मंगलवार, 29 नवंबर 2016

शब्द संधान / इक बंगला बने न्यारा / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

भारत में कई भाषाएँ बोली जाती हैं। मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगू, हिन्दी आदि। एक भाषा बंगला भी है। लेकिन जब सहगल ‘इक बंगला बने न्यारा’ गाते हैं तो स्पष्ट ही उनका आशय बंगला (या ‘बांगला’) भाषा से नहीं है। फिर ये शब्द,”बंगला” निवास (घर/मकान) का अर्थ कैसे देने लग गया? भाषा “घर” कैसे बन गई?

माना की हर घर बंगला नहीं होता। बंगला एक विशेष प्रकार का घर है। इसके ऊपर कोई मंजिल नहीं होती, इकहरा होता है और इसकी छत पर खपरैल होती है या फिर यह फूस या छप्पर से ढका रहता है। घर के सामने खुला स्थान भी रहता ही है। ऐसे मकान पहले सिर्फ बंगाल में ही बनाते थे। जब अँगरेज़ भारतवर्ष आए तो उन्हें सबसे ज्यादह तकलीफ यहाँ पड़ने वाली सड़ी गरमी से हुई। इससे निजात पाने के लिए उन्हें शायद ऐसे ही घरों की ज़रूरत थी। उन्होंने बंगाल में ऐसे घर देखे। बस, फिर क्या था। सारे हिन्दुस्तान में उन्होंने अपने रहने के लिए ऐसे ही घर बनवाना शुरू कर दिए। तेज़ गरमी नें ये राहत पहुंचाने वाले मकान थे।

कहा जाता है कि इस प्रकार के भवन मुग़ल बादशाहों को भी बहुत पसंद थे। वे ख़ास तौर पर अपनी बेगमों के लिए इसी तरह के बंगाली-महल बनवाते थे।

अंगरेजों ने भारत में अपने रहने के लिए ऐसे आवासों को न केवल प्राथमिकता दी बल्कि बंगाल में प्रचलित ऐसे भवनों को ‘बैंगलो’ नाम भी दिया। वे भारत में जहां भी गए, ऐसे भवनों का प्रचार भी करते गए। अब ‘बैंगलो’ हिन्दी में “बंगला” बन गया है। हर जगह एक मंजिला और खुले शानदार भवनों के लिए अब इसी शब्द का प्रयोग होने लगा है। बंगला शब्द ने इस तरह अर्थ विस्तार पाया। यह शब्द केवल एक ख़ास भाषा के ही लिए नहीं बल्कि एक ख़ास तरह के भवन के लिए भी प्रयुक्त होने लगा। हर किसी की यह ख्वाहिश रहती है कि रहने के लिए, “इक बंगला बने न्यारा”।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०/१ सर्कुलर रोड, इलाहाबाद – २११००१ (मो)९६२१२२२७७८

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