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हिन्दी में अनेक ऐसे आलोचक हुए, जिन्होंने कविता के परिदृश्य को प्रदूषित किया है - दिविक रमेश

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साक्षात्कार

हिन्दी में अनेक ऐसे आलोचक हुए, जिन्होंने कविता के परिदृश्य को प्रदूषित किया है

20वीं शताब्दी के आठवें दशक में अपने पहले ही कविता-संग्रह ‘रास्ते के बीच’ से चर्चित हो जाने वाले आज के सुप्रतिष्ठित दिविक रमेश रमेश कवि बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। 38 वर्ष की आयु में ही ‘रास्ते के बीच’ और ‘खुली आँखों में आकाश’ जैसी अपनी साहित्यिक कृतियों पर सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड पुरस्कार पाने वाले ये पहले कवि हैं। आपने 17-18 वर्षों तक दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों का संचालन किया। 1994 से 1997 तक दक्षिण कोरिया में अतिथि प्रोफेसर के रूप में कार्य किया, जहां इन्होंने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कितने ही कीर्तिमान स्थापित किए वहां के जन-जीवन और वहां की संस्कृति और साहित्य का गहरा परिचय लेने का प्रयत्न किया। कोरियाई भाषा में अनूदित-प्रकाशित हिन्दी का पहले संग्रह के रूप में इनकी कविताओं का संग्रह ‘से दल अइ ग्योल हान’ अर्थात् चिड़िया का ब्याह आया। इनके द्वारा चयनित और साहित्य अकादमी से प्रकाशित हिन्दी में अनूदित कोरियाई प्राचीन और आधुनिक कविताओं का संग्रह ‘कोरियाई कविता-यात्रा’ भी ऐतिहासिक दृष्टि से हिन्दी ही नहीं, किसी भी भारतीय भाषा में अपने ढंग का पहला संग्रह है। साथ ही, इनके द्वारा तैयार किए गए कोरियाई बाल कविताओं और कोरियाई लोक कथाओं के संग्रह भी सामने आए। अभी हाल में ही इनका नया कविता-संग्रह ‘वहाँ पानी नहीं है’ बोधि प्रकाशन से आया है। वीणा भाटिया और मनोज कुमार झा ने इनसे साहित्य से जुड़े विविध मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की है। प्रस्तुत है कुछ प्रमुख बातें।

प्र. समकालीन कविता के परिदृश्य पर कुछ कहें।

उ. समकालीन कविता का परिदृश्य काफी बहुमुखी और विविधतापूर्ण है। वस्तुत: हिन्दी कविता का संसार या क्षितिज बहुत फैलाव लिए हुए है। एक ओर देश की धरती पर हिन्दी और हिन्दीतर प्रदेशों में रची गई अथवा रची जा रही कविता है तो दूसरी ओर देश के बाहर प्रवासी और भारतवंशी कवियों के द्वारा सम्भव कविता है। रूप और शैलियों की दृष्टि से भी देखें तो हिन्दी कविता को समृद्ध पाएँगे। यहाँ काव्य नाटक और लम्बी कविताएँ भी हैं और ग़ज़ल, गीत और छन्दोबद्ध रचनाएँ भी खूब लिखी जा रही हैं। समकालीन कविता सक्षम एवं सकारात्मक दृष्टि से संपन्न कविता है, जिसने एक ओर नकारात्मकता या निषेध से मुक्ति दिलाई है तो दूसरी ओर गहरी मानवीय संवेदना से कविता को समृद्ध किया है। अपनी भूमि को सांस्कृतिक मूल्यों, स्थानीयता, देसीपन और लोकधर्मिता, स्थितियों की गहरी पहचान, अधिक यथार्थ, ठोस और प्रामाणिक चरित्र, मानवीय सत्ता और आत्मीय संबधों-रिश्तों की गरमाहट से लहलहा दिया है। मुख्यधारा की राजनीतिपरक समकालीन कविताओं पर भी दृष्टि डालें तो पाएंगे कि ये कविताएं नारेबाजी से तो दूर हैं ही, नारेनुमा तक नहीं हैं। ये तो गहरी संवेदनाओं से युक्त, भाषा और कलात्मक क्षमताओं से भरपूर एवं संयमित हैं। यहां काव्य-मुद्राओं एवं चमत्कारों के लिए कोई स्थान नहीं है। इन कविताओं ने सहजता का वरण किया है। प्रेम की कविताओं में भी ललक और जिज्ञासा है। रोमांटिक भावुकता के स्थान पर आत्मीय लगाव है। वस्तुत: यह कविता-अकविता के निषेधवाद से तो कोसों दूर आगे की कविता है ही-लगभग उसकी प्रतिद्वन्द्वी जैसी-धूमिल की लटकेबाजी और रेहटरिक को भी छोड़कर चली है। हां, प्रभाव इनका ज़रूर धीरे-धीरे गया है। समकालीन कविता की एक महिमामय उपलब्धि त्रिलोचन की कविता को इसके परिदृश्य में सशक्त पहचान मिलना भी है।

प्र. आप मूलत: कवि हैं। लेकिन कविता के साथ आपने आलोचना के क्षेत्र में भी काम किया है। आपकी पीढ़ी में ऐसे कम ही कवि हैं। कवि के लिए आलोचना-कर्म की ज़रूरत क्यों और किस हद तक है?

उ. आपने ठीक कहा। मैं भी खुद को मूलत: कवि ही मानता हूं। जहां तक मेरा प्रश्न है, मेरा आलोचना कर्म प्राय: स्वत:स्फूर्त न होकर अन्यों (पत्र-पत्रिकाएं, संस्थाएं) के अनुरोध पर लिखा कार्य अधिक है, भले ही आज आलोचना की मेरी चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हों। पेशे से प्राध्यापक रहा हूं। इस कारण भी लेख आदि लिखने की प्रेरणा मिलती रही। मेरी पीढ़ी के कुछ कवियों ने भी इस कर्म को किया है। यूं कवियों द्वारा आलोचना करने की हिन्दी में शुरुआत छायावाद से देखी जा सकती है। जब कवियों को आलोचक की आलोचना में उठा-पटक और पूर्वग्रह की राजनीति दिखायी देती है तथा जानबूझकर किसी प्रवृत्ति अथवा कुछ कवियों पर कुठाराघात किया लगता है तो फिर उन्हें अथवा उनमें से कुछ को इस क्षेत्र में भी सामने आना ही पड़ता है। नए कवियों में अनेक अच्छी आलोचना के लिए भी पहचाने जाते हैं, जैसे शमशेर, मुक्तिबोध आदि। तारसप्तक अपने प्रकाशन वर्ष से तीन वर्ष तक एक समीक्षा तक को तराशता रहा। आखिर कवि शमशेर बहादुर सिंह ने उसकी पहली समीक्षा की। कहानी के क्षेत्र में कमलेश्वर, मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव आदि को अपने समय के मान्य अर्थात प्रभावशाली बन चुके आलोचकों की भरपूर उपेक्षा सहनी पड़ी थी। मैंने व्यक्तिगत रूप से भी अनुभव किया है कि हिन्दी में विशुद्ध किस्म के अनेक ऐसे आलोचक हुए हैं, जिन्होंने कविता के परिदृश्य को भरपूर ढंग से प्रदूषित किया है। यह अलग बात है कि उनके पास अनेक कारणों से (जिनमें साहित्येतर भी सम्मिलित हैं) साहित्य में पाठ्यक्रमों में रचनाएं लगवाने, प्रतिष्ठित पुरस्कारों को दिलवाने, पुस्तकों को बिकवाने, पत्र-पत्रिकाओं में सुर्खियों में लाने आदि के रूप में प्रभावशाली हस्तक्षेप करने की ताकत रही है। इस कारण अनेक अच्छे, लेकिन उनकी गुटवादिता के संविधान को न मानने वाले कवियों को हलाल करने की भी भरपूर कोशिशें हुई हैं। विडम्बना यह भी है कि जिन कवियों की पताकाएं ऐसे आलोचकों द्वारा (बहुत बार योग्यता से ऊपर) फहरायी गई हैं, उनमें से बहुतेरे स्वभाव से उनके जैसा ही व्यवहार करते पाए जाते हैं। ऐसी स्थिति में कुछ कवियों को आलोचना के क्षेत्र में भी उतरना पड़ा हो तो वह गैरजरूरी होते हुए भी स्वाभाविक कहा जाना चाहिए। यहां मैं उन तथाकथित कवियों या उनके दलों को बचाना नहीं चाहता जो हथकंडे के रूप में आलोचना कर्म को अपने प्रचार के लिए काम में लाने का काम करते हैं। वे बहुत दिन चलते नहीं।

प्र. आलोचना का उद्देश्य क्या है ? यह काव्य का अनुशीलन, कविता के स्रोतों और कवि की रचना-भूमि की तलाश है या महज़ कविता और कवि को अच्छा-बुरा साबित करने का उपक्रम ? क्या हिन्दी आलोचना में फ़तवेबाज़ी जैसी प्रवृत्ति रही है ?

उ. उत्तर यूं आपके प्रश्न में ही छिपा है। वस्तुत: आलोचक एक कुशल गाइड की तरह होता है। मसलन, एक गाइड जब कोई ऐतिहासिक इमारत दिखा रहा होता है तो वह अपनी खास तैयारी और सूक्ष्म दृष्टि की बदौलत ऐसी-ऐसी बुनावटों की ओर ध्यान दिलाता है कि इमारत का सौन्दर्य चौगुना होकर हमारे सामने प्रस्तुत हो जाता है। कई बार तो हम चौंक जाते हैं। सोचने लगते हैं कि वे हमें क्यों नहीं दिखीं। कविता के वास्तविक सौन्दर्य की परतें खोलना और उनके प्रति पाठकों का आत्मीय भाव जगाना एक उचित आलोचक का धर्म होता है। लेकिन आप मुझसे खरी-खरी बात की अपेक्षा कर रहे हैं तो कह दूं कि दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद के अधिकांश आलोचक (इनमें कुछ कवि या रचनाकार-आलोचक भी हैं) धीरे-धीरे ’मेरे-तेरे’ के चक्कर में पड़ते चले गए और आलोचना को अविश्वसनीयता की ओर धकेलने में लगे रहे। आज जब कि लोकप्रिय संस्कृति के उपादान छाए हुए हैं और पाठकों तक सीधी पहुँच आसान हुई है, तो ऐसे आलोचकों की दयनीय स्थिति कोई भी देख सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि जो आलोचक नहीं हैं, रचनाकार हैं, उनमें से भी बहुत से ऐसे ही कुकर्मों के कारण दयनीय बनने की कतार में हैं, भले ही सम्प्रति अपने शातिराना अन्दाज के कारण चमकते नजर आ रहे हों। मैं आपकी बात से सहमत हूं कि आलोचना का अधिकांश फतवेबाजी, अच्छा-बुरा (बल्कि ऊंचा-नीचा) साबित करने की प्रवृत्ति और इनसे भी आगे बढ़कर कुछ अच्छे रचनाकारों की हत्या करने की साजिश से ग्रसित नजर आता है। यही उन जैसे आत्ममुग्ध और अहंकारी आलोचकों का गन्दा उद्देश्य भी है। तो भी आप जैसे अध्येताओं की एक बड़ी संख्या उपलब्ध है जो ऐसे आलोचकों की राह के अवरोधक बन चुके हैं और उन्हें ललकारने की हिम्मत रखते हैं।

प्र. क्या हिन्दी में आलोचना का कोई सिंडिकेट है, जिसका काम कवियों को प्रमोट करना, उन्हें स्थापित करना और तंत्र के साथ जोड़ना रहा है ?

उ. जी हाँ । कुछ संकेत तो मेरी पहले कही गई बातों से भी मिल सकता है। विस्तार से क्या कहूं। अधिक दुखदायी तो हिप्पोक्रेसी है। कोई आपको अपना प्रिय कवि कहेगा, कोई दो आदमियों के बीच

कभी-कभार आपकी कविताओं की प्रशंसा भी कर देगा, लेकिन जहां -जहां ( साहित्यिक चर्चाओं, पुरस्कारों, पाठ्य पुस्तकों , संपदित संकलनों, कुछ खास (नामी ) बना दी गई पत्र -पत्रिकाओं आदि के क्षेत्र में ) आपके कवि नाम को रेखांकित होना चाहिए, वहां-वहां से गायब कर या करवाता रहेगा । और अपने पट्ठों को रेखांकित या प्रमोट करने कराने में जी-जान लगा देगा। रेखांकित हुए ऐसे धन्य कवियों में से अनेक उनके सुर में सुर मिलाकर गौरवान्वित भी होते रहते हैं। यह काम सिंडिकेट की तरह भी किया जाता है। अब इससे अधिक मुँह न खुलवाएं, नहीं तो मुझे जो जिनसे मिला है, उनकी हेठी होने का अर्थ उभरने लगेगा जो मैं कतई नहीं चाहता ।

प्र. आपकी दृष्टि में वे कौन-से आलोचक हैं जिन्होंने समकालीन हिन्दी कविता की सम्यक विवेचना की हो।

उ. देखिए, यदि कहा जाए कि हमारे समय में भी अनेक समझदार और विद्वान आलोचक हुए हैं तो यह कहना सही ही होगा । लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अधिकांश प्रभावशाली ऐसे आलोचकों ने राग-द्वेष का प्रदूषण भी फैलाया है। कई कवियों का इतना नुकसान करने का प्रयत्न किया गया कि मरम्मत करने में बहुत समय लग जाएगा। इधर अरुण होता, जितेंद्र श्रीवास्तव, अजय नावरिया , गोपेश्वर सिंह, शम्भु गुप्त आदि में सम्यक विवेचना के स्वर अधिक उभरे नजर आ रहे हैं। इनमें से कुछ कवि-लेखक भी हैं। अपने निजी मूल्यांकन के स्थान पर बहुतायत उन लोगों की है, जो चले आ रहे बहाव में बह कर ही धन्य होते रहते हैं। और हाँ, कभी अज्ञेय ने लिखा था, शायद भोपाल से निकलने वाली कलावार्ता में कि नामवर जी एक समझदार आलोचक हैं, वे रचना की ताकत समझ लेते हैं, लेकिन उसे अभिव्यक्त करते समय गड़बड़ कर देते हैं। अच्छी बात यह है कि बाद के नामवर जी ने अज्ञेय की कविता पर अपनी पूर्व की धारणा को बदला है ।

प्र. प्राय: ऐसा कहा जाता है कि समकालीन हिन्दी कविता की आलोचना अभी तक प्रसंशा-निंदा तक ही सीमित है, उसमें काव्य को समग्र रूप में समझने की कोई दृष्टि सामने नहीं आई है। क्या यह सच है ?

उ. सम्पूर्ण हिंदी कविता की आलोचना के संदर्भ में तो यह पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता। सीमाओं के बावजूद रामचंद्र शुक्ल, नगेंद्र , हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, देवी शंकर अवस्थी, निर्मला जैन, विश्वनाथप्रसाद तिवारी जैसे आलोचकों के अवदान का महत्त्व समझना ही होगा। कुछ संदर्भों में नामवर जी का भी। कवि-आलोचकों में शमशेर बहादुर सिंह, मुक्तिबोध आदि की आलोचना कर्म का महत्त्व स्वीकारना होगा। अधिक गड़बड़ बाद में आने वाले तथा कथित आलोचकों में मिलती है। नामवर सिंह के बाद किसे कद्दावर आलोचक मानें, खोजना पड़ेगा। मिल जाए तो गनीमत। अपने ढंग से अज्ञेय ने भी अपने संपादन कर्म के माध्यम से गड़बड़ कम नहीं की।

प्र. आपकी कविताओं में लोक-जीवन प्रमुखता से आता रहा है। शुरुआती कविताओं के साथ बाद की कविताओं में और फिलहाल आपकी जो कविताएँ आ रही हैं, उनमें भी लोक-जीवन के विविध रूपों, उसके संघर्षों और विडम्बनाओं की अभिव्यक्ति हुई है। साथ ही, आपकी कविताएँ टाइप्ड नहीं हैं, यानी उनमें विविधता है। क्या हिन्दी कविता में अभी भी लोक को स्वीकृति मिलना बाकी है ?

उ. आपके प्रति हार्दिक आभारी हूँ कि आपने मेरी कविता की एक विशिष्ट समझ का परिचय दिया है। स्पष्ट है कि आपने मेरी कविताओं को गम्भीरता से पढ़ा है। इस खूबी को केदारनाथ सिंह ने भी उजागर किया था और कितने ही दूसरे उन विद्वानों ने, जिन्होंने मेरी कविताएं पढ़ कर उन पर लिखा है, उन्होंने भी इस विशेषता को उजागर किया है। असल में त्रिलोचन ने रचना में लोक से हर स्तर पर ताकत लेने का महत्त्व समझाया था, खासकर तब जब वे मेरे दूसरे कविता संग्रह ‘खुली आँखों में आकाश’ के लिए कविताओं का चयन कर रहे थे। मेरी चुनी हुई कविताओं के संग्रह ‘गेहूँ घर आया है’ पर एक चर्चा गोष्ठी में नामवर जी ने मेरी लोक भाव और भाषा से लैस एक कविता की प्रशंसा करते हुए उसका पूरा पाठ किया था। मेरे पिताजी अच्छे-खासे लोकगायक थे। वहां से भी गुण आया होगा

प्र. धूमिल और उस समय के कुछ अन्य कवियों की कविताओं में विशुद्ध जुमलेबाजी भी है। बाद के कुछ युवा प्रगतिशील कवियों में भी यह प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। कविता में जुमलेबाजी को प्रतिष्ठा कैसे मिली ?

उ. इस विषय पर मैंने काफी सोचा और लिखा है । मुझे अकविता के स्वर बड़बोलेपन से ग्रस्त लगे हैं, जैसे धूमिल के भी उनके विद्रोह के स्वर, कई बार रेहट्रिक हो जाने की कारण अनावश्यक लगे हैं, इसीलिए मैंने उसे छोड़ा है। साथ ही, ‘निषेध’ मात्र भी हमारी पीढ़ी के अधिकांश कवियों को रास नहीं आया। इसीलिए स्वयं मैंने अपने सम्पादन में बाद की कविताओं के कविता संग्रह का नाम ‘निषेध के बाद’ रखा था जो सितम्बर 1981 में प्रकाशित हुआ था। आपने ठीक कहा कि जुमलेबाजी प्रगतिशील कवियों में भी देखने को मिलती रही है। दूसरे शब्दों में, इसे उद्धरणीय पंक्तियों का समावेश करने वाला कहा जा सकता है । इसके शिकार कई जाने -माने कवि तक दिख जाएंगे। सधारण स्तर के पाठकों को ऐसी उक्तियां आकर्षित भी करती हैं। और कवि इससे गदगद भी होते हैं।

प्र. कविता की भाषा, कवि और आलोचक के विषय में आपकी क्या मान्यता है ?

उ. कविता की भाषा कुछ तो कवि के पास सहज रूप में उपलब्ध होती है , कुछ अभ्यास से कवि अपनी भाषा के रूप में सुधार भी लाता है । कविता की भाषा जब-जब मुझे जड़ाऊ लगी है, मैं उससे बिदका हूं । हर कवि के पास अपनी कविता की भाषा -शैली का ठाठ होता है, लेकिन वह उजागर नहीं प्रतीत होना चाहिए। हमारी पीढ़ी और आगे की पीढ़ी की कविता में भाषा की दृष्टि से भी स्थानिकता मिलती है। मेरे लिए यह स्थानिकता तभी ग्राह्य है, जब वह कविता में खपी हुई नजर आए, आयातित अथवा सप्रयास ना लगे । मुझे जातीय तौर पर खपे हुए अन्य भाषाओं के शब्दों पर भी कोई आपत्ति नहीं है। भाषा में लोक और जन (बिम्ब, प्रतीक , मुहावरे आदि से युक्त ) भाषा से बहुत ताकत ली जा सकती है। दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श के तहत रची गई अक्की कविताओं से इस बात को समझा जा सकता है। त्रिलोचन से भी सीख सकते हैं। हाँ, यह ध्यान रखना होगा कि लोक या जन भाषा हूबहू कविता की भाषा नहीं होती, उसमें कवि की कुछ न कुछ सर्जना भी होती है।

प्र. त्रिलोचन के साथ आपके आत्मीय संबंध रहे। आपने उनके बारे में लिखा भी है। आपको उनकी जो सबसे प्रिय कविता लगती हो, उसके बारे में बताएं और साथ ही कोई जीवन-प्रसंग भी।

उ. बेशक त्रिलोचन जी से मेरे घने और अत्यंत आत्मीय संबंध रहे हैं। उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। बात 26.5.78 की है। किसी काम से शमशेर जी के मॉडल टाउन वाले घर में गया हुआ था। शमशेर जी से मेरा घनिष्ठ परिचय 1975-76 में हुआ था। उस समय वे मेरी पहली पुस्तक ‘रास्ते के बीच’ के लिए कविताओं का चयन कर रहे थे। चयन-प्रक्रिया काफी लम्बी चल रही थी। इस दौरान शमशेर जी से साहित्य और-साहित्य जगत के बारे में काफी जानकारी मिली थी। बातचीत में वे कई बार त्रिलोचन, नागार्जुन तथा केदारनाथ अग्रवाल का भी ज़िक्र करते थे। त्रिलोचन का नाम तब तक मैंने सुना भर ही था। उनके सम्बन्ध में कोई ख़ास जानकारी नहीं थी। मुझे ‘दिगन्त’ हाथ लग गई और मैंने उसे पढ़ा। फ़्री वर्स में लिखने और पढ़ने वाला तथा अपने ही प्रारम्भिक गीतों और तुक़बन्दियों को ‘आउटडेटेड’ मानने वाला मैं ‘दिगन्त’ को पूरा पढ़ तो गया, लेकिन उसकी कविताओं से प्रभावित न हो सका। मुझे वे अनुभव को कहने वाली पुराने ढंग की अनु्शासन-बद्ध कविताएं लगी थीं। शमशेर की प्रशंसा से मैं ताल-मेल नहीं बैठा पा रहा था। मैं काफी परेशान हो उठा था। एक दिन मैंने बातचीत में शमशेर जी से कह ही तो दिया कि त्रिलोचन जी की कविताओं ने मुझे आकर्षित नहीं किया। उन्होंने कहा कि निराला के बाद त्रिलोचन का नाम सबसे ऊपर जाएगा। इस कवि का अभी मूल्यांकन होना है। मैं समझ गया था कि शमशेर जी त्रिलोचन की कविताओं को ज्यादा गम्भीरता, मेहनत और समझ के साथ पढ़ने की सलाह दे रहे थे।

प्र. हर बड़ा साहित्यकार बच्चों के लिए ज़रूर लिखता है। आपकी पीढ़ी के कवियों में सम्भवत: आप अकेले हैं इस क्षेत्र में काम करने वाले। आपने बच्चों के लिए काफी लिखा है, कविताओं से लेकर नाटकों तक। साथ ही कोरियाई बाल साहित्य का अनुवाद भी किया। बाल साहित्य के सामने अभी क्या चुनौतियाँ हैं, कुछ इस पर बताएँ।

उ. आपने उचित ही कहा । आप बाल साहित्य के क्षेत्र में मेरे काम से इतना परिचित हैं और आपने इतनी बड़ी प्रशंसा की बात कही, इसके लिए कृतज्ञ हूं। मेरी पीढ़ी के किसी एक आध कवि ने लिखा भी है तो वह नगण्य-सा ही है। हाँ, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, दिनकर, बच्चन, भवानी प्रसाद मिश्र, सोहनलाल द्विवेदी , भारत भूषण अग्रवाल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, प्रयाग शुक्ल आदि कवियों ने लिखा है, किसी ने कम किसी ने ज्यादा । गजलों के साथ शेरजंग फर्ग और बालस्वरूप राही ने लिखा है। बाल गद्य साहित्य में भी प्रेमचंद, विष्णु प्रभाकर, अमृतलाल नागर, मोहन राकेश आदि के नाम लिए जा सकते हैं। हिंदी के बाल साहित्य की स्थिति पहले काफी मजबूत हुई है, लेकिन चुनौतियां तो कई बाकी हैं। विस्तार से जानने के लिए तो मैं हाल ही में प्रकाशन विभाग, भारत सरकार से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘हिंदी बाल साहित्य कुछ पड़ाव’ पढ़ने की सलाह दे सकता हूं।

प्र. लेखकों के संगठन और राजनीतिक दलों से उनके जुड़ाव या कहें कि प्रतिबद्धता को लेकर आपका क्या मत है ?

उ. मैं स्वयं लेखकों के संगठनों से जुड़ा रहा हूं। राजीव सक्सेना और भीष्म साहनी के जामाने में पीडब्ल्यूए में सक्रिय भी रहा हूं। लेकिन बाद में अनेक कारणों से सक्रिय नहीं रह सका। प्रतिबद्धता तो किसी दर्शन या विचारधारा के प्रति होती है। राजनीतिक दलों को लेखक संगठनों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। लेखक संगठन या लेखक राजनीतिक दलों की तरह अटकलों को नहीं अपना सकता।

प्र. कहा जा रहा है कि मीडिया अब पूरी तरह सत्ता-अभिमुख हो गया है। पहले भी मीडिया संस्थान पूँजीवादी घरानों द्वारा ही संचालित थे, लेकिन स्थितियाँ भिन्न थीं। 'दिनमान', 'धर्मुयुग', 'सारिका' जैसी पत्रिकाएँ इन्हीं संस्थानों से निकलती थीं। अब जो गिरावट आई, उसके मूल में क्या कारण हो सकते हैं ?

उ. एक शब्द में कहूं तो बाजारवाद । कितने ही चैनलों में जैसे समाचार तक कलाबाजियां करते हुए दिखाए जाते हैं, वह मुझे फूहड़ ही अधिक लगता है। अब तो पैसा कमाऊ विज्ञापन

किसी भी समाचार या कार्यक्रम से ऊपर हैं। कितनी ही महत्त्वपूर्ण बात क्यों न हो, ब्रेक लेने से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं होती। पक्षपात भी सजग दर्शक या पाठक ना भांप जाते हों, ऐसा नहीं है। पूँजी ही नहीं, राजनीतिक गलियारों के सत्ता भोग भी आज के मीडिया के लिए कम महत्त्व नहीं रखते। बालकृष्ण भट्ट या प्रतापनारायण मिश्र के जमाने की बातें छोड़िए।

दिविक रमेश

बी -295, सेक्टर -20, नोएडा -201301

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