बुधवार, 2 नवंबर 2016

व्यंग्य की जुगलबंदी-6 : अनूप शुक्ल

व्यंग्य की जुगलबंदी-6
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इस बार की व्यंग्य की जुगलबंदी का विषय था दीपावली। मौका और दस्तूर के हिसाब से पहले ही घोषित कर दिया था रविरतलामी ने विषय। अरविन्द तिवारी, रविरतलामी , निर्मल गुप्त, समीरलाल उर्फ़ उड़नतश्तरी और अनूप शुक्ल ने दीपावली के मौके पर व्यंग्य की जुगलबंदी में लेख लिखे। आइये लेखों का सार संक्षेप देखिये।

सबसे पहले Arvind Tiwari जी के लेख पर बात ! अरविन्द जी ने ’उफ़ दीवाली फ़िर आ गयी’ शीर्षक से लेख में उ.प्र. में हालिया समाजवादी पार्टी की चकल्लस से शुुरु करते हुये चीनी आइटमों के आतंक को समेटते हुये नकली खोये की बात भी कह डाली। कुल मिलाकर बहुत चकाचक लिखा । शतकीय पारी खेलने वाला खिलाड़ी जैसे विकेट के चारो तरफ शाट लगाता है वैसे ही हर तरफ खुलकर खेले शानदार तरीके से अरविन्द जी। अरविन्द जी के लेख के कुछ अंश:

१. मन में समाजवादी परिवार की तरह घमासान है और बैंक बैलेंस कश्मीर बॉर्डर की तरह लहूलुहान है।यूपी में माइक की छीना झपटी की तर्ज़ पर बैंक हमारी पेंशन से टीडीएस काट रहा है।उन्हें परिवार प्रेम डुबाना चाहता है तो हमारा परिवार प्रेम बटुए को ख़ाली करवाना चाहता है।

२.बच्चे कहते हैं दादाजी एटीम से रुपये निकालो। हम उन्हें चीनियों द्वारा एटीम हैक करने की कहानी सुनाना चाहते हैं पर हमेशा कहानी सुनने को उत्सुक रहने वाले बच्चे यह कहानी सुनने को तैयार नहीं हैं।चीनी आइटमों के विरोध के चलते दीपावली का खर्च बढ़ गया है।

३.बच्चों ने खोये का असली नकली परीक्षण घर में ही कर डाला।पिछले दो दिनों से हमारा घर केमिस्ट्री लेब बना हुआ है।हर बार परीक्षण में खोया नकली निकला।लौटाने गए तो हलवाई ने एक तख़्ती दिखा दी जिस पर लिखा था फैशन के इस युग में शुध्दता की उम्मीद न करें।

पूरा लेख और उस पर आई टिप्पणियां बांचने के लिए अरविन्द जी की वाल पर पहुंचे और 30.10.16 का लेख देखें।

 

रविरतलामी Ravishankar Shrivastava ने दीपावली एक दिन पहले ही मना ली। कारण भी था। मेरी तेरी के साथ उसकी दीवाली भी मनानी थी उनको। इस शीर्षक से लिखे लेख में सोशल मीडिया पर दीपावली के बारे में हुई हलचलों और कसमों का जिक्र करते हुये अपनी बात कहीं रवि जी ने। आखिर में अपना सीक्रेट भी बता दिया। उनके लेख के मुख्य अंश:

१. महीने भर पहले से ही तमाम सोशल-प्रिंट-दृश्य-श्रव्य मीडिया में मैंने विविध रूप रंग धर कर चीनी माल, खासकर चीनी दियों, चीनी लड़ियों, और चीनी पटाखों का बहिष्कार कर शानदार देसी दीवाली मनाने का आग्रह-पूर्वग्रह, अनुरोध-चेतावनी सबकुछ देता रहा था. चहुँ ओर से आ रहे ऐसे संदेशों को आगे रह कर फारवर्ड पे फारवर्ड मार कर, और जरूरत पड़ने पर नया रंग रोगन लगा कर फिर से फारवर्ड मार कर यह सुनिश्चित करता रहा कि कोई ऐसा कोई संदेश व्यर्थ, अपठित, अफारवर्डित न जाए.

२.सूरज डूब रहा था, थोड़ा अँधेरा हो रहा था और आसमान में रौशनी भी आम दिनों की तरह ही नजर आ रही थी, उजाला ज्यादा नहीं हो रहा था इसका अर्थ था कि जनता चीनी लड़ियों से मुक्त हो चुकी है और राष्ट्रीय संपत्ति, महंगी बिजली बचाने की खातिर अपने घर को रौशन करने के बजाए अपने मन-मंदिर को रौशन करने के लिए प्रतिबद्ध हो चुकी है. एक शिक्षित, समृद्ध राष्ट्र की ओर हम आज बढ़ चुके थे. विश्व की सबसे बड़ी शक्ति बनने से बस हम चंद कदम ही दूर थे. यूँ भी जनसंख्या के लिहाज से तो यह कदम और भी कम है. बहरहाल.

अचानक कहीं पड़ोस में एक पिद्दी सा फटाका फूटा. सोचा, इतना तो चलेगा. शायद पिछले साल का बचा खुचा पटाखा होगा, किसी ने चला लिया होगा. उधर थोड़ा अँधेरा और बढ़ा तो दूर रौशनी की कतारें थोड़ी दिखने लगी थीं. सोचा, किसी अज्ञानी ने, किसी प्रकृति-अप्रेमी ने बिजली की लड़ लगा ली होगी, और लगाई होगी भी तो देसी – चीनी नहीं.

३.और, बचा हुआ तो केवल मैं और केवला मेरा ही घर था. परंतु मैं क्या कोई कच्चा खिलाड़ी था? बिलकुल नहीं. मैंने भी स्विच ऑन कर दिया. और मेरा घर भी रौशनी से जगमग कर उठा. पिछले वर्ष की सहेजी लड़ियों को मैंने पहले ही टाँग दिया था, और तीन-चार दर्जन चीनी लड़ियाँ और उठा लाया था. चीनी सामानों के बहिष्कार के कारण डर्ट-चीप दाम में मिल रही थीं. जस्ट इन केस, यू नो! सही समय पर बड़ी काम आ गई थीं वे. कुल मिलाकर मेरा घर पूरे मुहल्ले में, पूरे शहर में सर्वाधिक रौशनीयुक्त, सर्वाधिक प्रकाशित घर हो गया था.

रविरतलामी जी का पूरा लेख और उस पर आई टिप्पणियां यहां बांच सकते हैं http://raviratlami.blogspot.in/2016/10/blog-post_62.html

 

समीरलाल उर्फ़ Udan Tashtari हमेशा उस बारे में बढिया लिखते हैं जो वे कभी करते नहीं। इस बार भी दीपावली के मौके पर सफ़ाई के किस्से बयान किये समीरलाल ने। उनके लेख ’दीपावली पर सफ़ाई’ में सफ़ाई के मौलिक सवालों पर गहन चिन्तन किया गया और करके लेख में ठेल दिया गया है। उनके लेख के मुख्य अंश:

१. अब अगर साल भर गंदा नहीं करोगे तो फिर भला साफ क्या करोगे? इसी धार्मिक बाध्यता के चलते साल भर पलंग के नीचे सामानों की भराई और अलमारी के उपर सामानों की चढ़ाई नित जारी रहती है.

ठीक दीपावली के पहले, कमरों में साल भर पलंग के नीचे खिसकाया और अलमारी के उपर चढ़ाया गया सामान पलंग के उपर पर निकाल कर रखा जाता है..फिर उसमें से बेकार का सामान और कचरा, छाँटा बीना और बाँटा जाता है और बाकी का साफ सूफ करके पुनः रख दिया जाता है.

२. जिज्ञासु मन मित्र से पूछ बैठा कि इतने सारे सामान की सफाई कैसे करते हो?
मित्र ने यह कहते हुए ज्ञान दिया कि अगर सफाई करनी है तो बस दो ही तरीके हैं..एक तो सारे के सारे सामान को कचरा मान कर एक जगह इक्कठा कर लो ..और फिर उसमें से जो अच्छा अच्छा काम योग्य हो, उसे निकाल कर साफ सूफ करके वापस जमा कर रख दो..बाकी का बचा सामान मसलन कटे फटे या छोटे हो चुके कपड़े, जूते, टूटे बरतन, सूटकेस आदि ...जो बांट दिये जाने योग्य है नौकर चाकर को देकर दानवीर की तरह मुस्कराओ और बाकी का बचा कचरे में बाहर निकाल फेंको.

दूसरा...सब सामान जैसे रखा हुआ है वैसा ही रखा रहने दो और उसमें से कचरा छांट छांट कर अलग कर दो..यह तरीका थोड़ा ज्यादा मेहनत माँगता है...मगर सामान को फिर से जमाने की झंझट भी तो कम हो जाती है.

३. इसका हालांकि दीपावली से कुछ लेना देना नहीं है,...इसमें तो बस जब भी किसी सांसद महोदय या मंत्री जी से समय मिल जाये - सफाई की घोषणा कर दो...कचरा मंगवाओ...कचरा फैलवाओ...कचरा झाडू से किनारे करते हुए सांसद महोदय या मंत्री जी के साथ..फोटो खिंचवाओ...अखबारों में छपवाओ और सोशल मीडिया पर चढ़ाकर मस्त हो जाओ..हैश टैग #CleanIndia.#स्वच्छभारत……..बस्स!

समीरलाल जी का पूरा लेख और उस पर आई टिप्पणियां यहां बांच सकते हैं https://www.facebook.com/udantashtari/posts/10154418982296928

 

निर्मल गुप्त जी Nirmal Gupta ने दीपावली के मौके पर लक्ष्मी वाहन उल्लू के माध्यम से अपनी कही। लेख का शीर्षक रखा -उल्लुओं का होना,बनना और बाज़ार की मांग। उल्लू बनें रहेंगे, उल्लूओं का बना रहना दुनिया के लिये जरूरी है, कुछ जन्मजात उल्लू होते हैं और कुछ उल्लू बना दिये जाते हैं इस तरह के विमर्श से युक्त निर्मल जी के लेख के मुख्य अंश:

१. उल्लुओं का इस दुनिया में बने रहना बड़ा ज़रूरी है।अनेक बिजनेस उन उल्लुओं के सहारे ही चलते हैं जो उल्लू होते हैं पर देखने में लगते नहीं।कोई उल्लू नहीं चाहता कि वे उस जैसा दिखे।दिखने में जोखिम है।दीवाली बोनान्ज़ा के नाम पर कोई उल्लू की आँख से निर्मित ‘नज़रिया’ बेच रहा है तो कोई उसकी हड्डी से बना मर्दानी ताकत का गंडा।कोई उसके खून से गंजी चाँद पर केश लहलहाने वाले उर्वरक की ‘मेक इन इण्डिया’ टाइप की फैक्ट्री जमाये है तो कोई उसके अवयव से शर्तिया लड़का पैदा करने वाला मनीबैक गारंटी वाले नुस्खे की सेल।दुर्लभ सपने मुँहमागी कीमत पर दिवाली टाइप तीज त्योहारों पर ही आसानी और श्रद्धाभाव से बिक पाते हैं।

२.पर्यावरणवादी उल्लुओं की निरंतर घटती जनसँख्या पर चिंतन निमग्न हैं।सुबह होती है तो उनके विमर्श की डाल पर घर-द्वारे से गुमशुदा गौरेया आ बैठती है।दुपहर में वे विडालवंशियों की घटती संख्या पर जनचेतना जगाते हैं।शाम होते न होते उन्हें सफ़ेद गर्दन वाले मुर्दाखोर गिद्ध याद हो आते हैं।

३.कुछ उल्लू जन्मजात होते हैं तो कुछ उल्लू बना डाले जाते हैं।समाज में जिसकी उपयोगिता होती है उनकी तादाद खुदबखुद बढ़ती है। चहचहाने वाली चिड़ियें लुप्त होती जा रही हैं पर इसकी किसी को फ़िक्र नहीं। वैसे भी पंछियों के कलरव की इस दुनिया को ज़रूरत भी नहीं। यह काम डिजिटल चिड़िया बखूबी कर लेती हैं।

निर्मल गुप्त जी का पूरा लेख और उस पर आई टिप्पणियां यहां बांच सकते हैं https://www.facebook.com/gupt.nirmal?fref=ts

 

अंत में अनूप शुक्ल का लेख। अनूप शुक्ल लगता है अभी तक सर्जिकल स्ट्राइक वाले जुमले से उबर नहीं पाये हैं इसीलिये दीपावली पर लिखे लेख का शीर्षल रखा -दीपावली मतलब अंधेरे के खिलाफ़ उजाले की सर्जिकल स्ट्राइक। अनूप शुक्ल के लेख के मुख्य अंश :

१. अंधेरे के खिलाफ़ ये उजाले की हल्ला बोल की प्रवृत्ति के पीछे बाजार की ताकत काम करती है। अंधकार पर रोशनी की विजय के नाम पर तमाम रोशनी के एजेंट अपनी दुकान लगाकर बैठ जाते हैं। इतना उजाला फ़ैला देते हैं कि आंख मारे रोशनी के चौंधिया जाती है। दिखना बंद हो जाता है। अंधेरे के ’अंधेरे’ से उजाले के ’अंधेरे’ में लाकर खड़ा कर देते हैं रोशनी के ठेकेदार। जब तक आपको कुछ समझ में आता है तब तक आपको लूटकर फ़ूट लेते हैं। आपको जब तक होश आता है तब तक आप लुट चुके होते हैं। जो लोग लुटने की शराफ़त नहीं दिखा पाते वे पिट भी जाते हैं।

२.अंधेरा कभी उजाले के खिलाफ़ साजिश नहीं करता। वह लड़ाई भिड़ाई भी नहीं करता उजाले से। जब उजाला अंधेरे पर हमला करता है तो चुपचाप किनारे हो जाता है। नेपथ्य में चला जाता है। जब उजाले की सांस फ़ूल जाती है अंधेरे से कुश्ती लडते हुये तब अंधेरा फ़िर से अपनी जगह वापस आ जाता है।

अंधेरे का बड़प्पन ही है कि वह उजाले घराने के किसी भी सदस्य को चोट नहीं पहुंचाता। वो एक शेर है न:

जरा सा जुगनू भी चमकने लगता है अंधेरे में,
ये अंधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है जी!

३. अंधेरे पर उजाले का जयघोष करने वाले कामना करते हैं कि दुनिया में सदैव उजाला बना रहे। अंधेर-उजाले के लोकतंत्र की जगह रोशनी की तानाशाही सरकार बनी रहे। यह कामना ही प्रकृति विरुद्ध है। यह तभी हो सकता है जब धरती सूरज का चक्कर लगाना बन्द कर दे। जैसे ही ऐसा कुछ हुआ, ग्रहों का सन्तुलन बिगड़ जायेगा। सौरमण्डल की सरकार गिर जायेगी। धरती पर प्रलय जैसा कुछ आयेगा। अंधेरे पर उजाले की विजय का हल्ला मचाने वाला इंसान अपने टीन टप्पर, अस्थि-पंजर समेत ब्रह्मांड के किसी कोने में कचरे सरीखा पड़ा रहेगा न जाने किसी आकाशीय पिंड का चक्कर लगाते हुये।

अनूप शुक्ल का पूरा लेख और उस पर आई टिप्पणियां यहां बांच सकते हैं https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209516305677988

बताइये कैसी रही इस बार की व्यंग्य की जुगलबंदी? :)
#व्यंग्यकीजुगलबंदी, #व्यंग्य,

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