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बाल विज्ञान-कथा / ऐली की दुनिया में / कल्‍पना कुलश्रेष्‍ठ

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बाल विज्ञान-कथा

ऐली की दुनिया में

कल्‍पना कुलश्रेष्‍ठ

राजन की आँखें खुलीं तो उसने स्‍वयं को एक फुटपाथ पर खड़े हुए पाया। चौड़ी, साफ कांच जैसी चमकदार सड़क पर बेशुमार गाड़ियां बिजली की गति से आ-जा रही थीं। न सिर्फ सड़क बल्‍कि आसमान में भी तरह-तरह के वाहन उड़ते दिखाई दे रहे थे जिनके इंजन और हॉर्न की आवाजें मधुर संगीत की तरह सुनाई दे रही थीं। अत्‍यंत ठंडी हवाओं में विचित्र सी ताजगी भरी महक घुली हुई थी।

यकायक कुछ याद आते ही वह भय से सिहर उठा। रात साढ़े बारह बजे तक वह अपने कमरमें में पढ़ता रहा था। अगले दिन उसकी कैमिस्‍टी के प्रयोगात्‍मक परीक्षा थी। एक तो अगस्‍त की चिपचिपी उमस भरी गर्मी तो दूसरी ओर कैमिस्ट्री की जटिल रासायनिक अभिक्रियाएं। बिजली न होने के कारण पड़ोस के घरों में जनरेटर चल रहे थे जिनका कड़वा धुआं और शोर उसे परेशान किए हुए था। तंग आकर वह थोड़ी चहलकदमी करने के इरादे से बाहर लॉन में आ गया था। अभी दो-चार कदम ही चला कि था आंखों के आगे अंधेरा छा गया। चारों ओर घूमती सांय-सांय करती तेज हवा तक सुरंग की तरह उसे अपनी ओर खींच रही थी। उसक पैरों के नीचे से ठोस जमीन सरक गई थी और वह उसी काली सुरंग मेें गिरता चला जा रहा था। पलक झपकते ही यह सब कुछ घटित हो चुका था। फिर वह चेतना खो बैठा था।

परंतु यह सब क्‍या था। अपने छोटे से शहर के लॉन से वह यहां जगमगाती, आसमान छूती इमारतों के शहर में कैसे आ गया था? न जाने यह कौन सी जगह थी। शायद वह सपने में था। उसने अपना सिर जोर-जोर से झटका, हाथ-पैर पटके और कूदने लगा। इस पर भी जब सपना नहीं टूटता तो उसने चीखना शुरू कर दिया।

थोड़ी दूर पर खड़ी एक लड़की बड़ी दिलचस्‍पी से उसकी ये हरकतें देख रही थी। आखिरकार जब रोने को आ गया तो वह उसके पास आई।

‘‘मैं कहाँ हूँ, इस सपने में मुझे जगाओ प्‍लीज’’ राजन ने गिड़गिड़ाकर कहा। हरे बालों और सुनहरी रंगत वाली उस लड़की की आंखें आश्‍चर्य से फटी रह गइर्ं।

‘‘यह कोई सपना नहीं है। तुम जंजीरा सौरमंडल के पथरा ग्रह पर हो’’ उसने कहा।

‘‘ओह तो तुम कहना चाहती हो कि मैं पृथ्‍वी पर नहीं हूँ. . लेकिन मैं यहां कैसे पहुंच गया?’’

‘‘मेरे सैंसर मुझे संकेत दे रहे हैं कि तुम कोई अजनबी हो। लेकिन तुम यहां किस तरह...शायद तुम किसी समय-सेतु में प्रवेश कर गए होंगे’’ उसने सोचते हुए कहा।

‘‘समय-सेतु... वह क्‍या है?’’ राजन विचलित हो उठां ‘‘समय एक सतत धारा नहीं वरन कालखंडों की लड़ी की तरह है इन कालखंडों के बीच अत्‍यंत सूक्ष्‍म गैप है जो समय-विहीन होते हैं। बिलकुल उसी तरह जैसे मोतियों की लड़ी में मोतियों के बची गैप होते हैं। इस गैप में दूसरे संसारों की समय लड़ियां समाई हो सकती हैं। समय-सेतु वे हैं जिनके दोनों सिरे विभिन्‍न संसारों के कालखंडों में खुलते हैं। इस तरह समय-सेतु द्वारा किसी दूसरे संसार में चले जाना संभव हो सकता है।

‘‘अब में वापस कैसे जाऊँगा’’ राजन का दिमाग सुन्‍न होने लगा।

‘‘तुम परेशान मत होओ। प्रकृति में विकृति देर तक नहीं ठहरती है। जैसे आए हो वैसे ही चले भी जाओगे, किसी अन्‍य समय सेतु द्वारा। तब तक मेरे साथ चलो, तुम्‍हारा मन बहल जाएगा, इसे पहन लो’’ अपनी शर्ट के ऊपर पहनी हुई जैकेट उतारकर उसने ठंड से ठिठुरते राजन की ओर बढ़ा दी।

‘‘इतनी पतली सी जैकेट और इतनी गर्म?’’ राजन उस अनजानी लड़की के साथ, स्‍वयं को कुछ शांत का सहज अनुभव करने लगा था।

‘‘यह गर्म ही नहीं ठंडी भी हो सकती हैं इसमें कुछ खास तरह के सेंसर लगे हैं जो वातावरण की जरूरत के अनुसार शरीर केा गर्म या ठंडा रख सकते है’’ उसने बताया।

‘‘मैं राजन हूं।’’ तुम्‍हारा नाम क्‍या है?’’ उसने पूछा ‘‘मैं ज्ञळ 210 हूं’’ उसका उत्तर सुनकर राजन हैरान हो उठा।

‘‘यह भी कोई नाम है?’’ ‘‘हमारे यहां ऐसे ही नाम बल्‍कि कोड होते हैं। वैसे तुम मुझे ऐेेली कह बुला सके हो। दरअसल अपने ग्रह के अन्‍य मनुष्‍यों की तरह मैं भी एक साइबोर्ग हूं। यानी मनुष्‍य और मशीन की मिली-जुली नस्‍ल। मुझमें मशीनों जैसी क्षमता, ताकत और सामर्थ्‍य है साथ ही इंसानी भावनाएं, संवेदनाएं और दिमाग भी।’’

अचानक आसमान में उड़ती एक नाव जैसी गाड़ी आकर उनके सामने ठहर गई।

‘‘इस एअर-टैक्‍सी में बैठ जाओ। पैदल चलते-चलते तुम थक जाओगे।’’ दोनों के अन्‍दर बैठते ही डांइवर-विहीन कम्‍प्‍यूटर-चालित टैक्‍सी उड़ चली। राजन उत्‍सुकता से बाहर के नजारे देखने लगा। ऊंची सी एक शानदार इमारत पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘‘अपना भूत और भविष्‍य देखिए।’’ वह हंसने लगा।

‘‘तुम्‍हारे यहां भी ज्‍योतिष का धंधा चलता है?’’ ‘‘तुम गलत समझ रहे हो। यहां टाइम-मशीन द्वारा मनुष्‍य को उसके भूतकाल या भविष्‍यकाल में लेकर जाते हैं’’ ऐली ने बताया।

‘‘ओह यानी मैं समय में पीछे जाकर अपनी परदादी से मिल सकता हूं या फिर भविष्‍य में जाकर अपने पड़पोतों से भी।’’

‘‘हां, लेकिन एक निरपेक्ष अस्‍तित्‍व की तरह तुम भविष्‍य में सिर्फ झांक सकते हो। उसमें कोई हेर-फेर या छेड़छाड़ नहीं कर सकते। समय यात्रा के लिए सरकारी की अनुमति बहुत मुश्‍किल से मिलती है।’’ ‘‘ऐसा क्‍यों?’’ ‘‘क्‍योंकि समय यात्रा से लौटे व्‍यक्‍ति अवसाद की तरह-तरह की मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। कोई बचपन से लौटकर वापस नहीं आना चाहता, तो कोई जवानी की याद में आहें भरता है। कोई अतीत में हुई भूलों पर पश्‍चाताप करता

रहता है, तो कोई अपने साथ हुए अन्‍याय पर कुढ़ता, कसमसाता है। असल में यह एक तरह की टाइम-टेंवल सिकनेस है। सकार इसे बढ़ावा नहीं देना चाहती।’’

‘‘तुम ठीक कहती हो’’ राजन ने सहमति प्रकट की। राजन के कहने पर हवाई टैक्‍सी की गति धीमी कर दी गई थी। औरत के चेहरे जैसी सुन्‍दर आकृति वाली एक इमारत पर लिखा था- ‘‘कॉस्‍मेटिक पार्लर’’ राजन ध्‍यान से देखने लगा।

‘‘सुंदर दिखाई देना मनुष्‍य की प्राकृतिक इच्‍छा है। चलोगे अंदर?’’ ऐली ने पूछा।

‘‘हां जरूर!’’ अंदर का दृश्‍य देखकर राजन स्‍तब्‍ध रह गया।

एक काउंटर पर बड़े-बड़े कांच की डिब्‍बों में तरह-तरह की उंगलियां किसी द्रव में तैरती दिखाई दे रही थीं तो दूसरे पर नाक और कान थे। अन्‍य काउंटरों पर पलकें और होंठ इसी तरह रखे गए थे। कहीं-कहीं दवाएं और इंजेक्‍शन भी थे। ‘‘यह सब क्‍या है?’’ राजन को उबकाई-सी आने लगी। ‘‘यहां तुम अपने वे अंग बदलवा सकते हो जो तुम्‍हें पसन्‍द नहीं।’’

‘‘मशीन के पुर्जों की तरह?’’ ‘‘हां, हमारा शरीर भी तो एक हाइटेक मशीन ही है। इसका कोई भी हिस्‍सा बदलवाया या ठीक करवाया जा सकता ळै। इसमें एक डेढ़ घंटा लगता है और कोई निशान भी नहीं रहता। तुम चाहो तो अपनी नाक बदलावा लो। वैसे भी पकौड़े सी है’’ ऐली ने हंसकर कहा।

‘‘मुझे पकौड़े पसंद हैं’’ राजन ने मुंह फुला लिया। ‘‘तो चलो पकौड़े खाकर आते हैं’’ ऐली ने कहा तो राजन को एहसास हुआ कि उसके पेट में चूहे कूद रहे थे। वे चल पड़े।

‘‘तो चलो पकौड़े खाकर आते हैं’’ ऐली ने कहा तो राजन को एहसास हुआ कि उसके पेट में चूहे कूद रहे थे। वे चल पड़े।

हवा में गुब्‍बारे की तरह तैरती एक इमारत की छत पर एअर टैक्‍सी खड़ी हो गई थी।

‘‘यह हमारे शहर का मशहूर रेस्‍टोरेंट है...’’ ऐली के साथ वह अंदर आ गया। कुर्सी पर बैठते ही मेज की सतह पर मेन्‍यू कार्ड दिखाई देने लगा। ऐली ने छूकर दो-तीन व्‍यंजन चुने और आराम से बैठ गई।

‘‘यहाँ पेड़-पौधे या पशु-पक्षी दिखाई नहीं देते’’ राजन ेने उत्‍सुकता प्रकट की।

‘‘वे भी हैं पर कुछ विशेष स्‍थानों पर उन्‍हें संरक्षण में रखा गया है’’ ऐली ने बताया।

‘‘क्‍यों?’’ राजन हैरानी वश बोला। ‘‘नैनो टेक्‍नोलॉजी की सहायता से हमाने अपने पर्यावरण से अच्‍छा तालमेल बिठा लिया है। पर्यावरण संतुलन के लिए जो कार्य जीव-जंतु करते हैं, वे सभी कार्य हमारे नैनो मशीनें दक्षता से करती हैं। वे हमारे पूर्ण नियंत्रण में हैं। जबकि पशु-पक्षी कभी-कभी पर्यावरण को असंतुलित भी कर देते हैं’’ ऐली ने कहा।

राजन को याद आया कि उसके शहर में बंदर बहुत अधिक थे। ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर वे पक्षियों के घोंसले के अंडे नष्‍ट कर देते थे जिससे पक्षी दिनोदिन कम होते जा रहे थे।

‘‘ठीक कहा तुमने पर पेड़ों के बिना कैसे जीवित हैं यहां सब?’’

‘‘पौधों के वे जीन जो सूर्य के प्रकाश में भोजन बनाते हैं हमारे शरीर में डाल दिए गए हैं। अब हम भी उनकी तरह अपना भोजन स्‍वयं निर्मित करने के साथ-साथ ऑक्‍सीजन गैस भी छोड़ते हैं।’’

‘‘ओह तो इसलिए तुम्‍हारे बाल हरे हैं और यहां की हवा इतनी ताजा। लेकिन फिर यह खाना-पीना क्‍यों?’’

‘‘यह तो बस कभी-कभार ही। क्‍योंकि अभी हम स्‍वाद का मोह छोड़ नही सकें हैं’’ एली ने झिझकते हुए कहा।

रोबो बैरा आकर उनका ऑर्डर परोस चुका था। खा-पीकर बिल चुकाकर दोनेां बाहर टैक्‍सी में वापस आ गए।

घूमते-घूमते काफी देर हो चुकी थी। राजन को अब चिंता सताने लगी थी।

‘‘न जाने मैं पृथ्‍वी पर कब पहुंचूंगा, और अब कैमिस्ट्री

याद करूंगा। कहीं टैस्‍ट में फेल न हो जाऊं।’’

‘‘पढ़ाई की चिंता मत करो। उसका हल मरे पास है।’’ ऐली ने उसे सांत्‍वना दी। उनकी हवाई टैक्‍सी जमीन पर उतर आई थी। यहां राजन ने बहुत बड़ी इमारत देखी जिस पर विद्यालय लिखा हुआ था। वहां कई खेल के मैदान थे। उनमें स्‍कूली बच्‍चे खेल रहे थे।

‘‘ये हैं हमारे हाइटेक स्‍कूल। आओ मैं तुम्‍हें कैमिस्ट्री की कक्षा में ले चलती हूँ’’ ऐली उसका हाथ पकड़कर अंदर ले आई।

यह एक बड़ा सा हॉल था। जिसमें तरह-तरह की मशीनें रखी थीं। राजन को कुर्सी पर बिठाकर रोबो टीचर ने एक बड़ा हैलमेट जैसा उसके सिर पर पहना दिया। पांच मिनट बाद ही राजन को लगा जैसे उसके दिमाग में चींटिया सी रेंग रही हों। उसका सिर झनझना उठा। अगले पलों बाद सब कुछ शान्‍त हो चुका था।

कनटोप उतार दिया गया। ‘‘अब बताओ एल्‍यूमिनियम कार्बोनेट जब हल्‍के नाइटिंक अम्‍ल के साथ क्रिया करता है तो क्‍या होता है?’’ ऐली ने पूछा ‘‘एल्‍यूमिनियम नाइटेंट, पानी और कार्बन डाई ऑक्‍साइड बनती है’’ राजन ने तुरंत उत्‍तर दिया।

‘‘लेकिन यह सब मुझे कैसे पता?’’ उसकी हैरानी की सीमा नहीं रही।

‘‘क्‍योंकि केमिस्‍टीं के नैनो मेमोरी कार्ड तुम्‍हारे दिमाग के न्‍यूरॉनों में डाल दिए गए हैं। वहां जाकर ये तुम्‍हारे न्‍यूरॉनों के डीएनए के साथ जुड़ गए हैं और उनका सारा ज्ञान अब तुम्‍हारे दिमाग में समा चुका है।’’

‘‘अदभुत’’ ‘‘विषय, पाठयक्रम, कक्षा और उम्र के अनुसार ये नैनो मेमोरी कार्ड हमारे न्‍यूरॉनों में स्‍थापित कर दिए जाते हैं जिससे हम इस विषय के स्‍वतः ही जानकार हो जाते हैं’’ ऐली ने समझाया।

‘‘कितनी भाग्‍यशाली हो तुम, पढ़ाई-लिखाई की कोई चिंता नहीं, हर काम के लिए रोबो हाजिर और प्रदूषण वगैरह का नाम-निशान तक नहीं’’ राजन ने ईर्ष्‍या भरे स्‍वर में कहा।

‘‘सो तो है। विज्ञान और तकनीक को हमने सकारात्‍मक दिशा में विकसित किया है तो बदले में उसने हमें सब तरह का सुख और आराम दिया है’’ ऐली गर्व से बोली।

‘‘तुम्‍हारे ग्रह पर संस्‍कृति, भाषा और विज्ञान का विकास पृथ्‍वी की तरह ही हुआ है। इसलिए आशा है कि पृथ्‍वी पर भी वह दिन कभी आएगा जब वहां के बच्‍चे तुम लोगों की तरह बेफ्रिक हो जाएंगे।’’

‘‘मेरी शुभकामनाएं तुम्‍हारे साथ हैं। लो.... यह छोटी सी भेंट तुम्‍हें मेरी ओर से’’ कहते हुए ऐली ने सेलफोन की चिप जैसी कोई चीज उसकी ओर बढ़ाई।

‘‘यह क्‍या है?.....’’ ‘‘इसमें फिजिक्‍स, गणित, और बायोलॉजी के नैनो मेमोरी कार्ड हैं जो अगली कक्षाओं तक तुम्‍हारे काम....’’

ऐली कहे जा रही थी। राजन ने हाथ बढ़ाया ही था कि उसी अंधेरी, काली, तीव्र गति वाली सुरंग ने उसे समेट लिया। वह वहीं खड़ा था अपने लॉन में। नैनो मेमोरी कार्ड ऐली के हाथ में ही रह गए थे।

थके कदमों से वह अपने कमरे की ओर चल दिया। सामने दीवार-घड़ी सुबह के चार बजा रही थी।

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kalpna11566@gmail.com

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अनुमति से साभार प्रकाशित - विज्ञान कथा अक्‍टूबर-दिसम्‍बर’ 2016

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