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आलोचक और विचारक अरुण माहेश्वरी का साक्षात्कार

इंटरव्यू संक्षिप्त

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मनुष्यों के जीवन की लड़ाई अगर जारी है तो वे भविष्य का कोई कोई रास्ता तैयार करेंगे ही

हिटलर और मुसोलिनी के आदर्शों पर तैयार हुए संगठन अपने मूल फासिस्ट और आक्रामक रूप को दिखाने के बेचैन हो रहे हैं

अरुण माहेश्वरी मार्क्सवादी आलोचक, चिंतक और विचारक हैं। लंबे समय से वामपंथी आन्दोलन से जुड़े रहे और आज भी निरन्तर सक्रिय हैं। इन्होंने ‘कलम’ पत्रिका का संपादन किया, जिसका ऐतिहासिक महत्त्व है। साथ ही, अर्थशास्त्र, साहित्य आलोचना और समसामयिक राजनीति पर विपुल लेखन किया है। विविध विषयों पर आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्यालोचन से राजनीति तक। ‘एक और ब्रह्मांड’ इनकी अनुपम कृति है। ‘सिरहाने ग्राम्शी’ भी मार्क्सवादी विचार और दर्शन की प्रमुख कृति है। जनकवि हरीश भादानी पर साहित्य अकादमी से इनका जो मोनोग्राफ प्रकाशित हुआ है, वह अनूठा है। इसके अलावा, इस वर्ष हरीश भादानी समग्र का पांच खंडों में इन्होंने सरला माहेश्वरी के साथ संपादन-संकलन कर ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य किया है। अरुण माहेश्वरी सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय हैं और इस माध्यम का वैचारिक लेखन और बहसों के लिए इन्होंने इस्तेमाल किया है। इस पर इनकी किताब भी आई है ‘तूफानी वर्ष 2014 और फेसबुक की इबारतें’। मनोज कुमार झा और वीणा भाटिया ने आज के कुछ महत्त्वपूर्ण और गंभीर सवालों पर इनसे चर्चा की। प्रस्तुत है बातचीत के महत्त्वपूर्ण अंश।

1.आज देश में जो राजनीतिक परिस्थितियाँ बनी हैं, उनका मूल्याँकन आप किस तरह करते हैं? आरएसएस के सत्ता में आने की पृष्ठभूमि क्या रही है?

अरुण माहेश्वरी : यह भारत में आजादी के बाद अपनाये गये समाज के आधुनिकीकरण के प्रकल्प की विफलताओं का परिणाम है। आधुनिकता के इस प्रकल्प के साथ ही सामाजिक बराबरी, स्वतंत्रता और धर्म-निरपेक्षता मूल्य जुड़े हुए थे, जो भारत की आजादी की लड़ाई के अभिन्न अंग थे। लेकिन विकास के पूंजीवादी रास्ते की बदौलत बढ़ती हुई सामाजिक विषमता, भ्रष्टाचार और सामाजिक जीवन में गहरे तक बैठे अन्याय का खत्म न होना व्यापक जनता में एक बड़े मोहभंग का कारण बना और इसका लाभ आरएसएस की तरह की उन ताकतों ने उठा लिया जो अपने जन्म काल से ही आजादी की लड़ाई और उससे जुड़े सभी सामाजिक मूल्यों के विरोध में रही हैं। यह मोहभंग राजनीति के स्तर पर कांग्रेस दल के प्रति मोहभंग में व्यक्त हुआ। इसका लाभ आजादी की लड़ाई से ही जुड़ी वामपंथी ताकतों को मिल सकता था और वैसा होने पर उस लड़ाई के लाभों को उनकी तार्किक परिणति तक ले जाना मुमकिन होता। लेकिन वामपंथी ताकतें अपने खुद के सांगठनिक गतिरोधों में इस कदर फंस गई कि उसमें इस अवसर का लाभ उठाने की ताकत ही नहीं रही। ऊपर से सोवियत संघ और समाजवादी विश्व के पराभव ने भी उनकी विश्वसनीयता को अच्छा-खासा धक्का लगाया। कम्युनिस्ट अन्तरराष्ट्रीय की ही एक टुकड़ी होने के नाते कम्युनिस्ट पार्टियों के सांगठनिक स्वरूप में वे सारी कमजोरियां शुरू से आज तक बनी हुई हैं, जिनके कारण सारी दुनिया में कम्युनिस्ट पार्टियों को गहरा धक्का लगा है, उनकी जनतांत्रिक निष्ठाएं संदेह के घेरे में आ गईं और इसे उन सभी बीमारियों को झेलना पड़ रहा है जो दुनिया की दूसरी शासक कम्युनिस्ट पार्टियों को भी लगातार सता रही हैं।

इस विषय में मैंने अलग से एक नोट लिखा था, ‘वामपंथ के पुनर्विन्यास की जरूरत पर।

2. देश में साम्प्रदायिकता के उभार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर कुछ कहें। क्या देश का विभाजन अंग्रेजों की साजिश का परिणाम था? आखिर कांग्रेसी नेतृत्व इसका विरोध कर पाने में सफल क्यों नहीं हो सका?

अरुण माहेश्वरी : इसका एक अपना लंबा इतिहास है। इसी के चलते हमारा देश 1947 में एक बार बंट भी चुका है। इस्लामिक तत्ववाद के समानांतर यहां हिंदू तत्ववादी ताकतें भी आजादी की साझा लड़ाई के समानांतर अपना अस्तित्व बनाए हुए थी। सर सैय्यद के मुहम्मडन एडुकेशनल कॉन्फ्रेस (1986) के बाद ही 1905 के अंग्रेजों के बंगभंग के निर्णय और उसकी प्रतिक्रिया में पैदा हुए सांप्रदायिक तनावों की पृष्ठभूमि में 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग का गठन हुआ। उस समय राष्ट्रीय कांग्रेस हिंदू-मुस्लिम सबका साझा मंच होने पर भी कई उग्रपंथी राष्ट्रवादी गुट ऐसे थे जो उग्र हिंदू सांप्रदायिक विचारों से भरे हुए थे। इन संगठनों में मुसलमानों का प्रवेश निषेध था और इनके सदस्य हिंदू-मुस्लिम दंगों में भाग लिया करते थे। हिंदू बुद्धिजीवियों के एक बड़े हिस्से में अंग्रेजों के शासन को मुस्लिम बादशाहों-नवाबों के शासन से बेहतर माना जाता था और वे किसी न किसी रूप में मुसलमानों के बरक्स हिंदू श्रेष्ठता की बातें किया करते थे। इस रुझान को उपन्यास सम्राट माने गये बांग्ला के बंकिम चंद्र के लेखन में भी पाया जा सकता है। बहरहाल, इसी कशमकश के बीच से सबसे पहले 1909 में पंजाब में पंजाब हिंदू सभा की स्थापना हुई, जिसकी पहली सभा का सभापतित्व लाला लाजपत राय ने किया था। इसी साल मोर्ले-मिंटो रिफॉर्म के जरिये अंग्रेजों ने मुसलमानों के लिये अलग मतदान का अधिकार देने की बात कही थी। इसी पृष्ठभूमि में पंजाब हिंदू महासभा की तरह के संगठन ने कांग्रेस पर यह आरोप लगाया था कि वह हिंदुओं के हितों की पूरी तरह से रक्षा नहीं कर रही है। इसी से 1915 में हरिद्वार के कुंभ मेले में अखिल भारतीय हिंदू महासभा की आधारशिला रखी गई। उस सभा में सीधे तौर पर अंग्रेज सरकार के प्रति निष्ठा को जाहिर किया गया था, जिसका वहां उपस्थित स्वामी सहजानंद ने विरोध किया था।

इसके साथ परवर्ती दिनों में मदनमोहन मालवीय जुड़े और सन् ‘20 के जमाने में विनायक दामोदर सावरकर जैसे लोगों ने इस पर अपना अधिकार कायम कर लिया। शुरू में उनका तेवर ब्रिटिश राज-विरोधी और क्रांतिकारी था। तभी, 1925 में नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई, जिसका एकमात्र एजेंडा मुसलमानों के खिलाफ लड़ाई थी। उसने कभी भी अंग्रेजों विरोध नहीं किया, बल्कि उनकी कृपा से वे अपना सांगठनिक विस्तार करते रहे। आरएसएस के परवर्ती इतिहास पर हमारी एक पूरी किताब ही है, इसीलिये इस प्रसंग को मैं यहां और विस्तार से नहीं कहना चाहता। जन्म के बाद ही सन् ‘30 के जमाने में जब पश्चिम में फासीवादी और नाजीवादी ताकतें सिर उठाने लगीं, तब इन्होंने पूरी तरह से उनकी विचारधारा और सांगठनिक पद्धतियों को अपना कर अपना फैलाव शुरू कर दिया। फासिस्टों ने कैसे अपने देश के बाकी सभी अल्पसंख्यकों समुदायों का सफाया कर दिया था और अपना एकछत्र राज कायम किया था, उसके प्रति इनके नेता बहुत आकर्षित थे और उसी के अनुसार वे अपने को तैयार करने में लगे रहते थे। उधर कालापानी से लौट कर आने के बाद सावरकर भी अंग्रेजों के पक्ष में काम करने लगे और आरएसएस के साथ उनके गहरे संबंध हो गये। लेकिन इतिहास का तथ्य यह है कि आजादी के पहले तक भारत में आरएसएस कोई विशेष शक्ति नहीं बन पाई थी। भारत के लोगों पर गांधीजी और नेहरूजी तथा पूरी राष्ट्रीय कांग्रेस का असर इतना गहरा था कि हिंदुओं ने इन सांप्रदायिक ताकतों को अपने से दूर रखा और एक जनतांत्रिक और धर्म-निरपेक्ष भारत के प्रति अपनी निष्ठा को जाहिर की।

इसीलिये, आज जो सांप्रदायिक ताकतों का उभार हुआ है, उसमें इनके किसी भी प्रकार के सकारात्मक कामों का नहीं, जीवन की समस्याओं के उपयुक्त समाधान में असमर्थ साबित हुई आधुनिक, जनतांत्रिक और वामपंथी ताकतों की विफलताओं की भूमिका ही प्रमुख है।

3.भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा क्या रही है? क्या सर्वधर्म समभाव ही धर्मनिरपेक्षता है या इसका भिन्न चरित्र है?

अरुण माहेश्वरी : धर्मनिरपेक्षता में ‘सर्वधर्म समभाव’ की बात कही जाए या ‘धर्म-विमुखता’ की बात कही जाए, मूलत: इसका संबंध राज्य की भूमिका से है और यह माना जाता है कि राज्य को लोगों के धार्मिक विश्वासों के मामले में राज्य को किसी प्रकार का दखल नहीं देना चाहिए। इसके अलावा, मानव सभ्यता का इतिहास किसी भी धर्म-निरपेक्ष राज्य से यह उम्मीद करता है कि वह आम लोगों में कम से कम धार्मिक विश्वासों को बढ़ाने वाले कामों से अपने को दूर रखे। मनुष्यता की यात्रा बुद्धि और विवेक की ओर, हर प्रकार के अंधविश्वासों की तिलांजलि देकर विज्ञानमनस्कता की ओर होनी चाहिए। ऐसे में, कोई भी आधुनिक राष्ट्र यदि धार्मिकता को किसी भी रूप में बल पहुंचाता है तो वह प्रकारांतर से नागरिकों के मानसिक विकास में बाधक की भूमिका अदा करता है।

अभी सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर विचार चल रहा है कि चुनावों में किसी भी रूप में धर्म का इस्तेमाल करना क्या उचित है ? सुप्रीम कोर्ट की साफ राय है कि धर्म-निरपेक्ष संविधान इस प्रकार से धर्म का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देता है। इसे एक प्रकार से राज्य की सारी गतिविधियों पर लागू करके देखा जा सकता है। राज्य भारत के संविधान की भावना से परिचालित होने के नाते उसे धर्म को बढ़ावा देने वाली हर गतिविधि से अपने को यथसंभव दूर रखना चाहिए। सर्वधर्म समभाव का एक धर्म-निरपेक्ष राज्य में मेरे अनुसार यही अर्थ हो सकता है कि राज्य को प्रत्येक धर्म और उससे जुड़े कर्मकांडों से अपने को अलग रखना चाहिए।

4.भाजपा के बरक्स कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल आदि को धर्मनिरपेक्ष माना जाता रहा है। पर क्या ये वास्तव में धर्मनिरपेक्ष हैं? क्या ये वोटों की राजनीति के तहत अल्पसंख्यकवाद को बढ़ावा देते नज़र नहीं आते?

अरुण माहेश्वरी : निश्चित तौर पर भाजपा के एक धुर सांप्रदायिक पार्टी है। उसने भारत की राजनीति को धर्म के प्रयोग के जरिये विषैला बनाने में प्रमुख भूमिका अदा की है। उसके चलते राजनीतिक वातावरण में दूसरी प्रतिद्वंद्वी पार्टियां दबाव में रहती हैं और इसके कारण नाना प्रकार के समझौते करने के लिये मजबूर होती हैं। लेकिन इस मामले में किसी प्रकार की कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि भारत में भाजपा और मुस्लिम लीग ऐसी पार्टियां हैं जो आजादी की लड़ाई की धर्म-निरपेक्ष परंपरा के विरोध से पैदा हुई है। कांग्रेस सहित बाकी सभी पार्टियां आजादी की लड़ाई की परंपरा की पार्टियां है। आज की समाजवादी पार्टी, जनता दल या शिव सेना आदि की तरह की पार्टियां आजादी के बाद की दूषित परिस्थितियों की उपज हैं। फिर भी, वे समाजवादी पार्टी, जनता दल की राजनीति में धर्म का स्थान प्रमुख नहीं है, जबकि भाजपा शिवसेना की राजनीति धर्म पर ही टिकी हुई है।

5.देश ही नहीं, दुनिया भर में गैर जनतांत्रिक कट्टरवादी राजनीतिक ताकतों का वर्चस्व बढ़ा है, वहीं वामपंथी ताकतों का ह्रास हुआ है। ऐसी परिस्थितियाँ क्यों निर्मित हुईं, इस पर प्रकाश डालें।

अरुण माहेश्वरी : यह बात सच भी है और झूठ भी है। मानव समाज कभी समस्याओं से मुक्त नहीं होता। उसके अन्तर्विरोध ही उसके विकास के कारण होते हैं। ऐसे में, कभी-कभी सामयिक तौर पर मनुष्य की यात्रा आगे के बजाय पीछे की ओर जाती भी दिखाई देने लगती है। ऐसे संकट के समय में सामाजिक अन्तर्विरोध और भी तीव्र दिखाई देने के कारण लगने लगता है जैसे जड़ों की खोज में आदमी सचमुच पीछे, जड़ों की ओर, जंगलों की ओर लौट रहा है। लेकिन हमारा मानना है कि इतिहास की पूरी प्रक्रिया में ये कुछ खास पड़ाव से ज्यादा मायने नहीं रखते। इन सबका संबंध चलते-चलते कुछ सुस्ताने से भी होता है। जैसे हम कहते हैं कि इतिहास में बड़े से बड़े युद्ध भी कोई मायने नहीं रखते, लेकिन भौतिकी के क्षेत्र में होने वाला एक भी नया अनुसंधान हमेशा के लिये मनुष्यों के जीवन को बदल देता है। इसीलिये, धर्म आदि की तरह के विषय से गैर-धार्मिक विषयों की ही जीवन में प्रधानता होती है। अंतिम जीत इसीलिये मनुष्य के विवेक और तर्क की जीत में निहित होती है। सभ्यता उसी से बढ़ेगी, अंध-विश्वासों और विवेकहीनता को बढ़ाने वाली ताकतों से नहीं।

6. वर्तमान सत्ता का चरित्र पूरी तरह से निरंकुश होता हुआ दिखाई पड़ रहा है। पिछले दिनों कई लेखकों-विचारकों की हत्या, विरोध की आवाज़ को दबाने की कोशिश और तर्कपरकता का विरोध जिस रूप में सामने आया है, उसका प्रतिकार कैसे और किस रूप में संभव है? आज जनवादी लेखकों और बुद्धिजीवियों के सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं?

अरुण माहेश्वरी : हिटलर और मुसोलिनी के आदर्शों पर तैयार हुए संगठनों से इससे भिन्न किसी चीज की उम्मीद नहीं की जा सकती है। आज के शासक दल का इससे अलग कोई रास्ता नहीं हो सकता था। सोचा गया था कि संभव है देश के प्रति जिम्मेदारियों का दबाव इनमें कुछ बदलाव लायेगा। लेकिन ये तो शुद्ध तत्ववादियों की तरह का व्यवहार कर रहे हैं। हर बीतते दिन के साथ ये अपने मूल फासिस्ट और आक्रामक रूप को दिखाने के बेचैन हो रहे हैं। यहां तक कि इन्होंने क्षेत्रीय दादागीरी के नाजी आदर्शों को भी अपना लिया है। इन सब का प्रतिकार लेखकों और सभी शुभ बुद्धि-संपन्न लोगों की व्यापकतम एकता के अलावा और किसी तरह से नहीं हो सकता। यह अकेले लेखकों को मामला नहीं है। जैसा कि हमने कहा, लेखकीय मोर्चे की सभी लड़ाइयों का गहरा संबंध सामाजिक-राजनीतिक लड़ाइयों से होता है। राजनीति के क्षेत्र में भी ऐसी एकता कायम होगी। जो इसमें बाधाएं डालेंगे, वे अपना ही अहित करेंगे।

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