शनिवार, 26 नवंबर 2016

शब्द संधान / पंडा परिवार / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

 

नहीं, मैं किसी विशेष पण्डे के परिवार की बात नहीं कर रहा हूँ। हर पण्डे का कोई न कोई परिवार तो होता ही होगा। लेकिन मैं किसी के व्यक्तिगत जीवन में भला क्यों जाऊं? मैं फिलहाल सिर्फ शब्द, पंडा, से आत्मीय परिचय करना चाहता हूँ।

पंडित, पांडे, पंडा, पंडाल – ये सब एक ही परिवार के सदस्य हैं। जो पंडित है वही पंडा होने का हकदार है; और कभी कोई पंडितों का सम्मलेन हो तो ज़ाहिर है वे किसी न किसी पंडाल में ही एकत्रित होंगे। पंडा होने की पहली शर्त है की वह पंडित हो. पंडित अर्थात विद्वान, ज्ञानवान, ज्ञाता। शायद इसीलिए स्कूल के अध्यापकों को अक्सर पंडित जी नाम से पुकारा जाता है। मुझे याद है कि स्कूल के दिनों में मेरे एक अध्यापक थे जिन्हें हम पंडित जी कहते थे। बाद में पता चला की वे ब्राह्मण थे इसलिए पंडित जी कहलाते थे. किसी ज़माने में ब्राह्मणों का काम अध्ययन अध्यापन ही था. सभी ब्राह्मण पंडित होते ही थे। लेकिन बाद में जातिवाद के चलते ये ब्राह्मण एक जाति-वर्ण बन गया। बात पंडों की हो रही थी। कुछ ब्राह्मण पंडितों ने एक विशेष क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त कर ली. यह कर्म काण्ड में विशेषज्ञता थी। इस प्रकार मंदिरों घाट पर धर्मकृत्य कराने वाले पंडित अलग हो गए। ये तीर्थों के पुजारी बने और गंगा पुत्र कहलाए। इन्हीं को पंडा भी कहा जाने लगा। पीताम्बर पहने, तिलक मुद्रा लगाए, आसन मारे, चन्दन रगड़ते, कमंडल लिए ऐसे पण्डे तीर्थों में बंट गए. इस प्रकार काशी के पंडों, प्रयाग के पंडों, मथुरा के पंडों आदि, ने भी अपनी अपनी पहचान बना ली। इनका मुख्य काम मंदिरों की देखभाल करना और तीर्थ यात्रियों को दर्शन करवाना आदि हो गया.

जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है पंडित बुद्धिमान होता है और इसी पंडित से पंडा बना है. अब एक राज़ की बात बताता हूँ। संस्कृत के रहस्य सम्प्रदाय में ‘पंडा’ का अर्थ ही बुद्धि है तो दूर की कौड़ी क्यों लाएं। यों समझ लीजिए कि बुद्धि भी पंडा और बुद्धिमान भी पंडा. दोनों एक ही हैं. समय बदलता गया और अब पंडा एक रूढ़ शब्द हो गया है। पंडा वह जो तीर्थ यात्रियों को मंदिरों के दर्शन कराए और मंदिरों की देखभाल करे। और उनसे प्राप्त होने वाले धन से अपनी जीविका चलाए। किन्तु आज भी तमाम पण्डे ऐसे हैं जो पंडित हैं, विद्वान हैं, अध्ययन अध्यापन में रत हैं और कुम्भादि मेलों में शिरकत करते हैं तथा जनता को अपने प्रवचनों से लाभान्वित करते हैं। पर्वों पर उनके लिए “पंडालों” का इंतज़ाम किया जाता है.

पंडा शब्द मंदिरों की रखवाली करने वालों के लिए,जैसा कि बताया जा चुका है, रूढ़ बन गया है और आपको ताज्जुब होगा छत्तीसगढ़ में शराब की दूकानों की रखवाली करने वाले वेतन भोगियों को भी पंडा ही कहते हैं. आखिर शराबखाने आज मंदिरों से कोई कम थोडे ही है !!

अंत में, प्रसंग से थोड़ा हट कर। एक पंडा और होता है जिसका पंडित और पंडाल से कोई नाता रिश्ता ही नहीं है। यह एक पशु है जो पूर्वी हिमालय में पाया जाता है। दक्षिण पूर्व चीन में भी मिलता है। दो तरह का होता है लाल और बड़ा। लाल पंडा देखने में बड़ी बिल्ली सा होता है और बड़ा तो बड़ा है। लगभग भालू की तरह होता है। इति पंडा परिवार।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०/१, सर्कुलर रोडी , इलाहाबाद -२११००१ मो. ९६२१२२२७७८

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