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अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल का भव्य आयोजन

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अहमदाबाद (नवम्बर 12-13 2016): अहमदाबाद मैनेजमेंट असोसिएशन के विशाल सभागार में अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ सुविख्यात गुजराती साहित्यकार रघुवीर चौधरी, संगीत नाट्य अकादमी के चेयरमेन योगेश गढ़वी, बॉलीवुड से फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर,  ब्रिटिश डेप्युटी हाई कमिश्नर जेफ़ वेन, कुमायूँ फेस्टिवल के निदेशक सुमन्त बत्रा एवं एआईएलएफ के निदेशक उमाशंकर यादव ने दीप प्रज्जवलन के साथ किया।
अहमदाबाद अंतरराष्ट्रीय साहित्योत्सव में पधारे साहित्य, संगीत, कला, सिनेमा, मीडिया, शिक्षा और सांस्कृतिक संस्थानों के विद्वानों, सुधीजनों, श्रोताओं को संबोधित करते हुए रघुवीर चौधरी ने एआईएलएफ के सफल आयोजन हेतु आयोजक मण्डल को शुभकामनाएँ दीं और कहा कि साहित्य और समाज का अटूट रिश्ता है, जिसे बनाये रखने के लिए इस तरह के साहित्य समारोह आयोजित किये जाने की बड़ी आवश्यकता है। योगेश गढ़वी ने अपने निराले अंदाज में साबरमती के तट पर मन-मस्तिष्क को निर्मल एवं ज्ञानरंजित करने वाले इस साहित्यिक कुम्भ के आयोजन को विशिष्ट मानते हुए कहा कि आज फिर अहमदाबाद का भाग्य जागृत हुआ है और आज फिर गांधी की धरती पर इतिहास रचा जायेगा। मधुर भंडारकर ने भारत में विभिन्न भाषाओँ में रचे जा रहे साहित्य के अनुवाद की जरूरत को महसूसते हुए कहा कि फिल्मों ने भाषायी दूरियों को कम किया है और दुनियाभर के लोगों तक अपनी बात पहुंचायी है। कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए सुमंत बत्रा ने कहा कि आज दुनिया में सबसे अधिक जरूरत 'सॉफ्ट स्किल्स' की है, जिसको हम साहित्य और कला के माध्यम से विकसित कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आज जीवन में मूल्यों का ह्रास बड़ी तेजी से हो रहा है इसलिए विश्व साहित्य को वर्तमान सन्दर्भों में  जानना-समझना बहुत जरूरी है। कार्यक्रम निदेशक उमाशंकर यादव ने  कहा कि एआईएलए 2016 का मुख्य उद्देश्य साहित्य, सिनेमा और मीडिया के अंतर्भेदी रिश्तों की पड़ताल करना तो है ही, साहित्य को जन-जन तक पहुँचाना भी है। उन्होंने अहमदाबाद में देश-विदेश से पधारे साठ से अधिक साहित्यकारों, मीडियाकर्मियों, अभिनेताओं, निर्माता-निर्देशकों और बुद्धिजीवियों सहित शहर के साहित्य रसिकों का तहेदिल से स्वागत किया और उनकी भूरि-भूरि प्रसंशा की।
पहले दिन नौ सत्र परिसंवाद के लिए रखे गए। प्रथम परिसंवाद 'कैप्टीवेटिंग स्टोरीलाइंस' में फ़िल्मी दुनिया के जाने-माने निर्माता-निर्देशक मधुर भंडारकर का साक्षात्कार अमदाबाद के सुपरिचित रेडियो जॉकी ध्वनित के साथ हुआ। मधुर जी ने बताया कि उन्होंने बचपन में ही स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी और रोजी-रोटी के लिए मुम्बई चले आये। मुम्बई पहुंचकर उन्होंने किताबें पढ़ना जारी रखा। उन्हें फिल्म देखने का भी बहुत शौक था और इसलिए उनके इस शौक ने उन्हें शिक्षित और सुसंस्कृत कर लक्ष्य तक पहुँचने में बड़ी मदद की। उन्होंने ने बताया कि अपने शुरुआती दौर में वह मुम्बई में वीडियो लाइब्रेरी चलाते थे। साईकिल से वीडियो घर-घर पहुँचाना, खासकर फ़िल्मी दुनिया के लोगों तक, और उन फिल्मों पर विचार-विमर्श करने से उनमें फिल्म बनाने की इच्छा जागृत हुई और कालांतर में वह फिल्म निर्देशक बन गए। उनके इस साक्षात्कार ने आईएमए के विशाल सभागार को न केवल स्पंदित किया बल्कि इससे श्रोताओं को उनके सवालों के जवाब भी मिले। कई जिज्ञासुओं ने मधुर जी से उनके फ़िल्मी सफर से सम्बंधित प्रश्न पूछे, तो कई अन्य उनके व्यक्तिगत जीवन को जानने-समझने में भी सफल हुए।
द्वितीय परिसंवाद का विषय 'मीडिया-ड्रिवन स्टोरीज़' रहा। इस परिसंवाद के पैनल में मीडिया जगत के चर्चित सितारे अजय उमत, ब्रजेश कुमार सिंह, अनुरिता राठौर, किरण मनराल और तुहिन सिन्हा थे; जबकि मॉडरेटर की भूमिका में प्रदीप मलिक ने रोचक प्रश्नों के माध्यम से चर्चा को गंभीरता प्रदान की। जर्नलिज़्म की प्रासंगिकता और उसके महत्व को रेखांकित करते हुए वार्ताकारों ने बताया कि चूँकि जर्नलिज़्म इतिहास का प्रथम प्रारूप है इसलिए इस क्षेत्र के लोगों बहुत ही सावधानीपूर्वक कार्य करना चाहिए।
तृतीय सत्र - 'लुकिंग फॉर लिट्रेचर' ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इस सत्र के पैनल में सुविख्यात साहित्यकार रघुवीर चौधरी, निर्माता-निर्देशक एवं गीतकार संदीप नाथ, कवि, आलोचक एवं संपादक अवनीश सिंह चौहान एवं चर्चित लेखिका ऊषा नारायणन ने मॉडरेटर प्रोफ़ेसर निगम दवे द्वारा परिसंवाद से सम्बंधित तथ्यों पर खुले मन से अपने विचार रखे।रघुवीर चौधरी ने कहा कि साहित्य को जीने वाले साहित्य को रचने में सफल तो हो सकते हैं, किन्तु सही मायनों में उन्हें सफल तभी कहा जा सकता है जब पाठक उनके विचारों को आत्मसात करें। संदीप नाथ ने बॉलीवुड से जुड़े अपने अनुभवों को युवान भाई-बहिनों के साथ साझा किया; जबकि अवनीश चौहान ने कहा कि साहित्य साधना है और जिसकी साधना जितनी अधिक होगी, उसकी लेखनी में जीवन का सच उतना ही अधिक होगा। 

इसी दिन कार्यक्रम के अगले चरण में छः अन्य सत्रों, यथा- 'बुक लॉन्च : लेट्स रेस, डैडी!' (लेखक - सोहम शुक्ला, रघुवीर चौधरी द्वारा लोकार्पित); 'पोएट्री फॉर एवरीवन' (पैनलिस्ट्स- कुमुद वर्मा, मुसाफिर पालनपुरी, नितिन सोनी, संतोष बकाया, तुषार शुक्ला। मॉडरेटर- यासीन अनवर); ''रिविजिटिंग मिथॉलजि एंड इट्स रेलवन्स टुडे' (पैनलिस्ट्स- अनुजा चन्द्रमौली, सुहैल माथुर, विनोद जोशी, उषा नारायणन, माधुरी शर्मा। मॉडरेटर- विश्वेश देसाई); 'बुक लॉन्च : शब्दोच्छव'; 'पोएट्री रिसाइटेशन' (पोएट - प्रदीप खंडवाला); 'गुजराती लिट्रेचर' (पैनलिस्ट्स- चिनु मोदी, शोभित देसाई, अनिल चावड़ा, संकेत जोशी। मॉडरेटर- भूषण मेहता); 'शॉर्ट स्टोरीज़' (पैनलिस्ट्स- सुमंत बत्रा, अरुण कौल, किरण मनराल। मॉडरेटर- कोरलदास गुप्ता); 'गुजराती फोक टेल्स' (पैनलिस्ट्स- योगेश गढ़वी से मौलिक चौहान की बातचीत); 'बुक लॉन्च : रवि मनोरम (तुहिन सिन्हा द्वारा लोकार्पण); एवं 'वर्ल्ड लिट्रेचर' (पैनलिस्ट्स- आर्थर डफ, फेब्रिस मैनगेन, तुहिन सिन्हा, विल्पा पटेल। मॉडरेटर - नीता खुराना), में साहित्य और समाज पर व्यापक चर्चा हुई। श्रोताओं/ भावकों से खचाखच भरे सभागार में साहित्यकारों/ विद्वतजनों द्वारा बेबाकी से जीवन में मूल्यों की महत्ता को साहित्य के माध्यम से पुनर्रेखांकित किया गया और उनके द्वारा बड़े मनोयोग से जिज्ञासुओं के प्रश्नोत्तर दिए गए। 

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द्वितीय दिवस

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अगले दिन रविवार को भी अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल में साहित्य, सिनेमा, संस्कृति पर गंभीर चर्चा हुई। श्रोताओं से खचाखच भरे सभागार में जब परिसंवाद प्रारम्भ हुआ तो सम्पूर्ण वातावरण शब्द-पुष्पों से सुशोभित हो उठा। वार्ताकार ही नहीं, बल्कि शब्द-रसिक भी चर्चा-परिचर्चा में ऐसे तल्लीन हुए कि कब समय बीत गया, पता ही नहीं चला। इस दिन का प्रथम सत्र 'लिट्रेचर एंड सिनेमा' पर केंद्रित रहा। पैनलिस्ट्स थे युवा फिल्म निर्माता-निर्देशक अभिषेक जैन, गीतकार, निर्माता-निर्देशक  संदीप नाथ, निर्माता-निर्देशक सुमाना मुखर्जी एवं थियेटर पर्सनालिटी एवं लेखक पियूष भट्ट। मॉडरेटर- मिसेज़ अर्थ इंटरनेशनल माधुरी शर्मा। 

सत्र का शुभारम्भ सिनेमा में साहित्य की भूमिका से हुआ। वार्ताकारों ने एक स्वर में उदघाटित किया कि साहित्य की सिनेमा में सदैव विशेष भूमिका रही है। इसलिए सिनेमा को साहित्य से अलग कर नहीं देखा जाना चाहिए। पियूष भट्ट ने कहा कि सिनेमा स्क्रीन के माध्यम से साहित्य को आम और खासजन तक पहुंचता है। इसको थोड़ा और स्पष्ट करते हुए संदीप नाथ ने कहा कि सिनेमा एक श्रव्य-दृश्य प्रणाली है जिसके लिए साहित्य का होना बहुत जरूरी है। अभिषेक जैन ने माना कि फिल्म का निर्माण 'स्क्रिप्ट' लिखने से प्रारम्भ होता है, जोकि अपने आप में साहित्य ही है। जब मॉडरेटर ने वार्ताकारों से उनके प्रोजेक्टों के बारे में पूछा तो सुमाना मुखर्जी ने टैगोर के साहित्य पर, अभिषेक जैन ने 'रॉन्ग साइड राजू' और संदीप नाथ ने 'डीएनए में गाँधी' की  फिल्म निर्माण प्रक्रिया से सम्बंधित अपने विचार रखे।  

द्वितीय सत्र में बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी गीतकार एवं अभिनेता पियूष मिश्रा से वरिष्ठ पत्रकार अनुरिता राठौर एवं आइकॉन सॉल्यूशन के अनुभवी निदेशक उमाशंकर यादव ने 'द पॉवर ऑफ़ वर्ड्स' विषय पर बातचीत की। मिश्रा जी ने बडी ईमानदारी से फिल्म इंडस्ट्री के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला और स्वीकार किया कि फ़िल्मी दुनिया में संतुलन बनाकर रहने में ही भलाई है। उन्होंने इस अवसर पर श्रोताओं के आग्रह पर अपने काव्य संग्रह 'कुछ इश्क किया कुछ काम किया' से कुछ रचनाओं का पाठ किया और अपने चर्चित गीत 'ओ हुस्ना' को सस्वर भी प्रस्तुत किया। उनसे हुई बातचीत सारगर्भित और आह्लादकारी थी। 

दूसरे दिन के अन्य सत्र- 'शीन इन देअर टीन' (पैनलिस्ट्स- लालिमा यादव, संजय अग्रवाल, विश्वेश देसाई। मॉडरेटर- प्रिया व्यास); 'लिटररी एजेंट्स: हू ऑल नीड देम?' (पैनलिस्ट्स- चिंतन सेठ, अनिल चावड़ा, आरती मोटिआनी, सुहैल माथुर। मॉडरेटर- योगी त्रिवेदी); ऑन्ट्रप्रनरशिप एंड क्रिएटिविटी' (पैनलिस्ट्स- आशा मण्डपा, मेहराब ईरानी, रवि मनोरम, सुमित अग्रवाल।  मॉडरेटर- जिगना शाह); 'प्रतिलिपि डॉट कॉम : ऑनलाइन इज ओन लाइन' (पैनलिस्ट्स- अवनीश सिंह चौहान, फाल्गुनी वसावदा, मनोज जेना, संकेत जोशी। मॉडरेटर- सहृदयी मोदी); 'सोशल ऑन्ट्रप्रनरशिप' (सृजन पाल सिंह से जतिन कटारिया की बातचीत); 'रोमैंस इन बुक्स' (रक्षा भराडिया, नितिन सोनी, सुदीप नागरकर, रवि बेदी। मॉडरेटर- लालिमा यादव), भी रोचक और महत्वपूर्ण रहे। इन सत्रों के वक्ताओं ने गहरी समझ एवं सूझ-बूझ का दिग्दर्शन कराया और श्रोताओं की शंकाओं का समाधान किया। कुलमिलाकर, इस दो दिवसीय साहित्योत्सव के सभी सत्र भाषा एवं साहित्य के प्रेमियों के लिए हितकारी, उत्साहवर्धक एवं ज्ञानवर्धक रहे। 

इस चर्चा-परिचर्चा के अतिरिक्त मुख्य सभागार से सटे हुए कक्षों में कुछ कार्यशालाओं/पाठशालाओं की भी व्यवस्था की गयी थी, जिनमें 'द आर्ट ऑफ़ लैटर राइटिंग' (मीनू जसदानवाला); 'पोएट्री राइटिंग एवं हाइकु राइटिंग' (तूलिका एवं वत्सल शाह); 'पेरेन-टीन्स वर्कशॉप' (डॉ निश्चल भट्ट); 'हाउ टु ऐड 5000 प्रोडक्टिव आवर्स टु योर लाइफ' (संजय कुमार अग्रवाल); 'अखा नु अमदावाद (जय मकवाना); 'टिंगल-ए-कविता' (फरीबुर्ज ईरानी); ''शब्दोच्छव' (पिंकी व्यास); 'इम्प्रूव पोएट्री' (पोवेरा); 'ओपन कैनवास' (झरोखा- पीडीपीयू); 'राइटिंग फॉर ब्लॉग्स' (रंजनी शास्त्री) आदि प्रमुख हैं। इन कार्यशालाओं से प्रतिभागियों के व्यक्तित्व विकास के साथ साहित्यिक अभिरुचि और सृजन की क्षमता का विकास भी हुआ। 

इस साहित्योत्सव का विधिवत एवं सफलतापूर्वक आयोजन अहमदाबाद के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, जिसके लिए आयोजक मंडल के प्रतिभासम्पन्न एवं कर्मठ सदष्यों- रश्मि गोयल, पिंकी व्यास, मनीष पटेल, फरीबुर्ज ईरानी, भूषण मेहता, विकास यादव, फेस्टिवल क्युरेटर अनुरिता राठौर एवं ऊर्जावान निदेशक उमाशंकर यादव सहित कुशल मंच संचालकों - निविद देसाई, सिमरन छावड़ा, नितिन पिल्लई, नीरजा वसावदा, कवीन पांचाल, आयेशाह जरीवाला, राज चुंडावत और कंकना रॉय आदि की जितनी प्रसंशा की जाय कम है। इस टीम ने अपने प्रथम प्रयास में वह कर दिखाया जो कई बार कई वर्षों के अनुभवों और अथक प्रयासों से संभव हो पाता है। 

इस अंतरराष्ट्रीय साहित्योत्सव का समापन के अवसर पर फेस्टिवल निदेशक उमाशंकर यादव ने सम्मानित श्रोताओं, भद्र नागिरिकों, सुधी विद्वानों, लेखकों, चिंतकों एवं विचारकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि 'एआईएलफ 2016 एक ऐसा मंच है जहाँ साहित्य, सिनेमा और मीडिया की परिधि में व्यक्ति को व्यक्ति से, समूह को समूह से वैचारिक आदान-प्रदान करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मुझे लगता है कि इस तरह के साहित्यिक कार्यक्रम निश्चित ही साहित्य और समाज को एक दूसरे के निकट लाएंगे और जन-मन की इच्छाओं, अपेक्षाओं एवं अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने में अपना विशिष्ट योगदान देंगे।' 

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