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प्राची - नवंबर 2016 / कहानी / शुभारम्भ / डॉ. निर्मला तिवारी

कहानी

शुभारम्भ

डॉ. निर्मला तिवारी

‘‘पापा, चलिए न मेरे साथ! जल्दी से जल्दी तैयार हो जाइए. अम्मा भी चल रही हैं.’’

‘‘अरे, कहां ले जा रही है दीपा? मैं नहीं जा पाऊंगा. मुझे अभी अपना स्कूटर ठीक करवाना है. आज छुट्टी है, फिर मुझे समय नहीं मिलता.’’

‘‘ओह पापा! गोली मानिए स्कूटर को. कह रही हूं न, अभी तो आप मेरे साथ चलिए, जहां भी मैं ले जाऊं.’’

दामोदर झुंझला उठे. लेकिन जानते हैं, बेटी जिद्दी है. जो कहती है, करके रहती है. बेमन से ही सही, तैयार होकर साथ जाना पड़ा. जबसे दीपा नौकरी करने लगी है, तब से कुछ ज्यादा ही मनमानी करने लगी है.

‘‘अरे, कहां ले आई मुझे? यह तो कारों का शोरूम है. यहां हमारा क्या काम है भला?’’

अचकचाए हुए पापा को देखकर दीपा के चेहरे पर चांदनी-सी शुभ्र कोमल हंसी बिखर गई- ‘‘आइए पापा, आज आप कार खरीद रहे हैं. बहुत चला लिया खटारा स्कूटर. अब और नहीं. इतनी बड़ी कम्पनी में नौकरी करनेवाली दीपा के पापा को कार में ही घूमना चाहिए.’’

पापा के चेहर पर कौन से भाव झलके? खुशी! आश्चर्य! शर्मिन्दगी? थोड़ा पछतावा? क्या पता?

कुछ कह ही न पाए थे. आज उनकी बेटी उन्हें लाखों रुपये की कार दिलवाने शोरूम ले आई है. बात तो खुशी और गर्व की है, लेकिन दामोदर खुश नहीं हो पा रहे हैं. क्यों?

चलिए थोड़ा पीछे मुड़कर देख लें...

तीसरी संतान भी बेटी ही हुई. दामोदर का मन एकदम ही बुझ गया. कितनी उम्मीद लगाए थे कि इस बार बेटा होगा, लेकिन फिर बेटी? बेटी यानी कि शादी-दहेज का खर्च, खर्च और सिर्फ खर्च. अब तो कमाना है और पैसे जोड़ना है. वह भी सिर्फ बेटियों को ब्याहने के लिए. दूसरों को अपनी मेहनत-मशक्कत की कमाई सौंप देने के लिए. वारिस तो काई है नहीं कि धन जोड़कर उसे सौंपने का सुख लूट सकें. बेटियों का निरीह पिता! सर तो हमेशा झुका ही रहेगा.

दामोदर को स्थायी उदासी ने घेर लिया.

समय भी कितनी तेजी से भागता है. देखते ही देखते वह दिन आ गया कि...

‘‘कुछ भी हो जाए दीपा के पापा, मैं अपनी बेटियों को मोहल्ले के इस सड़ियल स्कूल में नहीं पढ़ाऊंगी.’’

बेटियां स्कूल जाने लायक हुईं तो दामोदर के सनातनी सोच को एक जबर्दस्त चोट पड़ी. श्यामा ऐसी जिद्दी होगी, उन्हें कहां मालूम था? औरत अपनी जिद पर अड़ जाए, तो पुरुष असहाय हो जाता है.

‘‘मेरी बेटियों अच्छे स्कूल में ही पढ़ेंगी. ना, मैं इस मामले में कुछ नहीं सुनूंगी.’’

दामोदर ने विरोध तो फिर भी किया ही- ‘‘कितनी भरी फीस है अंग्रेजी स्कूलों की, जानती हो? फीस भरते-भरते ही मैं कंगाल हो जाऊंगा. एक रुपया भी न बचा पाऊंगा. इनके महंगे स्कूल का खर्च उठाऊंगा या दहेज के लिए पैसे जोडूंगा.’’

‘‘मैं नहीं जानती, तुम क्या करोगे. लेकिन मेरा फैसला नहीं बदलेगा. हां, मैं भी कुछ काम कर लूंगी. थोड़ी सिलाई, थोड़ी छोटे बच्चों को टूयूशन...कुछ तो कमा ही लूंगी. लेकिन बेटियों की पढ़ाई के मामले में समझौता नहीं करूंगी.’’

चट्टान की तरह दृढ़ थी श्यामा.

वैसे भी श्यामा और दामोदर की गृहस्थी मजे में ही चल रही थी. सीमित आर्थिक साधनों के कारण खींचतान करके परिवार चल रहा था. यों नोंक-झोंक तो चलती रहती थी-

‘‘तुम्हारी बहिन के यहां शादी है, तो क्या मुझे ही बेच डालोगी? कितने रुपये फूंकना चाहती हो? मेरे खून-पसीने की कमाई ऐसे उड़ाने के लिए नहीं है, यह बात जान लो.’’

कैसी तीखी जहरीली जुबान! श्यामा अपनी बेबस तिलमिलाहट का क्या करे? दामोदर एक बार बोलना खरू करते, तो बोलते ही जाते. हर शब्द विष बुझे बाण की तरह श्यामा के सीधे-सादे मन को घायल कर देता. उसे दुःख होता, क्रोध भी आता. नपुंसक क्रोध!

‘‘कमाता तो मैं हूं न! पैसा मेरा है. उड़ाने में तुम्हें दर्द क्यों होगा? तुम्हें तो घर बैठे सबकुछ मिल जाता है. मेहनत से पैसे कमाओ, तो पता चले, पैसे की क्या कीमत होती है.’’

श्यामा किस पर गुस्सा निकाले? वह अपने गुस्से का प्रवाह अपने माता-पिता की ओर मोड़ देती, सारी गलती उन्हीं की है. जल्दी शादी कर देने के बजाय अगर उन्होंने पढ़ाई पर ध्यान दिया होता, तो आज श्यामा को ये बातें क्यों सुननी पड़तीं? आज उसमें नौकरी करने की क्षमता होती, तो वह भी रुपया कमाकर घर लाती और रोज-रोज यह जहर तो न पीना पड़ता.

खर्च के मामले में अपनी समझदारी पर उसे सन्देह नहीं है. एक-एक पैसा वह संभालकर ही खर्च करती है.

लेकिन यह उमा दीदी की बिटिया की शादी? श्यामा कैसे समझाए कि उमा दीदी ने उसके लिए क्या-क्या किया है! मां-बाप तो सक्षम थे नहीं, इसी बहिन ने कैसे-कैसे अपने भाई-बहिनों को पाला और अपना हक छोड़कर उसके ब्याह में खर्च किया.

आज उसकी परिस्थिति अच्छी नहीं है, तो क्या श्यामा का फर्ज नहीं है कि वह कुछ मदद करे?

यह सब दामोदर समझेंगे नहीं. क्यों नहीं है श्यामा के पास अपना कुछ? किसी भी चीज पर तो अधिकार नहीं है. वह तो मात्र रोटी-कपड़े पर काम करने वाली नौकरानी है. ना नौकरानी नहीं, गुलाम है वह. नौकरानी को तो वेतन देना पड़ता है और वह काम छोड़कर भी जा सकती है. श्यामा कहां जाए?

घर खर्च के लिए जितने पैसे दामोदर देते, उतने में ही खींचतान कर घर चलाना पड़ता. अधिक जरूरत हो, तो बातें सुनना पड़ता.

औरत इतनी मजबूर क्यों है? वह सोच के समन्दर में गहरे उतर जाती. गोता लगाकर खाली हाथ न लौटती. जो अमोल मोती वह ढूंढ़कर लाती, उन्हें छुपाकर रखती जाती. बढ़ता जाता उसके सोच का खजाना, कीमती विचारों का खजाना.

एक बात जो उसने ठान ली, तो बस ठान ली.

लड़कियां तीव्र बुद्धि थीं. जहां तक बना, श्यामा ने उन्हें घर में पढ़ाया, बड़ी क्लॉस में आने पर श्यामा की क्षमता चुक गई.

अब सवाल उठा कोचिंग का.

दामोदर से इस विषय में बात करना, यानि कि पेट्रोल को तीली दिखाना था.

श्यामा के विचारों से दामोदर के विचार मेल ही न खाते.

‘‘क्या करोगी इन्हें ज्यादा पढ़ाकर? लड़कियों से नौकरी करवाना है क्या? आखिर शादी तो करनी ही है न! मैं तो कहता हूं, पैसे बचाओ, पैसे जोड़ो और आगे की चिन्ता करो. पढ़ना-लिखना होगा, तो अपनी-अपनी ससुराल में जाकर पढ़ लेंगी.’’

यह सुनकर श्यामा का तो सारा खून ही निचुड़ गया. ससुराल जाकर? ससुराल में बेटी बेटी कहां रह जाती है? वह तो बहू बन जाती है, जिम्मेदारियों का पिटारा. कैसे पढ़ेंगी? कौन पढ़ने देगा? दिन-रात कोल्हू केबैल की तरह जुटे रहना और एक-एक पैसे के लिए पति का मुंह ताकना?

‘‘मेरा पैसा...मेरी कमाई...तुम्हारी औकात?’’ यही सब तो सुनना है. छिः, यह भी कोई जिन्दगी है? श्यामा का मुंह कड़वा हो गया.

सुना तो है, इतिहास अपने आपको दोहराता है. श्यामा सोच में पड़ गयी. बेटियों की शादी जल्दी हो जाएगी, तो इतिहास जरूर दोहराएगा अपने आपको. वही गुलामों की जिन्दगी. कहने को घर की रानी, लेकिन असल में जिसे एक दिन भी छुट्टी न मिले वह नौकरानी.

-मैं अपनी बेटियों को ऐसे जीवन में न ढकेलूंगी.- श्यामा ठान चुकी थी कि चाहे जो हो जाए, बेटियों की राह के हर कंकर-कांटे को बीनकर रहेगी. उसकी बेटियां बढ़ेंगी और जरूर आगे बढ़ेंगी.

हर बात पर झुकने, दबने वाली श्यामा ट्यूशन की बात पर अड़ी और ऐसी अड़ी कि दामोदर का सारा पौरुष बौना होकर रह गया. श्यामा को डांट-डपट कर बदाने की कोशिश की, तो श्यामा दहकती हुई ज्वाला बन गई, जिसके पास भी जाने से भय लगे.

पल-पल पिघलने वाला मोम कठोर फौलाद कैसे बन गया? दामोदर स्तब्ध थे. शायद कुछ डरे हुए.

खीझकर, झुंझलाकर ही सही, ट्यूशन का खर्च दामोदर को उठाना पड़ा.

जगदीप कपूर! दामोदर का घनिष्ठ मित्र! कैसा भाग्यशाली! दो-दो बेटे. एक भी बेटी नहीं. उसके सामने दामोदर के मन में हीन-भावना भर जाती. उसके बच्चे भी उसी स्कूल में पढ़ रहे थे, जहां दामोदर की बेटियां पढ़ती थीं.

‘‘यह कार्ड कैसा? कहां से आया है?’’

‘‘दीपा, रोमा के स्कूल से हमारे लिए आमंत्रण आया है. पुरस्कार-वितरण के वार्षिक कार्यक्रम में हमें बुलाया है.’’

दामोदर सपरिवार वार्षिकोत्सव में पहुंचे. जगदीप भी आए. दोनों मित्रों के परिवार साथ-साथ ही बैठे.

पुरस्कार-वितरण प्रारंभ हुआ, तो पढ़ाई, गीत, नाटक, वाद-विवाद, खेलकूद हर क्षेत्र में जाने कितने पुरस्कार बटोर लाईं दामोदर की बेटियां. श्यामा का हृदय उल्लास से भरा हुआ था.

कार्यक्रम के समापन के पूर्व दीपा के अभिवावकों को विशेष तौर पर सम्मानित करने के लिए मंच पर बुलाया गया, तो दामोदर का चेहरा दमक उठा. गर्व से भरे वे श्यामा के साथ स्टेज तक गए और शान से बुके लेकर लौटे.

जगदीप कपूर की वह खिसियाहट भरी बधाई! उसके लाडले तो पास ही मुश्किल से होते हैं. दामोदर अपना उल्लास छुपा ही नहीं पा रहे थे. अपने स्थान पर बैठे, तो तनकर! दो-दो बेटों का पिता सिर झुकाए बैठा ही रह गया.

‘‘किस्मत वाले हो दामोदर! बेटियां कैसे अच्छे नम्बरों से पास हो रही हैं! मेरे बेवकूफ लड़के तो पढ़ते ही नहीं हैं. बहुत परेशान हूं. समझ में नहीं आता, क्या करूं?’’

दामोदर के मन में हल्की-सी शान्ति सरक आई. चलो, लड़कियां पढ़ाई तो अच्छी कर रही हैं. शादी करने और लड़के ढूंढ़ने में आसानी रहेगी.

उम्मीद से कहीं ज्याद अंकों से दीपा ने बारहवीं उत्तीर्ण कर ली. अब बारी थी, उसे बाहर भेजकर पढ़ाई कराने की.

छोटा शहर! छोटा आसमान! जरूरत है, ऊंची उड़ान की. यहां तो वह राह ही नहीं है, जो मंजिल तक ले जाए.

दामोदर ने बेटियों के इरादे सुने, तो बुरी तरह भड़क उठे-

‘‘मेरे पास कारूं का खजाना नहीं गड़ा है, जो खोद-खोदकर देता जाऊं! लड़कियों को बाहर भेजकर पढ़ाई कराने की औकात नहीं है मेरी. यहीं पढ़ेंगी ये...’’

श्यामा चुप! बेटियां सहमी हुईं. दीपा आंसुओं में डूब गई. यहीं पंख कट जाएंगी, तो आसमान की ऊंचाइयां कैसे पा सकेगी! उसके विषय तो यहां है ही नहीं.

श्यामा ने हाथ से सरकते हुए साहस को थामा...यों डरकर चुप रह जाने से थोड़े ही काम चलेगा.

‘‘आप कैसी बात कर रहे हैं? उसे जो पढ़ना है, वे विषय यहां नहीं हैं. बाहर भेजना पड़ेगा.’’

‘‘मैं यह सब नहीं जानता. मेरी हैसियत बाहर भेजकर पढ़ाने की नहीं है. मैं लड़कियों को बाहर नहीं भेजूंगा. बाहर रहकर लड़के-लड़कियां आजाद हो जाते हैं. अपनी मनमानी करने लगते हैं. कहीं उल्टे-सीधे चक्कर में पड़कर नाक कटवा दी, तो मैं तो कहीं का नहीं रहूंगा.

‘‘मैं लड़कियों को बाहर भेजकर फिजूल में रुपया खर्च नहीं करूंगा...’’

बहुत मजबूती थी आवाज में- ‘‘कमाता तो मैं हूं, पैसे मेरे हैं. तुम करती ही क्या हो? मुफ्त में उड़ाने में तुम्हारा क्या जाता है? खुद कमाओ, तो पता चले, रुपया कैसे कमाया जाता है?’’

शूल की पीड़ा इतनी नहीं होती होगी? वह तो एक बार चुभकर थोड़ी देर दर्द देता है, लेकिन ये शब्द? गहरे धंसते हैं और असहनीय दर्द देते हैं.

श्यामा तिलमिला गई. अब? अबक्या श्यामा के अपने सपने समेट लेने पड़ेंगे? बड़ी चिन्ता हो गई श्यामा को. बेटियों का भविष्य उसे अपने अतीत से गुंथा हुआ दिखाई देने लगा. आतंक उसमें धीरे-धीरे घर करने लगा.

उसकी बेटियां भी क्या उसी की तरह जिएंगी. वहीं बर्तन, वहीं कपड़े, वहीं डॉट-डपट, निन्दा, तिरस्कार...?

नहीं, हरगिज नहीं! श्यामा अपने बिगड़े हुए अतीत में तो थिकड़े नहीं लगा सकती, लेकिन बेटियों के भविष्य को कतई चिथड़ा-चिथड़ा नहीं होने देगी.

श्यामा भी दुनिया देख रही है. आजकल लड़कियां क्या नहीं कर रही हैं. उसकी बेटियां कुशाग्र बुद्धि हैं, मेहनती हैं. उनमें तो कोई कमी है नहीं.

हां, कमी है धन की, सहयोग की. महत्त्वाकांक्षा? हां, उनमें भरपूर है. लेकिन पापा? ‘‘पराया धन ही तो होती हैं लड़कियां. शादी करके अपना घर-बार बसाएं. इनकी पढ़ाई पर लाखों खच करके हमें क्या मिलेगा? ये कमाएंगी भी, तो दूसरों का ही घर भरेंगी...हमें क्या?’’

दामोदर तो लोहे की दीवार हो रहे थे. टकराकर क्या श्यामा अपना सिर फोड़ ले? दीवार तो हटने से रही. तब? दूसरी राह खोजनी होगी. रहने दो दीवार को अपनी जगह.

अगले दिन बहुत सुबह उठकर श्यामा कहीं चली गई.

दामोदर आग बबूला.

‘‘अम्मा कह गई हैं, रात तक जा जाएंगी. मामा के घर गई हैं. नहीं, मुझे कुछ नहीं बताया.’’ डरते-डरते दीपा बोली.

बिना पूछे? बिना बताए? इतनी हिम्मत? दामोदर की बौखलाहट का कोई ओर-छोर नहीं. इतना तो समझ ही गए थे कि औरत अगर ठान ले, तो उससे निबटना मुश्किल हो जाता है.

रात तक श्यामा घर लौट आई. साथ में भतीजे रोहण को लेकर...उसने शान्त भाव से घर में प्रवेश किया. दामोदर उसे देखते ही बरस पड़े- ‘‘कहां गई थी? बताकर नहीं जा सकती थी? रोहण क्यों आया है? तुम्हारी यहीं आतद...चुप रहोगी या मुंह भी खोलोगी? मैं बक-बक किए जा रहा हूं और तुम...?’’

श्यामा ने मुंह नहीं खोला तो नहीं ही खोला. बेटियां चुप, सहमी हुई, रोहण मौन. दामोदर खुद ही उफन-उफन कर खाली होते रहे.

दीपा के मुम्बई जाकर कॉलेज में एडमीशन लेने की तारीख नजदीक आ चुकी थी और दामोदर का विरोध वैसा ही अचल था. इस कॉलेज में एडमीशन बिरले प्रतिभाशाली दात्रों को ही मिलता था. दुर्लभ सौभाग्य हाथ से निकला जा रहा था.

शाम को दामोदर ऑफिस से लौटे तो घर में अजब-सा सन्नाटा दिखा. घर कुछ खाली-खाली लगा-

‘‘रोहण चला गया क्या? दीपा दिखाई नहीं दे रही है?’’

कुछ आशंकित होते हुए उन्होंने पूछा. कभी-कभी उन्हें लगने लगता हे कि घर में उनकी पकड़ कमजोर तो नहीं पड़ गई? सत्ता की बागडोर शायद हाथ से छूटी जा रही है.

‘‘सुनिए दुबेजी!’’ हां, यह श्यामा ही थी. बात-बात पर रोकर रह जाने वाली यह नारी कितनी अजनबी लग रही थी. इसे तो दामोदर पहचानते नहीं, जो जान देने की हद तक विद्रोह पर आमादा हो, उस प्रचंड नारी के आगे कौन ठहर सकता है? दामोदर की आंखों के आगे शिव को पैरों के नीचे दबाए चंडी का स्वरूप कौंध उठा.

‘‘दद्दा ने मुझे गांव में जो खेती की जमीन दी थी, उसी से मैंने पैसों का इन्तजमाक कर लिया है. रोहण दीपा के साथ मुम्बई गया है. उसे कॉलेज और हॉस्टल में एडमीशन दिलाकर उसका सारा इन्तजाम करके लौट आएगा. दीपा जो पढ़ना चाहती है, पढ़ेगी और जरूर पढ़ेगी. आप व्यवस्था न कर सकें, तो भी वह पढ़ेगी. जरूरत पड़ी तो मैं अपना सारा जेवर बेच दूंगी, लेकिन मेरी बेटियां ऊंची उठेंगी ही.’’

दामोदर अवाक! मुंह से शब्द निकले ही नहीं. इतना बड़ा कदम उठा लिया! यह तो सूरजमुखी हुआ करती थी. पति की इच्छा के अनुरूप, उन्हीं की दिशा में घूमने वाली. अब तो खुद सूरज हो गई है, जिसकी प्रचंड किरणों से डर लगने लगा है.

औरत अपने अंदर कितने रूप छिपाए रखती है. पत्नी के इस रूप को तो दामोदर ने देखा ही नहीं था. अपने बच्चों के लिए निरीह गाय को सिंहनी में बदलते देख रहे थे वे.

चुप रह जाने के अलावा और कोई रास्ता था ही नहीं. श्यामा की यह हरकत उन्हें बहुत बुरी लगी थी. दीपा का यों बाहर रहकर पढ़ाई करना जरा भी नहीं भाया था उन्हें. लेकिन तिलमिलाकर रह जाने के अलावा और कर ही क्या सकते थे.

दीपा एक बार चल निकली, तो फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा. हर परीक्षा वह दक्षता के साथ उत्तीर्ण कर आगे बढ़ती गई. उसके प्रोत्साहन और मार्गदर्शन में रोमा और मोना भी पढ़ाई में जुटी थीं.

श्यामा की मोन तपस्या चल रही थी. मां की ममता की सीढ़ी कितनी ऊंची होती है, आज तक कोई नाप नहीं सका है. मां की ममता ने ही तो आंसू पोंछकर बालक ध्रुव को सीधे विधाता की गोद में बैठा दिया था. श्याामा अपने अन्दर शक्ति संचय करती और मां की यही शक्ति शतमुखी होकर बेटियों में समा जाती. दिन-रात का अन्तर भुलाकर वे जुट जातीं. तप कर ही तो स्वर्ण निखरता है.

बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर सबसे पहले दीपा जीवन की प्रतियोगिता में शामिल हुई. अच्छी से अच्छी नौकरियां उसके लिए जैसे तश्तरी में सजी रखी थीं. चुनाव उसे करना था! योग्यता के सामने कुछ भी दुर्लभ नहीं था.

जमा-पूंजी में से बहुत कुछ खर्च हो चुका था. दामोदर निराश हो चले. दीपा की आयु विवाह योग्य हो गई थी. वह नौकरी भी करने लगी थी. उधर रोमा और मोना भी तो कतार में थीं. दो-चार जगह बात चलाई भी, तो दहेज की मांग सुनकर ही सहम गए.

इसी दिन के लिए तो वे डर रहे थे. इसीलिए तो धन जोड़ना चाह रहे थे. अब?

मन में गुस्सा पनपने लगा.

दीपा ने सुना, तो हंस दी- ‘‘पापा आप भी! समय बदल गया है. इस बात को समझ लीजिए तो अच्छा है. साफ-साफ कहे देती हूं पापा, मैं ऐसी जगह शादी करूंगी ही नहीं, जहां लड़का दहेज मांगे. अपने पापा की जीवन भर की कमाई मैं दूसरों के घर क्यों जाने दूं? मैं खुद आपका कमाऊ बेटा हूं. आप दहेज क्यों देंगे?’’

पापा के गले झूल गई दीपा. दामोदर ने ऐसी अनोखी बात क्या कभी सुनी थी? ऐसा भी हो सकता है? बेटी बिना दहेज की शादी करेगी?

‘‘मैं नौकरी करने लगी हूं पापा. अच्छी-खासी तनख्वाह है मेरी. घर की बड़ी बेटी हूं. अब रोमा और मोना आपकी नहीं, मेरी जिम्मेदारी हैं.’’

-कोई सहारा नहीं चाहिए उसे. वह खुद सहारा देने लायक है.

अपने पैरों पर खड़ी होने से कितना आत्मविश्वास आ गया था. श्यामा की आंखों में आंसू आ गए. बेटी का यही रूप तो वह देखना चाहती थी.

दामोर सपना तो नहीं देख रहे हैं? सारी उम्र जिस तनाव की तपन में वे जिए हैं, वह क्षण भर में ही लुप्त हो जाएगी, ऐसा ख्याल तक कभी मन में नहीं आया था.

‘‘पापा, मेरी जगह अगर आपके घर बेआ जन्मा होता, तो क्या वह अपनी जिम्मेदारियां ने निभाता? समझ लीजिए, मैं ही आपका बेटा हूं....’’

दीपा उन्हें प्रज्वलित दीप-स्तम्भ की तरह लगी. कैसा अनुभव किया दामोदर ने! खुरदरे, नुकीले पत्थरों पर चलते-चलते पैरों के नीचे नरम दूब बिछ जाए, जैसे जेठ की दुपहरी में सावन की ठंडी फुहारें बरस जाएं.

बेटा होता तो? हां, याद आया. जगदीप कपूर के बेटे भी तो बड़े हो गए हैं. उस दिन मिला तो था जगदीप! वह बेचारा समय से पहले ही बूढ़ा दिखने लगा है. उसकी हालत देखकर दामोदर का मन दुःख गया था.

‘‘राहुल ने कॉलेज छोड़ दिया है. कैसे बताऊं तुम्हें? आजकल मिीना दिन-रात दारू में डूबा रहने लगा है. छोटा वाला रजनीश तो उससे भी दो कमद आगे निकल गया है. रोज जाने कैसी-कैसी लड़कियों के फोन आते हैं. एकदम बर्बाद हो गया. बताने में भी शर्म आती है. ऐसी नीच, नाक कटाने वाली औलाद भगवान दुश्मन को भी न दे. सच कहता हूं, दामोदर, जीना मुश्किल कर रखा है कमबख्तों ने!’’

बेचारे के बस आंसू ही नहीं निकले. रुआंसा तो वह हो ही गया था.

दामोदर के मन में गर्व और शान्ति का सागर लहरा रहा था. उनकी दो बेटियां ही इतना कमाने लगी हैं कि उन्होंने नया फ्लैट बुक कर लिया है. एक के आए दिन जर्मनी, जापान के चक्कर लगते रहते हैं, तो दूसरी आस्ट्रेलिया में जॉब पा चुकी है, तीसरी अच्छी नौकरी के लिए इंटरव्यू की तैयारी कर रही है.

पिछले महीने श्यामा की आंख का ऑपरेशन हुआ, तो दामोदर को एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ा. रीमा की कम्पनी ने सारा खर्च उठाया.

दामोदर के अन्दर अब बहुत कुछ बदल चुका था. श्यामा को वे हमेशा मूर्ख और कमजोर नारी मानते थे, लेकिन उसी श्यामा ने उन्हें हरा दिया. थोड़ी झेंप लगती है उन्हें, और थोड़ा अपनी सोच पर पछतावा.

श्यामा तो रोम-रोम खुशी और संतुष्टि से भरी है. विश्वविजयी होने का भाव ऐसा ही तो होता है. खुशी, गर्व, निश्चिन्तता, क्या-क्या दे दिया है बेटियों ने!

आज दामोदर हार गए हैं, लेकिन यह हार कितनी अच्छी लग रही है. भगवान को धन्यवाद कि वे हार गए. श्यामा की जीत ने तो सभी को जिला दिया.

दीपा पूर्ण विश्वास के साथ नई कार चला रही है. बाजू में बैठे वे बाहर देख रहे हैं. वे चाहते हैं कि लोग उन्हें चमचमाती कार में बैठा देख लें. उनकी अपनी कार!!

मन आश्वस्ति से भरा है. तमाम कुशंकाएं मिट गई हैं. अब बुढ़ापे की कोई चिन्ता नहीं. सब हो जाएगा. बेटियां खुद समर्थ हैं.

थोड़े आश्चर्य और खेद के साथ वे सोचते हैं कि उनकी सोच कितनी गलत थी.

सम्पर्कः 1729, सरस्वती कॉलोनी, पी एन बी कॉलोनी रोड, चेरीताल, जबलपुर-482002

मोः 94796 40496

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