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पर्यटन आलेख / धार्मिक -पौराणिक नगरी बागेश्वर / शशांक मिश्र भारती

पर्यटन आलेख

धार्मिक -पौराणिक नगरी बागेश्वर

शशांक मिश्र भारती

भारत वर्ष के पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड के प्रमुख शहरों में से एक बागेश्वर भी है'जो कि हिमालय की सुरम्य भूमि में नीलेश्वर व भीलेश्वर पर्वत

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श्रृंखलाओं के मध्य स्थित है। जिसका विस्तार सड़क के दोनों ओर सूर्यकुण्ड से अग्निकुण्ड तक फैला हुआ है। बागेश्वर अधिक बड़ा शहर न होकर एक छोटा किन्तु आकर्षक और विकसित शहर है। यह प्राचीन काल से ही आर्थिक, सांस्कृतिक,और व्यापारिक दृष्टि से प्रसिद्ध रहा है। बागेश्वर तीर्थराज प्रयाग की भाँति ही तीन-तीन नदियों के संगम पर बसा हुआ है। उत्तर की ओर से बहकर आने वाली व हिमालय की तलहटी में स्थित सरमूल से निकली सरयू, पश्चिम की ओर से आने वाली व एक सौ आठ महादेवों में से एक अंग्यारी महादेव से निकलने वाली गोमती और अदृश्य रूप में सरस्वती के संगम पर बसा है। यह शहर अपनी बसावट व प्राचीन कालीन मंदिरों से सहज ही सभी को अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है।

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बगेश्वर शब्द ब्याघ्रेश्वर से कालान्तर में अपभ्रंश से बना है। पौराणिक कथा है; कि जब राजा भगीरथ शिवजी की जटाओं से गंगा जी को लेकर आ रहे थे। तब ब्रह्मकपालिनी पत्थर के निकट मार्कण्डेय ऋषि तपस्या में लीन थे। वहां पहुंचकर गंगा का प्रवाह अवरुद्ध हो गया तथा ऊपर की ओर जल भराव हो गया। अन्य कोई उपाय न देखकर राजा भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना कर उनसे सहायता मांगी। शिवजी बड़ी दुविधा में पड़ गये। वह करें तो क्या ?

अन्ततः शिवजी ने स्वंय बाघ का तथा मां पार्वती ने को गाय का रूप धारण किया। अब गाय आगे-आगे और बाघ पीछे-पीछे दौड़ने लगा। गाय के रँभाने की आवाज सुनकर ऋषि की तपस्या भंग हो गई। वे गाय को बचाने दौड़ पड़े। इस झंझट के समय में नदी को रास्ता मिल गया और वह पुनः प्रवाहित होने लगी। कहा जाता है कि तभी से शिवजी बाघ का रूप धारण कर भ्रमण करते हैं। इसी कारण इस नगर का नाम ब्याघ्रेश्वर (बागेश्वर) पड़ गया।

यहां के त्रिवेणी के समीप ही ऐतिहासिक व पौराणिक मंदिर बागनाथ स्थित है। इसकी विशालता (ऊँचाई) शहर में कहीं से भी दृष्टिगोचर कर देती है। ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार नागर शैली के वर्तमान बाघनाथ मन्दिर इसका निर्माण 1602 ई0 में चंद्रवंशी राजा लक्ष्मी चंद द्वारा कराया गया; जबकि पुरातत्त्व वेत्ता इसमें रखी प्रस्तर प्रतिमाओं के आधार पर इनको सातवीं शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी के मध्य का मानते हैं। इस मंदिर की ऐतिहासिक प्रतिमाओं में उमा, महेश्वर, पार्वती, महिर्षमर्दिनी, एकमुखी, त्रिमुखी, चतुर्मुखी, शिवलिंग, विष्णु, शेषावतार आदि प्रमुख हैं। जिनको आर्कषक व दर्शनीय बनाकर रखा गया है। यूं तो बागेश्वर में वर्ष भर चहल -पहल रहती है। छोटे-बड़े मेले अनेक लगते हैं। लेकिन मुख्य आकर्षण माघ मास के प्रथम दिन मकर संक्रान्ति को लगने वाला मेला होता है। यह मेला लगभग एक माह तक चलता है। क्षेत्रवासियों के साथ-साथ प्रशासनिक अमला भी पूरी तरह से इसमें जुट जाता है।

मेले में दूर-दूर से लोग धार्मिक ,सांस्कृतिक कारणों से तो आते ही हैं। इस मेले में भोटिया लोंगों द्वारा बनाकर लायी गई औषधियों व प्रदर्शनी के साथ- साथ प्रदेश व देश के दूसरे हिस्सों से भी व्यापारी , लोक कलाकार पहुंचते हैं । यह शहर प्राचीनकाल से व्यापार की मण्डी भी रहा है। आजकल यहां के मेलों -उत्सवों में पहले के नगरी, झोड़ा, चांचरी और लोक नृत्यों का स्थान आधुनिक लोकगीतों, नृत्यों व संसाधनों आदि ने ले लिया है।

शैक्षिणिक व व्यापारिक दृष्टि से समृद्ध यह जनपद मुख्यालय के रूप में प्रदेश की मुख्य सड़कों से जुड़ा हुआ है। देश के किसी भी हिस्से से हल्द्वानी (नैनीताल) होकर 12-13 घण्टे में पहुंचा जा सकता है। इसके निकटवर्ती दर्शनीय पर्यटन स्थलों में कौशानी व बैजनाथ का नाम लिया जा सकता है।

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बैजनाथ धाम शहर के पश्चिम की ओर 10-12 किमी. की दूरी पर गोमती नदी के किनारे स्थित है। जहां पर मध्य काल के अनेक पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण मंदिर स्थित हैं। अन्य निकटस्थ छोट-छोटे पहाड़ी शहरों में ग्वालदम ,बेरीनाग गरूण आदि हैं।

सुरम्यवादियों में स्थित इस नगरी में यात्रियों के रूकने व भोजन आदि की पर्याप्त व्यवस्था है। दरें उचित ही हैं। देश के अन्य भागमभाग वाले स्थानों की अपेक्षा यहॉ का जीवन अपनी परम्पराओं के अनुरूप व ईमानदारी से युक्त है। छोटे-बड़े वाहन यहां प्रत्येक समय उपलब्ध रहते हैं। प्रथम बार

पहाड़ की यात्रा आरम्भ करने वालों को यहां पर पड जाने वाली अचानक ठण्ड व यात्रा में आ जाने वाली उल्टियों की रोकथाम की व्यवस्था करके ही यात्रा आरम्भ करनी चाहिए।

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शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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