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सविता मिश्रा की कविताएँ

सविता मिश्रा

~~जलता रावण ~~

रावण सपरिवार धू-धू कर
जल रहा था
पैसों की बर्बादी देख कर
दु:खी हो रहे थे हम !!

अगल-बगल देखा तो
रावण ही रावण बिखरे थे
सब दुष्ट रावण से निखरे थे
कुटिल चेहरों पर कुटिल मुस्कानें
आँखों में मक्कारी के क़तरे बिखरे थे।

हमने झट प्रभु को याद किया ,
हे राम!
सतयुगी रावण का किया संहार
आओ, फिर कलयुग में कर दो
इन सभी पापियों का उद्धार !

आँख बंद कर कर ही रहे थे
एक चिंगारी हम पर आ गिरी
लगा हम ही जलने लगेंगे
जलकर भस्म हो जाएंगे।

पति डाँटकर देने लगे नसीहतें
जब चिंगारी चिटकी
क्या तुम तब सो रही थी
जब आग थीं इतनी भड़की
तुम क्यों नहीं पीछे को सरकी।

.जैसे-तैसे राम जाने कैसे
जान बची तो फिर हमने
प्रभु को किया याद घबड़ाकर
और पूछा कि मेरे साथ
आपने क्यों किया ऐसा ?

प्रभु मंद-मंद मुस्काए
फिर बोले
रे मूरख !
तूने ही तो कहा था
आस-पास बिखरे
कलयुगी रावण का उद्धार करो
तो सबसे पास तो तू ही थी
तुझसे ही शुरुआत किया
अब बोल तू चाहती हैं क्या ?
उद्धार करूँ या छोडूँ !!

हम स्तब्ध रहे खड़े
अपने ही गिरेबान झाँक
बहुत ही हुए शर्मिंदा
प्रभु करो तुम अब क्षमा
छोड़ ही दो
थे हम अज्ञानी
नहीं देखेंगे अब से
दूसरों के दोष
अपने में से ही ढूढ़
पहले समाप्त करेंगे!!

प्रभु भी थे मेरे बड़े दयालु
झटपट मान गये
आगे से मत कहना हम से
साथ ही यह भी समझा गये!

तब से जैसा चल रहा है वह चलने दे रहे हैं
रावण को जलता देख हम भी खुश हो रहे हैं|
सविता मिश्रा

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बादल गरजता है
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बादल जब जब गरजता है,
मेरे दिमाग में खटकता है!!
मुझे लगता है,
धमकाता है यह धरती को,
अपनी औकात बतलाता है,
इस विशाल धरती को
एक धीमी सी गर्जना से
थर्रा देना चाहता है !!

बादल नहीं जानता कि धरती,
धीमी सी गर्जना से नहीं थर्रायेगी,
बादल कितना भी बौखलाए
कितनी भी बिजलियाँ गिराए,
पर नहीं तोड़ पायेगा वह धरती को।

गिराता है बिजली!
हिमशिला गिराता है!!
कुछ लकीरें अवश्य पड़ती हैं,
पर यह धरती उसे
स्वयं में छिपा लेती है,
अपने को टूटने से बचा लेती है।

बादल फिर आँसू बहाने लगता है,
उसी को लोग बरसात कहते है!!
पर लोग क्या जानें कि
यह बरसात नहीं !
बल्कि बादल का रोना है
अपनी हार पर।

धरती उसके आँसुओं को
अपने में समेट लेती है,
फिर उन्हीं आँसुओं से
बादल का पेट भरती है।

यही चक्र हर बार चलता है,
बादल अपना कर्म करता है,
धरती अपना कर्म करती है,
बादल गरजता है!!
मेरे दिमाग में खटकता है,
शायद धमकाता है धरती को
अपनी औकात बतलाता है।।

और धरती हर बार सोचती है,
क्षमा बड़न को चाहिए
छोटन को उत्पात।।
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कौन सा ! कैसा महिला दिवस !
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लो !!
पुनः आ गया नामाकूल 'महिलादिवस'
मनाओ ख़ुशी से या फिर रोकर
जैसे भी मनाना हो|
उपेक्षितों के लिए ....
निर्धारित है एक दिन
विशेष एक दिन देकर
कुछ उसे खुश कर देते हैं
और कुछ खुद भी खुश हो लेते हैं|

सिर्फ औपचारिकता और
दिखावे के लिए ही सही
इस पुरुष-प्रधान समाज में
हे नारी ! तुझे एक दिन मिला तो सही|
पुरुष वर्ग जानता है कि तू
थोड़े से ही खुश हो जाती हैं, अतः
तेरे लिए यह तिलस्मी-जादुई दिन
बना रक्खा हैं उसने |

अपने लिए उसने एक भी दिन नहीं रक्खा ..
देखा ना !!!
कितना महान हैं वह
जानता हैं सब दिन तो उसका ही हैं|
अतः नारी महान हैं !
यह कह..
आज यह दिन सभी मनाएंगे
वह भी जो इज्जत करते हैं
और वह भी जो रोज गालियाँ देते हैं|

मन में राम बगल में छुरी रखने वाले बहुत दिख जाएगें
नारी को पैर की जूती कहने वाले भी बढ़चढ़ कर मनाएगें|

खूब हर्षौल्लास से मनाओं सभी
क्योंकि पता नहीं फिर
मौका मिले या ना मिले!

अगले वर्ष शायद ...
तुम कही किसी कोने में सिसकियाँ लेती मिलो
या किसी के घर की बहू बन प्रताड़ित होती रहो
दुःख सहती हुई अपना मानसिक संतुलन खो दो
या किसी पागल खाने में अपना दिन काटती दिखो
या फिर अपने पति के इशारे पर कठपुतली बन फिरो
या जला दी जाओ सास-ससुर के द्वारा दहेज़ की बलि-वेदी पर
या नोंच ले तुम्हारे हाड़-मांस के शरीर को कोई दरिंदा
या तुम खुद तंग आ छोड़ जाओ इस बेदर्द दुनिया को
या एसिड से जला दिया जाए तुम्हारा गुलाब सा चेहरा
या बिना किसी गलती के भी तुम्हें मिलती रहें सजा
या खौफ़जदा हो तुम ना आ सको दुनिया के सामने
या गली मुहल्ले में बदनाम कर दी जाओ समाज के ठेकेदारों द्वारा
या गलती न होने पर भी मुहं छुपाती फिरो इस समाज से

कमजोर नहीं हो तुम किसी से...
पर साबित हो जाओ तुम कमजोर|
ऐसा माहौल हो जाए तैयार
तुम्हारे ही आस पास कि
तुम बिन बैसाखी के सहारे
बढ़ना ना चाहो आगे कभी
हर पगडंडी पर तुम्हें
घूरते दिख जाए कुछ भेंडियें|
तुम्हारा जीना हो जाए दुश्वार
इससे पहले ही मना लो इस दिवस को
कल किसने देखी हैं अतः
आज मना लो ख़ुशी से इस दिन को|
चलो हम भी मना ही लेते हैं इस एक दिन को
इसी लिए कहते हैं मुबारक हो महिला दिवस आप सभी को|....सविता मिश्रा
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~गुस्से से गुस्से की~
गुस्से से गुस्से की हो गयी जब तकरार
जिह्वा भी गुस्से की भेंट चढ़ खाए खार
द्वेष में बोले एक तो दूजा बोले चार
बेचारी जिव्हा हो गई शर्मसार
दो कटु वक्ता की आपस में रार हो गयी
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........|

बकने लगे एक दूजे को
उद्धत है अब चढ़ बैठने को
गुबार निकालते-निकालते
अचानक शुरू हो गयी मारम-मार
एक चलाए हाथ दूजा करे पैर से वार
देखते-देखते कुटमकाट हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ..........|

एक ने फोड़ा सर दूजे ने तोड़ा हाथ
आपस में काटम काट हो गयी
एक ने उठाई लाठी दूजा चलाये पत्थर
देखते ही नदियाँ खून की बह गयी |
दो लड़ाकुओ में लड़ाई हो गयी
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ........|

जब तक आपस में लड़ थक चूर ना हुए
धूल धरती का चाटने को मजबूर ना हुए
तब तक एक दूजे के खून के रहे प्यासे
भीड़ खड़ी देखती रही सारे तमाशे
मानवता यहाँ शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ........|

गुस्से से तमतमा खो गयी सहनशक्ति
आपस में खूब हुई रोष में गुथमगुत्थी
द्वेष ने न जाने कब उठाया सर
छोटी सी बात का बन गया बतंगण
क्रोध ने तूफान कर दिया खड़ा
आपस में ना जाने क्यों लड़ा
नासमझी में रार हो गयी
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ......|

आया होश तो शर्म से हो गयी नजरे नीची
अपनी करनी पर हुआ पश्चाताप तब
गाली गलौज हुई ख़त्म कब हाथापाई पर
गुस्से पर गुस्सा प्रभावी ना जाने हुआ कब
गुस्से से गुस्से की तकरार जब हुई
आपस में असहमति ना जाने कब हुई
गुस्से से गुस्से की टकराव हुई
तकरार हुई..रार हुई..||सविता मिश्रा
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~क्या-क्या बतायें~

क्या कहें!
भारत में आई कैसी त्रासदी हैं
लडकियों को नहीं कोई आजादी है
लड़कियां जन्म के पहले से ही हारी हैं
गर्भ में ही मार दी जाती क्या बेचारी हैं |

जैसे-जैसे बड़ी होती जाती हैं
बोझ कह धरती का सताई जाती हैं
चाहे कितनी भी खुशियाँ बिखेरे
रहती खुद सदा गम के ही अँधेरे
किसी भी चेहरे पर लाती ओज हैं
ईश्वर की अप्रितम सुंदर खोज हैं |

बिना कुछ सोचे समझे लड़कियां ही
हमेशा से ही घर-बाहर सताई जाती हैं
अपने घर में तो होता अपमान ही बस
दूजे घर की बेटियां तो जलाई जाती हैं|

कुछ बड़ी हुई तो घातक नजरें
लफंगो की सरेआम टिकने लगती है|
सुनसान देख नोंचने-खसोटने-लपकने
ताक में सदैव ही नजरें गड़ी रहती है|
बड़ी पीड़ा है दारुण क्या-क्या सुनायें हम
बहरी गूंगी सरकार को क्या-क्या बतायें हम|

उठ खड़ा हो कोई नवजवान
गलती से भी मदद को कभी यदि
जाता है मारा वह इन आतंकियों से ही
फिर उठ खड़ा ना होता कोई कभी भी|

ना जाने कब वह दिन आएगा
जब लड़कियां भी चैन से जीने लगेंगी
मस्त उन्मुक्त आंगन में फुदकती
आजादी की सांस आसमान में लेती फिरेंगी|

लड़कियों की भी किलकारी गूंजेंगी कब हर घर
बेफिक्र चारदीवारी के बीच में वह भी डोलेंगी |
गला घोटने वाले हाथ ना जाने कब
खुश हो प्यार से गले उसे लगायेंगे
लड़कियों को भी अपनी प्यारी बिटिया
स्नेह से ना जानें कब वह कह बुलायेंगे|

थोड़े से तो लोग सुधर गए है
देखते हुए बदलते समय को
जो थोड़े और बचे है अकडू
ना जाने कब वह सुधर पायेंगे|
दिखावे में पूजनीय है नारी न कह
सच में सम्मान से कब बुलाएगें
पूजा छोड़ कन्या को कह देवी
उसका सम्मान वह उसे कब दिलायेंगे|

फिर भी आशा यही है हमारी
वह दिन भी बहुत जल्दी आएगा
जब लड़कियों के जन्म पर भी हर घर ही
बन्दूक-पटाखे खूब जोर-शोर से चलवायेगा|
यूँ हर चौराहें पर हमें नहीं कभी यातनायें दी जायेंगी
लफंगों द्वारा कभी भी नहीं फब्बित्तियाँ कसी जायेंगीं|

.विश्वास हैं घना
त्रासदी भारत की ये जल्द दूर हो जायेंगी
लड़कियां भी आँगन में खिलखिलायेंगी।।....सविता मिश्रा
============================================

 

सविता मिश्रा
देवेन्द्र नाथ मिश्रा (पुलिस निरीक्षक )
पिता का नाम ..श्री शेषमणि तिवारी (रिटायर्ड डिप्टी एसपी )
माता का नाम ....स्वर्गीय श्रीमती हीरा देवी (गृहणी )
जन्म तिथि ...१/६/७३ |
जन्म स्थान ..इलाहाबाद
शिक्षा ...इलाहाबाद विश्वविद्धालय से ग्रेजुएट (हिंदी ,रजिनिती शास्त्र, इतिहास में ) |
गृहणी

लेखन विधा ...लेख, लघुकथा, कहानी तथा मुक्तक, हायकु और छंद मुक्त रचनाएँ |
प्रकाशन ...पहली कविता पति पहले जहाँ नौकरी करते थे (GEC ) वहीं की पत्रिका में छपी |
'मेरी अनुभूति' , 'सहोदरी सोपान २' '१००कदम' , साँझा काव्यसंग्रह में प्रकाशित कुछ रचनाएँ ।
'मुट्ठी भर अक्षर', 'लघु कथा अनवरत', साँझा लघुकथा संग्रह में प्रकाशित कुछ कथाएँ ।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा बेब पत्रिकाओं में छपती रहती है रचनाएँ |
'संरचना' सम्पादक डॉ॰ कमल चोपड़ा जी की पत्रिका में छपी "पेट की आग" लघुकथा |
महक साहित्यिक सभा, पानीपत में चीफगेस्ट के रूप में भागीदारी |

अभिरुचि ....शब्दों का जाल बुनना, नयी चींजे सीखना, सपने देखना !
मोबाईल नम्बर ..09411418621
ब्लाग - मन का गुबार एवं दिल की गहराइयों से |

पता ..
सविता मिश्रा
w/o देवेन्द्र नाथ मिश्रा (पुलिस निरीक्षक )
फ़्लैट नंबर -३०२ ,हिल हॉउस
खंदारी अपार्टमेंट , खंदारी
आगरा २८२००२

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