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(आपबीती कहानी) / न भय, न भ्रम, न भूत / महेश कुमार गोंड ‘हीवेट’

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(आपबीती)

न भय, न भ्रम, न भूत

उठिये भाई साहब, उठिये । यहाँ से यह सीट मेरे लिये रिज़र्व है ।” एक हमउम्र लड़के ने मुझे झकझोरते हुये जगाया ।

“क्या ? यहाँ से कहने का क्या मतलब है ? क्या ट्रेन चुनार पहुँच चुकी है ?” मैंने आँख मींजते हुये आलस्य से पूछा ।

“अरे हाँ, ट्रेन इस समय चुनार जंक्शन पर ही खड़ी है । अगर दो मिनट में तुम नहीं उतर पाये न तो फिर मुग़लसरांय तक यहीं पड़े रहोगे । ” लड़के ने थोड़ा अकड़ते हुये जवाब दिया ।

“अजीब बात है ! रोज़ तो यह ट्रेन लेट होते-होते भोर के तीन बजे तक यहाँ पहुंचती है । आज तो समय से पंद्रह मिनट पहले ही पहुंच गयी । अभी तो बस डेढ़ ही बज रहे हैं । इतनी रात को यहाँ से भला कौन गाड़ी मिलेगी ? वो भी इस पहाड़ी इलाके में !” यहीं सब बुदबुदाते हुये मैं प्लेटफॉर्म से स्टेशन के विश्रामालय की ओर अपने बैग को उठाते हुये चल पड़ा । वहां पहुंचकर मैंने पाया कि विश्रामालय में एक बीमार लालटेन की तरह जल रहे सोडियम लाइट के अलावा कोई न था । मैंने सोचा कि टिकट काउंटर की ओर चलकर देखतें हैं । शायद कोई यात्री मिले तो उसी के साथ गपशप में समय कट जाये । लेकिन टिकट काउंटर पर भी सिर्फ एक आदमी नज़र आया । वो भी टिकट काउंटर के अन्दर खर्राटे लगा रहा था । निश्चय ही वो टिकट काटने वाला बाबू ही था । जो इतनी रात को अपनी ड्यूटी कर रहा था ।

“सुबह के पांच बजे से पहले यहाँ से कोई गाड़ी भी नहीं मिलेगी । जो घाट तक पहुंचा सके । फिर वहां से गंगा नदी को पाल्टून पूल से पार करना पड़ेगा । उसके बाद भी दस किलोमीटर की दूरी तयं करने के बाद घर पहुँचने में तो दिन के दस तो बज ही जायेंगे ।” मैं स्वयं में उधेढ़बुन में लगा हुआ था । स्टेशन का सांय-सांय करता माहौल मुझे असुरक्षित महसूस करने पर मजबूर कर रहा था । फिर मेरे मन में एक विचार सुझा कि क्यों न घाट तक की दूरी (जो की पूरे चार किलोमीटर है) को पैदल ही तयं कर लिया जाये । फिर घाट के टैम्पो स्टैंड तक अपने दोस्त शिवा को बाइक लेकर बुला लूं । जिससे कम से कम सुबह के पांच बजे तक तो वह घर पहुँच ही जाऊंगा । हालांकि मेरा यह विचार काफी जोखिमपूर्ण था । क्योंकि रात के दो बजे पहाड़ों को चीरकर निकलती हुई उन सड़कों पर अकेले चलना, कोई बुद्धिमानी का काम नहीं था । शाम ढलते ही इस रास्ते पर लूट व हत्या के किस्से भी मैंने खूब सुनें थे । फिर भी मैंने घाट तक की दूरी को पैदल ही तय करने के लिये चल पड़ा

। इस समय मोबाइल की टार्च ही मेरी मार्गदर्शन का एकमात्र साधन था । लगभग ढाई किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद मेरी मोबाइल भी दो बार बीप देकर स्विच ऑफ हो गयी । अभी भी सुबह होने में कम से कम तीन घंटे का समय था । अब आगे का शेष डेढ़ किलोमीटर का रास्ता बिलकुल अंधकारमय था । सड़क के चारों ओर पसरे सन्नाटे से मुझे डर लग रहा था । मैं सोचने लगा कि अगर रास्ते में कोई भूत मिल गया तो क्या होगा ? इस समय अनायास ही मेरे मन में भय, भ्रम व भूत की भयावह कल्पनायें उभरकर सामने आ रही थी । इस समय किसी तरह से घाट पर पहुँचने के अलावा मेरे पास कोई चारा न था ।

लगभग आधे घंटे के बाद, मैं घाट पर पहुँचा । लेकिन वहां घाट का नज़ारा देखकर मैं एकदम सन्न रह गया । वहां दूर-दूर तक नदी का पानी व रेत पसरा हुआ था । पुल में लगने वाले पीपे नदी के एक किनारे पर बिखरे पड़े थे । मैं नदी के पूर्वी छोर खड़ा होकर पश्चिमी छोर पर जलते हुये एक लाश को स्पष्ट देख पा रहा था । लाश के आस-पास कोई व्यक्ति तो नज़र नहीं आ रहा था । शायद लोग अपने कर्मों से मुक्त होकर वहां से जा चुके थे ।

इस समय मेरे दिल के धड़कने की दर अपने अधिकतम सीमा पर पहुँच चुकी थी । मैंने तुरंत मोबाइल को फिर से ऑन किया और शिवा को फोन लगाया ।

“तुम स्टेशन पर ही रुक जाना । मुझे नहीं पता था कि पुल अभी तक नहीं बन पाया है । जबकि हर साल तो दशहरे पर ही बन जाता था । इस साल दिवाली तक भी न बन पाया ।” शिवा उधर से और आगे बोल ही रहा था कि मोबाइल फिर से स्विच ऑफ हो गयी ।

“तुम दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख व सनकी लड़के हो ।” मैं खुद को कोसते हुये घाट की ढलान उतर रहा था । मैं समझ नहीं पा रहा था कि ऐसी परिस्थितियों में क्या करना चाहिये ? वापस स्टेशन चले जाना चाहिये ? डर जाना चाहिये ? या फिर कुछ और करना चाहिये ? इस समय अगर मेरे साथ कुछ बुरा होता तो इसके लिये सिर्फ तीन वजह हो सकते थे, भय, भ्रम या फिर भूत । मुझे अभी भी केवल भूतों से ही डर लग रहा था । क्योंकि भय या भ्रम के लिये अभी मेरे मन में कोई जगह नहीं थी।

नदी के किनारे पर पहुंचकर मुझे एक झोपड़ी दिखाई पड़ी, जो कि चारों ओर से खुली थी । सामान्य दिनों में एक आदमी इसी झोपड़ी में बैठकर पुल का टोल टैक्स वसूला करता है । “अब सुबह तक यहीं रुकना चाहिये ।” झोपड़ी के नीचे खड़ा होकर अपनी बैग से चादर निकालते हुये मैंने सोचा । यहाँ आपको यह जानकर हैरानी होगी कि मुझे अभी भी किसी चीज़ की कमी महसूस हो रही थी, शायद एक चारपाई या तख़्त की, या फिर ऐसे ही किसी अन्य साधन की । जिससे मेरा चादर पूर्णतया बालू लेपित होने से भी बच जाता और साथ ही साथ छोटे-मोटे जानवरों से सुरक्षा भी हो जाती । कितनी अजीब बात है न, कि इतनी रात को एक शमशान में एकदम अकेला मैं एक चारपाई या तख़्त की चाह रख रहा था । खैर, लोग तो कहते हैं कि खोजने से भगवान मिल जाते हैं, तो फिर भला मुझे एक चारपाई या तख़्त क्यों नहीं मिल सकता था । मुझे मालूम था कि एक शमशान में मेरी यह जरुरत बड़ी आसानी से पूरी हो सकती है । क्योंकि जितने भी लोग यहाँ हमेशा के लिये आते हैं । सब लेटकर ही तो आते हैं ।

मेरी यह खोज मात्र बीस कदम चलने पर ही पूरी हो गयी । यह एक चारपाई या तख़्त तो नहीं था, पर था कुछ ऐसा ही । बांस की लकड़ियों से सीढ़ीनुमा बने इस तख़्त को ग्रामीण भाषा में मेरे यहाँ तो तिकठी कहते हैं, जिस पर शव को रखकर घाट तक लाया जाता है । यह लगभग घुटने भर पानी में आधा डूबा हुआ दिख रहा था ।

लगभग बीस मिनट के बाद मैं झोपड़ी के नीचे, अपने सीढ़ीनुमा तख़्त पर चादर रखकर बड़े आराम से लेटा हुआ था । मेरे द्वारा पीली चादर को ओढ़े हुये देखककर कोई भी एक लाश या फिर किसी भूत की कल्पना, बड़ी आसानी से कर सकता था । मेरे दोनों बैग एक आरामदायक तकिये की भूमिका निभा रहे थे । इस झोपड़ी के नीचे पड़ा एक जीवित लाश के रूप में मैं, नदी की दूसरी छोर पर जल रहे लाश को बड़े ध्यान से देख रहा था । वह जलता हुआ लाश मानों सार्वभौमिक सत्यता को प्रमाणित कर रहा था । जैसे कि वह बार-बार कह रहा हो कि जीवन का यहीं अंत है, यहीं सत्य है । इस समय महज तीन साल पहले अपने पिताजी को बिल्कुल उसी जगह पर विसर्जित करने की घटनाक्रम को मेरा दिमाग बार-बार दोहरा रहा था ।

ठंडी-ठंडी हवाओं के झोंके मुझे अपने चादर से मजबूती से लिपटने को मजबूर कर रहे थे । अब मैं थोड़ा सहमा हुआ जरुर था । लेकिन बुरी तरह से भयभीत नहीं था । क्योंकि मुझे लग रहा था कि यदि खुद को ज्यादा डराया, तो शायद ही सुबह घर पहुँच सकूँ । इस समय बचपन में सुनायी गयी पिताजी की भूतों वाली डरावनी कहानियाँ मुझे सहमें होने का पूर्णतया जिम्मेदार थीं । ये सब पारंपरिक भयानक अफवाहों का आज मुझे साक्षी बनने का अवसर मिला था । यह अवसर था भूत-प्रेतों से मिलने का । लेकिन आज तो कुछ और ही लिखा था ।

अपने डरे-सहमें ख्यालों में गोते लगाते – लगाते मैं कब नींद की आगोश में चला गया मुझे पता ही नहीं चला । अचानक से मुझे घाट की ऊंचाई पर से किसी चीज़ के लुढ़कते हुये अपनी ओर आने की आवाज सुनाई पड़ी । मैंने अपने आँख पर से चादर हटाकर देखा तो यह एक साईकिल सवार मेरी झोपड़ी की ओर चला आ रहा था । मुझे लगा शायद अब भूतों के आने का समय हो चुका है । मैं अपने चादर में जोर से दुबककर एक लाश होने का नाटक करने की कोशिश करने लगा । जब वह सवार मुझसे कुछ दूरी पर रह गया तो उसकी नज़र मेरे लेटे हुये शव पर पड़ी ।

“कौन हो ?”

“कौन हो तुम ?”

“जय हनुमान ज्ञान गुन सागर .....जय कपिश ......कौन हो तुम? ” साइकिल सवार ने साइकिल रोकते हुये भयभीत स्वर में चिल्लाने लगा । वह बीच-बीच में हनुमान चालीसा के मन्त्रों को भी दोहरा रहा था । मैं सोच में पड़ गया कि ये कैसा भूत है जो हनुमान चालीसा पढ़ रहा है । अब मुझे असली बात समझ में आ चुकी थी ।

“अरे चाचा डरो मत, उस पार जो यादव मिष्ठान भण्डार है न, मैं उन्हीं का लड़का हूँ । कोई भूत नहीं ।” यह कहते हुये मैं खड़ा होकर उस साइकिल सवार की ओर दो कदम आगे बढ़ा ।

“दूर रहो ! जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ......मैं कहता हूँ वहीँ रूक जाओ वरना गंगा जल छिड़ककर भस्म कर दूंगा ।” साइकिल सवार ने मुझे चेतावनी देते हुये कहा ।

दरअसल, जिसे मैं भूत समझ रहा था । वह मुझे भूत समझ रहा था । मैंने उसकी ओर महज पांच कदम ही बढ़ाये होंगे कि वह अपनी साइकिल को छोड़कर बीसों कदम पीछे की ओर भाग चुका था । सचमुच वह काफी डर चुका था ।

“अरे डरिये मत, मैं कोई भूत नहीं हूँ । आप चाहें तो मुझे गंगाजल में डुबाकर देख लीजिये । मुझे कुछ नहीं होगा । मैं यादव जी का लड़का हूँ । आप तो मेरी दुकान पर आते ही रहते हैं । ” मैंने भी जोर से उस आदमी पर चिल्लाया और फिर अपनी सीढ़ीनुमा तख़्त पर आकर वापस बैठ गया । अगले दस मिनट बाद वह आदमी मेरे पास बैठकर मेरे पिताजी (यादव जी) के व्यवहार व उनकी मिठाइयों की बखान कर रहा था । इस समय भी मैं तिरछी निगाहों से उस जलते हुये लाश की ओर देखकर अपने पिताजी को याद कर रहा था । मैं उस आदमी को बता देना चाह रहा था कि मैं यादव जी का बेटा नहीं हूँ । यहाँ से दस किलोमीटर दूर स्थित गाँव में मेरे पिताजी रहते थे । जिन्हें मैं तीन साल पहले, यहीं हमेशा के लिये छोड़ गया था । लेकिन सुरक्षा कारणों से मैं ऐसा नहीं कर सकता था ।

“बेटा, तुम थोड़ी देर और यहीं आराम कर लो । मैं मछलियाँ निकाल लूं तो फिर उनको बेचने उस पार चलूँगा । तुम भी साथ में चले चलना ।” मुझे सहेजते हुये वह नदी में अपनी जाल निकालने के लिये उतर गया ।

“लग रहा है तुम काफी थक गये थे ।” सुबह के छः बजे उस मछुआरे ने मुझे जगाते हुये कहा । अब वह भयानक रात बीत चुकी थी । मैंने उस जलते हुये लाश की ओर एक बार फिर देखा । अब वह लाश ठंडी राख में बदल चुकी थी ।

“पापा को मेरा राम-राम कहना, बेटा । बता देना किशोरी चाचा मिले थे ।” मुझे नाव से उतारकर मुछुआरे ने सहेजते हुये कहा ।

अगले दो घंटे के बाद मैं अपने घर पर पहुँच चुका था । रात की पूरी घटनाक्रम को जानने के बाद माँ, मेरी तबीयत को लेकर काफी परेशान थीं । जबकि मैं पूर्णतया आश्वस्त था कि मुझे यह तेज बुखार पिछली रात की थकान के कारण था । इसको भूत-प्रेतों से जोड़कर देखना मात्र एक कोरी-कल्पना थी । जैसा कि मेरी माँ सोच रही थी ।

“अब आगे से तुम कभी भी उस ट्रेन से सफ़र नहीं करोगे ?” माँ ने मुझ पर आजीवन प्रतिबन्ध लगाते हुये कहा । जिसे मैंने उनकी ख़ुशी के लिये स्वीकार कर लिया ।

वर्ष 2009 में घटित इस घटना से मेरे मन में हमेशा कुछ सवाल उठते रहे । आखिर उस शमशान से शाम ढलने का बाद गुजरने वाले लोग भूतों से डरकर पागल कैसे हो जाते हैं ? कौन होता है वहां जो रात में गुजरने वाले लोगों को लूट लेते हैं ? अगर ये सब भूतों के कारनामे हैं, तो फिर मैं कैसे बच गया ? मुझे तो वहां कुछ ऐसा दिखा ही नहीं - न भय, न भ्रम, न भूत ।

“कहीं ये सब शमशान के आसपास के गांवों के बदमाश लोगों के करतूतें तो नहीं ?” मेरे मन ने मुझसे सवाल किया ।

“शायद कुछ ऐसा ही है ।” जवाब में मैंने भी अपने मन से कहा ।

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(महेश कुमार गोंड ‘हीवेट’)

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