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शब्द संधान / शेखचिल्ली / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

शेख चिल्ली शब्द में, जैसा कि स्पष्ट है, दो पद हैं | शेख और चिल्ली | शेख उर्दू का एक बहुत सम्मानित शब्द है | दक्षिण एशिया में मुसलमानों की चार जातियां बताई गई हैं – शेख, सैयद, मुग़ल और पठान | इनमें शेख प्रथम हैं | इसीलिए शेख शब्द से दल-नायक या समूह के सरदार की ध्वनि भी आती है |वृद्ध-पुरुषों और मठाधीशों को भी शेख कहा जाने लगा है | सूफी संत और सूफी पीर भी शेख कहे जाते हैं |

लेकिन “शेख” के साथ यह “चिल्ली” कैसे जुड़ गया ? मूर्खों और हवाई किले बनाने वालों को ‘शेख चिल्ली’ क्यों कहा जाने लगा ? इतना ही नहीं, शेख से बना शब्द “शेखी” का अर्थ डींग हांकना,आत्म प्रशंसा में कोरी गप हांकना कैसे हो गया ? ये प्रश्न बड़े दिलचस्प हैं और इनका सही उत्तर पा लेना बड़ा दुष्कर है | क्या अधिकतर शेख मूर्ख होते हैं, हवाई किले बनाने वाले और डींग हांकने वाले होते हैं | नहीं, ऐसा तो नहीं है |

शब्दकोशों में शेखचिल्ली का अर्थ बड़ी बड़ी हवाई योजनाएं बनाने वाला एक “कल्पित” मूर्ख है | शेखचिल्ली लोक कथाओं का एक पात्र है | ये लोक कथाएँ भी कहाँ से कहाँ पहुँच जाती हैं | शेखचिल्ली की लोककथाएँ भी, हातिमताई के किस्से और मुल्ला नसिरुद्दीन के किस्सों की तरह, अरब देशों से भारत में आईं | इन किस्सों में नए नए कितने ही किस्से जुड़ते गए, इसका अंदाज़ लगाना मुश्किल है | लेकिन इन किस्सों का नायक इतना पसंद किया गया कि वास्तविक जगत में उसके गुणों से मिलते जुलते लोग उसी के नामों से पुकारे जाने लगे | शेखचिल्ली की हर लोक-कथा में आपको हवाई महल बनाने वाला एक मूर्ख मिल जाएगा; ऐसा मूर्ख जब हमें अपने वास्तविक जगत में भी कोई दिखाई देता है तो उसे हम “शेखचिल्ली” ही कहने लगते हैं |

लेकिन शेखचिल्ली क्या वस्तुत: सिर्फ एक कल्पित पात्र ही है ? शायद नहीं | कहते हैं हरियाणा के कुरुक्षेत्र के समीप एक गाँव में एक गरीब शेख परिवार रहता था इसमें एक बालक का जन्म हुआ | इस बालक का पिता बालक के जन्म होने के कुछ ही दिन बाद चल बसा | बालक को उसकी गरीब माता ने ही पाला-पोसा और शेख परिवार में जन्म लेने के कारण उसका नाम भी शेख ही रख दिया | शेख की माँ चाहती थी की उसका बच्चा पढ़ लिख कर बडा हो और परिवार को गरीबी से मुक्ति दिलाए | इसी उद्देश्य से उसने अपने बच्चे को एक मदरसे में दाखिल कर दिया | मदरसे में एक मौलवी साहेब उसे हिन्दुस्तानी ज़बान (उर्दू) सिखाते थे | हम जानते ही हैं कि हिन्दी और उर्दू में हर संज्ञा के साथ एक लिंग जुडा हुआ है, और तुर्रा यह है की लिंग के अनुरूप क्रियाएं भी बदल जाती हैं | कुछ चीजें स्त्रीलिंग हैं और कुछ पुल्लिंग | रहमान खाता है,पीता है, सोता है; सलमा खाती है, पीती है, सोती है | मौलवी साहेब नें बालक शेख को यही समझाया था | बालक ने भी यह पाठ हृदयंगम कर लिया |

हुआ यह कि एक दिन एक लड़की कुए में गिर गई | मुझे बचाओ, मुझे बचाओ कहकर वह चिल्लाने लगी | बालक शेख ने उसकी आवाज़ सुनी | उसने आसपास के लोगों से कहा, कोई लड़की कुए में चिल्ली रही है, उसे बचाओ – जल्दी आओ लड़की चिल्ली रही है | खैर लोगों ने लड़की को कुए से निकाल लिया | निकालने के बाद भी लड़की रोती- चिल्लाती रही| इस पर बालक शेख ने कहा , देखो अभी भी चिल्ली रही है | लोगों ने पूंछा ये चिल्ली चिल्ली क्या मचा रखा है ? शेख बोला क्यों इसमें गलत क्या है ? लड़का होता तो चिल्ला रहा होता, लड़की है तो चिल्ली रही है ! लोगों का हंसते हंसते बुरा हाल हो गया | और तब से बालक शेख का नाम शेखचिल्ली ही पड़ गया ! और उसकी मूर्खता की कहानियां लोक में खूब प्रचलित हुईं | कहते हैं यही शेख चिल्ली जब बुज़ुर्ग हुआ एक सूफी संत बन गया और उसका मकबरा आज भी कुरुक्षेत्र जिले में एक भव्य इमारत के रूप में खडा है, पास ही में एक मदरसे का भवन भी है | कहा तो यहाँ तक जाता है की शेखचिल्ली इसी मदरसे में पडा था |

पता नहीं शेखचिल्ली की यह कहानी कहाँ तक सही है | लेकिन कुरुक्षेत्र में शेखचिल्ली का एक मक़बरा तो है और उसे शासकीय संरक्षण भी प्राप्त है | किन्तु इतिहासकारों का कहना है कि शेखचिल्ली के इस मक़बरे को लोक में प्रचलित शेखचिल्ली से नही जोड़ना चाहिए | जिसे आज हम शेखचिल्ली का मकबरा कहते हैं वह वास्तव में “शेख चहली” का मकबरा है | शेख चहली का असली नाम अब्दुल रहीम बन्नूरी था जो शेख जलाका थानेसरी से मिलने ईरान से चलकर आया था | उन्होंने चालीस दिन का खुदा की इबादत और चिल्ला किया था और इस कारण उन्हें शेखचहली नाम से पुकारा जाने लगा था |

कौन जाने क्या सही और क्या गलत है ! पर शेखचिल्ली अभी भी ज़िंदा है – इसमें कोई दो राय नहीं हो सकतीं | - डा. सुरेन्द्र वर्मा / १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड,/इलाहाबाद- २११००१ मो. -९६२१२२२७७८

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