आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

चार आँखें,चौबीस हाथ / व्यंग्य / राकेश अचल

image

चार आँखें,चौबीस हाथ

*************************

अपने वही शांताराम ने बड़ी जल्दी की जो 59  साल पहले "दो आँखें ,बारह हाथ" जैसी फिल्म बना डाली .वे अपना प्रोजेक्ट अगर आज हाथ में लेते तो उनकी फिल्म का शीर्षक होता-"चार आँखें,चौबीस हाथ". हमारे अब्बा बताते थे कि "दो आँखें ,बारह हाथ"गोल्डन जुबली फिल्म थी और अकेले मुमनबी में 65  हफ्ते चली थी .

नए शीर्षक पर फिल्म बनाने के लिए हम शीर्षासन करने को तैयार हैं बशर्ते कि कोई हमें फायनेंस कर दे .शांताराम के जमाने में मंहगाई नहीं थी ,हर चीज सस्ती थी,कलाकार सस्ते थे,संगीतकार सस्ते थे,दर्शक सस्ते थे और तो और सिनेमा के टिकिट सस्ते थे .यहां तक कि लागत कम करने के लिए शांताराम जी खुद अभिनय कर लेते थे ,लेकिन अब जमाना बदल गया है .अब आँखें भी दो की जगह चार हो गयीं हैं और हाथ भी बारह की जगह चौबीस .

आँखों और हाथों की बढ़ी हुई संख्या की वजह से नयी फिल्म की लागत भी बढ़ गयी है ,ये स्वाभाविक है. जितनी आँखें होंगी ,कितने हाथ होंगे उतना उनका मेहनताना भी होगा .शांताराम जी ने अपराधियों के हृदय परिवर्तन पर सिनेमा बनाया था ,आज भी ये परिवर्तन का दौर जारी है .कोई सत्ता परिवर्तन के लिए समर्पित है तो कोई दल परिवर्तन के लिए .यानि सभी परिवर्तन के हामी हैं

अभी मैं यूपी में था,वहां अखिलेश ने अपना चुनाव चिन्ह साइकिल होते हुए भी चुनाव प्रचार के लिटाये रथ का इस्तेमाल करना शुरू किया है. ये भी परिवर्तन ही है .साइकिल वाला अगर रथारूढ़ हो जाये तो समझना चाहिए कि यूपी में  तरक्की हुई है  ?लेकिन अमित भाई मानने को तैयार ही नहीं है .जनता को कमल दिखा-दिखा कर समझने में लगे हैं कि -ये परिवर्तन झूठा है,असल परिवर्तन तो हम करेंगे .शाह साहब सबूत देते हैं कि -देखिये हमने रीता बहुगुणा को परवर्तित करा दिया ,उनके पास तो बहुगुणा थे ?जब वे बदल गयीं तो क्या यूपी में राज नहीं बदल सकता ?

शान्ताराम जी अगर प्रतीक्षा कर लेते तो उन्हें अपनी नई पटकथा के लिए कितना मौलिक माल मिलता .मसलन जैसे उनके जमाने में दो आँखें और बारह हाथ किसी को आफ एयर नहीं कर सकते थे ,लेकिन जैसे ही इनकी तादाद बढ़ी ये आफ एयर करने  की कला भी सीख गए .आँखें चार हों तो चार गुना दिखाई देने लगता है .और हाथ चौबीस हों तो काम भी जल्द निबटता है .किसी को निबटाने के लिए बढ़ हाथों से तो इस डिजिटल ज़माने में काम चलने वाला नहीं है .यानि अब जिसके पास जितने हाथ वो इंसान/पार्टी/नेता उतना ही ज्यादा कामयाब माना जाएगा .

आज के जमाने में बड़े बजट की फिल्म बनाना भी छोटा काम है ,बजट बनाइये और जिओ की तर्ज पर चाहे जितना ले आइये .बड़े बजट की फिल्म चले या न चले उसकी चर्चा हमेशा बड़ी ही होती है .इसमें बड़े-बड़े कलाकार बड़ी-बड़ी बातें करते हैं,जिन्हें छोटे-छोटे लोग पूरी फिल्म देखने के बाद भी नहीं समझ पाते और जेब काटा कर चले आते हैं .आजकल सियासत में भी यही सब हो रहा है . चुनावों का बजट बड़ा हो गया है ,जिसके पास नजत है वो ही सियासत कर सकता है ,हम जैसे अल्प बजट वालों के लिए सियासत में कोई जगह है ही नहीं .

बहरहाल हम बात कर रहे थे अचानक आँखों और हाथों की संख्या बढ़ने से उत्पन्न हुए संकट की. अब आँखें ज्यादा हैं तो चौकसी बढ़ गयी है, हाथ ज्यादा हैं तो उन्होंने ने भी नए   नए काम खोज लिए हैं. ये हाथ कभी कीचड़ फैलाते हैं, कभी कीचड़ में कुछ खिलते हैं तो कभी कुछ. कभी गर्दन नापते हैं तो कभी गर्दन दबाते हैं आप कह कटे हैं कि हाथों के बढ़ने के साथ ही बेकारी और आँखों के बढ़ने के साथ ही बेकरारी भी बढ़ रही है .इसलिए नए शीर्षक कि प्रस्तावित फिल्म में पुराने जमाने के कलाकार , अनगिनत तकनीक, लाइट और साउंड चले या न चले लेकिन एक गीत जरूर चल सकता है ,जिसके बोल हैं -

"जिया बेकरार है,आई बहार है .......

आप फुर्सत में हों तो फिलहाल ये गीत गुनगुना सकते हैं, चार आँखें चौबीस हाथ फिल्म जब बनेगी, तब बनेगी.

@राकेश अचल

टिप्पणियाँ

  1. =)) हा हा... सही कहा, अभी तो यही फिल्म बन सकती है।

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.