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व्यंग्य - विमुद्रीकरण / राजशेखर चौबे

विमुद्रीकरण

मेरे एक मित्र का पान का ठेला था। डॉक्टर ने उसे बताया कि उसके कंधे की हड्डी 'डिस्लोकेट' (खिसक) हो गई है। उसे एक नया शब्द मिल चुका था। अब किसी के सिर, पैर या रीढ़ की हड्डी में दर्द होने पर उसे लगता था कि सामने वाले का सिर, पैर या 'रीढ़ की हड्डी' (या शरीर का कोई भी अंग) डिस्लोकेट हो गई है। इसी तरह कहीं पर भी किसी भी विषय पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' का प्रयोग होने लगा है।

रजनीकांत के फिल्म का पहले दिन टिकट मिल जाने पर, लड़की के पट जाने पर, 500 या 1000 के पुराने नोट चल जाने पर और न जाने कौन-2 की सफलता पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' का प्रयोग किया जा रहा है। सरकार के पहले सर्जिकल स्ट्राइक (जो नापाक राष्ट्र पाक पर किया गया था ) पर कई लोग सबूत मांग रहे थे परन्तु दूसरे सर्जिकल स्ट्राइक (नोटबंदी) का कोई भी सबूत नहीं मांगा जा रहा है।

सरकार ने अचानक 8 नवंबर रात्रि 8 बजे 500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण कर विपक्षी नेताओं को राज्यों के चुनाव के पहले ही हतप्रभ कर दिया। प्रारंभ में सभी नेताओं को नोटबंदी की प्रशंसा करनी पड़ी। जिन लोगों के पास करोड़ों का कालाधन है उन्हें भी तारीफ करनी पड़ी। सरकार ने ऐसा धोबी पछाड़ मारा कि 500 और 1000 के नोट जमा करने वाले गरीब हो गए और 100 के नोट जमा करने वाले रातोंरात अमीर हो गए। बाद में नोटबंदी का लूपहोल निकालकर इसकी आलोचना की जाने लगी। कुछ का विरोध जायज है परन्तु कुछ का विरोध समझ से परे है। एक नेता का कहना है कि वे किसी भी बंदी का समर्थन करते हैं चाहे वह शराबबंदी हो या नोटबंदी। सरकार भले ही उदारवादी एवं दक्षिणपंथी हो परन्तु उनकी यह योजना समाजवादी एवं साम्यवादी सोच का परिचायक है। नोटबंदी को भारत की आम जनता का पूरा समर्थन प्राप्त है। ऐसा न हो कि विमुद्रीकरण का विरोध करने वाले नेताओं से जनता ही विमुख हो जाए।

नोटबंदी का असर कमोबेश सभी पर पड़ा है एक बेटा अपनी मां से कह रहा है मैंने ब्लैक को व्हाइट करने की कला सीख ली है और अपने अरबों रूपये में से 4000 लाईन में लग कर व्हाइट कर लिया है। पहली बार यह देखने में आया है कि जिसके पास जितना अधिक पैसा (कैश) है वह उतना अधिक परेशान है। जो जितना अधिक गरीब है वह उतना ही अधिक प्रसन्न है। जन-धन खातों में पैसों की बारिश हो रही है। जिन गरीब खातों को एक रूपया भी मयस्सर नहीं था उनमें हजारों रूपये जमा हो रहे हैं, भला हो नोटबंदी का सभी गरीब भाइयों एवं बहनों से निवेदन है कि पैसा खाते में जमा होने के बाद अपने दाताओं को भूल जाना है। कहावत अब बदल दिया जाएगा - चोर का माल चांडाल खाए' की जगह पर होगा 'चोर का माल गरीब खाए'। पहले जो लाग कहते थे कि मैंने किसी से चवन्नी भी नहीं ली है, अब वे लोग सीना ठोंक कर कह सकते है, 'मैं किसी से 500 और 1000 के नोट भी नहीं लेता'।

छत्तीसगढ़ सरकार ने स्वाइप मशीन पर वैट टैक्स खत्म कर दिया है ताकि व्यापारी आदि इसे खरीदकर अपने कार्यस्थल पर लगा सके। इस तरह हम 'कैशलेस लेनदेन की ओर एक कदम बढ़ा सकेंगे'। एक अतिरिक्त स्वाइप मशीन, ठेकेदार, उद्योगपति, कर्मचारी, अधिकारी, नेता, आदि के कार्यस्थल में लगाया जाना चाहिए ताकि लोग अतिरिक्त रकम (दान) को स्वाइप कर प्रदान कर सके। यह मंदिर के दान-पेटी की तरह होगा जिसमें देने वाले का कोई नाम-पता नहीं रहेगा परन्तु पाने वाले को सभी जान सकेगें। इस मशीन का पूरा डिटेल आन-लाईन उपलब्ध रहेगा और सभी के द्वारा देखा जा सकेगा। इस तरह प्राप्त दान (इसे काला-धन कहना उचित नहीं होगा) को इकट्ठा कर रखा जाए ताकि देश के प्रत्येक परिवार के खाते में 15 लाख रू. जमा किया जा सके। जनता को आम खाने से मतलब होना चाहिए न कि पेड़ गिनने से। यह भी पता चला है कि हाईटेक भिखारियों में से कुछ पेटीएम एप से पैसा ले रहें हैं और कुछ ने स्वाइप मशीन की बुकिंग कर ली है।

अंततः यदि नोटबंदी निर्णय को सफलता प्राप्त हो गई तो कांग्रेस का बयान शायद ऐसा ही होगा, 'एन.डी.ए. सरकार ने पूर्ववर्ती सरकार के मनरेगा सहित कई योजनाओं को ही आगे बढ़ाया है। इसी तरह नोटबंदी का फैसला भी हमारे पूर्व के निर्णय की नकल ही है। हमने भी चवन्नी बंद कर नोटबंदी की नींव रख दी थी।' सभी विपक्षी दल भी नोटबंदी के साथ साथ सरकार की तारीफ करते नजर आएगें। इस तरह यही कहा जाएगा कि अंत भला तो सब भला।

राजशेखर चौबे,

रायपुर

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