पटाखों का कमाल / बाल कथा / शशांक मिश्र भारती

दीपावली विशेष :

           दुबौला सरयू नदी के ऊपर बसा हुआ एक गांव है। नीचे से ऊपर को बने सीढ़ियोंदार खेत बड़े सुन्दर लगते थे। नदी के दूसरी ओर पहाड़ी जंगल। जहां जंगली जानवरों की अधिकता। एक -दो बकरी तो बाघ आये दिन उठा ले जाते हैं।जंगल के नीचे बिल्कुल सटी हुई सड़क पर इक्का-दुक्का वाहन कभी-कभी दिख जाते हैं।

            फरवरी का महीना समाप्त होने वाला था। खेतों में हरी-हरी बालें दिखने लगी थीं। ऊपर से देखो तो दृश्य बड़ा सुहाना लगता था।मानो प्रकृति ने हरी चादर बिछा दी हो।नीचे बलखाती सरयू की धारा पत्थरों से टकरा कर मन भावन संगीत छेड़ रही थी।गांव में एक सूबेदार थे।वे अपने खेतों में लहलहाती गेहूं की मोटी-मोटी बालियां देखकर फूले न समा रहे थे। प्रतिदिन सुबह-शाम खेत में जाते, खाद-पानी आदि का ध्यान रखते।

           लेकिन उनकी खुशियां चिन्ता में बदलती जा रही थीं इधर बालियों मे दाने पड़ने शुरु हुए उधर किसी ने उन्हें अपना भोजन बनाना शुरु किया।इतनी निगरानी के बाद भी यह परिणाम हो रहा था।

           कोई कहता -जंगली सुअर होगा, कोई कहता वह नहीं हो सकता, कोई कहता अरे- सूबेदार जी गांव के लड़के भी तो बहुत शरारती हो गये हैं।जब पपीते खा जाते हैं तो गेहूं क्यों नहीं ?कोई बताता सियार भी शौकीन होता है।

           ''अब कोई भी हो मैं पता लगाकर ही छोड़ूंगा।'' सूबेदार ने एक फौजी की तरह रौब जमाने वाले अंदाज में कहा।

             उसके बाद से ही सूबेदार व उनका छोटा लड़का महादेव बारी -बारी से खेत की रखवाली करने लगे।कई दिन बीतने के बाद भी चोर पकड़ में नहीं आया।तो रखवाली करने में लापरवाही होने लगी।

         एक रात सूबेदार की आंख खर- खर की आवाज सुनकर अचानक खुल गई।उठकर देखा तो एक जंगली सियार गेहूं की बालें आराम से खा रहा था।मारने को दौड़े; कि वह भाग गया हाथ न आया।

        अगले दिन ही सबको पता लग गया कि सूबेदार के गेहूं खाने वाला एक सियार है।सूबेदार ने घर पर सबको बता दिया था।आज रात बारी थी।महादेव की, वह भी कुछ कम न था- निडर, साहसी।जंगल के किसी जानवर से वह न डरता था।वह आज मन ही मन खुश था।उसने ठान लिया था कि सियार आयेगा तो सबक सिखा ही दूंगा।दुकान से पटाखों की एक पूरी लड़ी वह चुपके से ले गया था।आज की रात महादेव बिल्कुल नहीं सोया।वह पूरी तरह चौकस था। इंतजार करते- करते जब आधी रात बीत गई तो खर- खर की आवाज सुनाई पड़ी।

         महादेव धीरे से उठा और उसने धीरे-धीरे जाकर पीछे से रस्सी का फंदा डालकर सियार को पकड़ लिया और उसे लाकर एक बड़े से पत्थर से बांध दिया।फिर निकाली पटाखों वाली लड़ी और उसकी पूंछ में बांध दी।

          अब तो महादेव मन ही मन खुश था कि कितना मजा आयेगा जब पटाखे छूटने से सियार भागेगा।घर वाले तो खुश होंगे ही ।गांव वाले भी पीठ थप- थपायेंगे।पर हुआ इसका उल्टा , जैसे ही पटाखों की लड़ी में आग लगाई।सियार घबरा कर रस्सी तोड़कर गेहूं के खेत में घुस गया और लगा इधर- उधर दौड़ने।धीरे-धीरे पूरा खेत ही आग की चपेट मे आ गया और बाद में उछलता हुआ नीचे बह रही सरयू मे कूद पड़ा।पटाखों की आवाज सुनकर गांव वालों की नींद खुल गई।उठकर देखा तो खेतों में आग लगी हुई थी।दौड़ कर गये, बुझाने की कोशिश की पर थोड़ी बहुत फसल सभी की जल गयी थी।सूबेदार का तो पूरा खेत ही साफ हो गया।
          सूबेदार गुस्से से लाल हो रहा था।कि- ''तुझे पटाखे लगाने की क्या आवश्यकता थी।जब पकड़ लिया था; तो बांधे रखता, पत्थर मारता, डण्डे लगाता या कुछ न करता।'' लेकिन अब क्या हो सकता था। महादेव दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर  एक ओर बैठा फूट-फूट कर रो रहा था।

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29.10.2016
शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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