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लोककवि रामचरन गुप्त का लोक-काव्य

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लोककवि रामचरन गुप्त का लोक-काव्य

+डॉ. वेदप्रकाश ‘अमिताभ ’

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लोककवि रामचरन गुप्त की रचनाओं को पढ़कर यह तथ्य बार-बार कौंधता है कि जन-जन की चित्त-शक्तियों का जितना स्पष्ट और अनायास प्रतिबिम्बन लोक साहित्य में होता है, इतना शिष्ट कहे जाने वाले साहित्य में नहीं | लोक कवि एक ओर तात्कालिक और कालांकित कहे जाने वाले प्रश्नों और घटनाओं से तुरंत प्रभावित होता है | दूसरी ओर जन-आस्था में धंसे मूल्यों और मिथकों को अपनी निर्ब्याज अभिव्यक्ति में सहज ही समाहित कर लेता है | रामचरन गुप्त ने महात्मा गांधी की हत्या से लेकर भारत-पाक-चीन युद्ध आदि की जनमानस में प्रतिक्रियाओं को मार्मिक अभिव्यक्ति दी है | गांधी जी-वामपंथियों, कल्याण सिंह, काशीराम आदि के लिए भर्त्सना के विषय हो सकते हैं, लेकिन जन-साधारण उन्हें ‘महात्मा ’ ‘संत ’ और अहिंसा का पुजारी ही मानता रहा है | रामचरन गुप्त ने नाथूराम गौडसे को सम्बोधित रचना में इसी सामूहिक मनोभाव को व्यक्त किया है-

नाथू तैनें संत सुजानी

बापू संहारे |

इसी प्रकार पाक-चीन युद्धों के समय कथित बुद्धिजीवी भले ही सोचते रहें ‘ युद्ध ‘ बहुत घृणित है या यह धारणा बना ली जाए कि चीन के साथ युद्ध में भारत की गलती थी | जन-साधारण यह सब नहीं सोचता, न सोचना चाहता है | उसके लिए विदेशी आक्रमण अपवित्र कर्म है और वह उसका मुंह-तोड़ उत्तर देने के लिए संकल्पबद्ध होता है –

अरे पाक ओ चीन

भूमी का लै जायेगौ छीन

युद्ध की गौरव-कथा कमीन

गढ़ें हम डटि- डटि कैं |

मंहगाई जैसी तात्कालिक परेशानियों से क्षुब्ध और संतप्त जनमानस की पीड़ा को अपनी एक रचना में मुखर करते हुए श्री गुप्त ने पाया है कि सन-47 में केवल राजनीतिक आज़ादी मिली थी | जन-साधारण आर्थिक आज़ादी चाहता है-

एक-एक बंट में आबे रोटी

भूखी रोबे मुन्नी छोटी

भैया घोर ग़रीबी ते हम कब होंगे आजाद ?

इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि रामचरन गुप्त की रचनाओं में अपने समय का साक्ष्य बनाने की शक्ति है | वे केवल यथार्थ-वर्णन तक सीमित नहीं रहते, उनकी जन-धर्मी दृष्टि भी रचनाओं में उभरती है | कुछ रचनाओं में उनका साम्राज्यवाद-विरोधी दृष्टिकोण ठेठ ढंग से व्यक्त हुआ है –

1. पहलौ रंग डालि दइयो तू विरन मेरे आज़ादी कौ

और दूसरौ होय चहचहौ इन्कलाब की आंधी कौ,

एरे घेरा डाले हों झाँसी पे अंगरेज ..........

2. हमने हर डायर को मारा हम ऊधमसिंह बलंकारी

हम शेखर हिन्द-सितारे हैं, हर आफत में मुस्कायेंगे |

श्री गुप्त की रचनाएँ फूल-डोल, मेलों और रसिया-दंगलों में गाने के निमित्त रचित हैं | लोकमानस में विद्यमान राम-केवट सम्वाद, श्रवणकुमार-निधन और महाभारत के सन्दर्भों की लोक साहित्य में एक खास हैसियत है | इनके माध्यम से अनपढ़ जनता तक ‘विचार’ का सम्प्रेषण सफलतापूर्वक सम्भव होता है -

“ प्रभु जी गणिका तुमने तारी, कीर पढ़ावत में | वस्त्र-पहाड़ लगायौ, दुस्शासन कछु समझि न पायौ, चीर बढ़ावत में | राम भयौ वन-गमन एक दम मचौ अवध में शोर | रज छु उड़ी अहिल्या छन में “ आदि पदों से प्रत्यक्ष है कि रामचरन गुप्त के लोककाव्य में पुराख्यानों और मिथकों की उपस्थिति ‘ अभिव्यंजना ‘ को प्रखर बनाती है |रसिया-दंगलों में लोक-कवियों को चमत्कार-प्रदर्शन का आश्रय भी लेना पड़ता है | यह चमत्कार पद्माकर जैसे सिद्ध कवि की शब्द-क्रीड़ा का स्मरण दिलाता है –

।। पंडित परम पुनीत प्रेम के ।।

दुर्बल दशा दीनता देखी दुखित द्वारिकाधीश भये

दारुण दुःख दुःसहता दुर्दिन दलन दयालू द्रवित भले

सो सत्य सनेही संग सुदामा के श्री श्याम सुपाला

ए दीनन पति दीन दयाला।

अस्तु, अलीगढ़ के जनकवि खेम सिंह नागर, जगनसिंह सेंगर आदि की तरह श्री गुप्त भी उच्चकोटि के लोककवि हैं |

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डॉ. वेदप्रकाश ‘ अमिताभ’, डी. 131, रमेश विहार, ज्ञान सरोवर, अलीगढ़ -202001, moba.-09837004113

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++दया के सागरः लोककवि रामचरन गुप्त

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लोककवि रामचरन गुप्त का मन कविता के स्तर पर ही संवेदनशील नहीं रहा, बल्कि जिन स्त्रोतों से वे कविता के लिये संवेदना ग्रहण करते थे, उन सामाजिक स्त्रोतों की अस“यता, क्रन्दन, करुणा, दया, दुखःदर्द और शोषण के प्रति ‘कुछ कर गुजरने’ की ललक उनमें आजीवन रही। गरीबों, असहायों, पीडि़तों के प्रति सेवा-भाव में रचा-बसा उनका मन हर तरह अत्याचारों का विरोधी रहा। चाहे अलीगढ़ के दंगे हों या भोपाल गैस त्रासदी या कोई बलात्कार या दहेजहत्या से लेकर चोरी-डकैती-कांड, उनका मन ऐसी घृणित घटनाओं पर क्षोभ, आक्रोश और उत्तेजना से भर उठता।

लोककवि रामचरन गुप्त आर्थिक रूप से भारत को गुलाम बनाने वाली अमेरिकी नीतियों के प्रति जनता के बीच चाहे जब अपने विरोध को मुखर कर बैठते। ऐसे संवेदनशील मन के धनी श्री रामचरन गुप्त अपनी जन्मस्थली गांव एसी जिला-अलीगढ़ में रहते थे तो ग्रामवासियों की सेवा में अपना तन-मन लगाकर कई बार उन्होंने दिन-रात एक किये। एसी गांव के निवासी डोरी शर्मा के पैरों में फोड़े हुए और फोड़ों में कीड़े रेंगने लगे। श्री रामचरन से डोरी शर्मा की असह्य वेदना और दुर्दशा नहीं देखी गयी। वे उसे लेकर सरकारी अस्पताल पहुंचे और भर्ती कराकर उसका इलाज करवाया। ठीक इसी तरह की सहायता उन्होंने राजवीर पुत्र मोहन लाल की भी की।

श्री गुप्त के साथी लोकगायक डोरीलाल शर्मा के भाई महेन्द्र शर्मा उपर्फ नरहला की ट्यूबैल की कंुडी में गिरने से जीभ कट गयी, वह उसे लेकर भूखे-प्यासे रात में ही भाग छूटे और नगर के सरकारी अस्पताल में उसका इलाज कराया। श्री गुप्त के मित्रा ठा. चन्द्रपाल सिंह के पिता आंखों के रोग से ग्रस्त थे, उन्हें लेकर वे गांधी आई हॉस्पिटल आये और वहां अपना काम छोड़कर कई दिन उसके साथ रहे।

श्री रामचरन गुप्त का यह काल घोर गरीबी और दुर्दिनों का काल था। एक दिन मजदूरी न करने का मतलब था-घर में एक दिन फाका। लेकिन श्री गुप्त ने अपनी या अपने परिवार की चिन्ता न करते हुए गांव के ऐसे अनेक लोगों की हर संभव सहायता या सेवा की, जिन्हें वक्त पर अगर सहायता न दी जाती तो परिणाम अनिष्टकारी, दुःखद और त्रासद हो सकते थे। यही नहीं वे बिच्छू, ततैया आदि के काटने पर चीखते-चिल्लाते लोगों का मंत्रों आदि के द्वारा उपचार करते थे।

श्री रामचरन गुप्त अपना गांव एसी छोड़कर जब अलीगढ़ नगर में आ बसे, उस वक्त उन पर लक्ष्मी की विशेष कृपा हो गई तो उन्होंने धन से असहाय, गरीबों, रिश्तेदरों की यथासम्भव सहायता की। गांव एसी में अपनी जमीन पर मंदिर-निर्माण करवाया। साध्ुओं, संतों, फकीरों का स्वागत किया। सच तो यह है कि उनके सामने याचक बनकर जो भी आया, वह निराश नहीं लौटा। एक बार उनके पड़ोस में एक जाटव का लड़का अग्नि की चपेट में आ गया। श्री गुप्त उसे देखने तुरंत घटनास्थल पर पहुंचे और बिना सोचे अपनी जेब में से इलाज को रुपये दिये और उसके परिवार वालों से कहा-‘इस बच्चे का तुरंत भर्ती कराकर अस्पताल में इलाज करवाओ। लोककवि रामचरन गुप्त सचमुच दया के सागर थे।

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संघर्षों की एक कथाः लोककवि रामचरन गुप्त

+इंजीनियर अशोक कुमार गुप्त [ पुत्र ]

लोककवि रामचरन गुप्त 23 दिसम्बर 1994 को हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनका चेतन रूप उनके सम्पर्क में आये उन सैकड़ों जेहनों को आलोकित किये है, जो इस मायावी, स्वार्थी संसार के अंधेरों से वाकिफ हैं या जिनमें इस अंधेरे को खत्म करने की छटपटाहट है। ऐसे लोगों के लिए रामचरन गुप्त आज भी एक महापुरुष, एक महान आत्मा, संघर्ष के बीच जन्मी-पली-बढ़ी एक गौरव कथा हैं। वे एक स्वाभिमानी, ईमानदार और मेहनतकश जि़न्दगी की एक ऐसी मिसाल हैं जिसका आदि और अन्त मरुथल के बीच एक भरा-पूरा वसंत माना जाए तो कोई अतिशियोक्ति न होगी।

श्री रामचरन गुप्त का जन्म अलीगढ़ के गांव ‘एसी’ में लाला गोबरधन गुप्त के यहां जनवरी सन् 1924 को एक बेहद निर्धन परिवार में हुआ। उनकी माताजी का नाम श्रीमती कलावती देवी था। पंडित ने जब उनकी जन्म कुंडली तैयार की तो उसमें लिखा कि ‘यह बच्चा होनहार और विलक्षण शक्तियों से युक्त रहेगा। इसके ग्रहों के योग बताते हैं कि यह अपने माता-पिता की एकमात्र पुत्र संतान के रूप में रहेगा। श्री रामचरन गुप्त के कई भाई थे किंतु उनमें से एक भी जीवित न रह सका। श्री रामचरन गुप्त ने भाइयों का वियोग अपने पूरे होशोहवास में झेला और उनके मन पर भाइयों के मृत्युशोक की कई गहरी लकीरें खिंचती चली गयीं। भ्रात-दुःख की यह छाया उनकी कविताओं में स्पष्ट अनुभव की जा सकती है।

श्री रामचरन गुप्त सिर्फ कक्षा-2 तक अलीगढ के ग्राम-मुकुटगढ़ी के विद्वान, समाजसेवी, राष्ट्रभक्त मास्टर तोतारामजी द्वारा शिक्षित हुए। मास्टर तोताराम के सुशील और नेक संस्कारों की चर्चा वे अक्सर करते रहते थे। श्री गुप्त में विलक्षण प्रतिभा बाल्यकाल से ही थी। एक बार इंस्पेक्टर आॅफ स्कूल ने मुकुटगढ़ी बाल विद्यालय का निरीक्षण किया और बच्चों से तरह-तरह के सवाल किये। सारे बच्चों के बीच होनहार बालक गुप्त ने इस सलीके के साथ सारे प्रश्नों के उत्तर दिये कि इंस्पेक्टर आॅफ स्कूल अत्यंत प्रभावित हुए। वह इस होनहार बालक के पिता से मिले और उनसे इस बच्चे को गोद लेने तथा उच्च शिक्षा दिलाने की बात कही। लेकिन पिता ने उन्हें न तो इन्स्पेक्टर आॅफ स्कूल के साथ भेजा और न उसकी भावी शिक्षा की कोई व्यवस्था की। परिणामतः वे कक्षा-दो तक ही शिक्षा पा सके।

एक विलक्षण प्रतिभा का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि शिक्षा की रोशनी उस तक न पहुंच सकी। यही नहीं परिस्थितियों ने उन्हें खेलने-कूदने की उम्र में ही एक सेठ के यहां बर्तन मांजने, कपड़े धोने पर मजबूर कर दिया। पर प्रतिभा का विलक्षण तत्त्व दबाने से भला कैसे दब सकता है? श्री गुप्त ने सेठ के यहां बर्तन मांजने और कपड़े धोने के दौरान, उसी के कारखाने में पता नहीं जाने कब, ताले बनाने का काम सीख लिया। जब सेठ को इस बात का पता चला तो वे बेहद खुश हुए। उन्होंने श्री गुप्त की पीठ ठोंकी और एक किलो घी पुरस्कार स्वरूप दिया। इस प्रकार श्री रामचरन गुप्त एक घरेलू नौकर की जगह ताले के कारीगर बन गये।

लगभग 16-17 वर्ष की उम्र में हारमोनियम-निर्माता श्री रामजीलाल शर्मा से श्री गुप्त का सम्पर्क हुआ। रामजीलाल शर्मा एक बेहतरीन हारमोनियम वादक और एक अच्छे गायक थे। परिणामस्वरूप श्री गुप्त में भी सांस्कृतिक गुणों का समावेश होने लगा। वह गायन और वादन की विद्या में निपुण हो गये। अन्य कवियों की कविताएं, गीत-भजन गाते-गाते वे स्वयं भी गीतों की रचना करने लगे। उनके प्रारम्भिक गीतों में ईश्वर-भक्ति का समावेश अनायास नहीं हुआ। इस भक्ति के मूल में उनकी निधर्नता, असहायता अर्थात् अभावों-भरी जि़न्दगी से मुक्त होने की छटपटाहट ने उन्हें ईशवन्दना की ओर उन्मुख किया।

श्री रामचरन गुप्त के पिता को जब पुत्रा के इन कलात्मक गुणों की जानकारी हुई तो वे बेहद खुश हुए और उन्होंने अपने गीत-संगीत के शौकीन गांव एसी के ही साथी जसमन्ता बाबा के साथ उनको लोकगीतों की परम्परा से जोड़ दिया।

लगभग 20 वर्ष की उम्र में श्री गुप्त का विवाह कस्बा सोंख जिला मथुरा के सेठ बद्रीप्रसाद गुप्त की पुत्री गंगा देवी के साथ जून 1946 में संपन्न हुआ। उस वक्त श्री गुप्त एक ताले के कारीगर के स्थान पर ताले के एजेण्ट के रूप में 150/- प्रतिमाह पर कार्य करने लगे। उनके लिए एजेण्ट के रूप में यह काल इसलिए सुखद रहा, क्योंकि इसी दौरान उन्हें पूरे भारत वर्ष के भ्रमण का अवसर मिला। भारत-भ्रमण के दौरान उन्होंने भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने क्रांतिकारियों के जीवन-चरित्र पढ़े। भगतसिंह, गांधी-नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस आदि पर लिखी पुस्तकों को छान मारा?

श्री रामचरन गुप्त को भारत से अतीत से बेहद लगाव थे। उनके मन में भारत के इतिहास को जानने की तीव्र लालसा थी, अतः वे जिस भी शहर में जाते, समय मिलते ही उस शहर की पुरातन सभ्यता की जानकारी के लिए किलों में या अन्य पुरातन स्थलों में खो जाते। भारत के राजा-महाराजाओं का इतिहास उन्हें ऐसे रट गया जैसे सबकुछ उन्हीं के सामने घटित हुआ हो।

मगर एजेन्ट का यह कार्य ज्यादा समय न चल सका। सेठ हजारीलाल का कारखाना फेल हो गया और श्री रामचरन गुप्त का भविष्य अंधकारमय। घर में सम्पन्नता की जगह पुनः विपन्नता ने ले ली। वे धंधे या रोजी की तलाश में ठोकरें खाने लगे। उन्होंने अलीगढ़ के ही मौलवी साहब, शमशाद ठेकेदार, शमशुद्दीन और हाजी अल्लानूर आदि के यहां जगह-जगह काम किया, लेकिन इतना भी न कमा सके कि चैन से दो वक्त की रोटी खा सकें।

संघर्ष और अभावों-भरी जि़ंदगी की कड़वाहट ज्यों-ज्यों सघन होती गई, श्री गुप्त का काव्य-प्रेम त्यों-त्यों और बढ़ता गया। वे एक तरफ रोटी के लिये अथक परिश्रम करते, दूसरी तरफ जब भी समय मिलता, किसी न किसी नयी कविता का सृजन कर डालते। उन्होंने अपने गांव के ही जसवंता बाबा, नाथूराम वर्मा आदि के साथ जिकड़ी भजनों की शास्त्रीय परम्परा से युक्त मंडली का गठन कर लिया, जो फूलडोलों [आंचलिक लोकगीत सम्मेलन] में जाती। बाबा जसवंत ढोलक पर संगत देते और लाल खां फकीर तसला बजाते। कवि के रूप में मंडली की तरफ से श्री रामचरन गुप्त रहते।

सन् 1953 में श्री गुप्त यहां प्रथम पुत्र का आगमन चार दिन की भूखी मां [श्रीमती गंगा देवी] के पेट से हुआ, जिसका नाम रमेश रखा गया। उनका पुत्र भी विरासत में मिली कविता से भला अछूता कैसे रहता। यह पुत्र बचपन में संगीत और गायकी के लिये प्रसिद्ध रहा और अब सुकवि रमेशराज के नाम से लगातार हिन्दी साहित्य की सेवा में रत है।

लोककवि रामचरन गुप्त के दूसरे पुत्र अशोक का जन्म 1958 में हुआ, जो इंजीनियर के रूप में आजकल सरकारी सेवा में नियुक्त है। इसके पश्चात् एक पुत्री कुमारी मिथिलेश का जन्म दिसम्बर 1955 में हुआ, पंडित ने जिसका अन्नपूर्णा रखा और नाम रखते समय यह घोषणा की कि ‘गुप्ताजी यह कन्या आपके घर में अन्न की पूर्ति करेगी।’ भविष्यवाणी सत्य साबित हुई और इस पुत्री के जन्म के दो-तीन साल के भीतर लगभग यह स्थिति आ गयी कि परिवार को पेट-भर खाना मिलने लगा।

जब श्री गुप्त का कवि-कर्म भी ऊँचाइयां छूने लगा। वे अब अपने पिता और अपने गांव के ही लक्ष्मीनारायन टेलर, प्रहलाद टेलर, बफाती टेलर, गजराज सिंह, दलवीर सिंह, रामबहादुर, सुरेश, रीता गड़रिया, डोरी शर्मा, इंदरपाल शर्मा, बाबा जसवंता, सुबराती खां आदि के साथ फूलडोलों में जिकड़ी भजनों को लिख कर ले जाते। श्री डोरीलाल शर्मा गुप्त के भजनों को गाने वाले प्रमुख गायक रहते। जसवंता बाबा ढोलक बजाते। शक्का फकीर तसला और भजनों के दोहराव या आलाप के लिए लक्ष्मी नारायण टेलर, दलवीर सिंह, प्रहलाद टेलर, सुरेश, इंदरपाल शर्मा आदि प्रमुख रूप से रहते थे। गजराज सिंह या श्री रामचरन गुप्त हारमोनियम को सम्हालते और तबले पर संगत देते लाल खां।

सन् 1960 से लेकर सन् 74 तक का समय श्री रामचरन गुप्त के कविकर्म का स्वर्णकाल था। इसी काल में उन्होंने ‘ए रे रंगि दे रंगि दे रे’, ‘ए कुआरी रही जनकदुलारी’, सिय हिय बिन अधिक कलेशा’, ‘जूझि मरैगो कोई पंडवा’,‘ बिन श्याम सुहाग रचै ना’, ‘नाथूराम विनायक’, कैसौ देस निगोरा’, ‘जा मंहगाई के कारन’, ‘ए रे सीटी दै रई रे’, ‘सावन सूनौ नेहरू बिन’, ‘मेरी तरनी कूं तारौ तारनहार’, ‘वंशी वारे मोहना’, ‘राम भयौ बन गमन’, ‘कौने मारो पुत्र हमारौ’, ‘अड़ें हम डटि-डटि कैं’ जैसी कालजयी कविताओं का सृजन किया। यह रचनाएं बृज-क्षेत्र में आज भी काफी लोकप्रिय हैं।

श्री गुप्त का सन् 65 के करीब क्रांतिकारी कवि खेमसिंह नागर, पंडित भीमसेन शास्त्री , पंडित जगन्नाथ शास्त्री , पंडित रामस्व रूप शर्मा आदि विद्वानों से सम्पर्क हुआ और इस सम्पर्क को मित्रता में बदलते देर न लगी। वे क्रांतिकारी कवि खेमसिंह नागर के कहने पर कम्युनिस्ट पार्टी के मेम्बर बन गए और काफी समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के लिए कार्य करते रहे। किंतु कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधाभासों को देखते हुए वे धीरे-धीरे निष्क्रिय हो गये। नागरजी के सम्पर्क से इतना जरूर हुआ कि उनकी कविताएं ईश-भक्ति के साथ-साथ समाजोन्मुखी, यथार्थपरक और ओजमय होती चली गयीं।

सन् 1973 तक कविकर्म में निरंतर जुटे रहने का परिणाम यह हुआ कि श्री गुप्त काव्य के शास्त्रीय पक्ष के अच्छे ज्ञाता और महान वक्ता बन बैठे। वे अब फूलडोलों में निर्णांयक [जज] के रूप में आमंत्रित किये जाते। वे सिंगर्र, छाहरी, एसी, पला, बरौठ, पड़ील, देदामई, बिचैला आदि गांवों के फूलडोलों में निर्णांयक मंडल में सम्मिलत किये गये।

सन् 1973 में पुरा स्टेशन के पास गांव-बरेनी में एक ऐतिहासिक फूलडोल का आयोजन हुआ, जिसमें बृजक्षेत्र की 36 मंडलियाँ आयी। उन में से नौ मंडलियों के कवि हिन्दी साहित्य में पी.एचडी. किये हुए थे। इन 36 मंडलियों में से एक मंडली एसी गांव की भी थी, जिसके कवि के रूप में नायक श्री रामचरन गुप्त बने। बेरनी गांव के दंगल में उनके द्वारा रचित भजन ‘मेरी तरनी कूं तारौ तारन हार’ तो अकाट्य रहा ही, श्री गुप्त ने उन 35 मंडलियों के भजनों को अपनी तर्कशक्ति से दोषपूर्ण प्रमाणित कर डाला। उस रात-भर में 35 मंडलियों के कवियों से तर्क-वितर्क के उपरांत सुबह निर्णांयक मण्डल ने उनकी मंडली को प्रथम पुरस्कार देने की घोषणा कर दी।

बेरनी गाँव के फूलडोल में जब लोककवि रामचरन गुप्त को श्रेष्ठ कवि के रूप में प्रथम पुरस्कार की घोषणा या उससे पूर्व तर्क-वितर्क को कुछ कवियों ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और लाठी-बंदूक लेकर श्री गुप्त पर हमला करने के लिए तैयार हो गए। इस घटना को लेकर इनका मन दुःख और क्षोभ से भर उठा। श्री गुप्त पुरस्कार लेकर वापस अपने गांव तो जरूर चले आये लेकिन उन्होंने भविष्य में किसी फूलडोल में न जाने की कसम खा ली। यह एक कवि का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि बेरनी के दंगल ने उनके मन में इतनी घृणा भर दी कि वह अपने कविकर्म से ही विरत हो गए। ‘मेरी तरनी कूं तारौ तारनहार’ उनकी श्रेष्ठ, पर अन्तिम कविता बनकर रह गयी।

सन् 1970-71 में उनका सम्पर्क दिल्ली के ‘खुराना ब्रादर्स’ के मालिक वी.पी. खुराना से हुआ और उन्हें ठेके पर ताले बनवाने का काम सौंपा। श्री रामचरन गुप्त ने कविकर्म से अपना सारा ध्यान हटाकर गांव में ही एक-दो कारीगर रख कर ताला निर्माण में लगा दिया। इसका एक कारण यह भी था कि उनके दोनों पुत्र इस वक्त उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। उन्हें और शिक्षित कराने में ही उन्होंने अपनी समझदारी समझी। इसके बाद 1973-74 में उन्होंने अपना काम गांव एसी से हटाकर अलीगढ़ में ही डाल दिया। अब वे कारीगर से एक ताले के कारखाने के मालिक बन गये। इसी बीच 1973 में उनके यहां एक पुत्रा चन्द्रभान का जन्म और हुआ।

सन् 1975 में श्री रामचरन गुप्त ने अपना गांव एसी छोड़कर थाना सासनी गेट के पास ईसानगर अलीगढ़ में अपना एक मकान खरीद लिया। उसकी ऊपर की मन्जिल में वह सपरिवार के साथ रहते और नीचे की मन्जिल में कारखाना डाल दिया। सन् 75 से लेकर सन् 90 तक उन्होंने चतुरश्रेणी वेश्य समाज की सेवा में अपना तन-मन-धन लगाया। वे इस संस्था के कोठारी भी रहे।

सन् 1989 में उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह बड़ी धूमधाम से किया। विवाह करने के उपरांत उन्होंने उसी दिन स्वप्न देखा कि उनके हाथों में उल्लू है और वह उड़ने के लिए फड़पफड़ा रहा है। इस स्वप्न की चर्चा उन्होंने अपने परिवारजनों से की और कहा कि अब हमारे घर से लक्ष्मी [श्री रामचरन गुप्त की पुत्री ] चली गयी। समय की लीला देखो कि इस स्वप्न के कुछ माह बाद ही खुराना ब्रादर्स से बिगाड़-खाता हो गया। पार्टी बेईमान हो गयी और श्री रामचरन गुप्त को कई लाख का घाटा दे दिया। घूमता पहिया जाम हो गया।

सन् 1990 के बाद सन् 94 तक का काल श्री गुप्त के लिए दुःख-तनाव और द्वन्द्वों का काल रहा। वह अस्वस्थ रहने लगे। उदररोग ने उन्हें बुरी तरह जकड़ लिया। अपने उपचार के लिये वे एक वैद्य से दस्तावर दवा ले आये, परिणामतः उन्हें इतने दस्त हुए कि उनके दोनों गुर्दे फेल हो गये। गुर्दे फेल होने के बावजूद वे मनोबल और साहस के साथ एक माह तक मुस्कराते हुए मौत के साथ आंख मिचैली का खेल खेलते रहे और 23 दिसम्बर 1994 को अपने बड़े पुत्रा रमेशराज की बांहों में सिर रखे हुए निर्विकार परम तत्त्व में विलीन हो गये।

 

मेरे बाबूजी लोककवि रामचरन गुप्त

+ डॉ. सुरेश त्रस्त

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आठवें दशक के प्रारम्भ के दिनों को मैं कभी नहीं भूल सकता। चिकित्सा क्षेत्रा से जुड़े होने के कारण उन्हीं दिनों मुझे दर्शन लाभ प्राप्त हुआ था स्वर्गीय रामचरन गुप्त का। मेरे मुंह से बाबूजी का सम्बोधन निकला और सम्मान में स्वतः ही मेरे दोनों हाथ जुड़ गए। उस समय से मेरा यह नियम हो गया कि मैं प्रतिदिन ही बाबूजी से मिलने लगा और कभी-कभी तो दिन में तीन-चार बार तक भेंट हो जाती।

बाबूजी को ब्रौंकाइटिस और कोलाइटिस रोग थे। दवाओं के बारे में मुझसे पूछते रहते। लाभ भी होता। लेकिन खाने-पीने की बदपरहेजी भी कभी-कभी कर ही लेते थे, जिससे रोग पुनः पनप जाता। वे सबसे ज्यादा अपने पेट से परेशान रहते थे। जैसा कि हमारे देश में हर आदमी जिससे भी अपनी बीमारी के बारे में बात करेंगे तो वह फौरन ही कहेगा कि आप अमुक दवाई खा लें, इसके खाने से मैं या मेरे रिश्तेदार ठीक हो गये। बाबूजी के साथ भी कई बार ऐसा ही हुआ और इसके चलते ही रमेशराज [बाबूजी के बड़े बेटे] मुझे रात में भी घर से उठा-उठा कर ले गये।

एक बार रमेशजी मुझे रात के बारह बजे के करीब बुला लाये। मैंने जो बाबूजी को देखा तो 104 बुखार था। वे बेहोशी की हालत में थे। उन दिनों मलेरिया चल रहा था। मैंने वही इलाज किया। ठीक हो गये। दूसरे दिन जब मैं उनसे मिलने पहुंचा तो वे ठीक थे। लेकिन रात की बात का उन्हें तनिक भी पता नहीं था।

नवम्बर-1994 में उनकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो चली थी। मैंने बाबूजी को एक रिक्शे में जाते हुए देखा तो मुझे लगा कि वह अधिक ही बीमार हैं। मैंने रमेशजी से इस विषय में बात की तो पता लगा कि वे आयुर्वेदिक दवा खा रहे हैं। एक दिन में 35-40 बार शौच चले जाते हैं। मैंने तुरन्त कहा कि उनके शरीर में पानी की कमी हो जायेगी और गुर्दो पर अतिरिक्त भार भी पड़ेगा। कभी भी कुछ अनहोनी हो सकती है। और वही हुआ जिसका मुझे डर था।

अंतिम दिनों की स्थिति यह हो गयी कि चलने-फिरने में परेशानी होने लगी। रात में कई बार पेशाब के लिए उठना, गिर पड़ना लेकिन कोई शिकवा नहीं। एक दिन जब मैं उन्हें देखने गया तो बाबूजी रमेशजी से कह रहे थे कि ‘भइया मोये एक सीढ़ी-सी बनवाय दै। मैं सरक-सरक के टट्टी-पेशाब कूं चलो जाउगो। रात को ठंड में तेरी बहू और माँ कू तकलीफ न होय।’ यह उनके संघर्षशील व्यक्तित्व की ही तो बात है जोकि ऐसी स्थिति में भी किसी को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहते थे।

वह अपनी बात के धनी और साफ बात कहने वाले थे। मेरी अपनी भी कोई समस्या होती तो बाबूजी बहुत सोच-समझ कर सही परामर्श देते। मेरे साथ उनका व्यवहार पुत्रवत रहा। उनकी कमी मैं हमेशा ही महसूस करता रहूंगा।

आज बाबूजी हमारे बीच नहीं रहे। उनकी स्मृतियां सदैव ही हमारे साथ रहेंगी। साहित्य-चर्चा होती तो वह कहते कि तुम और रमेश जो कविता [खासतौर से मुक्तछंद] लिखते हो, क्या इसी को कविता कहते हैं? यह सुनकर हमें बड़ा अचरज होता। हम सोचते कि वाकई हम उनके मुकाबले कहीं नहीं ठहरते हैं?

मैं उनके व्यवहार में जिस बात से सबसे अधिक प्रभावित हूं-वह था उनका आत्म-विश्वास। कोई भी उदाहरण हो, बाबूजी उसकी पुनरावृत्ति तीन-चार बार अवश्य करते। यह सारी बातें उनकी सच्चाई और आत्म-विश्वास को प्रगट करती हैं।

मेरे बाबूजी दुबले-पतले, अपनी धुन के पक्के, जुझारू, कामरेड साहित्यकार भी थे। एक नेकदिल, ईमानदार इन्सान, दुःखियों के दुःख के साथी थे। ज्ञान का भण्डार थे। ऐतिहासिक ज्ञान इतना कि वह स्वयं में एक इतिहास थे। ऐसे थे मेरे बाबूजी!

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|| लोककवि रामचरन गुप्त मनस्वी साहित्यकार ||

+डॉ. अभिनेष शर्मा

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स्व. रामचरन गुप्त माटी के कवि थे। अपने आस-पास बिखरे साहित्य को अपने शब्दों का जामा पहनाकर लोकधुन से उसका शृंगार कर जिस तरह से वक्त की इमारतों में सहेजते रहे, शायद वर्तमान में कोई भी उस तरह का साहस नहीं कर पाता है। वर्तमान कविता जो शायद खुद ही तुकान्त और अतुकान्त शीर्षकों में विभक्त होकर कभी ‘गीत’, कभी ‘हिन्दी ग़ज़ल’, कभी ‘नई कविता’ की उपाधि से विभूषित होकर अपनी विवशता पर हैरान है, ऐसे में लोकगीत, लोकधुन और लोकभाषा के सुस्पष्ट सुदृढ़ स्तंभों पर आसीन गुप्तजी का साहित्य, मील का पत्थर बना काव्य-सृजकों के लिये नई राह खोलता है।

प्रतिभा कभी भी एक जगह संकुचित नहीं रह सकती। प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति चाहे ग्रामवासी हो या कतिपय शहरी, वह पुस्तक पढ़कर स्वयं शास्त्री हुआ हो या पाठशालाओं में अध्यापकों की अभिरक्षा में शिक्षित हुआ हो, वह कभी भी गुमनामी के तिमिर में तिरोहित नहीं हो सकता। समय को उसे समझकर उसकी आहट लेनी ही होगी तथा उसको पूर्ण सम्मान देते हुए उसका वास्तविक अधिकार उसे देना ही होगा।

स्व. गुप्तजी की रचनाओं से सुसज्जित ‘जर्जर कश्ती’ के अंक सही मायनों में साहित्य के आंगन में पल्लवित उस पुष्प की सुगन्ध को व्यापक गगन में स्थापित करने का एक बेजोड़ प्रयास रहे हैं। प्रस्तुत अंकों में प्रकाशित रचनाएं गुप्तजी के व्यक्तित्व को पूर्णरूप से चित्रांकित करने में सफल रही हैं। साहित्य की गद्य और पद्य दोनों विधाओं में उनकी मजबूत पकड़ दृष्टिगोचर होती है। सामयिक काल की घटनाओं का निवेश रचनाओं को श्वेत पत्र की तरह महत्वपूर्ण बना देता है।

जो बात हमारे राजनीतिज्ञ कहते हुए डरते हैं, उसे उन्होंने पूर्ण जोश से अपने गीतों का केन्द्र बिन्दु बनाया। उसी का चित्रण निम्नलिखित पंक्तियों में है-

‘लाशों पर हम लाश बिछायें, करि दे खूँ के गारे हैं

आँच न आने दें भारत पै, चले भरे ही आरे हैं।।’’

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भारत की उत्तर सीमा पर, फिर तुमने ललकारा है

दूर हटो ऐ दुष्ट चीनियो ! भारतवर्ष हमारा है।

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ओ मिस्टर अय्यूब आग धधकी है सूखी कंडी में

लहर लहर लहराय तिरंगा अपना रावलपिंडी में ।

यथार्थ का काव्यांकन करने में भी गुप्तजी पीछे नहीं रहे हैं। जीवन के छोटे-छोटे सत्य जो हर कदम पर हमारी सहायता करते हैं या फिर हमारे गतिमान कदमों में बेडि़या डालते हैं, उनका हर कवि की शैली पर व्यापक असर पड़ता है तथा लोककवि होने के कारण गुप्तजी भी उससे अछूते नहीं है-

मैं सखि निर्धन का भयी करै न इज्जत कोय

बुरी नजर से देखतौ हर कोई अब मोय।

श्री गुप्त निम्न पंक्तियों में गरीब नारी-हृदय का सटीक चित्रण है जो उनके काल में ही नहीं, वर्तमान में भी रत्ती-भर भी परिवर्तित नहीं है। तभी तो दुखियारी यह कहने पर विवश है-

कैसौ देश निगोरा, तकै मेरी अंगिया कौ डोरा

मोते कहत तनक से छोरा, चल री कुंजन में।

यदि कवि की लेखनी सीमित परिभाषाओं को ही परिभाषित करती रहे या कवि को किसी एक विधा में संतुलित कर दे तो वह कवि कभी लोककवि नहीं हो सकता और न कभी यह उक्ति की जाती है कि-‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’।

गुप्तजी की साहित्य-मंजूषा में भक्तिगीतों की भरमार है और यही कारण है कि सीधी , सरल और गेय ब्रजभाषा में रचित उनके भक्तिगीत-रसिया उन्हें जनकवि बनाने में सहायक होते हैं। वियोग और संयोग उनके भक्तिगीतों की जान है, तभी तो वह गाते हैं-

‘ओ अंतिम समय मुरारी, तुम रखना याद हमारी।’

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‘मीठी-मीठी प्यारी-प्यारी बाजी रे मुरलिया

सुन मुरली की तान बावरी ब्रज की भयी गुजरिया।’

जिकड़ी भजन, आजादी के गीत, कथा-गीत यहाँ तक कि मौसम के परिवर्तन का स्वागत मल्हार से, हर क्षेत्र में उनकी रचनाएं अपनी छटा बिखेरते हुए मिल जाती हैं-

कारे-कारे बदरा छाये छूआछूत के जी

ऐजी आऔ हिलमिल झूला लेउ डार

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सावन समता कौ आये मेरे देश में जी

एजी रामचरन कौ नाचे मनमोर।

ऐसी पंक्तियों को गुनगुनाते हुए किसका मनमोर नहीं नाच उठेगा?

श्री गुप्त की लघुकथाओं में भी उनके द्वारा किये गये कटाक्ष कापफी सटीक हैं -‘‘ रे मूरख किलो में नौ सौ ग्राम तो हम वैसे ही तोले हैं और क्या कम करें’’।

जर्जर कश्ती के अंकों में उनके पुत्र रमेशराज द्वारा लिखी गयी कविताएं उनकी सुस्थापित जगह के साथ पूरा-पूरा न्याय करती हैं-

‘हम हुए जब-जब भी मरुथल जिंदगी के दौर में

तुमको देखा बनते बादल इसलिए तुम याद हो।’

गुप्तजी द्वारा रचित साहित्य आने वाले समय में अपनी अलग छटा लिये हमेशा-हमेशा याद रखा जायेगा तथा हर नया कवि इस शैली को अपनाने के लिये उत्सुक रहेगा। भले ही शारीरिक रूप से वह वर्तमान में नहीं हैं परन्तु उन जैसा मनस्वी साहित्यकार काल-स्तम्भ पर हर युग में अपनी ध्वजा लिये सजग प्रहरी की भांति साहित्य-सेवा करता मिलेगा।

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+|| लोककवि रामचरन गुप्त के लोकगीतों में आनुप्रासिक सौंदर्य ||

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+ज्ञानेन्द्र साज़

‘जर्जरकती’ मासिक के जनवरी-1997 अंक में प्रकाशित लोककवि स्व. रामचरन गुप्त की रचनाएं युगबोध की जीवन्त रचनाएं हैं। हर लोककवि की कविता में आमजन लोकभाषा में बोलता है। ये कविताएं तथाकथित बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोगों की रचनाओं से सदैव भिन्न रही हैं, लेकिन ऐसी रचनाओं से कहीं बेहतर हैं।

लोककवि लोकभाषा में प्रचलित गायन शैलियों का बेताज बादशाह होता है। रसिया, मल्हार, दोहा, होली, स्वांग, वीर और फिल्मी घुनों में आमजन की बात लोककवि ही कह सकता है। रामचरनजी भी इससे अछूते नहीं रहे।

श्री गुप्त की रचनाओं के कुछ दृष्टव्य पहलू इस प्रकार हैं- एक निर्धन अपने बच्चे को पढ़ा न सकने की पीड़ा को यूं व्यक्त करता है-

ऐरे! एक चवन्नी हू जब नायें अपने पास, पढ़ाऊँ कैसे छोरा कूँ।

लोक कवि का यह आव्हान देखिए-

जननी! जनियो तौ जनियो एैसौ पूत, ऐ दानी हो या सूरमा।

मल्हार की गायकी के माध्यम से पूर्व प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु को देश की पीड़ा के रूप में कवि स्वीकारता है-

‘‘सावन सूनौ नेहरू बिन है गयौ जी।’’

देश-प्रेम, गुप्तजी का प्रिय विषय है। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की नीचता की सही की सही पकड़ उनकी कविता में है-

चाउ-एन-लाई बड़ौ कमीनौ भैया कैसी सपरी।

अथवा

सीमा से तू बाहर हैजा ओ चीनी मक्कार

नहीं तेरी भारत डारैगो मींग निकार।

या

ओ भुट्टो बदकार रे, गलै न तेरी दार रे।

आनुप्रासिक सौंदर्य भी रचनाओं में भरा पड़ा है जो अनेक प्रकार से परिलक्षित होता है-

भूषण भरि भण्डार भक्तभयभंजन भरने भात चले।

अथवा

दारुण दुःख दुःसहिता दुर्दिन दलन दयालु द्रवित भए।

किसी भी बोली के आम प्रचलित शब्दों का प्रयोग करके लोककवि उन शब्दों को प्रसिद्धि दिलाने में बड़े सहायक का काम करता है यथा रामचरनजी द्वारा प्रयोग किए गए कुछ शब्द-‘मींग, दुल्लर, कण्डी, पनियाढार, गर्रावै, पपइया तथा पटका-पटकी’ आदि।

आज की यह मांग है कि ब्रजक्षेत्र से लुप्त होती इन संगीतमय विधाओं को जागरुक रखने के लिए लोककवि रामचरन गुप्त के काव्य पर विशेष चर्चाएं आयोजित करायी जाएं ताकि मूल्यांकन के साथ-साथ विधाएं भी बनी रह सकें।

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+|| लोककवि रामचरन गुप्त एक देशभक्त कवि ||

- डॉ. रवीन्द्र भ्रमर

अलीगढ़ के ‘एसी’ गांव में सन् 1924 ई. में जन्मे लोककवि रामचरन गुप्त ने अपनी एक रचना में यह कामना की है कि उन्हें देशभक्त कवि के रूप में मान्यता प्राप्त हो। यह कामना राष्ट्रीय आन्दोलन के उस परिवेश में उपजी, जिसमें स्वतंत्रता की मांग अत्यन्त प्रबल वेग में मुखर हो उठी थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शिकंजे में कसा देश शोषण-अन्याय और दमन का शिकार बना हुआ था। चारों ओर गरीबी, भुखमरी, जहालत और बीमारी का बोल-बाला था।

लोककवि रामचरन का जन्म साम्राज्यवादी शोषण के ऐसे ही राष्ट्रव्यापी अंधकार की छाया में हुआ। इनका बचपन बड़ी गरीबी में बीता था। किशोरवस्था में इन्होंने एक परिवार में बर्तन मांजने का काम भी किया। इसी के साथ-साथ ताले बनाना भी सीख लिया और आगे चलकर तालों का एक कारखाना भी लगाया। किन्तु कई कारणों से इसमें विशेष सफलता नहीं मिली। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में ‘डासत ही सब निसा बिरानी, कबहुं न नाथ नींद भर सोयौ’- जैसी अनवरत संघर्षमय परिस्थिति में, लगभग सत्तर वर्ष की अवस्था में इनका निधन हो गया।

कविवर अज्ञेय ने एक कविता में कहा है-‘दुःख सबको मांजता है और जिसे मांजता है, उसे तप्त कुन्दन जैसा खरा बना देता है’। रामचरन गुप्त के संघर्षमय जीवन और संवेदनशील हृदय ने इन्हें कविता ओर उन्मुख किया। ये ज्यादा पढ़े-लिखे तो थे नहीं, अतः इनके व्यक्तित्व का विकास लोककवि के रूप में हुआ। दिन-भर मेहनत-मजदूरी करते, चेतना के जागृत क्षणों में गीत रचने-गुनगुनाते और रात में बहुधा ‘फूलडोलों’ में जाते, जहां इनके गीत और जिकड़ी भजन बड़े चाव से सुने जाते थे। ये सच्चे अर्थों में एक सफल लोककवि थे। इन्होंने ब्रज की लोकरागिनी में सराबोर असंख्य कविताएं लिखीं जो किसी संग्रह में प्रकाशित नहीं होने के कारण अव्यवस्था के आलजाल में खो गईं।

लोककवि रामचरन गुप्त के सुपुत्र श्री रमेशराज ने इनकी कुछ कविताएं संजोकर रख छोड़ी हैं , जिनके आधार पर इनके कृतित्व का यथेष्ट मूल्यांकन सम्भव हो सका है। रमेशराज हिन्दी कविता की नयी पीढ़ी के एक सफल हस्ताक्षर हैं। इन्हें हिन्दी की तेवरी विधा का उन्नायक होने का श्रेय प्राप्त है। अतः इन पर यह दायित्व आता है कि ये अपने स्वर्गीय पिता की काव्य-धरोहर को सहेज-संभाल कर रखें और चयन-प्रकाशन तथा मूल्यांकन के द्वारा उसे उजागर कराएं।

लोकगीत की संरचना की विषय में एक धारणा यह है कि अगर कोई पूछे कि यह गीत किसने बनाया तो तुम कह देना कि वह दुःख के नीले रंग में रंगा हुआ एक किसान था। इसका आशय यह है कि लोकगीतों की रचना लोकजीवन की वेदना से होती है और इनका रचयिता प्रायः अज्ञात होता है। वह समूह में घुल-मिलकर समूह की वाणी बन जाता है। लोकगीत मौखिक परम्परा में जीवित रहते हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक की यात्रा करते हैं।

लोकगीतों की एक कोटि यह भी मानी जाती है जिसकी रचना लोकभाषा और लोकधुनों में किसी ज्ञात और जागरूक व्यक्ति द्वारा की जाती है। लोककवि रामचरन गुप्त की रचनाएं लोककाव्य की इसी कोटि के अंतर्गत आती हैं। इन्होंने राष्ट्रीय, सामाजिक चेतना के कुछ गीतों के अतिरिक्त, मुख्यतः ‘जिकड़ी भजन’ लिखे हैं। ‘जिकड़ीभजन’ ब्रज का एक अत्यन्त लोकप्रिय काव्यरूप है। इसमें भक्ति-भावना का स्वर प्रधान होता है और ये लोकगायकों की मंडलियों द्वारा गाये जाते हैं। ये मंडलियां आपस में होड़ बदकर, अपने-अपने जिकड़ी भजन प्रस्तुत करती हैं। गीतों में ही प्रश्नोत्तर होते हैं। जिस मंडली के उत्तर सार्थक और सटीक होते हैं, उसी की जीत होती है। रामचरन गुप्त को इस कला में महारत हासिल थी। ये जिस टोली में होते, विजय उसी की होती और जीत का सेहरा इनके सर बांधा जाता था।

इस लोककवि की रचनाओं को भाव-सम्पदा की दृष्टि से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। इनकी भाषा तो बोलचाल की परम्परागत ब्रजभाषा है। कहीं-कहीं खड़ी बोली की भी चाशनी दिखाई पड़ती है। शैली की दृष्टि से अधिकांश रचनाएं जिकड़ी भजन और कुछ रचनाएं प्रचलित लोकधुनों की पद्धति में रची गई हैं किन्तु भावानुभूति अथवा विषय की दृष्टि से इनका रचनाफलक विस्तृत है। कवि रामचरन गुप्त की रचनाओं की पहली श्रेणी राष्ट्रीयता की भावना से युक्त गीतों की है। इनमें स्वाधी नता-संग्राम की चेतना और स्वाधीनता के लिए बलि-पथ पर जाने वाले वीरों के साहस एवं ओज का मार्मिक वर्णन किया गया है।

राष्ट्र-प्रेम से भरे भाव की एक रचना के कुछ अंश द्रष्टव्य हैं-

‘ए रे रंगि दै रंगि दे रे वीरन रंगरेज, चुनरिया मेरी अलबेली।

पहलौ रंग डालि दइयो तू बिरन मेरे आजादी कौ,

और दूसरौ होय चहचहौ, इंकलाब की आंधी कौ,

ए रे घेरा डाले हों झांसी पै अंगरेज, चुनरिया मेरी अलबेली।

कितनी हिम्मत, कितना साहस रखतौ हिन्दुस्तान दिखा,

फांसी चढ़ते भगत सिंह के अधरों पै मुस्कान दिखा,

ए रे रामचरन कवि की रचि वतनपरस्त इमेज, चुनरिया मेरी अलबेली।

कवि की ‘वतनपरस्त इमेज’ के सन्दर्भ में दो उदाहराण इस प्रकार हैं- इनमें भारत के वीर जवानों की वीरता, शक्ति और साहस का वर्णन बड़े मुखर स्वरों में किया गया है-

‘‘पल भर में दें तोड़ हम, दुश्मन के विषदन्त।

रहे दुष्ट को तेग हम और मित्र को संत।।

अरि के काटें कान

हम भारत के वीर जवान

न बोदौ हमकूं बैरी जान

अड़े हम डटि-डटि कें।

हर सीना फौलाद

दुश्मन रखियौ इतनी याद

मारौ हमने हर जल्लाद

लड़ें हम डटि-डटि कें।

यह रचना भारत-पाक और भारत-चीन युद्ध के परिप्रेक्ष्य में रची गई थी।

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद स्वाधीनता और देश की रक्षा का भाव रामचरन गुप्त की रचनाओं में दिखाई पड़ता है-

हम बच्चे मन के सच्चे हैं, रण में नहीं शीश झुकायेंगे,

हम तूफानों से खेलेंगे, चट्टानों से टकरायेंगे।

वीर सुभाष, भगत जिस आजादी को लेकर आये थे

उस आजादी की खातिर हम अपने प्राण गवायेंगे।

इन उदाहरणों से ‘विषदंत तोड़ना’, ‘कान काटना’, ‘सीना फौलाद होना’, ‘तूफानों से खेलना’, ‘चट्टानों से टकराना’ इत्यादि मुहावरों के संयोग से वीरता और ओज की निष्पत्ति सहजरूप से हुई है। इससे कवि की भाषाशक्ति का पता चलता है।

दूसरी श्रेणी में सामाजिक सरोकार की रचनाएं आती हैं। कहीं महंगाई, चोरबाजारी और गरीबी की त्रासदी को उभारा गया है और कहीं वीरता, दानशीलता, संयम, साहस, विद्या, विनय और विवेक आदि जीवनमूल्यों को रचना-सूत्र में पिरोया गया है-

‘‘जा मंहगाई के कारन है गयो मेरौ घर बरबाद

आध सेर के गेहूं बिक गये, रहे हमेशा याद।

सौ रुपया की बलम हमारे

करहिं नौकरी रहहिं दुखारे

पांच सेर आटे कौ खर्चा, है घर की मरयाद।

पनपी खूब चोरबाजारी

कबहू लोटा, कबहू थारी

धीरे-धीरे सब बरतन लै गये पीठ पर लाद।।’’

उच्चतर जीवनमूल्यों के सन्दर्भ में एक यह रचना अवलोकनीय है, जिसमें कवि ने किसी जननी से ऐसे पुत्र को जन्म देने की अनुनय की है जो दानी हो या वीर हो-

‘‘जननी जनियौ तो जनियौ ऐसौ पूत, ए दानी हो या हो सूरमा।

सुत हो संयमशील साहसी

अति विद्वान विवेकशील सत् सरल सज्ञानी

रामचरन हो दिव्यदर्श दुखहंता दानी

रहै सत्य के साथ, करै रवितुल्य उजाला।

जनियो तू ऐसौ लाला।।’’

लोककवि रामचरन गुप्त का वास्तविक रूप इनके जिकड़ी भजनों में दिखाई पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कठिन जीवन-संघर्ष ने इन्हें ईश्वरोन्मुख बना दिया था, इसे कवि की वतनपरस्ती का भी एक अंग माना जा सकता है क्योंकि देशभक्ति के अन्तर्गत देश की संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना का भी विन्यास होता है। राष्टकवि मैथिलीशरण गुप्त की कृतियों के माध्यम से इस अवधारणा को भली प्रकार समझा जा सकता है। ध्यातव्य यह भी है-जिकड़ी भजनों का कथ्य और मूल स्वर धार्मिक ही होता है। अस्तु, रामचरन गुप्त के जिकड़ी भजनों में धार्मिक चेतना और भक्तिभावना यथेष्ट रूप में मुखरित हुई है।

इनकी इस कोटि की रचनाओं के दो वर्ग हैं। एक में रामावतार की आरती उतारी गई है तो दूसरे में कृष्णावतार का कीर्तन किया गया है।

रामकथा से सन्दर्भित दो उदाहरण दर्शनीय हैं-

‘‘राम भयौ वनगमन एकदम मचौ अवध में शोर

रोक रहे रस्ता पुरवासी चलै न एकहू जोर।

त्राहि-त्राहि करि रहे नर-नारी

छोड़ चले कहां अवध बिहारी,

साथ चलीं मिथिलेश कुमारी और सौमित्र किशोर।

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श्री रामचन्द्र सीता सहित खड़े शेष अवतार

केवट से कहने लगे सरयू पार उतार।

जल में नाव न डारूं , नैया बीच न यूं बैठारूं

भगवन पहले चरण पखारूं, करूं तब पार प्रभू!

भाषा-कवियों में गोस्वामी तुलसीदास से लेकर पंडित राधेश्याम कथावाचक तक ने इन प्रसंगों का मार्मिक वर्णन किया है। रामचरन गुप्त भी इनमें अछूते नहीं रहे। कृष्णकथा के संदर्भ में इन्होंने भागवत आदि महाभारत के प्रसंगों को अनुस्यूत किया है। विनय भावना की इनकी एक रचना इस सन्दर्भ में दृष्टव्य है-

‘‘बंसी बारे मोहना, नंदनंदन गोपाल

मधुसूदन माधव सुनौ विनती मम नंदलाल।

आकर कृष्ण मुरारी, नैया करि देउ पार हमारी

प्रभु जी गणिका तुमने तारी, कीर पढ़ावत में।

वस्त्र-पहाड़ लगायौ, दुःशासन कछु समझि न पायौ,

हारी भुजा अन्त नहिं आयौ, चीर बढ़ावत में।’’

ब्रज में लोककवियों और लोकगायकों की एक परम्परा रही है। अलीगढ़ जनपद में नथाराम गौड, छेदालाल मूढ़, जगनसिंह सेंगर और साहब सिंह मेहरा जैसे रचनाकारों ने इसे आगे बढ़ाया है। इस लोकधर्मी काव्यपरम्परा में रामचरन गुप्त का स्थान सुनिश्चित है। राष्ट्रीय-सामाजिक चेतना के गीतों और जिकड़ी भजनों की संरचना में इनका योगदान सदैव स्वीकार किया जायेगा।

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+|| हिन्दी-क्षेत्र कवियों में से एक नाम स्व. रामचरन गुप्त का ||

- प्रोफेसर अशोक द्विवेदी

हमारे देश में हजारों ऐसे लोक कवि हैं, जो सच्चे अर्थों में जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे न केवल स्वयं, बल्कि अपनी रचनाओं के साथ गुमनामी के अंधेरे में गुम हो जाते हैं। आभिजात्यवर्गीय-साहित्य उनकी रचनाओं को और उनको महत्व देने में संभवतः इसी कारण डरता है कि कहीं ऐसे कवियों की रचनाधर्मिता के आगे उनके भव्य शब्द-विधा न कहीं फीके न पड़ जाएं। हिन्दी-क्षेत्र के ही इन्हीं हजारों कवियों में से एक नाम स्व. रामचरन गुप्त का रहा है।

पाठ्य-पुस्तकीय साहित्य से अलग कवि गुप्त की कविता में एक सच्चे देश-प्रेमी, एक सच्चे लोकमन की छटा देखी जा सकती है। कवि अधिक पढ़ा-लिखा नहीं है। पोथियों से उसका सरोकार केवल जीवन के प्रश्नों को समझने और सुलझाने के क्रम में रहा है। उसके गीत शब्द-शास्त्राीय स्वरूप ग्रहण नहीं कर सके हैं। अलंकार और छंद विधान को कविता की कसौटी मानने वालों को उनकी कविताएं पढ़कर तुष्टि भले ही न मिले, किन्तु अपने देश, देश पर मर मिटने वाले वीर जवानों और अपने ईश्वर के प्रति उनके अनुराग में कोई खोट निकाल पाना संभवतः उनके लिए भी दुष्कर होगा।

स्व. रामचरन गुप्त का जीवन हमारे देश के उस समय का साक्षी रहा है, जिसने अंग्रेजों की गुलामी और स्वतंत्राता के पश्चात् देशी सामंतों-साहूकारों की गुलामी दोनों को झेला है। अंग्रेजों की गुलामी को झेलते हुए कवि ने अपने जीवन के सुनहरे क्षणों-युवावस्था को गरीबी और अभावों से काटा। कवि के जीवन में ऐसा भी समय आया जब एक दिन की मजदूरी न करने का मतलब घर में एक दिन का पफाका था।

कवि ने अपने दुर्दिनों को ईश्वर की उस प्रार्थना में उतारा जो केवल कवि की प्रार्थना नहीं बल्कि दुख-दर्द से पीडि़त उस युग की प्रार्थना थी, जब हर लोक-मन यही पुकारता था-

‘‘नैया कर देउ पार हमारी

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विलख रहे पुरवासी ऐसे-

चैखन दूध मात सुरभी कौ

विलखत बछरा भोर।

‘देशभक्ति में दीवाना’ लोककवि रामचरन गुप्त सीमा पार दुश्मनों को कभी तलवार बनकर, कभी यमदूत बनकर तो कभी भारी चट्टान बनकर चुनौती देता है। गोरों को भगाने के लिए, आज़ादी को बुलाने के लिए, वह शमशीर खींचकर खून की होली खेलने के लिए जनता का आव्हान करता है-

‘‘तुम जगौ हिंद के वीर, समय आजादी कौ आयौ।

होली खूं से खेलौ भइया, बनि क्रान्ति-इतिहास-रचइया,

बदलौ भारत की तकदीर, समय आज़ादी कौ आयौ।

गोरे देश को लूटते हैं, तो कवि कहता है-‘‘ सावन मांगै खूँ अंग्रेज कौ जी’’। आजादी के बाद जब देशी पूँजीपति, राजनेता बदनाम होते हैं तो कवि उनकी अमेरिकी सांठ-गांठ की भर्त्सना करता है। जब मंहगाई आती है तो कवि को एक-एक रोटी को तरसती जनता अभी भी परतंत्र नजर आती है। कवि भूख को समझता है, इसलिए भूखों की आवाज़ बनकर अपने गीतों में प्रस्तुत होता है। ये गीत न केवल भावप्रवण हैं बल्कि उस मानवीय चिन्ता को भी प्रकट करते हैं जो इस युग की सबसे बड़ी चिन्ता है।

आम जनता का जीवन जीने वाले स्व. रामचरन गुप्त अपने जीवन संघर्षों, लोकगीतों की मिठास से युक्त भजनों और देशभक्ति पूर्ण कविताओं के चलते निश्चित ही एक सफल लोककवि कहे जाने के पात्र हैं। ब्रजभाषा की लोककवियों तथा लोकगायकों की परम्परा में वे अमिट रहेंगे, ऐसा विश्वास है।

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