मंगलवार, 15 नवंबर 2016

नोट में भी खोट - हरदेव कृष्ण

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सामग्री स्त्रोतः मुख्यतः हिन्दी समाचार पत्र

नोट में भी खोट

कबीर ने अपनी एक रचना में कहा है- माया महा ठगनि हम जानी। इस माया के फेर में बड़े-बड़े उलटफेर हुए हैं। छल-कपट, विश्वासघात और खूनी संघर्ष सब माया के लिए ही होते रहे हैं। इसके पीछे बड़े-बड़े रिश्ते धाराशायी हो गए। इसीलिए संतजन इस माया से दूर रहने के लिए कह गए हैं। वो तो यहां तक कहते हैं कि अगर यह कहीं अनायास रास्ते में पड़ी मिल जाए तो चुपचाप इस पर मिट्टी डाल देनी चाहिए।

कहते हैं पहले समाज में विनियम का कार्य वस्तुओं के आदान-प्रदान द्वारा होता था। जैसे किसी को अनाज की जरुरत होती थी तो वह पशु देकर उसकी पूर्ति कर लेता था। फिर शायद कौड़ी का प्रयोग अस्तित्व में आया। उन दिनों कौड़ी और ज्यादा पशुधन रखने वाले को खूब सम्मान दिया जाता होगा। धीरे-धीरे मानव तरक्की करता गया और उसी प्रकार उसके विनियम के साधन भी बदलते गए। सुविधा की दृष्टि से सोने ,चाँदी और तांबे की मुद्राओं का प्रचलन आरंभ हुआ। शायद चर्म मुद्रा भी कुछ समय के लिए चली हो। जब यह भी भारी और असुविधाजनक लगी तो कागज सामने आया । आधुनिक युग में माया का मनमोहनी रुप करंसी नोटों पर सवार होकर अपना जलवा बिखेर रहा है।

मगर सावधान! पुराने और सड़ेगले नोट से मोह रखना खतरनाक हो सकता है। यही नोट आपको धनसुख के साथ-साथ बीमारियों का तोहफा भी दे सकते हैं। भरतीय वैज्ञानिकों ने एक शोध द्वारा यह खुलासा किया है कि दस , बीस और सौ रुपए के नोटों में फंगस पाया जाता है। यही नहीं इन में बैक्टीरिया, वायरस और एंटीबॉयटिक रजिस्टेंस जीन पाए गए हैं। तब तो अर्थशास्त्र के स्मार्ट गुरुओं ने ठीक ही किया कि माया की इस धारा को पहले चेकबुक बाद में डेबिट - क्रेडिट और इलैक्ट्रॉनिक ट्रांसफर में समेट दिया। इस तरह से लेनदेन जहां आसान, सुलभ और त्वरित बन गया है वहीं हमें बीमारियों से भी सुरक्षित कर दिया।

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च और इंस्टिट्यूट ऑफ जिनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बॉयोलोजी के वैज्ञानिकों ने यह अध्य्यन किया है। बाद में उनका यह शोध “ स्टडी पल्स वन रिसर्च जनरल ” में प्रकाशित हुआ । इन सभी करंसी नोटों को ग्रॉसरी , केमिस्ट , स्नैकबॉर, हार्डवेयर की दुकानों और रेहड़ी-फड़ी वालों से लिया गया था। इनमें सत्तर फीसदी फंगस मिला है। नौ फीसदी नोटों में बैक्ट्रिया और एक फीसदी नोटों पर वायरस पाया गया है। इसके अलावा इन में 78 एंटीबॉयटिक रजिस्टेंस जीन भी पाया गया है। यह जीन शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली की क्षमता को कमजोर कर देता है।

सामान्यतः नोट कई हाथों से गुजरता है। धूल, पसीना और मिट्टी में संघर्ष करने वाला मजदूर भी नोट इस्तेमाल करता है। माँस व चाय आदि की दुकान पर काम करने वाला व्यक्ति लेनदेन मुख्यतः नोटों में करता है। वहां सीलन भरे हाथ लगना कोई नई बात नहीं है। कुछ अज्ञानी लोग बिना थूक लगाए नोटों की गिनती नहीं कर पाते। इन कारणों से बैक्ट्रिया और वॉयरस इन नोटों पर सवार होकर फैल सकते हैं। यह निश्चित रुप से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

वैज्ञानिकों के अनुसार सबसे ज्यादा खतरा पुराने नोटों से होता है। नोट जितना पुराना और गला हुआ होगा उसमें बैक्ट्रिया होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी। ध्यान देने योग्य है कि अगर नोट नया है और यह कई दिनों तक प्रयोग में नहीं लाया जाता, तब भी इसमें फफूंदी बन जाती है। उस दौरान इसकी गंध में भी कुछ परिवर्तन आ जाता है।

कागज़ के पुराने नोटों से बचने का सबसे उत्तम उपाय तो यही है कि देश में प्लास्टिक करेंसी का चलन हो जाए। इस दिशा में सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए। देश के वित मंत्रालय और स्वास्थय मंत्रालय को तालमेल रखते हुए हरकत में आ जाना चाहिए। लोगों को अधिक से अधिक डेबिट और क्रेडिट कार्ड का उपयोग करना चाहिए। पुराने और सड़े-गले नोटों को छूने के बाद अगर भोजन करना पड़े तो पहले हाथ अच्छी तरह साबुन से धो लेने चाहिए। ऐसे तमाम उपाय करने से हम नोटों में व्याप्त बैक्ट्रिया और वॉयरस के प्रकोप से बच सकते हैं।

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हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक - मल्लाह-134102

जिला पंचकूला (हरियाणा)

मो. 9896547266

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