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नोट तो नोट है ,फिर भी चल जाएगा / व्यंग्य / राकेश अचल

राकेश अचल

व्यंग्य 

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नोट तो नोट है , फिर भी चल जाएगा

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फितरत खान दुखी हैं. बुक्का फाड़कर रो नहीं सकते. और न रोएं तो मरने का खतरा है. सरकार ने अचानक, आधीरात से बड़े नोट बंद कर दिए हैं. डाक्टर कह रहे हैं की जैसे भी हो खान साहब को रुलाये. दरअसल खान साहब बड़े आदमी हैं. उनका हर काम बड़ा ही होता है. बड़े-बड़े खेत हैं. बड़े-बड़े कारोबार हैं. बड़ा नाम है. बड़ा काम है. बड़ा गोदाम है. और तो और एंटी में जितना भी दाम है, वो भी बड़ा ही बड़ा है.

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एक जमाने में बड़ा होना बड़प्पन की निशानी थी. अब आफत की निशानी बन गया है. फितरत खान के पास बड़े नोटों का अकूत भंडार है. लेकिन वे अब इसको लेकर परेशान हैं. इतने बड़े नोट लेकर कहाँ जाएँ? कैसे बैंक वालों को अपना मुंह दिखाएँ ? बैंक वाले कहेंगे नहीं की इतना माल दबा कर क्यों बैठे थे ? पहले ही दे दिया होता तो मैनेजर का टारगेट पूरा हो जाता. प्रमोशन का गेट खुल जाता बेचारे का. लेकिन तब तो ऐसे बैठे थे जैसे उधार मांग कर खा-पी रहे हों.

फ़ितरत खान की बिरादरी के लोग केवल हमारे ग्वालियर में ही नहीं हैं, पूरे मुल्क में हैं. अभी तक मुल्क इन लोगों की मुठ्ठी में हुआ करता था. अब ये मुल्क की मुठ्ठी में हैं. मिन्नतें कर रहे हैं, रिरिया रहे हैं , बड़े नोट जमा कराने के लिए. पांच सौ का नोट चार अउ में और हजार का आठ सौ में देने के लिए राजी हैं, फिर भी ईमानदार रियाया है की हाथ नहीं धरने दे रही.

बड़े नोटों के चलन ई कब्र पाकर बड़ी बी रात से ही सन्निपात में चली गयीं हैं. बार-बार मुंह पर पानी छिड़कना पड़ रहा है. पता नहीं क्या आंय-सांय बड़बड़ा रही हैं ? डॉक्टर परेशान हैं. नींद की सुई लगा कर अभी अभी गए हैं , लेकिन हमारा बाबा खुश है. उसकी सेहत पर बड़े नोट बंद होने का कोई साइड इफेक्ट नजर नहीं आ रहा. बाबा ने रोज की तरह कपालभाती की , आसन लगाए , आँखें मिचकाई. और मुस्कराते हुए बोले-"देखो हम पहले से ही कहते थे की ऐसे कपड़े पहनो जिसमें जेब न होती हो. तब हमारी बात किसी ने मानी नहीं. मान लेते तो आज ये दिन न देखना पड़ते.

बाबा का अर्थशास्त्र देसी है. बिना जेब के ही पांच से ग्यारह और ग्यारह से पच्चीस करोड़ के आसामी हो गए बाबा , लेकिन बड़े नोट बंद होने की कोई टेंशन नहीं. सारा माल नेट बैंकिंग से, या प्लास्टिक मनी से चलता है. खिन -खिन तो केवल जबान हिलाने या आँख मिचकाने से ही बात बन जाती है. देश में बाबाओं की अर्थव्यवस्था में कालाधन पनपता ही नहीं. केवल गेरुआ  धन   ही फलता -फूलता  है. गेरुआ धन कभी अपावन नहीं होता. इससे न आतंकवाद पनपता है और न इसे जाली बनाया जा सकता है. ये पूर्णता स्वदेशी होता है. स्वदेशी माल कभी हानिकारक नहीं होता.

अरे भाई ! हम फितरत की बात करते-करते कहाँ बाबाओं पर आ गए , बाबा नाम तो जहाज है, इस पर सवार होकर कोई भी पर हो सकता है.. आपके पास अगर बड़े नोट हैं तो आप बाबा की दूकान से फिलहाल दवाएं खरीद कर स्टाक कर लें. दवाओं की खरीद में अभी बड़े नोट स्वीकार किये जा रहे हैं. बाद में बाबा की दवाएं, आटा, ब्यूटी क्रीम आदि सामग्री बेच कर आप मुनाफ़ा भी कमा सकते हैं और अपनी पूँजी भी बचा सकते हैं

हमारे इव रेडा भाई ने तो आनन-फानन में "बड़े नोट कैसे भुनाएं "नाम की एक किताब ही लिख दी है. उनकी किताब हाथों हाथ बिक रही है. इव रेडा भाई ने बड़े नोटों से छोटी किताब छपवाई और अब उसी से छोटे-छोटे, नन्हे-नन्हे नोट कमा रहे हैं. अपना-अपना हुनर है साहब. हुनर की कीमत सब दूर है. सियासत में तो है ही. अब मोटा भाई ने अपना हुनर दिखाया तो दुनिया में एक बार उनका डंका फिर बज गया. जब-जब डंका बजता है, तब-तब मोटा भाई खुश हो जाते हैं

फितरत खान साहब को तकलीफ है की मोटा भाई ने बड़े नोटों पर पाबंदी लगाकर अपने बड़े दिल का परिचय नहीं दिया. अरे भाई जब बड़े नोट बंद ही करने थे तो दो हजार का नोट क्यों ला रहे हैं ? जितना बड़ा नोट आएगा उतना कालाधन बढ़ेगा. लेकिन क्या करें? बड़े लोग इतनी छोटी-छोटी बातें समझते ही नहीं , जबकि रहीम दास जी साफ़ साफ़ कह गए थे की -बड़ों को देखकर  छोटों  की अनदेखी अनसुनी  नहीं करना चाहिए. बहरहाल अब हम भी निकल रहे हैं अपना एकलौता बड़ा नोट बैंक में जमा करने. , आखिर राष्ट्रप्रेम का मुजाहिरा हमें भी तो करना है. नोट की क्या, नोट तो नोट है वो तो चल ही जाएगा !

@राकेश अचल

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