शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

सोनम गुप्ता बेवफ़ा क्यों है... / मंजीत ठाकुर

यह मुई सोनम गुप्ता है कौन, और यह बेवफा क्यों है?

 


जब इंसान के हाथ में नोट ही न हों, पता लगे कि आपके पास के 86 फीसद, अरे साहब वही 5 सौ और हजार वाले नोट, अब सब्जीवाले, चायवाले, कपड़ेवाले, धोबी, बढ़ई वगैरह-वगैरह नहीं लेंगे। आपको इस साल के खत्म होने से पहले अपने सारे ऐसे नोट बैंक में वापस धर देने हैं, उसके बदले नए कलदार निकारने हैं। आपके मोबाइल में देश से काला धन को जड़ से खत्म कर देने के देशभक्त संकल्प आ-जा रहे हैं, आप ऊर्जा से भरे हैं और प्रधानमंत्री के आदेशानुसार अपने पास पड़े चार हज़ार के बड़े नोटों को चिल्लर में बदलवाने बैंक जा रहे हैं। आपको उम्मीद है कि आप जाएंगे और बैंक मैनेजर फूलों के हार के साथ आपका स्वागत करेगा।

आपकी पत्नी आपसे, सरकार से, प्रधानमंत्री से नाराज़ है क्योंकि उनने आपके पर्स से, अपनी कमाई से, रक्षाबंधन और भैया-दूज में नेग में मिले पैसों को संभालकर और आपसे छिपाकर रखा था, क्योंकि महंगाई के इस दौर में आप कभी भी उनकी बचत पर बुरी दृष्टि फेर सकते थे। लेकिन आपकी पत्नी, मां, दादी का यह चोरअउका धन, या स्त्रीधन बैंक में वापस करना जरूरी हो गया।

बहरहाल, देश को बचाने की खातिर आम आदमी इतना त्याग तो कर ही सकता है। आप बैंक में पैसा जमा नहीं कर पा रहे। सुबह से कतार में खड़े आपकी हिम्मत दुपहरिया आते-आते जवाब दे जाती है। देशभक्ति की चाशनी की मिठास थोड़ी कम हो जाती है और चाय की दुकान पर एक दस रूपये के नोट पर एक धुंधली-सी लिखावट पर आपकी नज़र जाती हैः सोनम गुप्ता बेवफा है।

उसी वक्त आपके वॉट्स-एप, आपका ट्विटर, फेसबुक, अखबार, वेबसाइट्स हर जगह सोनम गुप्ता के बेवफा होने की बातें नुमायां होने लगती हैं।

हम सोचते रह जाते हैं यह मुई सोनम गुप्ता है कौन, और यह बेवफा क्यों है?

अब हिन्दुस्तान में लोगों को नोटों पर कुछ न कुछ लिखने की आदत है। हम उम्मीद करते हैं कि यह जो नोट हम खर्च कर रहे हैं वह कभी-न-कभी हम तक वापस आएगा। हम बड़े प्यार से उस पर अपना नाम लिख देते हैं। कुछ वैसे ही, जैसे पुरानी इमारतों, धरोहर साबित की जा चुकी चट्टानों और मंदिरों की दीवारों पर हम अपनी प्रेमिका, या मुहल्ले की उस लड़की का नाम लिख डालते हैं जिसे हम दिलो-जान या किडनी-गुरदे-फेफड़े से प्यार करते हैं, और कभी-कभार तो लड़की को इस बात का इल्म तक नहीं होता।

दिलजले आशिकों के ऐसे इजहारे-इश्क या भड़ास निकालने की अदा देश में बहुत पुरानी है। विदेशों में इसका चलन है या नहीं, और अगर है तो किस हद तक है, इस पर कोई विश्वसनीय सूचना नहीं है।

लेकिन नोटबंदी के इस दौर में मुझे पूरा यकीन हो गया कि हमारा देश ऐसे खुराफातियों से भरा हुआ है, जो मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। और इन कुछ भी कर गुजरने वालों ने सोनम गुप्ता की बेवफाई का क्या खूब सहारा लिया।

सोनम गुप्ता को बेवफा बताने वाले और फिर उसी की तरफ से –मैं नहीं बेवफा—की तर्ज़ पर दूसरे नोटों को सोशल मीडिया पर किसने उछाला? यह वही वर्ग है जो बाथरूम साहित्यकार है और जम्मू से कन्याकुमारी तक, हर जगह फैला है।

नोटों की बात छोड़िए, आपने हिन्दुस्तान के हर कोने में चल रही ट्रेनों के टॉयलेट, प्रतिष्ठित इलाकों की इमारतो की लिफ्ट, सीढ़ियों, दीवारों समेत हर सार्वजनिक प्रतिष्ठान के शौचालयों में लेखन करने वालों पर कभी गौर किया है?

भोपाल हो या गोहाटी, अपना देश अपनी माटी की तर्ज़ पर टॉयलेट साहित्यकार पूरे देश में फैले हैं। मैं उन लेखकों की बात कर रहा हूं, जो नींव की ईंट की तरह हैं। जो कहीं छपते तो नहीं, लेकिन ईश्वर की तरह हर जगह विद्यमान रहते हैं। सुलभ इंटरनैशनल से लेकर सड़क किनारे के पेशाबखाने तक, पैसेंजर गाड़ियों से लेकर राजधानी एक्सप्रेस तक, तमाम जगह इनके काम (पढ़ें, कारनामे) अपनी कामयाबी की कहानी चीख-चीखकर कह रहे हैं।

देश के ज्यादातर हिस्सों में ज्यों हि आप किसी टॉयलेट में घुसते हैं, अमूमन बदबू का तेज़ भभका आपके नथुनों को निस्तेज और संवेदनहीन कर देता है। फिर आप जब निबटने की प्रक्रिया में थोड़े रिलैक्स फील करते हैं, तो आप की नज़र अगल-बगल की गंदी या साफ-सुथरी दीवारों पर पड़ती है, वहां आपको गुमनाम शायरों की रचनाएं दिखेंगी (आप चाहें तो उसे अश्लील या महा-अश्लील मान सकते हैं)। कई चित्रकारों की भी शाश्वत पेंटिंग्स दिखेंगी।

कितना वक्त होता है! इन डेडिकेटेड लोगों के पास! कलम लेकर ही टॉयलेट तक जाने वाले लोग। जी करता है उनके डेडिकेशन पर सौ-सौ जान निसार जाऊं। इन लोगों के बायोलजी का नॉलेज भी शानदार होता है... तभी ये लोग दीवारों पर उसका प्रदर्शन भी करते हैं।

पहले माना जाता था कि ऐसा सस्ता और सुलभ साहित्य गरीब तबके के सस्ते लोगों का ही शगल है। इसे पटरी साहित्य का नाम भी दिया गया था। लेकिन बड़ी खुशी से कह रहा हूं आज कि इनका किसी खास आर्थिक वर्ग से कोई लेना-देना नहीं है। कोई वर्ग-सीमा नहीं है। अपना अश्लील सौंदर्यशास्त्र बखान करने की खुजली को जितना छोटे और निचले तबके के सिर मढ़ा जाता है, सच यही है कि उतनी ही खाज कथित एलीट क्लास को भी है।

तो जब तक अपने प्रेम के प्रकटन का यही पैसिव तरीका इस देश में रहेगा, दीवारों से लेकर नोटों तक कोई सोनम गुप्ता बेवफा होती रहेगी। मुहल्लों में जब तक प्रेम जीवित रहेगा, छींटाकशी भी, और इनकार भी, तब तक देश में सोनम गुप्ताएं बेवफा होती रहेंगी।

 


मंजीत ठाकुर के ब्लॉग गुस्ताख़  http://gustakh.blogspot.in/2016/11/blog-post_17.html से साभार प्रकाशित

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