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"जलधारा बहती रहे" में समकालीनता का सारगर्भित निदर्शन - सुरेश चन्द्र

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जलधारा बहती रहे में समकालीनता का सारगर्भित निदर्शन सुरेश चन्द्र, प्रोफेसर , हिन्दी विमाग, असम विश्वविद्यालय, सिलचर 788011, असम मोबाइल न0 9...

जलधारा बहती रहे में समकालीनता का सारगर्भित निदर्शन

सुरेश चन्द्र,

प्रोफेसर , हिन्दी विमाग, असम विश्वविद्यालय, सिलचर 788011, असम

मोबाइल न0 9612826588

suresh4dec@gmail.com

 

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जो व्यक्ति इतिहास की गहरी समझ रखता है वह भविष्य के प्रति चेतस रहता है और भविष्य के प्रति उसकी चेतसता समकालीनता के बोध से प्राणवान और सशक्त बनती है । भारतीय इतिहास में शोध उपाधि प्राप्त डॉ0 अपर्णा शर्मा हिन्दी की ऐसी साहित्यकार हैं जो उपर्युक्त बातों को चरितार्थ करती हैं । समकालीनता का सम्यक बोध आपकी रचनाधर्मिता को वैशिष्ट्रय प्रदान करता है । आपने साहित्य की विविध विधाओं में अनेक कृतियों की रचना की है । अपनी साहित्य की कृतियों में आपने स्वस्थ भविष्य के निर्माण के प्रयोजन से विदूप समकालीन जीवन-स्थितियों का बेहद यथार्थ चित्रण किया है । साहित्य-साधना में निरन्तर संलग्न डॉ0 अपर्णा शर्मा की अब तक प्रकाशित साहित्यिक कृतियाँ अग्रांकित हैं-‘खो गया गाँव” (कहानी संग्रह) ‘पढ़ो-बढ़ो” (नवसाक्षरों के लिये), ‘सरोज ने सँभाला घर' (नवसाक्षरों के लिये), 'चतुर राजकुमार" (बाल उपन्यास), "विरासत में मिली कहानियाँ (बाल कहानी संग्रह) ‘जागों बच्चों” (बाल कविता संग्रह), ‘मै किशोर हूँ (बाल कविता संग्रह), ‘नीड़ सभी को प्यारा है” (बाल कहानी संग्रह) ‘जल धारा बहती रहे’ (कविता संग्रह)। आपका शोध ग्रन्थ है-‘भारतीय संवतो का इतिहास" ।

प्रस्तुत अध्ययन के अन्तर्गत डॉ0 अपर्णा शर्मा की गद्य प्रकाशित काव्य कृति 'जल धारा बहती रहे" में निदर्शित समकालीनता पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है ।

समीक्ष्य कृति की पहली कविता का शीर्षक है-‘‘मेरी कविता" । यह कविता डॉ0 अपर्णा शर्मा की कविताई का वैशिष्ट्रय बयान करती है-सीधे और सरल अन्दाज में । सपाट बयानी और कोरी नारेबाजी के स्तर को प्राप्त हो चुकी कविता से एकदम अलग कविता रचती हैं डॉ0 अपर्णा शर्मा । बटाईदारों के बीच बँटने वाली खेत की उपज की तरह विभिन्न वादों में बँट चुकी कविता से अलग एक मुकम्मल कविता रचने में विश्वास रखती है। डॉ0 अर्पणा शर्मा । आपकी कविता के शब्दों और वाक्यों में युग-जीवन स्पन्दित होता है और वह तमाम विपरीतताओं के बीच भी सुख का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम है। दृष्टव्य है ‘मेरी कविता” की अगांकित पंक्तियाँ -

‘कविता है मेरी चिर अनंत

ढूँढो ना इसका आदि-अंत ।

हर अंकुर में छिपी हुई यह

आकाश भूमि पर विद्यमान ।

हर यौवन की यह है पुकार

हर जीवन का है छिपा सार ।

हर दिन को करती है सुखांत।

स्पष्ट है कि डॉ अपर्णा शर्मा की कविता में जीवन का सार अंतर्निहित है और ऐसा हो पाना तब तक सम्भव नहीं है जब तक कि मनुष्य-व्यवहार के विविध क्षेत्रों में घटित रचनाओं के अनुभव जगत् का अभिन्न हिस्सा न बने ।

भारत महापुरूषों की जन्म और कर्म भूमि रहा है । भारतीय महापुरूषों में महात्मा गाँधी का नाम उल्लेखनीय है । उनकी महानता इस बात में अन्तभूत है कि उनको राष्ट्रपिता जैसी अद्भुत पहचान मिली है । उनके विचार और कार्य मानवीय सरोकारों और नैतिक आदशों के परिप्रेक्ष्य में स्तर पर मान्य हैं । दो अक्टूबर और तीस जनवरी को क्रमशः उनकी जन्म और तिथि के रूप में आयोजन करके हर वर्ष मनाया जाता है । हमारे देश के उनके नाम पर संस्थाओं, योजनाओं और कार्यक्रमों को खूब महत्व दिया जाता है, परन्तु नागरिकों के जीवन-व्यवहार में उनके आदर्शों के लिये कोई स्थान नहीं है । गाँधी को राष्ट्रपिता वाले भारतीय समाज में घटित इस बिडम्बना को डॉ0 अपर्णा शर्मा ने "गांधी के झड़े के नीचे" शीर्षक अपनी कविता का विषय बनाया है । कविता की अग्रांकित पंक्तियों में अभिव्यक्त हुई इस विडम्बना को पढें -

‘गांधी के झंडे के नीचे/पलते भष्ट्राचार हैं ।

जनता सारी मूक हो गयी/कर्णधार लाचार हैं ।

इस कुर्सी की खातिर हमने/देखो क्या-क्या खेल किया ।

आतंकी, काला बाजारी/लूट-पाट से मेल किया ।

यहाँ बेबसी, वहाँ बेबसी/प्रजातन्त्र की हार है ।”

अग्रजों और पूर्वजों से बहुत बार सुना है कि- अतीत सबको अच्छा लगता है। अतीत का अच्छा लगना बेशक मानव-सभ्यता के विकास पर प्रश्न-चिहन है, परन्तु समकालीन जीवन-स्थितियों में यह सौ प्रतिशत सत्य हैं। मानवपन की श्रेष्ठता को चरितार्थ करने वाला जो मूल्यबोध अपनी सहज-सरल प्रकृति के साथ समाज-तन्त्र में घटित होता था, आज वह जीवन से बाहर हो गया है । आज की नयी पीढ़ी, जिसे युवा समाज कहना ज्यादा उचित है, जिस सोच को लेकर जीवन-मार्ग पर अग्रसर हो रही है उसमें अधिकार भावना तो है कर्तव्यबोध नहीं है, प्राप्ति की व्यग्रता तो है त्याग की सदाशयता नहीं है, बढ़ने की बेचैनी तो है दूसरों को बढ़ाने के लिये अपेक्षित सहयोग की इच्छा नहीं है, मशीनीकरण तो है इन्सानियत नहीं है, व्यष्टि के प्रति चेतसता तो है, समष्टि के प्रति सम्वेदना नहीं है। इसीलिये डॉ0 अपर्णा शर्मा के अन्दर अधिकार भावना तो है विद्यमान सर्जक मनुष्य जब इस मूल्यहीनता के रू-ब-रू होता है तो उन्हें अपने अतीत की अच्छाई याद आती है और वे ‘तुम क्या जानो ?” शीर्षक कविता में वर्तमान को स्वर देने के साथ-साथ अतीत को भी शब्दबद्ध करती हैं । कविता में कवयित्री ने बेटी को सम्बोधित करते हुए हमारे वर्तमान का सच अग्रांकित पंक्तियों में बयान किया है –

. 'बिटिया रानी तुम क्या जानो. बचपन की वे अजब कहानी ।

तुमने तो देखा है कमरा. देखी है फलैटों की दुनिया ।

बंद कमरे में टीवीदेखा. सीखा है कम्प्यूटर तुमने ।

भारी भीड़ में धक्का देकर. खुद आगे बढ़ना सीखा है ।

मोटर की पीछे हो दौड़ी. बहुमंजिल चढ़ना सीखा है ।

मोटा चश्मा लगा नाक पर. बस पुस्तक पढना सीखा है ।''

जो अपेक्षित है, परन्तु उसे आज की पीढ़ी सीखना और अपनाना नहीं चाहती, कवयित्री ने उसको कविता में आगे लिखा है । कवयित्री ने आगे जो लिखा है उसे पढ़े और समझें

"गिरते को दे हाथ सहारा, बीच सड़क से पार लगाना ।

दादी के मन्दिर की डलिया, हौले से उन तक पहुँचाना।

बाबा के चश्मे से तुमने, देखी नहीं बड़ी आकृतियाँ।

डांट अगर मुझको दे भाई, दादा का उस पर गुर्राना।“ 4

अपने अतीत और वर्तमान का डॉ0 अपर्णा शर्मा की मूल्यों के प्रति चेतसता का परिचायक है। कवयित्री की यह चेतसता देश और काल की परिधियों का अतिक्रमण कर सार्वभौम और सार्वकालिक मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा करने वाही है।

पर्यावरण संरक्षण हमारे समय का बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है । लाभ की अन्तहीन भूख और सम्वेदना शून्य विकास के स्वप्नद्रष्टा लोग प्रकृति की हानि करने में योजनाबद्ध ढ़ग से संलिप्त हैं | शहरीकरण के नाम ऐसा परिवर्तन हुआ है कि जहाँ पर लहलहाती फसलें होती थीं वहाँ अब कंक्रीट, सीमेंट और लोहे से निर्मित भवनों और सड़कों का जाल दिखायी देता है । विकसित सभ्यता का भ्रम पैदा कर रही भौतिकता की अन्धी दौड़ में मनुष्य प्रकृति के सुरम्य और स्वास्थ्यवर्धक परिवेश में भाँति-भाँति के प्रदूषणों को जन्म दे रहा है । पर्यावरण चेतस् लेखक श्री किशोरी लाल व्यास "नीलकठ' ने इस सन्दर्भ में चिन्ता व्यक्त करते हुए लिखा है कि “स्वतन्त्रता के पश्चात् अनेकानेक कारणों से हमारे देश में वनों का भारी विनाश हुआ है ।

50% वनाच्छादित राष्ट्र की केवल 11% भूमि पर ही वन है और ये जंगल भी तीव्र गति से समाप्त होते जा रहे हैं । यह अत्यन्त शोचनीय बात है । इससे हमारा पर्यावरण सन्तुलन गड़बड़ा गया है, ऋतु-चक्र बाधित हो गया है, नदियाँ-झरने-सरोवर सूख रहे है और हर वर्ष वातावरण में गर्मी बढ़ती जा रही है ।” इतना ही नहीं प्रकृति के साथ मनुष्य की बेतहाशा छेड़छाड़ के कारण माउण्ट एवरेस्ट का कद भी कम हो गया है । "चीनी ब्यूरो ऑफ सर्वेयिंग एण्ड मैंपिग मानता है कि दुनिया के सर्वोच्च शिखर की ऊँचाई 12 मीटर घट गयी होगी ।"

डॉ0 अपर्णा शर्मा प्रकृति के साथ घटित हो रही अनहोनी और उसके दुष्परिणामों से पूरी तरह बाखबर हैं। आपने अनेक कविताओं में पर्यावरण विषयक अपनी चिन्ता को व्यक्त किया है । इस सन्दर्भ में आपकी ‘गाज गिरती है" और ‘कही कहानी' शीर्षक कविताएँ उल्लेख्य हैं ।

‘गाज गिरती है” कविता में कवयित्री ने बिल्कुल सही लिखा है कि

"भौतिक सुख से घिरा है मानव

प्राकृतिक दृश्य अलभ्य हो रहे ।

उषा की लालिमा किधर है

इसकी पहचान नहीं मिलती ।”

"कहो कहानी' कविता के अन्तर्गत डॉ0 अपर्णा शर्मा ने ग्राम देवता का हाल-चाल जानने के बहाने से विकास के नाम पर हमारे जीवन में कम होते प्रकृति-सुख के विषय में अपनी चिन्ता को स्वर दिया है | यथा -

'धरती को माँ कहने वाले

ग्राम देवता हुआ तुम्हें क्या ?

X X X X

भागीदारी बने हो देखो

तुम विकास के परिहास में ।

शीतल दुग्ध चाँदनी छूटी

खोये मरकरी के प्रकाश में ।'8

संतप्त बचपन समकालीन मानव-समाज का ऐसा दुखद सच है जिसे विश्व-मंच पर महसूस किया जाता है । भारत के श्रीयुत् कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की सुश्री मलाला यूसफजई को मिले वर्ष: 2014 ई0 के नोबेल पुरस्कार से संप्तप्त बचपन विषयक वैश्विक चिन्ता का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है । भारत और पाकिस्तान की दोनों महान हस्तियों को यह पुरस्कार उनके द्वारा किए जा रहे बाल-दमन-उन्मूलन विषयक उपक्रमों की सार्थकता को ध्यान में रखकर दिया गया है।

बचपन में छिपी भावी युवा शक्ति ही किसी समाज और राष्ट्र के विकास का वास्तविक आधार होती है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि समाज और राष्ट्र अपने बच्चों को उचित पोषण दे और उनके मानवाधिकारों का हनन न होने दें । रचनाकार परिवार, समाज, राष्ट्र और को बच्चों की दुर्दशा से अवगत कराकर व्यवस्थापकों को बच्चों के प्रति उनकी जिम्मेदारी का कराने में महती भूमिका निभाते है। । डॉ0 अपर्णा शर्मा बाल हितों के प्रति बेहद सम्वेदनशील और प्रतिबद्ध हैं। । आप अपनी कविताओं में समकालीन बाल-जीवन की विदूप स्थितियों का चित्रण करके व्यवस्थापकों को बच्चों के हित मे कुछ अच्छा करने की सीख देती हैं । इस सन्दर्भ में आपकी "दिन का प्रारम्भ” और ‘वह लड़का" शीर्षक कविताएँ पठनीय है ।

"दिन का प्रारम्भ" कविता में कवयित्री ने अभाव और गरीबी की मार खाये बच्चों के जीवन की कठिनाई की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हुए कचरे के लिये लड़ते हुए मासूम बच्चों का दृश्य प्रस्तुत किया है । यथा

"मेरे दिन का प्रारम्भ होता है

X Χ X X

गली के नुक्कड़ पर लगे

कचरे के ढेर के साथ ।

उस पर कचरे के लिये लड़ते

मासूमों को देखना

प्रतिदिन का क्रम बन गया है"

"वह लड़का" कविता में डॉ0 अपर्णा शर्मा ने एक ऐसे भूखे बच्चे का परिस्थिति-चित्र प्रस्तुत किया है जो धनवानों और व्यवस्थापकों के बीच रोटी पाने की चाह लेकर भटक रहा है । कविता की अग्रांकित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं –

वह काली आँखों / और घुंघराले बालों वाला लड़का

फटी कमीज और मैले निक्कर वाला लड़का

х X X X

धुओं उड़ाती दौड़ती गाड़ियों को/दृकुर-टुकुर निहारता वह लड़का

भाषण दे रहे नेता को /पुलिस मैन की गालियों को

पान की दुकान पर बजते गानों को/सुनता-गुनगुनाता

अपने ही ख्यालों में खोया वह लड़का/.रोटी चाहता है ।"10

चिन्तन और लेखन की दृष्टि से हमारा समय विमर्शों का युग है । दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, पर्यावरण, नारी आदि विमर्शों की ऑधी आयी हुई है। जैसी कि मनुष्य की प्रवृत्ति बन चुकी है कि वह प्रत्येक स्थिति का स्वयं के पक्ष में, दुरूपयोग ही अधिक करता है और अच्छाई को बुराई में बदल देता है। आजकल विमशों के तंत्र में भी यह प्रवृत्ति पूरी तरह से प्रभावी है । डॉ0 अपर्णा शर्मा ने विमशों के कारण विकसित सामाजिक-सांस्कृति चिन्ताओं और मानवता के खतरों को बारीकी से समझी हैं । आप विमर्शों के दुरूपयोग से स्वस्थ्य जीवन-संस्कृति को विकृत नहीं होने रही हैं कि विमर्शकों के तेवर जीवन की सहजता से मेल नहीं खा रहे हैं । इसलिये स्वयं नारी होते हुए आप नारी जीवन के हित में नारी विमर्शकों को सलाह देती हैं कि वे नारी को जीवन की सहज राह पर चलने दें. वे नारी को भटकाव का मार्ग न दिखाएँ। दृष्टव्य है आपकी “न बूझो” कविता की अग्रांकित पंक्तियाँ –

सहज चलने दो अपनी राह

नारी विमर्शियों/न बूझो उसकी चाह ।

तुमने उठाया पर्दै का प्रश्न/वह हो रही निवर्सन ।

X Χ X X

तुमने चाहा विकास में बढ़ाये हाथ/उससे गया अपनों का साथ ।

X X X X

नारी शुभ चिन्तकों ने उठा दिये वेश्यालय/भोजनालय बन गये वेश्यालय ।

न दो ऐसी राह कि रास्ता ही भटक जाय/न दो ऐसी चाह कि

नारीत्व ही भूल जाय ।

X X X X

वह स्वयं जानती है/ वह अवसरों को खूब पहचानती है।“

कविता की ये पक्तियां स्पष्ट: कर देती हैं कि नारी स्वयं के बारे में अच्छा-बुरा सब जानती हैं । यह उपयुक्त निर्णय लेने में सक्षम हैं । दुनियाँ की सफल नारियों के उदाहरण इस तथ्य को प्रमाणित भी कर देते हैं । । मुझे विश्वास है कि डॉ० अपर्णा शर्मा की यह कविता नियति में खोट लेकर विमर्शों की झंडाबरदारी करने वालों को सही राह पर लाने में सार्थक भूमिका निगायेगी और मानवोचित संस्कारों में आबद्ध समाज के स्वस्थ स्परूप के संरक्षकों को आगे आकर समाज को जंगल बनने से बचाने के लिये प्रेरित करेगी ।

कैसी अन्तर्विरोधी जीयन दृष्टि विकसित हो चली है कि एक ओर तो व्यक्ति विश्वग्राम की बात कर रहा है और दूसरी ओर अपने निकटस्थ पडोसी से मधुर सम्बन्ध नहीं बना पाता । आज की पीढ़ी ने पड़ोस के महत्व को झुठला कर जिस असामाजिकता को पैदा कर लिया है इसके चलते विश्वग्राम की अवधारणा स्वयं प्राणहीन हो गयी है । डॉ0 अपर्णा शर्मा अपनत्वशून्य हो रहे आस-पड़ोस के सम्बन्धों को लेकर हैरान होती हैं, क्योंकि आपको इस सम्बन्ध-हास में सम्बन्ध-निर्वाह की पुरानी सुखद सामाजिक परम्परा के हास का बोध होता है । किसी भी सामाजिक व्यक्ति को सोचने के लिये विवश कर देने वाली अपनी हैरानी को व्यक्त करने के लिये आपने "मैं पड़ोसी हूँ' शीर्षक से एक कविता लिखी है । अपनी नितान्त मानवीय मनोदशा को व्यक्त करते हुए आपने कविता में लिखा है कि

‘मैं निकट पड़ोसी हूँ/मेरे करीब के घर में

आज शायद कुछ/अनिष्ट हुआ है ।

मैं शरीक तो होना चाहता हूँ उसके गम में

केवल लटके चेहरे के साथ/दुखित हृदय से नहीं ।

Xx x x x

मैं हैरान हूँ/ यह सोच कर-

. जिस पड़ोस को मेरे पुरखों ने / बरसों से निबाहा था

कब और कैसे मैंने उसे खो दिया?

कब और कैसे मैंने उसे खो दिया?

मैं निकट पड़ोसी हूँ/ पड़ोसी के सुख-दुःख बाँटने के / सम्बन्धों रहित ।.

हमारे देश में रचनाकारों की स्वस्थ परम्परा रही है । ऐसे रचनाकार इस देश में हुए हैं जिन्होंने स्वयं को त्याग के शीर्ष पर अवस्थित करके मानवीय सरोकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को आकार दिया है । कबीर ने अपनी प्रतिबद्धता को आकार दिया है । कबीर ने अपनी प्रतिबद्धता को वाणी देते हुए स्वयं कहा था कि -

“सुखिया सब संसार है, खाबै अरू सोवै । ।

दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै ।"

जन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का उद्घटन करते हुए नागार्जुन ने 10 जून, 1975 ई0 को सत्ता पक्ष को ललकारते हुए कहा था कि

‘जन कवि हूँ क्यों चाटुंगा मैं थूक तुम्हारी,

श्रमिकों पर क्यों चलने दूँ बंदूक तुम्हारी ?”

आज स्थिति बदल चुकी है। रचनाकारों के उद्देश्यों और प्रतिबद्धताओं में विकार आ गये हैं । रचनाकारों की दृष्टि अब सर्जन से पहले पुरस्कारों पर जाती है । रचनाधर्मिता के उद्देश्य से भटके पुरस्कार झटकने की फिराक में लगे रहने वाले रचनाकारों द्वारा दारू-पार्टियों का आयोजन आम बात हो गयी है । ऐसे रचनाकारों द्वारा खुशामदी अन्दाज में लिखी जा रही रचनाओं का लोककल्याण से भटकी सरकारों पर कोई प्रभाव नही पडता है । डॉ० अपर्णा शर्मा ने रचनाकारों के इस चिन्ताजनक पतन को ''शासन नहीं विखंडित होता.. शीर्षक कविता में पूरी सच्चाई के साथ उजागर किया है । यथा-

''शासन नहीं विखंडित होता. दास कबीरा कभी न रोता ।

ऑख मूँदकर तुम सोये हो. तान चदरिया वह भी सोता ।

सरकारें अब लटक रहीं है. उद्‌देश्यों से भटक रही हैं ।

X x x x

उठो कवि तुम कब से सोये. बस मीठे सपनों में खोये?

छलका जाम रात भर तुमने. देखा नहीं किसी को रोता ।

कैसे जागृत हो समाज यह. जहां स्वयं ही कवि है सोता ?'. ''

भारत में गंगा नदी का विशेष महत्व है | यह भारतीयों को विविध प्रकार जीवन प्रदान करती है । गंगा के सम्बन्ध में मान्यता कुछ भी हो परन्तु सच यह निकलती है और समुद्र में मिल जाती है । यह हम सब जानते हैं कि गंगा को मुनाफाखोरों और अन्धविश्वासियों ने बुरी तरह से प्रदूषित कर दिया है । गंगा के साथ कोई वह बिना किसी भेदभाव के सबको समान रूप से जल देती हैं । जब गंगा आपको संकुचित धारणा का वाहक नहीं बनाती तो फिर उस पर कोई अपनी तुच्छता कैसे आरोपित कर सकता है । यदि कोई ऐसा करता है तो उसे उसकी मानसिक विकृति ही कहा जायेगा और उसे सामासिक संस्कृति वाले समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता है । डॉ0 अपर्णा शर्मा सामासिक संस्कृति विषयक भारत के वैशिष्ट्रय की सजग प्रहरी हैं । अपनी व्यापक सोच के तहत आपने “अविरल गंगा” शीर्षक कविता में गंगा के महत्व और उसकी वर्तमान स्थिति का वर्णन करते हुए जहाँ एक ओर उसे साम्प्रदायिकता से मुक्त रखने का मुद्दा उठाया है तो दूसरी ओर उसे गंदा न करने का बेहद प्रासंगिक आहवान किया है । यथा -

'भगवा से क्यों बाँध रहे हो गंगा सबकी थाती है ।

भेद न करती जाति धर्म का सबको नीर पिलाती है ।

नहीं बहाओं बिष्टा इसमें माँ की निष्ठा रहने दो ।"

་་་་་་་་་་་་་་་་་་

काश ! गंगा को माँ मानने वाले भारतीय समाज के लोग डॉ. अपर्णा शर्मा की इस कविता में अभिव्यक्त उनकी गंगा विषयक सात्विक सोच को समझें और अपनी पूज्य माँ के जल को विष्ठा, अस्थि, कचरा आदि से प्रदूषित न करने का संकल्प लें।

उपर्युक्त अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि डॉ0 अपर्णा शर्मा कृत "जलधारा बहती रहे" शीर्षक काव्य कृति में समकालीनता का सारगर्भित निदर्शन हुआ है ।

 

सन्दर्भ:-

1.जलधारा बहती रहे, डॉ0 अपर्णा शर्मा, साहित्य संगम, लूकरगंज, इलाहाबाद, संस्करण : प्रथम, 2014, पृ0 01 |

2 उपर्युक्त, पृ0 02 |

3 उपर्युक्त, पृ0 11 ।

4 उपर्युक्त ।

5 हरित वसुन्धरा, अप्रैल-जून, 2005, सम्पादक : डॉ0 मेहता नागेन्द्र सिंह, 0/50 डाक्टर्स कॉलोनी, ककड़बाग, पटना-800 020, पृ0 07 |

6 उपयुक्त, पृ0 44 (पर्यावरण-समाचार-आलोक कुमार) |

7 जलधारा बहती रहे, डॉ0 अपर्णा शर्मा, पृ0 13 ।

8 उपर्युक्त, पृ0 62 |

9. उपर्युक्त. पृ० 21 ।

10 .उपर्युक्त. पृ० 27 ।

11 -उपयुक्तका, पृ० 29 ।

12 .उपर्युक्त. पृ० 37 एवं 38 ।

13 .कबीर ग्रंथावली संपादक : श्यामसुन्दर दास, प्रकाशन परिवार द्वारा प्रकाशित, संस्करण : २००८ (पुनर्मुद्रण : २०-, पू० 57 1

14 नागार्जुन रचनावली 2, सम्पादन-संयोजन-शोभाकान्त. राजकमल प्रकाशन प्रा० लि.. --बी, नेताजी सुभाष मार्ग. नई दिल्ली-१ 1०००७. संस्करण : २००३ पहली आवृत्ति : 2०1 1). पृ० 94 ।

15 .जलधारा बहती रहे. डॉ० अपर्णा शर्मा. पृ० 54 ।

16.उपर्युक्त, पृ० 68

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कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian 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रचनाकार: "जलधारा बहती रहे" में समकालीनता का सारगर्भित निदर्शन - सुरेश चन्द्र
"जलधारा बहती रहे" में समकालीनता का सारगर्भित निदर्शन - सुरेश चन्द्र
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