद्भुत ऊर्ज”

# यदि किन्ही भूलों के कारण आप अपनी ऊर्जा या शक्ति को गंवा चुके हों तो अब संभल जायें। गायत्रीमंत्र व ॐ का जाप करें, सात्विक भोजन करें और उस खोई शक्ति को फ़िर से पाने के लिये यह प्रयोग करें …………

सूखा आ़वला १०० ग्राम, शतावरी ५० ग्राम व कूजा मिश्री २०० ग्राम लाकर कूट-पीसकर मिलादें और काँच की शीशी या जार में रखें। प्रातः व सायं इसके २-२ चम्मच पानी से लें। सर्दियों में गर्म पानी के साथ लें। भोजन या जलपान एक - आध घण्टे बाद लें पर दूध, खीर, बर्फ़ी, खोया या मावा एक, डेढ़ घण्टे तक न लेना अच्छा है।

शुक्र, वीर्य बनेगा, बल बढ़ेगा, कमजोर दिल का कंम्पन, प्रदर रोग, स्वप्नदोष, पुरानी कब्ज, ऐसीडिटी व गैस आदि रोग ठीक होने लगेंगे। युवाओं के सफ़ेद होते बाल छः मास में काले, लम्बे व चमकीले हो जायेंगे। चेहरे पर लाली, सुन्दरता आने लगेगी। बूढ़ों की झुर्रियाँ मिटने लगती हैं।

पर काफी, चाय, फास्ट फूड, कोल्ड ड्रिंक, अण्डा या कोई भी नशे तथा गलत आदतें हों तो वे त्यागनी होंगी; तभी बात बनेगी। आदतें सुधारने में प्राणायाम व व्यायाम भी बहुत सहायक सिद्ध होते हैं।

# स्मरणशक्ति व स्वास्थ्य की रक्षा के लिये सब प्रकार के बोतल बन्द व पैकिट बन्द आहार तथा सब प्रकार का फास्ट फ़ूड बाधक है। ये सब हमारे स्वास्थ्य को बुरीतरह से नष्ट कर देते हैं। वास्तव में इनमें मोनोसोडियम ग्लुटामेट, डाईमिथाईल पालीसिलाक्सीन, बुटाईल हाईड्रोक्वीनोन (TBHQ), कैल्शियम सल्फ़ेट, कैल्शियमप्रोपियोनेट, सोडियम प्रोपियोनेट, अमोनियम क्लोराईड व अनेकों परमिटिड सुगंध तथा रंगआदि अनेक हानिकारक रासायनिक पदार्थ होते हैं।

मोनोसोडियम हमारे स्नायु कोषों को उत्तेजित करके नष्ट कर देता है। फ़लस्वरूप हमारी याद करने, समझने, सीखने की क्षमता निरंतर घटती चली जाती है। यही काण है जो कि फास्ट फ़ूड खाने वाले युवक- युवतियों के चेहरे व आँखें निस्तेज नजरआने लगते हैं। पढ़ने में वे निरंतर पिछड़ते जाते हैं। इन रसायनों से लीवर,किडनी, हृदय, तिल्ली आदि सभी अंग खराब होने लगते हैं।आलस व मोटापा बढ़ता जाता है। मधुमेह के रोगी बहुत बड़ी संख्या में इसी कारण बढ़ रहे हैं।

अतः स्मरणशक्ति व स्वास्थ्य की रक्षा के लिये हमें ये जंक आहार छोड़ना होगा।

पर यह इतना आसान नहीं है। ये ऐमऐसजी एक ऐडिक्शन है। अफ़ीम की तरह इसका नशा होता है। इसलिये इसे छोड़ने में काफ़ी मेहनत की जरूरत होगी। पीपल वृक्ष की छाल मुंह में रखकर चूसते रहने से काफ़ी सहायता मिलेगी। नशे छुड़वाने में यह बहुत लाभकारी है।

# किसी अच्छे शिक्षक से योग व प्राणायाम सीख कर नियमित अभ्यास करें। आहार व विचार सही होने पर शारीरिक व मानसिक क्षमतायें निरंतर बढ़ती जायेंगी।

# अकरकरा के फ़ूल, बच, कुलंजन ५०-५० ग्राम को कूट, छानकर कूजा मिश्री १५० ग्राम मिलाकर एक - एक चम्मच दिन में ३ बार चूसें। कुछ ही दिन में स्मृति बढ़ती नजर आयेगी। बतलाये गये परहेज याद रखें। आम, अमचूर, इमली आदि खटाई दवा के प्रयोग काल में न लें। आम या अमचूर का खट्टा पुरुषों के शुक्र को नष्ट करता है। इस प्रयोग से स्वर मधुर भी होगा। गाने वालों के लिये यह बहुत अच्छ है।

# लड़कियों व महिलाओं को लिये कुछ विशेष प्रयास करने होंगे। उनके शैम्पू व सौंदर्य प्रसाधनों में एक हजार से अधिक विषैले रासायनिक पदार्थ हैं। जिनके कारण उनके बाल, सुंदरता, स्वास्थ्य, बुद्धि व प्रसन्नता बरबाद हो रहे हैं। इन्हीं के कारण गर्भपात व बाँझपन तेजी से बढ़ रहा है। ये रसायन महिलाओं के प्रजनन तंत्र को भी रोगी व दुर्बल बना रहे हैं। इसलिये इन्हें बन्द करके अपने सौंदर्य प्रसाधन व अपना साबुन बनायें। (इसके लिये प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करनी होगी।)

# याद रखने की एक खास बात यह है कि हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं। हमारे विचारों के अनुसार हमारी अन्तःस्रावी ग्रंथियाँ या ऐन्डोक्राईन ग्लैंड हार्मोन स्राव छोड़ते हैं। उन रसों के प्रकार के अनुसार हमारा शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य बनता है। तभी कहा है कि हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं।

जरा विचार करें कि हम क्या सोचते हैं ? ध्यान देंगे तो पता चलेगा कि हम जो देखते, सुनते और पढ़ते हैं वही सब हम जाने या अनजाने में सोचते हैं। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे हम वही बनते चले जाते हैं जो हम सोचते है।

सोच को बदले बिना, ऊँची सोच के बिना हम बड़े नहीं बन सकते। और सोच को बदलने के लिये देखना होगा कि हम क्या देखते, पढ़ते व सुनते हैं। बुरे चित्र, बुरे दृष्य, हिंसा, बलात्कार, षड़यंत्र देखकर कोई भला आदमी कैसे बन सकता है ? हम व हमारे बच्चे टीवी, इंटरनैट पर हजारों हिंसा, बलात्कार, नग्नता, अश्लीलता, असभ्यता व छल-कपट के दृष्य देखते हैं। अखबारों व पत्रिकाओं में भी वही अश्लीलता, हिंसा व अपराध पढ़ते है़। यह सब कचरा भीतर डालते रहकर अच्छे व्यक्ती, विद्यार्थी का निर्माण कैसे सम्भव है ? मन की भूमि में विष बीज बोकर हम उत्तम फ़ल पाने की नासमझी किये जा रहे हैं। अच्छा देखें, सुने, पढ़ेंगे तो अच्छा सोचने लगेंगे। तब अच्छे हार्मोन बनने लगेंगे और हम तन व मन से स्वस्थ बनेंगे। इसलिये अच्छे चित्र कमरे में लगायें, अच्छी पुस्तकें पढ़ें, अच्छा सुनें और अच्छे लोगों की संगति करें। तब सबकुछ अपने आप अच्छा होने लगेगा।

पीजीआई चण्डीगढ़ के कार्डिऐलोजिस्ट प्रो. यशपाल शर्मा की खोज के अनुसार झूठ, फरेब करने से मस्तिष्क में इस प्रकार के हार्मोन बनने लगते हैं जिनसे कैंसर होने की सम्भावना होती है। उनकी खोज यह भी कहती है कि माता व पिता तनाव मुक्त व निर्भय हों तो उनकी संतान छः फुट कद की व खूब स्वस्थ होगी। फ़िर चाहे माता व पिता पाँच या साढ़े पाँच फुट के ही क्यों न हों।

इतना गहरा प्रभाव होता है हम पर हमारी सोच, हमारे विचारों का। तो स्वस्थ, सुन्दर, शक्तिशाली, बुद्धिमान बनना है ; दिव्य शक्तियों का स्वामी बनना है तो सबसे पहले हम अपने विचारों को बदलें। उसके लिये सही देखें, सही पढ़ें,सही सुनें और सही आहार लें। तब हम अपनी दिव्य व सुप्त शक्तियों को जगाने की साधना में हम सफ़ल हो सकेंगे और इसी जीवन में बहुत बड़े, बहुत महान बनकर अपना व सारे समाज का कल्याण कर सकेंगे।

आप अपने सुझाव, प्रश्न आदि निम्न पते पर भेज सकते हैं।

शुभाकाँक्षी,

वैद्य राजेश कपूर, व्हट्सऐप 7831840226 ,

ई मेल : dr.rk.solan@gmail.com

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