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शिया मुस्लिम द्वारा प्रारंभ सिमरी का महावीरी झंडा -लक्ष्मीकान्त मुकुल

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शिया मुस्लिम द्वारा प्रारंभ सिमरी का महावीरी झंडा

-लक्ष्मीकान्त मुकुल

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सामाजिक और धार्मिक समरसता का एक अद्भुत उदाहरण गाँव सिमरी में मिलता है, जहाँ दशहरे में महावीरी झंडा उठाने की प्रथा एक शिया मुस्लिम द्वारा सौ वर्ष पूर्व आरम्भ की गयी थी, जो आज भी बदस्तूर जारी है। 'शाहाबाद महोत्सव स्मारिका' में प्रकाशित जाफर हसन बेलग्रामी के एक आलेख में कहा गया है कि सद्भावना को अक्षुण्ण बनाये रखने वाले ऐसे तत्वों की गहराई को समझते हुए इस महावीरी झंडा उत्सव में भाग लेना चाहिए। करीब दो हजार की आबादी का गाँव सिमरी, जहाँ शिया व सुन्नी मुस्लिमों के अलावे हिन्दू भी काफी संख्या में निवास करते हैं। यह गाँव रोहतास (बिहार) जिला के दावथ प्रखंड के अन्तर्गत है तथा आरा-मोहनिया राष्ट्रीय उच्च मार्ग (एन0एच0-30) पर मलियाबाग के पार्श्व में अवस्थित है। यह गाँव ठोरा और काव नदियों के दोआब में बसा है।

मुस्लिम बिरादरी द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं व गौरव ग्रन्थों के प्रति सम्मान की भावना के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं, जिसमें राम भक्त हनुमान के प्रति आदर की भावना सबसे प्रबल मिलती है। हनुमान जी के कार्य और चरित्र से सभी वर्गों के लोग अनादि काल से ही प्रभावित रहे हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहा जाए तो हनुमान जी भगवान के एकनिष्ठ उपासक हैं, इसलिए समस्त जगत के कष्ट को दूर करने के लिए सदा उद्यत रहते हैं। भारतीय साहित्य और साधना में ऐसे परोपकारी एकनिष्ठ भगवत्सेवक का चरित्र दुर्लभ ही है।

जनदेवता हनुमान के प्रति मुस्लिमों द्वारा प्रकट किए गए सम्मान और समर्पण का व्यापक रुप से विवरण 'कल्याण' के हनुमान अंक में मिलता है। लखनऊ के अलीगंज मुहल्ले में गोमती के पास तत्कालीन अवध के नवाब मुहम्मद अली शाह की बेगम रबिया (सन् 1792-1802) ने संतान प्राप्ति के लिए स्वप्न-दर्शन के आधार पर मनौती स्वरुप इस्लामबाड़ी में हनुमान जी का मंदिर दिया था। हनुमान जी की मूर्ति बेगम साहिबा ने सपने में निर्देशित टीला को कारिन्दों से खुदवाकर निकलवाया था। मुस्लिम बिरादरी के लोग भी उसकी पूजा करते हैं और वहाँ मेला भी लगता है। फैजाबाद के प्रशासक नवाब मंसूर अली ने अपने पुत्र के भयंकर रोग से छुटकारा पाने के लिए हनुमान जी से मनौती माँगी। स्वस्थ हो जाने पर अयोध्या के हनुमानगढ़ी में श्रद्धावनत् नवाब ने विशाल मंदिर का निर्माण कराया तथा बावन बीघा भूमि उस मंदिर को दान में दिया एवं साधुओं को धूप में आराम करने के लिए इमली के पेड़ भी लगवाए।

सिमरी में बसा शिया मुस्लिम परिवार कोआथ के नवाब परिवार की एक शाखा माना जाता है। अंग्रजी शासन-काल में ईस्ट इंडिया कंपनी के सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन द्वारा सन् 1812-13 में शाहाबाद के सर्वेक्षण रिर्पोट में कोआथ के नवाब नुरुल हसन के परिवार और उनकी जमींदारी का विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है। इनके पुरखे शुजाउद्दौला की फौज के कमांडर थे, जिसकी उपलब्धि में उन्हे शाहाबाद जिला के आरा परगना में 105 मौजे तथा दनवार और दिनारा परगनों में 153 गाँव बेलगान मिले थे, जिसे लखराज संगता गंग कहा जाता था। इनकी जमींदारी परिवार के ही कुल पंद्रह शेयरों में बँटी थी। कोआथ और सिमरी गाँव इन्ही खान लोगों के कोठियों के कारण मशहूर थे। अवध के बेलग्राम नामक स्थान से आया यह परिवार उपने नाम के अंत में बेलग्रामी शब्द जोड़कर अपनी पृथक पहचान कायम रखता है। शाहाबाद गजेटियर के मुताबिक इस परिवार में अनेक कवि-शायर व अधिकारी भी हुए हैं। जिला की प्रमुख मिठाई बेलग्रामी का चलन इन्हीं लोगों ने शुरु किया था। इनके पास अभी भी मुगलकाल व औपनिवेशिक जमाने के ऐतिहासिक दस्तावेज, पाण्डुलिपियाँ और चित्र सुरक्षित हैं। ब्रिटिश शासन द्वारा खान की उपाधि से विभूषित होने के कारण 'खान की सिमरी' नाम से इस गाँव की ख्याति मिली। सिमरी स्थित बेलग्रामी परिवार अपनी उदारता, समर्पण, हिन्दू समाज से भाईचारा और विद्वानों, सन्तों और फकीरों को आदर देने वाला माना जाता है। आज भी ये लोग भौतिकवादी व्यवस्था में 'नदी के द्वीप' की तरह अपनी पहचान बनाये हुए हैं। सिमरी गाँव का काली स्थान, महावीरी अखाड़ा और जोगीवीर आदि हिन्दू धार्मिक स्थलों के पर्याप्त जमीन बेलग्रामी परिवार ने ही दान में दिया था।

इस महावीरी झंडा की ऐतिहासिक पृष्टभूमि तथा सामाजिक सांस्कृतिक अवदान के विषय में जानकारी हासिल करने के लिए सिमरी गाँव के ग्रामीणों तथा आस-पास के गाँव यथा धरकंधा, अवाढ़ी, चौरांटी, परसिया कला, केवटी टोला, जमसोना, बभनौल, महुअरी, परमेश्वरपुर और मलियाबाग के बुद्धिजीवियों व बुजुर्गों से गहन पड़ताल की गई। सिमरी मध्यविद्यालय के सेवानिवृत्त शिक्षक स्थानीय निवासी 76 वर्षीय हनुमान सिंह ने बताया कि जैसा उन्होने बड़े-बूढ़ों से सुना है कि बेलगामी परिवार के लोग उस समय नवाब थे। इख्तिखार हसन बेलग्रामी के पितामह सर सैय्यद मरहूम शाह हसन बेलग्रामी नरसिंह दूबे आदि सिपहसलारों के साथ अपनी कोठी पर बैठे हुए थे, तभी उन्होंने देखा कि गाँव के काफी लोग अच्छे परिधानों में सज-धजकर झुंड के झुंड कहीं जा रहे हैं। इस बाबत पास बैठे लोगों से उन्होंने पूछा कि ये लोग कहाँ जा रहे हैं? तो उत्तर मिला कि पास के गाँव बभनौल मके दशहरे के दिन झंडा उठता है, उस झंडा-जुलूस में शामिल होने और वहाँ के अखाड़े में दंगल-करतब देखने ये लोग जा रहे हैं। यह बात उनको नागवार लगी कि इस इलाके का सबसे नामी गाँव तो सिमरी है, जिसकी जनसंख्या भी काफी है, यहाँ नवाब खानदान रहता है, जिसका नाम काफी दूर तक फैला है, परन्तु यहाँ के लोग एक कमतर गाँव बभनौल में महावीरी झंडा उत्सव मनाने के लिए जा रहे हैं। उन्होंने अगले दिन पूरी सिमरी बस्ती में डुगडुगी पिटवा कर ऐलान कराया कि आज नवाब साहब की कोठी पर एक आवश्यक मजलिस जमेगी, जिसमें आम व खास सभी सिरकत करेंगे। उस बैठक में नवाब साहब ने गाँववालों के सामने यह प्रस्ताव रखा कि क्या यह महावीरी झंडा हमारे गाँव सिमरी में नहीं हो सकता? उनके इस कथन से पूरे गाँव के हिन्दू आश्चर्य में पड़ गये और सबने एकमत से उनकी इच्छा का समर्थन किया। नवाब साहब ने कहा कि अब अगले साल से यहाँ के लोग बभनौल में महावीरी झंडा उठाने का काम बंद करेंगे और झंडा प्रतिवर्ष यहाँ से ही उठेगा और यहीं के अखाड़े तक जायेगा, जहाँ दंगल-खेल-तमाशा होगा।

कहते हैं कि अगले वर्ष दशहरा से एक माह पहले ही नवाब साहब ने गाँव के कुछ जागरुक लोगों को उस जमाने में चार सौ रुपया चाँदी के विक्टोरियन सिक्के देकर बनारस12 में झंडा बनवाने के लिए जिम्मेदारी के साथ भेजा। लाल रंग के मखमल के कपड़े का वह एकरंगा झंडा बनारस स्थित दालमंडी के समीप नारियल बाजार में झंडा बनाने की मशहूर दुकान नारायण के0 दास के यहाँ बनवायी गयी। जिस पर सोने के तार से महावीर जी की आकृति उभारी गयी। कहा जाता है कि उसमें एक किलोग्राम सोने का इस्तेमाल हुआ था। झंडा बनवाने जाने वालों में जगमनन साह, जोगी चौधरी, सिपाही सिंह, गुदानी सिंह प्रमुख थे। बनारस से झंडा जब तैयार होकर गाँव सिमरी में आया, तो महावीर जी की आँखों को बनाने के लिए नवाब साहब ने अपनी तिजोरी से दो मनके दिए, जिनकी कीमत आज बेशुमार है। इस गाँव में पचास घर उज्जैनी राजपूत बिरादरी के हैं, जो पूरब और पश्चिम पट्टियों में बसे हैं। पूरब पट्टी में चौरस आंगन वाला बैठकानुमा एक घर है, जिसे 'दालान' कहा जाता है। वहीं पर झंडा उठाने की परंपरागत रस्म निभाई जाती है। दालान के पास महावीर जी के स्थान से झंडा उठता हुआ पूरे गाँव में जुलूस की शक्ल में घूमाते हुए नेशनल हाइवे के पास अखाड़े तक ले जाया जाता है। जुलूस के अखाड़े पर पहुँचते ही स्थानीय मुहर्रम कमेटी के अखाड़े द्वारा सलामी दी जाती है। इस पूरे उत्सव के आरंभ से अंत तक बेलग्रामी परिवार के लोग अपनी भागीदारी बनाये रखते हैं। अखाड़े पर कुश्ती में भाग लेने के लिए आस-पास और दूर-दूर तक के पहलवान आते हैं और इनाम पाते हैं।

अखाड़े के परंपरागत मालिक सबसे पहले स्व0 बसगीत सिंह थे। उनके बाद उनके परिवार के ज्येष्ठ पुत्र इन कर्तव्यों का निर्वाह करते आ रहे हैं। उस दिन पश्चिम टोले के लोग आकर उनको पगड़ी और लंगौटा उपहार में देते हैं। बसगीत सिंह के बाद अखाड़े के उत्तराधिकारी क्रमशः सरयू सिंह और राजेन्द्र सिंह हुए। इस समय धीरेन्द्र सिंह अखाड़े के मालिक हैं, जो राँची में बी0एस0एफ0 में इन्स्पेक्टर पद पर कार्यरत हैं तथा महावीरी झंडा उठने के समय अपने दायित्व को निभाने प्रतिवर्ष दशहरे में छुट्टी लेकर चले आते हैं।

ग्रामीण बताते हैं कि सिमरी गाँव, जहाँ हिन्दू मुस्लिम के पर्व को अपने पर्व की तरह मानते हैं और मुस्लिम हिन्दू पर्व को अपना पर्व मानते हैं। महावीरी झंडा के जुलूस में आगे चलने वालों में मस्जिद के पेशे इमाम दूर से ही पहचाने जा सकते हैं। महावीरी झंडा को लेकर चलने वाले हिन्दू मुहर्रम के ताजिये में उसी जोशो-खरोश के साथ सम्मिलित होते हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता का अद्भुत मेल बड़ा ही रोमांचकारी शक्ल अख्तियार करता है।

कहा जाता है कि परंपरागत रुप से जुलूस और अखाड़े का झंडा, मुद्गर, पोशाक, सिंदूर, लंगौटा, छत्र आदि सुरक्षित रखी गई वस्तुओें को उस दिन निकाला जाता है। दशहरे के समय मनाये जाने वाले इस महावीरी झंडे में तीर-तलवार, लाठी-गदका-बनेठी आदि खेल भी खिलाड़ी दिखाते हैं। 'बजरंग बली की जय' से वातावरण मुखरित हो जाता है। हनुमान भक्तों की भीड़ से गाँव की सड़क भर जाती है। इस दिन महावीरी झंडे के जुलूस में भाग लेने के लिए आबाल-वृद्ध, नर-नारी अत्यन्त सज-धजकर दूर-दूर के गाँवों से आते हैं। वे अपने साथ महावीरी पताका भी जुलूस में लाते हैं। भजन-कीर्तन मण्डली, खिलाड़ियों के खेल, बजरंगी का स्वांग बनाकर नृत्यरत नर्तकों की मंडली और दर्शकों की भीड़ सभी एक अनोखा परिवेश संघटित करते हैं। एक दिन का यह आयोजन अपने ढंग का अनूठा होता है। वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा हनुमान जी की विशेष पूजा पंचोपचार विधि द्वारा की जाती है और पूर्ण उत्साह एवं गौरवपूर्वक महावीरी झंडे का जुलूस निकाला जाता है।

बनारस से बनाये गये उस झंडे के बारे में गाँव के युवा सत्येन्द्र सिंह ने कई मुख्य और रोचक बातें बतायीं। अपने दादा के कथनानुसार उन्होंने कहा कि वह झंडा सन् 1913 में बनारस में बना था। काफी पुराना होने के कारण वह कुछ फट-सा गया है, परन्तु हनुमान प्रतिमा के उकेरे गये सोने के सभी तार यथावत् हैं। दो मनकों से बने आँख में से एक मनका गायब हो गया है। उनका कहना है कि यह झंडा पहले अनगराहित चौधरी के यहाँ रखा जाता था, परन्तु 25 वर्ष पहले उनके यहाँ पड़ी डकैती में वह झंडा भी चोरी चला गया। चोरों ने उसे अनुपयोगी समझकर ईख के खेत की मेड़ पर छोड़ दिया। इस प्रकार वह झंडा बच गया। सत्येन्द्र जी ने बताया कि पुराना झंडा अब इस्तेमाल में नहीं आता, वह अब धरोहर के रुप में है। उसके बदले अब नया झंडा, जो दस साल पहले बना था, उसे ही उपयोग में लाया जाता है। पुराना झंडा और नया झंडा उस दिन (दशहरा) पूजा के समय रखा जाता है। पंडित द्वारा उसकी पूजा की जाती है। उन्होंने कहा कि पुराना और नया झंडा अब उनके यहाँ अलग कोठरी में सुरक्षित है, जिसकी सुबह-शाम नियमित पूजा होती है, धूप-दीप, गूगूल-अगरबत्ती जलाया जाता है और सुंदरकाण्ड का पाठ किया जाता है।

बेलग्रामी परिवार के बुजुर्ग सैय्यद इख्तिखार हसन बेलग्रामी उर्फ रसूल भाई का कहना है कि सिमरी गाँव के महावीरी झंडा की शोभा-यात्रा तथा मुहर्रम के ताजिये का जुलूस शुरू से ही काफी मशहूर रहा है, जिसमें दोनों समुदाय के लोग दूर-दूर से पधारकर इसमें भागीदारी करके गौरवान्वित होते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे आने वाली पीढ़ियाँ इन गौरवशाली उत्सवों को इसी उमंग के साथ मनाती रहेंगी।

सिमरी गाँव के महावीरी झंडे की यात्रा का समापन गाँव से पूरब नेशनल हाइवे के किनारे महावीर जी के अखाड़े पर होता है। परन्तु नेशनल हाइवे के प्रस्तावित दोहरीकरण की योजना से अखाड़े की जमीन के अस्तित्व पर खतरा भी मंडराने लगा है, क्योंकि फोर लेन की यह सड़क होते ही यह भूमि ठीक बीच में आ जायेगी और मालवाहक गाड़ियाँ अखाड़े की धरती को रौंदती हुई दौड़ती रहेंगी। मुस्लिम अखाड़े के खलिफा मजहर आलम इस खतरे से आशंकित होते हुए कहते हैं कि सरकार के साथ ग्रामीण इस स्थिति से उदारतापूर्वक निपटने का प्रयास करेंगे। अन्यथा विषम हालत में अखाड़ा की भूमि को वैदिक अनुष्ठान के द्वारा अन्यत्र स्थानान्तरित करना पड़ सकता है।

अतएव बेलग्रामी नवाब द्वारा शुरू किया गया सिमरी का महावीरी झंडा उत्सव आज भी सांप्रदायिक और जातीय उन्माद के घनघोर अंधेरे माहौल में प्रकाश की उजली लकीरों की तरह उम्मीदों से भरा है। जिसको संरक्षण-संवर्धन-प्रोत्साहन किए जाने की आवश्यकता है।

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