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मुक्तिबोध : संस्मरण में सृजन की तस्वीर / डॉ.चन्द्रकुमार जैन

जन्म शती वर्ष पर विशेष 

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राजनांदगाँव में मुक्तिबोध : संस्मरण में सृजन की तस्वीर

डॉ.चन्द्रकुमार जैन


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हिन्दी कविता के महानतम सर्जकों में से एक गजानन माधव मुक्तिबोध के निधन की आधी सदी पूरी होने के बाद लीजिये अब उनका जन्म शताब्दी वर्ष भी आ गया। सितंबर उन्नीस सौ पैंसठ के नया ज्ञानोदय में कवि श्रीकांत वर्मा का एक लेख छपा था जिसमें उन्होंने कहा था अप्रिय सत्य की रक्षा का काव्य रचने वाले कवि मुक्तिबोध को अपने जीवन में कोई लोकप्रियता नहीं मिली और आगे भी, कभी भी, शायद नहीं मिलेगी। कालांतर में श्रीकांत वर्मा की आशंका गलत साबित हुई और मुक्तिबोध निराला के बाद हिन्दी के सबसे बड़े कवि के तौर पर न केवल स्थापित हुए बल्कि आलोचकों ने उनकी कविताओं की नई-नई व्याख्याएं कर उनको हिंदी कविता की दुनिया में शीर्ष पर बैठा दिया।

गजानन माधव मुक्तिबोध का छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर से नाता कितना गहरा था,यह बताने की ज़रुरत शायद नहीं है। इतना याद रहे कि सन 1958 से मृत्यु पर्यन्त वे राजनांदगांव दिग्विजय कालेज में व्याख्याता रहे। यहीं उनके तत्कालीन आवास स्थल को मुक्तिबोध स्मारक के रूप में यादगार बनाकर वहां हिंदी के दो अन्य साहित्यकार डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र की स्मृतियों को संजोते हुए छत्तीसगढ़ शासन, जिला प्रशासन और मुक्तिबोध स्मारक समिति ने मिलकर मुक्तिबोध जी के अनन्य मित्र श्री शरद कोठारी और तत्कालीन कलेक्टर श्री गणेश शंकर मिश्रा की अगुवाई में सन 2005 में एक सुन्दर संग्रहालय की स्थापना भी की, जिसे कालेश्वर जैसे प्रख्यात पत्रकार-कलमकार ने साहित्य का सांस्कृतिक करिश्मा निरूपित किया।  स्मरणीय है कि मुक्तिबोध की सबसे ज्यादा चर्चित लम्बी कविता अँधेरे मे ‘ को भी पचास साल पूरे हो गए हैं। इस कविता का संभावित रचनाकाल 1957 से 62 के बीच ठहरता है। नागपुर-राजनांदगांव के दरम्यान इस कविता का अंतिम संशोधन 1962 में और ‘कल्पना’ में अंतिम प्रकाशन 1964 में आशंका के द्वीप अँधेरे में शीर्षक से हुआ था।

बहरहाल कुछ और कहने से पहले मुक्तिबोध की चर्चित लम्बी कविता अँधेरे में के विषय में प्रख्यात कवि-समालोचक अशोक वाजपेयी ने अपने एक संस्मरण से कुछ अंश यहां साझा कर लें। श्री वाजपेयी कहते हैं – अपने उस समय, उस लम्बी कविता का कोई शीर्षक नहीं था: यह कहना भी कठिन है कि पूरी हो गई थी या नहीं। वह शायद उसका पहला प्रारूप था जिसे मुक्तिबोध हमारे आग्रह पर साथ ले आए थे। वे उन दिनों राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय में अध्यापक थे और उस नाते सागर विश्वविद्यालय की कोर्ट में उन्हें महाविद्यालय से नामजद किया गया था। कोर्ट की बैठक साल में एक बार होती थी और वे उसमें भाग लेने आते थे। यह 1959 की बात है: मेरा बीए का अंतिम वर्ष था। हमने उनसे दो आग्रह किए थे कि वे हमारी संस्था ‘रचना’ में नई कविता पर एक व्याख्यान दें और वे ‘नई कविता का आत्मसंघर्ष’ शीर्षक से लिखकर आए थे। व्याख्यान के अगले दिन उन्होंने अपनी लम्बी कविता का हम कुछ मित्रों के सामने, जिसमें रमेशदत्त दुबे, आग्नेय, जितेन्द्र कुमार और प्रबोध कुमार शामिल थे, पढ़ा।

आगे श्री वाजपेयी कहते हैं – लगभग एक घंटे कविता पढ़ने के बाद उन्होंने कहा कि ‘पार्टनर बोर हो रहे हों तो बंद करते हैं, चलिए चाय पी ली जाए’। दूसरी तरफ, हम सभी हतप्रभ थे- हमने ऐसी विचलित करनेवाली लम्बी कविता इससे पहले न तो सुनी थी, न ही पढ़ी। मुक्तिबोध इस कविता पर उसके बाद बरसों काम करते रहे और मार्च 1964 में, उनके पक्षाघात होने के बाद पोलिश विदुषी अग्नेश्का राजनांदगांव से लौटते हुए अपने साथ ‘आशंका के द्वीप: अंधेरे में’ शीर्षक से इस कविता को अपने साथ लाईं। उन दिनों भारतीय ज्ञानपीठ के दरियागंज दिल्ली स्थित कार्यालय में हम कुछ लेखक मिलकर एक गोष्ठी चलाते थे। तब 1 मार्च को यह कविता उसमें पढ़ी गई। कविता ‘कल्पना’ में छपी, पर तब जब मुक्तिबोध उसे देखने के लिए अपने भौतिक शरीर में जीवित नहीं थे। इस वर्ष जैसे मुक्तिबोध के दुखद निधन के वैसे ही ‘अंधेरे में’ कविता के प्रकाशन के पचास वर्ष हो रहे हैं।

वाजपेयी जी के अनुसार अंधेरे में कविता की लम्बी यात्रा अपने आप में वेदना-भास्कर रही है। उसके कालजयी होने का इससे अधिक और प्रमाण क्या चाहिए। हमारा वर्तमान समय जिस तरह की सकर्मकता की मांग करता है उसका एक प्रारूप इस कविता में है और अर्धशती के बाद भी धुंधला या अप्रासंगिक नहीं हुआ है। इसी तरह जाने-माने व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने अपने संस्मरण में लिखा है – राजनांदगांव में तालाब ( रानी सागर ) के किनारे पुराने महल का दरवाजा है – नीचे बड़े फाटक के आसपास कमरे हैं,दूसरी मंजिल पर एक बड़ा हाल और कमरे,तीसरी मंजिल पर कमरे और खुली छत। तीन तरफ से तालाब घेरता है। पुराने दरवाजे और खिड़कियां,टूटे हुए झरोखे,कहीं खिसकती हुई ईंटें, उखड़े हुए पलस्तर दीवारें। तालाब और आगे विशाल मैदान। शाम को जब ज्ञानरंजन और मैं तालाब की तरफ गए और वहां से धुंधलके में उस महल को देखा,तो एक भयावह रहस्य में लिपटा वह नजर आया।

दूसरी मंजिल के हाल के एक कोने में मुक्तिबोध खाट पर लेटे थे। लगा,जैसे इस आदमी का व्यक्तित्व किसी मजबूत किले सा है। कई लड़ाइयों के निशान उस पर हैं। गोलों के निशान हैं,पलस्तर उखड़ गया है,रंग समय ने धो दिया है- मगर जिसकी मजबूत दीवारें नींव में जमी हैं और व​ह सिर ताने गरिमा के साथ खड़ा है। मैंने मजाक ​की, इसमें तो ब्रह्मराक्षस ही रह सकता है। मुक्तिबोध की एक कविता है ‘ब्रह्मराक्षस’। एक कहानी भी है जिसमें शापग्रस्त राक्षस महल के खण्डहर में रहता है। मुक्तिबोध हंसे। बोले, कुछ भी कहो पार्टनर अपने को यह जगह पसंद है।

मुक्तिबोध जी के सुपुत्र और यशस्वी पत्रकार-संपादक श्री दिवाकर मुक्तिबोध का संस्मरण भी उनकी रचनाधर्मिता के गहरे फलसफे की पड़ताल में काफी मददगार मालूम पड़ता है। वह कहते हैं - हम राजनांदगांव के बसंतपुर में रहते थे। शहर से चंद किमी दूर बसा गांव। राजनांदगांव भी इन दिनों बड़ा गांव जैसा ही था। कस्बाई जैसा जहां कॉलेज थे, अस्पताल था, शालाएं थीं। शहरी चहल-पहल थी। शांत, अलसाया-सा लेकिन सुंदर। दिल को सुकून देने वाली हवा बहती थी। लोगों में आपस में बड़ी आत्मीयता थी, भाईचारा था। पिताजी राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुए थे और बसंतपुर से आना-जाना करते थे। कभी पैदल, कभी साइकिल से। 

बसंतपुर में हमारा मकान था बढ़िया। बाहर परछी, परछी से सटा छोटा कमरा जो पिताजी की बैठक थी, दो लंबे कमरे और पीछे रसोई तथा रसोई के बाहरी दीवारों से सटा खूब बड़ा बगीचा जिसमें फलों के झाड़ थे, सब्जियां उगाई जाती थीं। यह मकान चितलांगियाजी का था और बगीचा भी उनका। बसंतपुर के दिन वाकई बहुत खूबसूरत थे। उसका सुखद अहसास अभी तक कायम है।  यहां रहते हुए कोई ऐसी घटना याद नहीं है जो पिताजी के व्यक्तित्व को नये ढंग से रेखांकित करती हो। अलबत्ता वे कितने पारिवारिक थे वह ज़रूर जाहिर होता है। रात को कंदील की रौशनी में वे हमें पढ़ाते थे। क्लास लेते थे। वक्त-वक्त पर मेरे साथ शतरंज खेलते थे। जान-बूझकर मुझे जिताते थे। शाम को कॉलेज से घर आने के बाद शायद ही कभी शहर जाते हों। यानी उसके बाद उनका पूरा समय हमारा था। हमारे साथ वक्त बिताते। बातें करते या फिर हाथ में किताब या काग़ज़-कलम लेकर लिखने बैठ जाते।

बसंतपुर में हम ज़्यादा दिन नहीं रहे। शायद साल-डेढ़ साल। राजनांदगांव महाविद्यालय परिसर में अंतिम सिरे पर स्थित शीर्ण-जीर्ण लेकिन महलनुमा मकान में रंग-रोगन चल रहा था, हम यहीं शिफ्ट होने वाले थे। एक दिन शिफ्ट हो गये। पुराने जमाने के बड़े-बड़े कमरों और मंजिलों वाला नहीं था नया मकान। दरअसल राजनांदगांव बहुत छोटी रियासत थी, इसलिए महल भी साधारण थे। नीचे एक अलग-थलग कमरा जहां बड़े भैया रमेश पढ़ाई करते थे। दूसरे छोर पर प्रवेश कक्ष और ऊपर की मंजिल पर तीन हालनुमा कमरे, एक रसोई और खुली बालकनी। खिड़कियां बड़ी-बड़ी व दरवाज़ों के पल्ले भी रंग-बिरंगे कांच से दमकते हुए। पिताजी ने जिस कक्ष में अपनी बैठक जमाई वहां छत पर जाने के लिए चक्करदार सीढ़ियां थीं जो उनकी प्रसिद्ध कविता 'अंधेरे में' प्रतीक के रूप में है। इसी कक्ष में वे लिखते-पढ़ते, आराम करते थे। जब कभी दादा-दादी राजनांदगांव आते, उनका डेरा भी यहीं लगता था। दादाजी के लिए पलंग था, दादी फर्श पर बिस्तर लगाकर सोती थीं। यहां उनकी उपस्थिति के बावजूद लिखते या पढ़ते वक्त पिताजी की एकाग्रता भंग नहीं होती थी। शुरू-शुरू में दादाजी का पलंग प्रवेश द्वार यानी भूतल पर स्थित कक्ष में रखा गया था ताकि बाथरूम तक जाने के लिए उन्हें कष्ट न हो। लेकिन पिताजी के लिए यह भी एक प्रकार से मिनी बैठक ही थी। 

वे देर रात तक लिखते और सुबह होने से पहले उठ जाते। करीब 4 बजे। हमें भी जगाते थे ताकि हम पढ़ने बैठें। लिखने के लिए बैठने के पूर्व चाय उनके लिए बेहद ज़रूरी थी। कोयला रहता था तो सिगड़ी जलाते थे या फिर रद्दी काग़ज़ों को जलाकर खुद चाय बनाते थे। कभी-कभी यह काम हम भी कर देते थे। सिगड़ी के आसपास बैठना, या फिर काग़ज़ जलाकर चाय बनाने में अलग आनंद था। आग की रौशनी में पिताजी का चेहरा दमकता रहता था। वे इत्मीनान से कंटर भर (पीतल का बड़ा गिलास) चाय पीते और फिर लिखने बैठ जाते थे। यह सिलसिला सुबह 8 बजे तक चलता था। फिर उनके कपड़े, इस्त्री करने का काम मेरा था। पैजामा-कुर्ता और कभी-कभी खादी की जैकेट भी। 

आगे श्री दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं कि पिताजी प्राय: रोज सुबह-सुबह, अखबार के आते ही, नीचे उतर आते थे और दादाजी को अखबार की खबरें पढ़कर सुनाया करते थे। खबरों पर लम्बी-लम्बी बातें होती थीं। घंटे दो घंटे कैसे निकल जाते थे, पता ही नहीं चलता था। कॉलेज से लौटने के बाद शाम को भी वे दादाजी के पास बैठते थे। बातें करते थे। हमारी दादी को पढ़ने का बहुत शौक था। पिताजी कॉलेज की लायब्रेरी से उनके लिए उपन्यास, कहानी-संग्रह लेकर आते थे। मुझे पढ़ने का चस्का दादीजी की वजह से हुआ। किताबें आती थीं, मैं भी देखता-परखता था। कुछ-कुछ पढ़ता भी था। बंकिम चटर्जी, शरतचंद्र, प्रेमचंद, कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी, आचार्य चतुरसेन, वृंदावनलाल वर्मा और यशपाल भी मेरे प्रिय लेखक थे।

बसंतपुर की तुलना में दिग्विजय कॉलेज के दिन और भी बेहतर थे। मित्रों के साथ साहित्यिक चर्चाओंं का सिलसिला तेज़ हो गया था। दूसरे शहरों से आने वालों में प्रमुख थे- शमशेर बहादुर सिंह, श्रीकांत वर्मा, हरिशंकर परसाई, आग्नेश्का कोलावस्का सोनी व विजय सोनी। प्राय: रोज़ आने वालों में ये प्रमुख थे- डॉ. पार्थ सारथी, अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक। कॉलेज में एकमात्र वे ही थे जिनसे प्राय: अंग्रेजी में वैचारिक बहस हुआ करती थी। डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी व उनका परिवार भी पास ही में रहता था, पर वे शायद ही कभी आये। अलबत्ता पिताजी कभी-कभी उनके यहां जाया करते थे। वे भी हिन्दी पढ़ाते थे। शरद कोठारी, रमेश याग्निक, जसराज जैन, विनोद कुमार शुक्ल, निरंजन महावर, कन्हैयालाल अग्रवाल, अटल बिहारी दुबे, कॉमरेड किस्म के कुछ और लोग, जिनके नाम याद नहीं, आया-जाया करते थे। कॉलेज के प्रिंसीपल किशोरीलाल शुक्ल भी घर आते थे। महफ़िल जमती थी, बातें खूब होती थीं। प्राय: शाम के बाद। पिताजी धार्मिक कर्मकांड पर कितना विश्वास रखते थे, मुझे नहीं मालूम। उन्हें मंदिर जाते न मैंने देखा न सुना। अलबत्ता दादाजी की ग़ैरहाजिरी में या अस्वस्थ होने पर वे घर में पूजा ज़रूर करते थे, पूरे मंत्रोच्चार के साथ। होलिका दहन के दिन होली घर के बाहर सजाकर होली पूजा भी वे करते थे, बाकायदा धवल वस्त्र यानी धोती पहनकर। इसलिए वे नास्तिक तो नहीं थे, कितने आस्तिक वह थे, यह अब कौन तय कर सकता है? इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि वामपंथी विचारधारा से सहमत होने का अर्थ नास्तिक होना नहीं है। ईश्वर में आस्था सबकी होती है, भले ही कोई कुछ भी कहे।

दिवाकर जी मानते हैं कि राजनांदगांव में जितना समय बीता, सुखद था, बहुत सुखद। अभावग्रस्तता कभी इतनी विकट नहीं थी कि फाके करने की नौबत आये। वरन् यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि राजनांदगांव में अर्थाभाव चिंतात्मक नहीं था। काम चल रहा था, मज़े से चल रहा था। पिताजी खुश थे और हम सभी भी। छोटे थे, पढ़ते थे, खेलते-कूदते थे। सारा दिन खुशी-खुशी बीत जाता था। हमारे घर के आजू-बाजू में दो बड़े तालाब थे, हैं, जो अब और भी खूबसूरत हो गये हैं। पिताजी हमें सुबह तालाब में नहाने-तैरने ले जाते थे। तैरना हमने उन्हीं से सीखा। खुद अच्छे तैराक थे, दूर तक जाते थे। लौटने के बाद एक-एक करके हम भाई-बहनों को तैरना सिखाते थे। कभी-कभी साथ में मां भी हुआ करती थीं। घंटे दो घंटे कैसे निकल जाते थे, पता ही नहीं चलता था।

तो राजनांदगाँव में यही वह जगह है जहां मुक्तिबोध ने अपने रचनात्मक जीवन के सर्वाधिक उर्वर वर्ष बिताए। वरिष्ठ पत्रकार शरद कोठारी के सार्थक प्रयास से मुक्तिबोध दिग्विजय कालेज में पदस्थ हो सके थे। यहां आने से पहले तब जबकि स्व. कोठारी जी 1952-54 की अवधि में नागपुर मॉरिस कालेज के विद्यार्थी थे, वहां जाने से पहले मुक्तिबोध के सम्बन्ध में उनकी जानकारी नहीं के बराबर थी, परन्तु वह नागपुर में वह बहुत चर्चित थे। मोतीराम वर्मा के ‘लक्षित मुक्तिबोध’ में निवेदित साक्षात्कार में इसका जिक्र करते हुए कोठारी जी में कहा है – मुक्तिबोध आदमी को पहचानने में माहिर थे। कोई चमक-दमक दिखाकर या अतिरिक्त आत्मप्रदर्शन से उन्हें प्रभावित नहीं कर सकता था। आडम्बरी प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्तियों का उन पर कोई असर नहीं था, न दिल से न ही दिखावे के लिए वह उन्हें आदर दे सकते थे। इसी तरह वह प्रायः अपने स्तर से बातें करते थे, जिससे नीचे उतारकर मिलना उनके लिए संभव नहीं था।

मुक्तिबोध के राजनांदगांव आने की कहानी का सार, नागपुर में पढ़ाई पूरी कर लौटने के बाद कोठारी जी के इन शब्दों में मिल जाता है – नागपुर से यहाँ आ कर मुक्तिबोध के सम्बन्ध में विविध सूत्रों से जानकारी मिलती रही। मैंने तब लॉ कर लिया था और सन 1957 में अनेक महानुभावों सहयोग से राजनांदगांव में दिग्विजय कालेज की स्थापना करने में हमें सफलता मिल गई थी। प्रमोद वर्मा और किशोरीलाल जी शुक्ल ( महाविद्यालय के संस्थापक प्राचार्य ) के भतीजे, वह मेरे नागपुर के दोस्त थे, के परामर्श से हमने मुक्तिबोध को यहाँ अपने कालेज में लाने की योजना बनायी। उनसे प्रार्थना-पत्र लिखने को कहा गया। कालेज की मैनेजिंग कमेटी ने अपने हेल्दी एटीट्यूड का परिचय दिया और मुक्तिबोध लेक्चरर नियुक्त कर लिए गए।

स्मरणीय है कि मुक्तिबोध के जीवन का अंतिम अध्याय, राजनांदगांव के साहित्यिक-सांस्कृतिक वातावरण में बीता। उनके सृजन की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ आकर उन्होंने सुरक्षा की सांस ली और उन्हें यायावरी जीवनवृत्ति से छुटकारा मिला। उनके भीतर स्थायित्व की भावना का उदय हुआ। यहाँ उनका ज्यादातर समय लेखन कर्म में बीता। वह स्वयं कहा करते थे कि राजनांदगांव को छोड़कर अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा।

मुक्तिबोध जिस प्राकृतिक वातावरण से घिरे थे, उसे प्रतीकों के माध्यम से शब्द देकर जीती-जागती रचना में ढाल देते थे। वह सिर से पाँव तक कवि थे। उनका व्यक्तित्व ही काव्यमय था। रानीसागर में पाल पर ढलती सांध्य बेला में जो बत्तियां जलतीं उनकी परछाइयों को मुक्तिबोध ज्योतिस्तंभ कहते थे। उस पूरे परिवेश को वह इडलिक यानी काव्यमय कहा करते थे। भाऊ समर्थ लिखा है – राजनांदगांव गया। उनसे ( मुक्तिबोध से ) मुलाकात हुई। रात भर घूमते रहे, नागपुर की तरह। बातें और चर्चाएं। घुमावदार सीढ़ियां चढ़कर हम उनकी गुफानुमा हवेली ( किराए की ) के कमरों में बैठे। स्याह दीवारें। मुझे लगा एक पुरानी भयानक ईमारत। वहां से दिख रहा था बाहर का विशाल दृश्य। बहती हवा ! वह पुरानी इमारत ऎसी लग रही थी, जैसे उनके सृजनशील मन रूप।

याद रहे कि मुक्तिबोध ने लिखा है –

उन्नति के चक्करदार /लोहे के घनघोर

ज़ीने में अन्धकार !!/गुम कई सीढ़ियाँ हैं

भीड़ लेकिन खूब है /बड़ी ठेलमठेल है

ऊपर मंज़िल तक /पहुँचने में बीच-बीच

टूटी हुई सीढ़ियों में /कुछ फंस गए, कुछ

धड़ाम-से नीचे गिर /मर गए सचमुच

प्रगति के चक्करदार /लोहे के घनघोर

ज़ीने में सांस रुक /जीने से स्वर्गधाम

कई पहुँच गए प्राण !!

( 1958, राजनांदगांव, मुक्तिबोध रचनावली )

वास्तव में मुक्तिबोध सफलता के दोयम दर्ज़े के तौर तरीकों से पूरी तरह दूर रहे। कभी कोई कपटजाल नहीं रचा। चालाकी और छल-छद्म से जिंदगी की ऊंची मंज़िलों तक पहुँचने का कोई ख़्वाब तक भी नहीं देखा।  मुक्तिबोध के अचल सृजनात्मक विश्वास और उनके निष्कपट जीवन की मानिंद उनकी कविता भी अनंत काल तक आबाद रहेगी।

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लेखक शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर महाविद्यालय,

राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ में प्राध्यापक ( हिन्दी विभाग ) हैं

मो.09301054300

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