शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

प्राची - नवंबर 2016 / त्रिलोचन पर मेरी कविताएं / भारत यायावर

त्रिलोचन पर मेरी कविताएं

भारत यायावर

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आत्म-परिचय

जन्म : 29 नवम्बर, 1954 ई. हजारीबाग.

कविता-पुस्तकेंः झेलते हुए (1980), मैं हूं यहां हूं (1983), बेचैनी (1990), ‘हाल-बेहाल’ (2004) एवं ‘तुम धरती का नमक हो’ (2015) प्रकाशित और चर्चित.

जीवनीः ‘नामवर होने का अर्थ’ (2012)

आलोचनाः ‘नामवर सिंह का आलोचना कर्म’ (2013), ‘विरासत’ (2013), ‘रेणु का है अंदाजे बयां और’ (2014), ‘पुरखों के कोठार से’ (2016), संस्मरणः ‘सच पर मर मिटने की जिद’ (2016)

भारत यायावर

प्राध्यापक, हिन्दी विभाग,

विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग

आवास : यशवंत नगर,

मार्खम कॉलेज के निकट,

हजारीबाग-825 301 (झारखण्ड)

मोबाइल : 09835312665

मउंपसरू इींतंजलंलंअंत/हउंपसण्बवउ

अन्य लेखन

खोज-कार्यः हिन्दी के महान् लेखक महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं फणीश्वरनाथ रेणु की दुर्लभ रचनाओं का खोज-कार्य. इन दोनों लेखकों की लगभग पच्चीस पुस्तकों का संकलन-संपादन. ‘रेणु-रचनावली’ (1994) एवं ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली’ (1996) का संपादन.

अन्य संपादित पुस्तकेंः ‘कवि केदारनाथ सिंह’ (1990), ‘आलोचना के रचना-पुरुष : नामवर सिंह’ (2003) एवं ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी का महत्त्व’ (2004).

पुरस्कार

नागार्जुन पुरस्कार (1988) बेनीपुरी पुरस्कार (1993) राधाकृःण पुरस्कार (1996) पुश्किन पुरस्कार (1997) मास्को

बात उन दिनों की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आंखें खोल रहा था. यानी हिंदी साहित्य के मुख्य द्वार पर खड़ा था और अध्ययन-ममन के दौर से गुजर रहा था. यह बीसवीं शताब्दी का आठवां दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था. कविताएं लिखता था और अपने मित्रों को सुनाता था. उसी समय मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं- छायावाद, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां और कविता के नए प्रतिमान. इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है. यह मेरे लिए आलोचना की पहली पुस्तक थी, जिसे पढ़ते हुए लगता था कि लेखक सामने उपस्थित होकर बोल रहा है. यानी, एक ‘बोलता हुआ गद्य’. एक ऐसी वाचिकता, जिसमें रचनात्मकता है और है विश्लेषण की अनोखी पद्धति और नई बातों एवं उद्भावनाओं का अन्वेषण!

1980 ई. से मैं उनके करीब आया. फिर त्रिलोचन-शमशेर-नागार्जुन का भरपूर स्नेह मुझे मिला. ये तीनों वरिष्ठ कवि नामवर की प्रतिभा के कायल थे. इन कवियों में त्रिलोचन ही ऐसे कवि थे जिनके पास किस्सा-कहानियों-संस्मरणों का अद्भुत खजाना था. 1980 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया. तब अनिल जनविजय, जिन्हें मैं अपनी आत्मा का सहचर मानता हूं, जे.एन.यू. में रूसी भाषा और साहित्य का अध्ययन कर रहे थे. वे जे.एन.यू. के पेरियार हॉस्टल में रहते थे. हम लोग प्रायः प्रतिदिन वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह से मिलते. यदा-कदा नामवरजी से भी मिलना होता. तब त्रिलोचन दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू-हिंदी कोश पर काम कर रहे थे. हम दोनों मित्र त्रिलोचन से मिलने जाते. त्रिलोचन की बातों से तब अनुपम आनंद मिलता. उस समय मैंने ‘विपक्ष’-सीरिज में स्वप्निल श्रीवास्तव की काव्य-पुस्तिका ‘ईश्वर एक लाठी है’ प्रकाशित की थी और अनिल जनविजय की काव्य-पुस्तिका ‘कविता नहीं है यह’ शाहदरा में कांतिजी के यहां छपवा रहा था. उसी समय एक दिन अनिल और मुझसे त्रिलोचनजी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए. उनकी कविताएं किन पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, यह भी उन्होंने नोट करवाया. वे नामवर के विद्यार्थी जीवन में की गयी साहित्य-साधना को उल्लेखनीय मानते थे.

एक दिन त्रिलोचन से मिलकर अनिल के कमरे में रात में मैंने एक कविता लिखी, जिसे अनिल ने बहुत पसंद किया. यह कविता इस प्रकार है-

बता रहे हैं त्रिलोचन जी

हजारों वर्षों की अपनी बदलती हुई परंपरा को

अपने में जीवंत किये हुए

विश्व के तमाम ज्ञान-विज्ञान से निरंतर टकराते हुए

आज के समग्र यथार्थ के रू-ब-रू खड़े

मेरे आदर्शों के मूर्त रूप हैं त्रिलोचन जी

 

बता रहे हैं-

जब किशोर थे

आचार्य शुक्ल से मिलने उनके घर जाते थे

उसी वक्त वे उनसे सीधे टकराते थे

 

बता रहे हैं त्रिलोचन जी

कभी ‘हंस’ में उप-संपादक थे

मुक्तिबोध थे डिस्पैचर, पर मुक्तिबोध कितने आगे हैं.

 

बता रहे हैं त्रिलोचन जी

व्यक्ति सरल ऐसा भी होता

जैसे हैं शमशेर बहादुर!

 

त्रिलोचन जी बाबा के

गुरुत्व भार को तौल रहे हैं

 

त्रिलोचन जी बता रहे हैं

कितने प्रखर आलोचक हैं नामवर सिंह

 

बता रहे हैं त्रिलोचन जी

काशी के अपने संघर्षों को

याद कर रहे

कई लेखकों से अपने

संबंधों का इतिहास कह रहे

बात-बात में बार-बार वे

कोश-ज्ञानः प्रस्तुत कर रहे

 

त्रिलोचन जी बोल रहे

तब त्रिलोचन हैं

किंतु रहन-सहन में अब भी

बासुदेव हैं

कम-कीमती कुर्ता-पाजामा

कम-कीमती ही घिसी-सी चप्पल

कंधे से झूलता एक झोला

जैसे अपने गांव-ज्वार से

अभी-अभी आये हों दिल्ली

 

ऊबड़-खाबड़

देहाती-से लगने वाले

सॉनेटिया इस त्रिलोचन से

हिंदी वाले खफा रहे हैं

रुचते नहीं त्रिलोचन उनको

 

मैं देहाती

गंवई लेखक

त्रिलोचन के पास खड़ा हूं

मेरे आदर्शों के

मूर्त-रूप हैं त्रिलोचन जी.

 

एक दिन नामवर जी ने कहा कि आप त्रिलोचन जी को अपने साथ कल जे.एन.यू. लेते आइए- शाम को. उस दिन मैंने त्रिलोचन जी को नामवर जी का आमंत्रण दिया. वे सहर्ष तैयार हो गए और दूसरे दिन शाम को उन्हें लेकर मंडी हाउस आया. वहां से गोमती गेस्ट हाउस आया, जहां से जे.एन.यू. की एक बस नियत समय पर प्रतिदिन खड़ी रहती थी. उस जगह सप्तपर्णी के कई पेड़ थे. त्रिलोचन ने सात पत्तों के गुच्छे को तोड़कर सप्तपर्णी के गूढ़ रहस्य समझाए. फिर वहीं फुटपाथ पर पान खाया. वहां से उन्हें लेकर जब जे.एन.यू. पहुंचा, तो नामवर जी केदार जी के साथ खड़े थे. वे गले लगकर भावविह्वल होकर मिले.

मैंने उस रात त्रिलोचन पर एक और कविता लिखी-

इस तुलसी का राम

घूम रहे थे

साथ त्रिलोचन

कल सड़कों पर

 

दिल्ली की आंखों में मानो

धूल पड़ी थी

उसने देखा नहीं

और फिर झापड़ मारा

 

मैंने सोचा

कैसे कहते लोग नगर यह

दिल वालों का

 

इसने देखा कहां

आग बस जलती रहती

इसने सोचा होता

फिर हम

साथ नहीं रह पाते

और त्रिलोचन पीछे

होती लोगों की भीड़

 

भीड़ से बाहर आकर

सप्तपर्णी के पत्ते तोड़े

पान चबाये

त्रिलोचन यह नाम

उपेक्षा भर का होगा

दिल वालों को

पर नामवर सिंह

केदार के साथ खड़े थे

त्रिलोचन के वे महत्त्व को समझ रहे थे

गले मिलें ज्यों

कृष्ण-सुदामा की बाहें हों

 

गुजर रही थी भीड़

बसों में बैठी-बैठी

गुजर गयी थी भीड़

त्रिलोचन बिन पहचाने

 

धूल उड़ी थी फिर सड़कों पर

पर महत्त्व क्या कमा कभी है

इस तुलसी का

इस तुलसी का राम बसा है

जन-जानस में.

 

आप देखें कि इन दोनों कविताओं में नामवर का भी जिक्र है. त्रिलोचन की आत्मीयता नामवर से कितनी थी, इसे उनकी ‘रोजनामचा’ नामक पुस्तक पढ़ने से पता चलता है.

त्रिलोचन जी ने नामवर की कविताओं की खोज करने को 1982 में कहा था. तब से लगा हुआ था. इसी खोज का परिणाम है यह पुस्तक. इस पुस्तक में मैंने नामवर की प्रारंभिक साहित्य-साधना को दर्शाने के लिए उनकी अनेक दुर्लभ एवं असंकलित रचनाओं को दिया है. जो रचनाएं विख्यात हैं, उन पर कम लिखा है. खासकर उनके बनारस के जीवन और लेखन को ही ज्यादा महत्त्व दिया है. इस कार्य में कितना सफल हुआ हूं, कह नहीं सकता.

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