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भारतीय संस्कृति का महापर्व – छठ : शैलेश त्रिपाठी

भारतीय संस्कृति का महापर्व – छठ

पहिले पहिल हम कईली

छठी मैया वरत तोहार।

करिह क्षमा छठी मैया

भूल-चूक गलती हमार

भारत एक ऐसा देश जिसे पर्व और उत्सव के देश कहने में कोई दिक्कत नही होनी चाहिए। अब इसे संयोग ही तो कहा जायेगा की दीपावली का उत्सव मनाने के तुरन्त बाद एक ऐसा उत्सव आता जिसे महा-उत्सव या महापर्व कहना लाज़मी है बात तो कहि न कहि बिलकुल साफ़ है मैं जिक्र उस महापर्व की कर रहा हु जिसमें साक्षात् प्रभु सूर्य की पूजा की जाती है अर्थात छठ

यह पर्व हर वर्ष दो बार मनाया जाता है चैत्र मास में और कार्तिक मास में ।

भारत में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध यह आस्था का सबसे बड़ा लोकपर्व है जहाँ भारतीय संस्कृति,जहाँ परम्परा कहि न कहि अपने पुरे रंग में हर व्यक्ति पर चढ़ि दिखाई देती है।

यह पर्व दीपावली के बाद भैया दूज के तीसरे दिन से आरम्भ होता है,और चार दिन तक चलता है,इतना ही नही इस पर्व की मान्यता सर्वोपरि है हर प्रकार की मनोकामना के लिए जन मानस इस उत्सव में भाग लेते है।

पौराणिक महत्व-एक मान्यता के अनुसार"जब जुआ में पाण्डव अपने राजपाठ को हार जाते है तब द्रौपदी इस व्रत को रखती है और उसके बाद पाण्डव का राजपाठ मिल जाता है। और वर्तमान स्थिति में यदि महाउत्सव पर प्रकाश डाला जाय तो यह पर्व बिहार,पूर्वी उत्तर प्रदेश ही नही बल्कि अमेरिका,ब्रिटेन,मॉरीशस,गोयाना,त्रिनाद जैसे देशो में भी इसी रिवाज और परम्परा के साथ मनाया जा रहा है,

आजकल हम देखते है अमेरिका के टेक्सास नदी पर यह महोत्सव धूम मचा रहा है।

कहि कहि ती इस पर्व के कारण सरकारी छुट्टी भी होती है। इस उत्सव की एक अलग पहचान है जैसे ही छठ पूजा का समय नज़दीक आता है लोग अपने घरो में छठ माई के गीत बजाना प्रारम्भ कर देते है और इस पर्व के रंग में रगने लगते है।

इस लोक संस्कृति का विशाल महापर्व है इस पर्व मे आराध्य सूर्य और उनकी बहन छठ मैया है। इस पर्व के चार दिन के होने के अलग अलग अपने मतलब भी है इस उत्सव का आरम्भ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि को होती है और समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी तिथि को होती है।

इस उत्सव को प्रथम दिन को नहाय-खाय कहते है,इस दिन घर की साफ़-सफाई की जाती है ताकि घर शुद्ध हो जाये,इसके पश्चात व्रतधारी स्नान करके शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करके व्रत आरम्भ करते है। इस दिन लोग कद्दू,खीर ग्रहण करते है और व्रतधारी के उपरांत ही घर के अन्य सदस्य भोजन ग्रहण करते है।

इस व्रत का दूसरा दिन यानि कार्तिक शुक्ल पञ्चमी जिसे लोहंडा और खरना कहते है इस दिन व्रतधारी दिनभर व्रत रखते है जिसे खरना कहते है और आस पास के लोग को प्रसाद खिलाने हेतु निमन्त्रण भेजते है,जिसमे गन्ने के रस से बनी हुई खीर,दूध,चावल का पिट्ठा,घी चिपुड़ि रोटी देते है।

इसके बाद तीसरे दिन यानि कार्तिक शुक्ल पष्ठी को सन्ध्या अरघ

जिसमे सन्ध्या के समय डूबते सूर्य को नमस्कार करते हुए अरघ देते है और अंतिम दिन यानि कार्तिक शुक्ल सप्तमी जिसे उषा अरघ कहते है

जहा सभी व्रती एकत्रित होते है और उगते हुए सूर्य को अरघ देते है।

इस प्रकार चार दिनों तक यह महा पर्व चलता है।

समाजिक समरसता का महापर्व है छठ दूसरे त्यौहार जहाँ अपनी अहमियत को खोते जा रहे हैं, वहीं छठ महापर्व का बेहद तेजी से देश और विदेश तक में प्रसार हो रहा है और इससे भी बड़ी बात है कि परिवार के साथ ही यह पर्व मनाया जाता है और फिर समाज को भी एक जगह इस हेतु इकठ्ठा होना ही पड़ता है। आज बेशक यह पर्व देश और विदेशों तक फ़ैल चुका है, किन्तु मूल रूप से यह पर्व बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में ही प्रचलित रहा है तो आज भी हम सब देख सकते हैं कि किस तरह विभिन्न प्रदेशों में कार्य कर रहे बिहारी और उत्तर प्रदेश के भैया टूट कर गाँव की ओर भागते हैं। छठ-पर्व की वजह से पूरे देश से बिहार को जानी वाली रेलगाड़ियों में मारामारी मची रहती है तो रेल मंत्रालय को कई-कई विशेष ट्रेन भी चलानी पड़ती है। यह बात सिर्फ इसलिए उद्धृत कर रहा हूँ कि बेशक दूसरे त्यौहारों पर परिवार इकट्ठे हों न हों, किन्तु छठ-पर्व पर लोगबाग समय निकालते ही हैं और परिणामस्वरूप सामाजिक मेलजोल की संस्कृति पुष्ट होती है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देने वाली एकमात्र ज्ञात परंपरा वाली छठ पूजा की महिमा अब सर्वव्यापी हो चुकी है। चूंकि बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग आज हर जगह मौजूद हैं तो छठ पूजा के नाम पर हर जगह कार्यक्रम होते दिख जाते हैं। अगर दिल्ली की ही बात करें तो आपको तमाम होर्डिंग में 'छठ पूजा' के बधाई सन्देश सहज ही नज़र आ जाएंगे!

यह स्थिति पहले की स्थिति से काफी भिन्न है। अगर कुछ समय पहले की बात करें तो, भारत जैसे देश में और मुंबई जैसे आधुनिक शहर में पिछले दिनों जिस प्रकार छठ पूजा का भारी विरोध किया गया था, उसने कइयों के रोंगटे खड़े कर दिए थे। अपने प्रदेश में रोजी-रोजगार की व्यवस्था न होने के कारण कोई व्यक्ति पलायन करता है, लेकिन अपने देश में भी वह व्यक्ति त्यौहार नहीं मना सकता, सम्मान से जी नहीं सकता, इस बात ने देश भर में छठ पूजा को लेकर भारी उत्सुकता पैदा कर दी थी। बिहार, यूपी या किसी भी राज्य के लोग हों, जब भी किसी भारतीय पर अपनी संस्कृति को लेकर जरा भी आंच आती है, वह बेहद सजग होकर और भी तीव्र गति से आगे बढ़ता है। मुम्बई इत्यादि जगहों पर छठ पूजा के जिस प्रकार से कुछ छुटभैये नेताओं ने विरोध किया, उससे यह त्यौहार और भी तेजी से अपना प्रभाव बढ़ाता चला गया और साथ ही इसे मनाने वाले लोग भी काफी हद तक संगठित हुए। अगर पलायन की बात करें तो, यह एक ऐतिहासिक सच है कि जो यात्रा करते हैं, वह विकास करते हैं. जो एक जगह जम जाते हैं, वह जड़ हो जाते हैं। गुलामी के काल में हमारे पूर्वजों को अंग्रेजों ने गुलाम बनाकर दूसरे देशों में भेजा था, लेकिन अब वह उन देशों की रीढ़ बन चुके हैं, अर्थव्यवस्था में, सामजिक दृष्टि में और लोकतंत्र में तो खैर वोट की अहमियत है ही। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं। बल्कि कुछ देशों में तो रोजी-रोटी कमाने की खातिर गए लोगों के वंशजों ने राष्ट्र-प्रमुख के पद तक पहुँच बना ली है। काश कि हमारे देश के लोग पिछड़े और विकसित राज्यों की मानसिकता में भेद न करें! एक जगह के लोग, दूसरे राज्य के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को अपने पास बैठाना पसंद करें। सिर्फ इसलिए कि कमजोर व्यक्ति हर तरह का कार्य करने को तत्पर रहता है, और इस कारण स्थानीय व्यक्ति को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है, किसी का विरोध करना कतई जायज नहीं है। संयोग कहिये या कुछ और, लेकिन पिछले दशकों में छठ-पूजा ‘पिछड़े-लोगों’ और बिहार जैसे पिछड़े राज्यों की अस्मिता का प्रतीक बन गयी है। मुद्दे का राजनीतिकरण होने से इसका प्रचार-प्रसार तो खूब हुआ लेकिन इस त्यौहार की असली अहमियत हम कहाँ तक समझ पाएं हैं, यह बात अवश्य ही देखने वाली होगी! अगर राजनीतिकरण से अलग हटकर सोचें तो छठ-पर्व पर जिस प्रकार का सामाजिक एकत्रीकरण होता है, वह किसी और दशा में दुर्लभ है। मैं अपनी बात करूँ तो मेरे गाँव में छठ पूजा पर देश और विदेश तक रहने वाले लोग एकत्र होते हैं और गाँव के तालाब के किनारे शाम को चार घंटे से ज्यादा समय भी देते हैं। सिर पर छठ-पूजा की सामग्री और प्रसाद से भरी टोकरी लेकर घाट पर जाने का आनंद अनुपम होता है। भारतीय संस्कृति की छटा इस समरस त्यौहार के माध्यम से देश-विदेश तक फ़ैल चुकी है।

इसके साथ इस त्यौहार की मूल भावना जो मैं समझता हूँ, वह यही है कि गिरते को भी सहारा दो, ठीक उसी प्रकार जिस तरह से डूबते सूरज की महिमा को छठ पूजा के माध्यम से हम स्वीकार करते हैं। क्योंकि जो गिरेगा, वही उठेगा, जो डूबेगा, वही उगेगा. जो संघर्ष करेगा, वही आगे होगा. जो ठहर जाएगा, वह मृत हो जाएगा। आइये, राजनीति से दूर हटकर इस पर्व की महिमा को आत्मसात करें

छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल पंडालों और भव्य मंदिरों की जरूरत होती है न ऐश्वर्य युक्त मूर्तियों की। बिजली के लट्टुओं की चकाचौंध, पटाखों के धमाके और लाउडस्पीकर के शोर से दूर यह पर्व बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गई उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रंथ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थअना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के साथकी जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। नगरों की सफाइ, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबंधन, तालाव या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा भाव और भक्ति भाव से किए गए सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है।

लोकपर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति भाव से पूर्ण लोकगीत गाए जाते हैं।

इस पर्व में लोकगीत हर लोगो के जबान पर रहता है जैसे कुछ गीतों का यहा उल्लेख करना जरूरी है-

पहिले पहिल हम कईली

छठी मैया वरत तोहार।

करिह क्षमा छठी मैया

भूल-चूक गलती हमार