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सुशील शर्मा की 4 लघुकथाएँ

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लघु कथा -4

बछड़ा और लड़की


सुशील शर्मा
किशोरी लाल के घर दो दो खुशियां आने वाली थीं। पहली उनकी बहु को संतान होने वाली है और उनकी एक गाय भी जनने वाली है।
डॉक्टर ने उन्हें बताया था की कल उनकी बहु की कभी भी डिलेवरी हो सकती है इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे को बहु के साथ कल ही अस्पताल भेज दिया था।
आज सुबह वो जल्दी उठ गए थे वो अभी गुसलखाने से स्नान करके ही निकले थे की गाय ने रंभाना शुरू कर दिया। किशोरीलाल दौड़ कर सार में पहुंचे देखा गाय जन चुकी थी एवम बच्चे को प्यार से चाट रही थी। किशोरी लाल ने पास जाकर देखा गे ने बछड़े को जना था। किशोरीलाल का मन दुखा उनके मुँह से अचानक निकला "बछिया न जन सकी तुम "।
करीब सुबह आठ बजे उनका पुत्र मुंह लटकाये हुए आया बोला "पिताजी लड़की हुई है। "किशोरी लाल का मन बहुत दुखी हो गया उनके मुँह से फिर आह निकली "बहू लड़का न जन सकी तुम। "
कत्लगाह जाते बछड़े और ससुराल में जलती लड़कियों का दर्द उनके चेहरे पर स्पष्ट झलक रहा था।

लघु कथा -5

शौच की सोच


सुशील शर्मा
आज तहसीली कार्यालय में बहुत गहमा गहमी थी। सभी तैयारी में जुटे थे कलेक्टर साहब ,विधायकजी एवम सभी जन प्रतिनिधि आ रहे थे। आज इस तहसील को बाह्य शौच मुक्त तहसील का तमगा मिलने वाला था।
कार्यक्रम बहुत भव्य हुआ कलेक्टर महोदय ने स्वच्छता के बारे में शासन की प्रतिबद्धता एवम जन सहयोग के ऊपर उद्बोधन दिया। विधायक महोदय ने बहुत गर्व से घोषणा की कि आज यह तहसील बाह्य शौच से मुक्त हुई। कार्यक्रम समापन के उपरांत कलेक्टर महोदय वापिस जिला कार्यालय की और जा रहे थे। शहर के बाहरी छोर पर झुग्गियों के सामने से कुछ औरतें लोटा लटकाये चली आ रहीं थीं। कलेक्टर महोदय समझ गए उन्होंने गाडी रुकवा कर उन औरतों को समझाने की कोशिश की। कलेक्टर महोदय ने कहा "अब आप लोग बाहर शौच के लिए नहीं जा सकते ये एक सामाजिक बुराई है आप लोग अपने घर में शौचालय बनवायें "
उनमें से एक वृद्ध महिला बोली "बेटा हम एक किलोमीटर दूर से पीने के लिए पानी लाते हैं इस में दो लोटा में हमारा काम हो जाता है घर के शौचालय में तो एक आदमी को एक बाल्टी पानी लगता है और बेटा ये हमारा आंतरिक मामला है इसमें तुम न ही बोलो तो ज्यादा अच्छा है। "इतना कह कर वो सब औरतें मुँह बिचकाकर चली गईं।
कलेक्टर महोदय रास्ते में सोच रहे थे शौच का सोच बदलना इतना आसान नहीं है।

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कलयुग का सुख*


सुशील शर्मा

सोहनी ने दीपावली की रात को टोटका कर कुछ सिन्दूर अपनी पड़ोसन मोहनी के घर डाला सोचा उसकी कुछ परेशानी कम हो जायेगी।
रात को लक्ष्मी जी भ्रमण को निकली सोहनी की हरकत देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। लक्ष्मी जी सोचने लगीं दिन में तो इन दोनों के बीच बहुत मधुर व्यवहार रहता है लेकिन रात के अँधेरे में ये कैसा गलत व्यवहार?
लक्ष्मी जी ने सोहनी की परीक्षा लेनी चाही रात को उन्होंने सोहनी को स्वप्न में दर्शन दिए ।उन्होंने सोहनी से कहा *" बोलो सोहनी तुम्हें क्या चाहिए ?"*
सोहनी ने कहा *"मुझे कुछ नहीं चाहिए बस आप मोहनी को बहुत सारे दुःख दे दो।"*
लक्ष्मी जी ने कहा *"उसे दुखी क्यों देखना चाहती हो?"*
सोहनी ने कहा *"लक्ष्मीजी ये कलयुग है आपको नहीं मालूम कलयुग में इंसान सिर्फ दूसरे विशेष कर अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों के दुःख देख कर ही सुखी होता है।और कोई चीज उसे इतना सुख नहीं दे सकती।"*
लक्ष्मी जी सोहनी के जवाब से अभी तक सदमे में है।

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शिक्षा की व्यथा


सुशील शर्मा
मास्टर साहब बड़े गंभीर मुद्रा में कुर्सी पर बैठे थे। जिला शिक्षा अधिकारी का संचेतना पत्र आया था कि निरीक्षण के दौरान आपके विद्यालय में कम उपस्थिति पाई गई आप इस बारे में तीन दिवस के अंदर अपने स्पष्टीकरण भेजें। मास्टर साहब परेशानी में झल्लाये "मैं क्या उन्हें घर से घसीट कर स्कूल ले आऊं। "
गांव का स्कूल था बेचारे अकेले मास्टरजी 50 ,60 गरीबों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। अब मास्टर पढ़ाये ,भोजन बनवाये ,डाक बनायें या अपने घर के काम निबटाये।
कल कलेक्टर महोदय का दौरा है जिला शिक्षा अधिकारी ने मास्टर साहब की अच्छी हवा भर दी थी की अगर उपस्थिति कम रही तो खैर नहीं होगी। बेचारा मास्टर घबरा कर छात्रों के घर गया।
"क्यों रतिराम क्या हो रहा है ?"मास्टर साहब को आता देख रतिराम ने ओंटा पर बैठने के लिए फट्टा बिछा दिया "राम राम मास्टर साहब "
रतिराम तुम्हारे बेटा और बिटिया दोनों एक माह से स्कूल नहीं आ रहे हैं। " मास्टर साहब ने शिकायती लहजे में रतिराम से पूछा।
"उन्हें स्कूल भेजो नहीं तो परीक्षा में फेल हो जायेंगे " मास्टरजी ने डर दिखाया।
"ऐसो है मास्साब जित्तो पढ़ने थो उत्तो पढ़ लयो अब हमरे मोड़ा मौड़ी घर को काम कर हैं के किताबों में बिडे रहें। "
"हमाई बकरिएँ कौन चरे है और घर की रोटी पन्ना तो हमाई मोड़ी बने है तुम्हारी मास्टरनी तो ने बना देहे।"रतिराम के चेहरे पर गुस्सा झलक रहा था।
"फिर भी रतिराम पढ़ लिख कर बच्चे अच्छे गुण सीख जायेंगे जीवन में तरक्की कर हैं।"मास्टरजी ने अंतिम प्रयास किया।
" मास्साब तुमरो ज्ञान तुम्ही रखो हमारे मौड़ा मौड़ी सिर्फ वज़ीफ़ा और मध्यान्ह भोजन के लाने स्कूल जात है। पढ़ा लिखा कर दो कौड़ी के नै करने उन्हें।" रतिराम ने ऊँचा ज्ञान मास्टरजी को दिया।
"मास्साब हमारे बच्चों को बजीफा अभे तक नै मिलो का बात है कल कलेक्टर साहब से शिकायत करने पड़ है। "रतिराम ने चेतावनी देते हुए मास्टर साहब को चिंता में डाल दिया।
इधर मास्टर साहब रतिराम के बच्चों का वज़ीफ़ा बैंक में जमा कर रहे थे उधर बच्चे स्कूल में हुड़दंग मचा रहे थे।

संपर्क : - archanasharma891@gmail.com

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