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व्यंग्य / कड़क चाय, नेता और नोट / राकेश अचल

 

आदत जब बिगड़ती है तो बिगड़ती ही जाती है,अब अपने पन्त-प्रधान को ही लीजिये.बचपन में कड़क चाय बनाना सीखे थे और ये हुनर आजतक नहीं भूले.सियासत में भी उसका इस्तेमाल कर रहे हैं .कालाधन पर पहले ढुलमुल रवैया अपना और अब लानत-मलानत सुन-सुन कर अचानक चाय की तरह इतने कड़क हो गए की जनता को कड़कनाथ ही बना दिया .

कड़क चाय आम आदमी नहीं पीता.आम आदमी के हिस्से में धोवन या कट चाय ही आती है. कड़क चाय का स्वाद उन्हें ज्यादा पुसाता है जिनकी जवान ऐंठने लगती है या जिनके दिमाग पर हर वक्त खुमार सा छाया रहता है .पन्त प्रधान ने अपनी कड़क चाय जिन्हें पिलाना थी उन्हें तो पिलाई नहीं ,उलटे आम जनता को परोस दी.अब बेचारी जनता मुंह बिचकाती फिर  रही है .उसका चेहरा देखकर कार्टूनिस्ट  एक नहीं पचास मुख मुद्राएं उकेर सकता है .

कड़क चाय पीने वाला अगर कोई आदमी गलती से अपना घर-बार छोड़ कर सियासत में आ जता है तो हड़कम्प मचा देता है .हड़कंप ऐसा की लाइन में खड़े-खड़े ही हाड कांपने लगते हैं .काले नोटों को बाहर निकालने के लिए नेता जी ने कड़क चाय पिलाई तो पूरा देश सड़कों पर आ गया. इतनी भीड़ और कतारें तो आम चुनाव के समय भी देश में कहीं नजर आयीं थी .कड़क चाय का चलन ऐसा चला पड़ा है की लोग अब बात-बात में धमकाने के बजाय कड़क चाय पिलाने का ऑफर दे देते हैं .

कड़क चाय और कड़क नेता में कुछ समानताएं होतीं हैं. जैसे कड़क चाय की खुशबू आपको लुभाती जरूर है किन्तु कड़क चाय जैसे ही कंठगत होती है थूकने का मन करता है. ठीक ऐसा ही कुछ कड़क नेता के साथ है. कड़क नेता की वाह-वाही खूब होती है लेकिन जैसे ही बेचारा कोई कड़क कदम उठाता है ,विपक्ष उसकी थू-थू करने  लगता है .आजकल यही हो रहा है ,किन्तु इसमें दोष किसी का नहीं है.सारा दोष कड़क चाय का है .जो कड़क चाय पियेगा वो मुंह बिचकायेगा,कड़वाहट कम करने के लिए थू=थू भी करेगा.इसका किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए .

कड़क चाय हो,वो भी कड़क नेता के हाथ की बनी तब कड़क नोट हासिल करने में भी मजा आता है. पांच सौ और दो हजार के कड़क नोट आजकल जब एटीएम से निकलते  हैं तो ऐसे बजते हैं जैसे अरहर की सूखी फली बज रही हो .पुराने नोट  में ये कड़कपन  कहाँ.पुराने नोट   तो अब सन्निपात के शिकार हैं ,उनकी कडकडनेस को सरकार ने अचानक लुजलुजेपन में बदल दिया है ,पुराने नोट कड़क होकर भी पहले की तरह कड़क नहीं रहे. पैट्रोल पम्प,रेलवे बुकिंग और अस्पताल वाले भी इन पुराने कड़क नोटों को हिकारत से भरी नजरों से देखते हैं और फिर ऐसे लेते हैं जैसे अहसान कर रहे हों.?

आजादी के पहले जन्मे एक बुजुर्गवार से हमने नेताओं के कड़कपन का राज जानना चाहा तो वे रहस्यमयी मुस्कान बिखेरते हुए बोले-"बेटा ! नेताओं ने कड़क रहने का नुस्खा कड़क नोटों से ही सीखा है. जो जितना कड़क होगा,वो उतना ज्यादा चलेगा.बाबा ने बताया कि-" जो नेता अंदर से कड़क नहीं हो पाते वे ऊपर से कड़क कपडे पहन लेते हैं.उनके कपड़ों में इतना कड़क कलफ लगा गोता है की ससुरी गर्दन तक छिल जाती है.इस कड़कदेपन को उभारने में लाउंड्री वाले को पसीना आ जाता है" 

छोटी सी जिंदगी में अपने राम का पाला कड़क चाय,कड़क नेता,कड़क नोट और कड़कनाथ यानि सभी कड़कों से पड़ चुका है .अब धीरे-धीरे इस कड़कपन से विरक्ति सी होने लगी है .अब न कड़क चाय पुसाती है और न कड़क नेता.कड़क नोट भी काटने को दौड़ते हैं और कड़कनाथ का तो सवाल ही नहीं.अब हिंसा हमें फूटी आँख नहीं सुहाती .ऐसे में देश की जनता के ऊपर है कि उसे कड़क चाय का प्याला पीना है या नहीं?कड़क नेता चाहिए या नहीं?कड़क नोट चाहिए या सपचास के सड़े-बसव स्व नोट?कड़कनाथ से काम चलना है या फ़ार्म का कोई उत्पाद खाना है ?

हमारे फैमिली डाक्टर ने तो साफ़ कह दिया है कि -यदि चैन से जीना है तो कड़कपन से दूर रहिये.कड़क चाय पीने  से,कड़क  नेता के साथ रहने से और कड़क नोटों से मुहब्बत करने से रक्तचाप बढ़ जाता है .बढ़ा हुआ रक्तचाप पहले से एक राष्ट्रीय संकट है.इसलिए कड़कपन से हमेशा परहेज कीजिये,अन्यथा आप जाने और आपका काम जाने .

@राकेश अचल 

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