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व्यंग्य / देख तेरे संसार की हालत ..... / सुशील यादव

देख तेरे संसार की हालत .....

1.

‘मनखुश’ भाई .... आज भी ....?

पता नहीं कब से और कैसे मैं मनसुख को मन-'खुश' कहने लगा।

उसे हरदम प्रसन्नचित्त देखते रहने से आदतन मेरी जुबान में उसका नाम मनखुश दर्ज  हो गया था। वो भी इसे सहजता से लेता है।

उसे दुखी या उदास देखने की कल्पना भी पास नहीं फटकती।

वो आज ऐटीएम की लंबी कतार में पैंसठवें नम्बर पर खड़ा हो बचपन से साथ पढ़ते समय पहले और दूसरे के अलावा तीसरे आने पर पढ़ाई की रफ्तार बढ़ा देता था। उसे पहली बार मायूस देखा।

क्या करें बन्धु ,क्या ज़माना आ गया .....अपना पैसा ..... अपनी कमाई और अपनी मेहनत की पूंजी को बाहर लाने में ये मशक्कत ....। तीन दिनों से लाइन में लगता हूँ .... नंबर आते तक कैश ख़त्म हो जाता है, आज भी लगता है हो नहीं पायेगा ....?

तेरे पास एक आध-सौ का है तो काम चला दे ,आज का काम तो निकले  ....। वो लगभग रुआंसा हो चला था ....। मैंने कहा मैं पीछे लगा हूँ देखते हैं ,अगर नम्बर नहीं आये तो करेंगे कुछ इंतिजाम ....।

कुछ दिनों से मेरे साथ यही हो रहा है ,निकालने आता हूँ रुपिया, और जेब से चार -पांच सौ लाइन में लगे परिचय के जरूरतमंदों को बाट जाता हूँ।

मुझे अपने से ज्यादा उनका संकट भारी लगता है।

##2.

वे हाथ में मैले कुचैले से थैला लिए अपनी सोच में मगन चले जा रहे थे। पास से गुजरती हुई मेरी मोटर सायकल को रुकने का इशारा किया ,मैंने पूछा कहिये नटवर जी ,कहाँ छोड़ दें आपको। इतनी धूप में सब्जी-भाजी लेने कहाँ निकल पड़े .....? वे बोले आप इस थैले से कन्फ्यूज हुए लगते हैं। बढ़िया है। हम घटिया थैला लिए ही इसी खातिर हैं कि लोग कन्फुजियाये रहें , दरअसल इसमें काला धन है। वे मुझको व्यंग्यकार समझ के व्यंग की भाषा में बतियाने का उपक्रम करते दिखे।

मैंने सआश्चर्य उनके साहस को दाद देते हुए कहा ,तब तो ,इस मैले से थैले का भाग जग गया।

वे बोले, बुद्धिजीवियों,चोर-उचक्कों को भ्रम में डालने के लिए इस थैले का प्रयोग हम बरसों से करते आ रहे हैं। वे इसमें नगदी होने की कल्पना भी लोग नहीं पालते और हम आढ़त से दिन भर की वसूली को लेकर, बस –रेल, रिक्शा -ऑटो में मजे-मजे आ -जा लेते हैं। यूँ कहें अभी हम बैंक जा रहे हैं।

हमने पूछा ज्यादा जोखिम की रकम तो नहीं है। वे बोले आप तो घबरा रहे हैं ...? मैंने मन में सोचा,काले धन के चक्कर में , कहाँ ये अदना लेखक फंस सा रहा है। बाइक के एक्सीलेटर को ब्रेक दबा-दबा के चलाते हुए जतलाया कि निकट भविष्य में बाइक आगे जाने से इंकार कर सकती है।

उनको ये भी कहा कि उन्हें किसी मेकेनिक की शाप नजर आये तो ताकीद करें।    ‘परिचित’ होने के परिचय-धर्म को निबाह करने के नाम पर आगे कहा ;नटवर भाई आजकल हेलमेट न पहनने पर गवर्नर्मेंट को जुर्माना बंद कर देना चाहिए। या हजार पांच सौ के खुल्ले चालान होने पर देने की व्यवस्था हो। लोगों को चालान करवाने का भारी सुख जो कभी न मिला ,मिलाने लग जाएगा। वैसे चारों तरफ से सरकारी लूट अच्छी नहीं ....क्या कहते हैं ..? उनकी सहमति की गर्दन सामने आये स्पीड ब्रेकर की वजह से कुछ ज्यादा हिली, जो मेरे गर्दन से टकराई।

चूंकि वे मेरी रचनाओं के सजग, पार्ट-टाइम पाठक भी थे अतः: मेरी बातों के मर्म तक सीधे जा पहुंचे। फरमान जारी किया कि गाड़ी रोक दो।

- मैंने ब्रेक मारते हुए पूछा, थैला गिरा क्या..... ?

नहीं बैंक नजदीक है . यहीं उतार दो पैदल चला जाउंगा।

माहौल को सामान्य बनाने की गरज से मैंने कहा अगर आपके काले-धन को बैंक तक   सुरक्षित पहुंचा देता तो मुझे खुशी होती  ....?बैंक के आसपास सादे लिबास  में मंडराते आईटी और पुलिस के खौफ़  को सजग पडोसी होने के नाते दरकिनार कर  रख देने में बहादुरी का परिचय भी मिलता है, ये सोच के पूछ लिया ,  वैसे है कितना ....?

वे बोले ज्यादा नहीं,  बस बीस-हजार है।

अरे आप इतनी कम रकम को नाहक भारी भरकम नाम ‘काला-धन’ देकर हमें क्या-क्या सोचने पर मजबूर कर दिया ,आपसे ज्यादा तो हमारे पास है देखिये ,पूरे चालीस-हजार, वो भी खीसे में लिए  चलते हैं। बैठो हम भी उसी बैंक को जा रहे हैं। मेरी बाइक स्मूथ चलते हुए,  सीधे बाइक की पार्किंग में जा रुकी।

 

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छत्तीसगढ़)

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