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‘ककनागवउआ’ ही ‘ककनागवउआ’ / पंकज सुबीर

‘ककनागवउआ’ ही ‘ककनागवउआ’

(त्रैमासिक पत्रिका विभोम स्वर के "आख़िरी पन्ना" स्तंभ में प्रकाशित पंकज सुबीर का लेख)

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भोपाल के कवि-कथाकार संतोष चौबे की कहानी ‘लेखक बनाने वाले’ में यह शब्द आता है ‘ककनाउआ’। यह पंचमुखी रचनकारों के संदर्भ में वहाँ आता है। ऐसे रचनाकार जो ‘क’ से कवि भी हैं, ‘क’ से कथाकार भी हैं, ‘ना’ से नाटककार भी हैं, ‘उ’ से उपन्यासकार भी हैं और ‘आ’ से आलोचक भी हैं। संतोष चौबे की कहानी में अलग संदर्भ है लेकिन मुझे लगता है कि इन दिनों सारे रचनाकार ‘ककनागवउआ’ होते जा रहे हैं(‘ग’ से ग़ज़लकार और ‘व’ से व्यंग्यकार भी)। इस होते जाने के पीछे कारण है लगातार और अनवरत् छपने का सुख।

कहीं आपकी कहानी छप रही है, कहीं कविताएँ, कहीं समीक्षा तो कहीं लघुकथा। यह बात अलग है कि कोई भी रचना कहीं नहीं पहुँच रही है। बस छपे का सुख जो मिलना चाहिए, वह भर मिल रहा है। तो क्या छपना ही हमारा अंतिम लक्ष्य हो गया है? हमारी सारी रचनाधर्मिता केवल छपने के लिये ही है ? यह एक ख़तरनाक स्थिति है।

किसी पत्रिका के एक अंक में आपकी कहानी छप गई है, तो आपको लगता है कि आने वाले दो-तीन अंकों में अब वहाँ कहानी तो छपेगी नहीं आपकी, आप तुरंत लौटती डाक से तीन कविताएँ और एक लघुकथा भेज देते हैं। अरे हाँ! अभी व्यंग्य और ग़ज़ल को तो हम भूल ही गए थे। इस समय हर रचनाकार एक साथ कहानीकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार, कवि, समीक्षक, ग़ज़लकार, नाटककार (और शायद आलोचक भी) है। वह किसी और के लिये कोई स्पेस ख़ाली छोड़ना ही नहीं चाहता है। जहाँ छपे बस वो ही छपे।

वर्तमान में हिन्दी की एक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं किरण सिंह, जो वर्ष भर में एक ही कहानी लिखती हैं। लेकिन, जब वह कहानी प्रकाशित होती है तो हलचल मच जाती है। जैसा उनकी पिछली कहानी ‘द्रोपदी पीक’ ने भी किया। साल भर में केवल एक, या कभी वह भी नहीं लिखने वाली किरण सिंह इस समय की सबसे महत्त्वपूर्ण कहानीकारों में हैं। क्या हम किरण सिंह से कोई सबक ले सकते हैं? बहुत ज़्यादा छपना एक प्रकार का ओवर एक्सपोज़र होता है और यदि ओवर एक्सपोज़र सशक्त न हो, तो वह नुकसान ही करता है। एक और नुकसान यह भी होता है कि पाठक आपके बारे में कोई धारणा ही नहीं बना पाता। उसे पता ही नहीं चलता कि आप क्या हैं ?

क्योंकि आप तो ‘ककनागवउआ’ हैं।

आप ‘मास्टर ऑफ नन’ बनने में विश्वास नहीं रखते हुए ‘जैक ऑफ ऑल’ होते जा रहे हैं। आप अपने अंदर के सबसे सांद्र पक्ष को ही नहीं पहचान पा रहे हैं, और तनु अवस्था में कई विधाओं को एक दूसरे में गड्ड-मड्ड करते जा रहे हैं। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी इस समय के बड़े व्यंग्यकार हैं, आपने किसी दूसरी विधा में उनकी कोई रचना पढ़ी है? शायद नहीं। ऐसा नहीं है कि उन्होंने किसी दूसरी विधा में लिखा ही नहीं होगा, लिखा होगा, लेकिन उन्हें पता है कि व्यंग्य ही उनका सांद्र पक्ष है। बाकी किसी विधा में उन्होंने कुछ लिखा भी होगा, तो वह डायरी में क़ैद कहीं दबा पड़ा होगा।

जो कुछ भी हम लिखते हैं, वह सब कुछ प्रकाशित होने के लिये नहीं होता। लेकिन इस समय तो ऐसा लगता है मानों सबको छपने की जल्दी सी हो रही है। इधर लिखा और उधर वह छप जाए। जो लिखा, जैसा लिखा, वैसा का वैसा ही छप जाए, संपादन जैसा कुछ भी उसके साथ न हो। हम यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारी कमज़ोर रचनाएँ सामने आ-आकर हमारा कितना बड़ा नुकसान कर रही हैं।

इस पन्ने पर लिखते समय ‘मैं’ ‘मैं’ नहीं रहता, हो सकता है आपको बुरा लगा हो, लेकिन, एक बार काँच के सामने खड़े होइए, अपने आपको गौर से देखिए और सोचिए कहीं आप भी ‘ककनागवउआ’ तो नहीं होते जा रहे हैं ?

यदि ‘हाँ’ तो सँभल जाइए.......

.सादर आपका ही,  पंकज सुबीर

संपर्क : subeerin@gmail.com

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