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बदलाव / लघुकथा / कामिनी कामायनी

बदलाव।

निहाल होता रहता था वह अपनी माँ पर। छुटपन से कोई दोस्त उसके घर से बिना कुछ खाए नहीं जाता था। ‘ बेटे, बच्चे भगवान का रूप होते हैं, वे भला बिना मुंह जूठा किए हमारे घर से कैसे जा सकते हैं”। उनकी इस बात का किसी के पास कोई जबाव नहीं रहता।

देव जब बड़ा हुआ, स्कूल पार करके कालेज के विशाल प्रांगण में पहुंचा। यहाँ भी उसके नए नए अनेक दोस्त बन गए। माँ कहतीं “बेटा, अपने दोस्तों को बुला ले, हॉस्टल का खाना खाकर बोर हो गए होंगे”। अब माँ कहती, ”लोग भगवान होते हैं, और घर आए भगवान को भोजन कराना भाग्य की बात है”। याने की माँ को हर हाल में घर में मेहमान का आना, उनकी खातिरदारी खुद अपनी हाथ से करना बेहद अच्छा लगता था। मित्र ही नहीं, देव के पिता के जानने वाले, रिश्ते नाते सभी उन्हें इस ममतामयी व्यवहार के कारण, बहुत पसंद करते थे। अपनी माँ पर उसको बेहद गर्व भी था। उसके व्यवहार में जो उदारता थी, वह भी, माँ की ही देन थी।

समय समस्या लेकर आने लगा। माँ अब थकने लगी थी। उम्र भी बढ़ती जा रही थी। नौकरी से अवकाश पाकर, पिता जी शहर के पास ही अपनी गाँव वाले पुश्तैनी मकान में आ गए थे।“ माँ बहुत बीमार है, बिस्तर से उठ नहीं सकती है, डाक्टरों ने भी जवाब दे दिया है ’। पिताजी ने जब खाँस कर काँपते हुए स्वर में, फोन पर कहा, तो उसके मस्तिष्क में बहुत सी, अतीत की कोमल यादें,उसे बेचैन करने के लिए, तरंगित हो आई। अपनी असीम व्यस्तताओं के बीच भी, महानगर से उड़ कर,वह  आ गया। माँ ने बेटा को, बेटे के परिवार को देखा, उनकी बुझी बुझी आँखें चमक गई थी।

इस चिंगारी ने उनकी जिजीविषा को जैसे फिर से उजागर कर दिया। अब वह बिस्तर पर, अपने से उठ कर बैठने  लगी थीं। चंद दिनों में वह बाहर दरवाजे पर रखे खाट पर जाकर आसन जमाने लगी। रिश्ते नाते आने जाने वाले सबने उनके जीने की आशा छोड़ दी थी। उन्हें इस तरह फिर से बैठी देखकर, लोगबाग करीब आकर हाल चाल पूछने लगते। शरीर से अत्यंत अशक्त माँ, वहीं से आवाज देती, ”बहूरानी, इन लोगों को नाश्ता पानी कराओ, मेहमान बनकर भगवान आए हैं”।

दो चार दिन तो बहू ने बेमन से ही सही, अतिथियों की सेवा सत्कार किया। मगर उसकी सहन शक्ति एकदिन जवाब दे गई, पति के सामने अपना अंगार निकालते हुए कहा, “ रास्ते चलते लोगों को बुला बुला कर खाना खिलाना मेरे बस की बात नहीं। भर दिन मैं रसोई में घुसी रहती हूँ। ऐसी महिला  के साथ मैं तो अब पल भर भी नहीं रह सकती। मैं तो अपने दोनों बच्चों को लेकर मायके जा रही हूँ, अभी तुरत”। देव कुछ पल के लिए चुप रहा, फिर बोला “ मैं अभी जाकर, माँ से कहता हूँ, वे अपनी आदत बदलें, सच में तुम्हारा पूरे दिन भोजन की तैयारी में लगे रहना अब मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। तुम मुझको छोड़ कर कैसे चली जाओगी”। माँ तब तक उस कमरे के दरवाजे तक पहुँच चुकी थी। कोई मेहमान आया था, उसके भोजन के लिए बहू से बात करने आ रही थी। अंदर से बहू बेटे की तेज आवाज में जारी संवाद उनके कानों में पिघलते लोहे की तरह पड़ी। उन्हें देव की बात से इतना सदमा लगा कि,वह वहीं ढेर हो गई थीं।

डा0 कामिनी कामायनी।  

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